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बंद कमरे की आवाज़ भाग 1 — आधी रात की दस्तक

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

शहर से लगभग पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुरानी हवेली खड़ी थी, जिसे लोग काली हवेली के नाम से जानते थे। हवेली करीब सौ साल पुरानी थी और पिछले पच्चीस वर्षों से पूरी तरह बंद पड़ी थी।

 

गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि हवेली के अंदर एक कमरा ऐसा था, जिसका दरवाज़ा कभी नहीं खोला गया। उस कमरे से रात के समय आवाज़ें आती थीं।

 

कभी किसी बच्चे के रोने की।

 

कभी किसी औरत के धीरे-धीरे गुनगुनाने की।

 

और कभी…

 

दरवाज़ा खटखटाने की।

 

गाँव वाले उस हवेली के पास से दिन में भी गुजरने से बचते थे।

 

लेकिन आरव को इन बातों पर विश्वास नहीं था।

 

आरव शहर में पढ़ा-लिखा एक युवा था और कुछ दिनों के लिए अपने नाना के गाँव आया था। उसे बचपन से ही पुराने मकानों और रहस्यमयी जगहों के बारे में जानने का शौक था।

 

एक शाम चाय की दुकान पर बैठे-बैठे उसने हवेली का जिक्र छेड़ दिया।

 

“लोग कहते हैं उस हवेली में भूत है,” आरव ने हँसते हुए कहा, “लेकिन किसी ने देखा भी है उसे?”

 

चाय वाले बूढ़े हरिराम ने उसकी ओर गंभीरता से देखा।

 

“देखने की जरूरत नहीं पड़ती बेटा। कुछ चीज़ें दिखाई नहीं देतीं… महसूस होती हैं।”

 

“और वो बंद कमरा?”

 

हरिराम का चेहरा अचानक उतर गया।

 

“उसके बारे में मत पूछो।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“क्यों?”

 

हरिराम ने धीमी आवाज़ में कहा—

 

“क्योंकि जो उस कमरे की आवाज़ सुन लेता है… वह फिर पहले जैसा नहीं रहता।”

 

आरव ने इसे भी गाँव की कहानी समझकर टाल दिया।

 

लेकिन उसी रात करीब दो बजे उसकी नींद अचानक खुल गई।

 

कमरे में अजीब-सी ठंड थी।

 

खिड़की बंद थी, फिर भी पर्दा धीरे-धीरे हिल रहा था।

 

आरव ने उठकर खिड़की देखी।

 

सब कुछ सामान्य था।

 

वह वापस बिस्तर पर जाने ही वाला था कि…

 

ठक… ठक… ठक…

 

दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

 

आरव रुक गया।

 

“कौन?”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

कुछ सेकंड बाद फिर आवाज़ हुई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

इस बार आवाज़ के साथ एक धीमी फुसफुसाहट भी सुनाई दी।

 

“आरव…”

 

उसका शरीर सिहर उठा।

 

आवाज़ किसी बच्चे की थी।

 

आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

 

“कौन है?”

 

बाहर सन्नाटा था।

 

उसने दरवाज़ा खोला।

 

गलियारा खाली था।

 

लेकिन फर्श पर गीले पैरों के छोटे-छोटे निशान बने हुए थे।

 

वे निशान दरवाज़े से शुरू होकर…

 

सीधे हवेली की दिशा में जा रहे थे।

 

आरव ने तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया।

 

सुबह उसने अपने नाना से इस बारे में पूछा।

 

नाना कुछ देर चुप रहे।

 

फिर बोले—

 

“तुमने हवेली की आवाज़ सुनी है?”

 

आरव चौंक गया।

 

“आपको कैसे पता?”

 

नाना ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्योंकि ये पहली बार नहीं हुआ।”

 

“क्या मतलब?”

 

नाना ने गहरी साँस ली।

 

“पच्चीस साल पहले उस हवेली में ठाकुर वीरेंद्र सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे। उनकी पत्नी, उनका बेटा और उनकी छोटी बेटी—मीरा।”

 

“फिर?”

 

“एक रात हवेली में आग लगी। ठाकुर और उनकी पत्नी तो बाहर निकल आए, लेकिन मीरा अंदर रह गई।”

 

आरव ने पूछा, “क्या उसकी मौत हो गई?”

 

नाना ने सिर हिलाया।

 

“कहते हैं कि आग लगने से पहले मीरा को हवेली के एक कमरे में बंद कर दिया गया था।”

 

आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मीरा लगातार कह रही थी कि कमरे की दीवार के पीछे से कोई उसे बुलाता है।”

 

कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।

 

नाना ने आगे कहा—

 

“लोगों ने सोचा बच्ची डर गई है। लेकिन उस रात उसने अपने पिता से कहा था—”

 

नाना की आवाज़ काँपने लगी।

 

“पापा… कमरे में कोई और भी है।”

 

आरव के रोंगटे खड़े हो गए।

 

“उसके बाद?”

 

“सुबह कमरा खोला गया। मीरा वहाँ नहीं थी।”

 

“क्या?”

 

“कमरा अंदर से बंद था। खिड़की भी बंद। लेकिन बच्ची गायब थी।”

 

आरव कुछ बोल नहीं पाया।

 

“फिर हवेली में आग लगी।”

 

“और उसके बाद से वह कमरा बंद है?”

 

“हाँ।”

 

आरव के मन में अब डर के साथ जिज्ञासा भी पैदा हो चुकी थी।

 

उस दिन दोपहर को उसने हवेली जाने का फैसला किया।

 

नाना ने बहुत मना किया।

 

लेकिन आरव नहीं माना।

 

हवेली का मुख्य दरवाज़ा जंग लगा हुआ था। उसे धक्का देते ही वह भयानक आवाज़ के साथ खुल गया।

 

अंदर धूल, मकड़ी के जाले और सड़ती लकड़ी की गंध थी।

 

दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे।

 

आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।

 

ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास उसे एक पुरानी तस्वीर मिली।

 

तस्वीर में चार लोग थे।

 

ठाकुर वीरेंद्र सिंह।

 

उनकी पत्नी।

 

एक छोटा लड़का।

 

और एक छोटी लड़की।

 

मीरा।

 

आरव तस्वीर को ध्यान से देखने लगा।

 

अचानक…

 

तस्वीर में मीरा की आँखों पर उसे कुछ अजीब दिखाई दिया।

 

ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आँखें तस्वीर के अंदर से उसे देख रही हों।

 

आरव ने तस्वीर नीचे रख दी।

 

उसी समय ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

 

धड़ाम!

 

वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

 

ऊपर एक लंबा गलियारा था।

 

गलियारे के आखिरी छोर पर एक काला दरवाज़ा था।

 

दरवाज़े पर लोहे की मोटी जंजीर बंधी थी।

 

यही था वह बंद कमरा।

 

आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

 

तभी…

 

अंदर से आवाज़ आई।

 

“आरव…”

 

वह पीछे हट गया।

 

आवाज़ बिल्कुल साफ थी।

 

“आरव… मुझे बाहर निकालो।”

 

आरव का गला सूख गया।

 

वह भागना चाहता था।

 

लेकिन तभी अंदर से एक बच्ची रोने लगी।

 

“मुझे बहुत डर लग रहा है…”

 

आरव ने काँपते हुए पूछा—

 

“तुम… मीरा हो?”

 

कुछ पल तक कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर अंदर से धीमी आवाज़ आई—

 

“नहीं…”

 

आरव की साँस रुक गई।

 

आवाज़ फिर आई—

 

“मीरा तो बहुत पहले चली गई।”

 

दरवाज़े के नीचे से अचानक काला पानी जैसा कुछ बाहर आने लगा।

 

आरव पीछे हट गया।

 

और तभी कमरे के अंदर से किसी ने जोर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया।

 

धड़ाम!

 

धड़ाम!

 

धड़ाम!

 

जंजीरें हिलने लगीं।

 

आरव भागने के लिए मुड़ा।

 

लेकिन सीढ़ियों के नीचे…

 

एक छोटी लड़की खड़ी थी।

 

उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।

 

बाल उसके चेहरे को ढके हुए थे।

 

आरव ने काँपते हुए पूछा—

 

“तुम… कौन हो?”

 

लड़की ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

 

उसके चेहरे पर आँखें नहीं थीं।

 

सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे।

 

और उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान थी।

 

उसने कहा—

 

“तुमने दरवाज़ा क्यों खोला?”

 

आरव ने पीछे देखा।

 

बंद कमरे की जंजीर…

 

अपने आप खुल चुकी थी।

 

और कमरे के अंदर से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही थी।

 

ठक…

 

ठक…

 

ठक…

 

कोई कमरे से बाहर आ रहा था।

 

आरव ने दौड़ लगा दी।

 

लेकिन उसके पीछे से एक आवाज़ गूँजी—

 

“आरव…”

 

“अब तुमने मुझे सुन लिया है।”

 

और उसी क्षण…

 

हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

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