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कातिल कौन? भाग 3 — असली कातिल

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

रात के ठीक बारह बजे अर्जुन पुराने थिएटर के सामने खड़ा था।

 

थिएटर वर्षों से बंद था।

 

दरवाज़े पर जंग लगी थी और अंदर घना अंधेरा था।

 

अर्जुन ने अपनी पिस्तौल निकाली और धीरे-धीरे अंदर प्रवेश किया।

 

“सुमन!”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

अंदर टूटी हुई कुर्सियाँ और पुराने पोस्टर पड़े थे।

 

अचानक पीछे से आवाज़ आई—

 

“आपको अकेले आने को कहा था।”

 

अर्जुन पलटा।

 

एक आदमी अंधेरे में खड़ा था।

 

चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

 

अर्जुन ने पिस्तौल तान दी।

 

“सुमन कहाँ है?”

 

वह आदमी हँसा।

 

“पहले आपको यह समझना होगा कि आप किसे बचाने आए हैं।”

 

अर्जुन ने कहा—

 

“अपना चेहरा दिखाओ।”

 

वह व्यक्ति धीरे-धीरे रोशनी में आया।

 

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

 

वह आदमी था—

 

इंस्पेक्टर विक्रम।

 

अर्जुन का अपना साथी।

 

“तुम?”

 

विक्रम मुस्कुराया।

 

“हाँ।”

 

अर्जुन ने पिस्तौल सीधी कर दी।

 

“सुमन कहाँ है?”

 

“जिंदा है।”

 

“उसे कहाँ रखा है?”

 

विक्रम ने थिएटर के पीछे बने कमरे की ओर इशारा किया।

 

“लेकिन उसे बचाने से पहले आपको पूरी कहानी सुननी होगी।”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“तुमने विवेक और विनय को मारा?”

 

विक्रम ने कुछ क्षण उसे देखा।

 

फिर कहा—

 

“हाँ।”

 

अर्जुन कुछ नहीं बोला।

 

विक्रम आगे बढ़ा।

 

“लेकिन वजह वह नहीं है जो तुम सोच रहे हो।”

 

“तो वजह क्या है?”

 

“दस साल पहले मेरी बहन माधवी थी।”

 

अर्जुन का चेहरा बदल गया।

 

माधवी…

 

विवेक की पत्नी।

 

विक्रम ने कहा—

 

“माधवी को पता चल गया था कि कंपनी के दो करोड़ रुपये किसने चुराए थे।”

 

“विवेक और विनय?”

 

“हाँ।”

 

“लेकिन तुमने कहा था कि विवेक ने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

 

विक्रम हँसा।

 

“वह कहानी थी।”

 

“सच क्या है?”

 

विक्रम ने कहा—

 

“विवेक और विनय दोनों ने पैसे चुराए थे। माधवी ने उन्हें पकड़ लिया। उसने पुलिस में जाने की धमकी दी।”

 

“फिर?”

 

“उन्होंने माधवी को डराने की कोशिश की। उस रात कार में उसका पीछा किया गया। उसकी कार का ब्रेक काट दिया गया।”

 

अर्जुन ने धीमे से पूछा—

 

“और वह मर गई।”

 

विक्रम ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“लेकिन केस में इसे हादसा बताया गया।”

 

“क्योंकि पुलिस रिकॉर्ड बदल दिया गया था।”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“किसने?”

 

विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।

 

“उस समय के थानेदार ने।”

 

अर्जुन चुप हो गया।

 

विक्रम बोला—

 

“वही थानेदार तुम्हारा पिता था।”

 

अर्जुन के हाथ से पिस्तौल लगभग ढीली पड़ गई।

 

“मेरे… पिता?”

 

“हाँ।”

 

“तुम झूठ बोल रहे हो।”

 

“अगर झूठ है तो यह देखो।”

 

विक्रम ने एक पुरानी फाइल अर्जुन की ओर फेंक दी।

 

अर्जुन ने फाइल खोली।

 

उसमें माधवी की दुर्घटना की रिपोर्ट थी।

 

लेकिन आखिरी पन्ने पर एक नोट था—

 

“दुर्घटना नहीं। ब्रेक से छेड़छाड़ की संभावना।”

 

उस रिपोर्ट के नीचे उसके पिता के हस्ताक्षर थे।

 

अर्जुन की आँखों में गुस्सा भर आया।

 

“मेरे पिता ने केस क्यों दबाया?”

 

विक्रम ने कहा—

 

“क्योंकि उन्हें रिश्वत दी गई थी।”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“किसने?”

 

“विवेक और विनय ने।”

 

कुछ क्षण तक दोनों के बीच सन्नाटा रहा।

 

फिर अर्जुन ने पूछा—

 

“तो तुमने उन्हें मार दिया?”

 

“हाँ।”

 

“सुमन?”

 

“वह गवाह थी।”

 

“उसे क्यों उठाया?”

 

“क्योंकि वह उस रात वहाँ थी।”

 

अर्जुन ने चौंककर पूछा—

 

“वह क्या जानती थी?”

 

विक्रम ने कहा—

 

“उसने माधवी की कार को उस रात जाते देखा था।”

 

“और उसने दस साल तक चुप्पी क्यों साधे रखी?”

 

“क्योंकि विवेक उसे पैसे देता रहा।”

 

अर्जुन ने गहरी साँस ली।

 

“लेकिन राहुल?”

 

विक्रम मुस्कुराया।

 

“वह निर्दोष है।”

 

“और नैना?”

 

“वह भी।”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“तो लाल बैग में खून क्यों था?”

 

विक्रम ने कहा—

 

“मैंने रखा था। राहुल को फँसाने के लिए।”

 

“और सुमन के कमरे में खून?”

 

“नकली।”

 

अर्जुन ने धीरे से पूछा—

 

“लेकिन एक बात समझ नहीं आई। विवेक की हत्या के बाद जो कागज़ मिला था—’कातिल तुम्हारे बहुत करीब है’—वह किसने लिखा?”

 

विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।

 

“विवेक ने।”

 

“क्या?”

 

“उसे पता था कि मैं उसके पीछे हूँ। उसने मरने से पहले सच का इशारा करने की कोशिश की।”

 

अर्जुन ने कहा—

 

“तो उसने तुम्हें पहचाना था?”

 

“हाँ।”

 

“फिर उसने तुम्हें अंदर क्यों आने दिया?”

 

विक्रम कुछ पल चुप रहा।

 

“क्योंकि वह जानता था कि मैं उसे मारने वाला हूँ।”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“और उसने विरोध नहीं किया?”

 

विक्रम ने कहा—

 

“उसने सिर्फ एक बात कही थी।”

 

“क्या?”

 

“उसने कहा था—’तुम्हें लगता है तुम न्याय कर रहे हो, लेकिन एक दिन तुम्हें भी अपने किए का जवाब देना पड़ेगा।’”

 

अर्जुन ने पिस्तौल नीचे नहीं की।

 

“सुमन को बाहर लाओ।”

 

विक्रम पीछे मुड़ा।

 

लेकिन तभी थिएटर के पीछे से आवाज़ आई—

 

“अर्जुन!”

 

अर्जुन दौड़कर वहाँ पहुँचा।

 

सुमन कुर्सी से बंधी थी।

 

अर्जुन ने उसे खोल दिया।

 

विक्रम भागने लगा।

 

अर्जुन ने उसका पीछा किया।

 

दोनों थिएटर की छत पर पहुँच गए।

 

विक्रम ने कहा—

 

“मैंने जो किया गलत था, लेकिन उन लोगों को सजा मिलनी चाहिए थी।”

 

अर्जुन ने कहा—

 

“सजा देने का अधिकार तुम्हें नहीं था।”

 

विक्रम ने पिस्तौल निकाली।

 

अर्जुन ने भी हथियार तान दिया।

 

कुछ सेकंड तक दोनों आमने-सामने खड़े रहे।

 

फिर विक्रम ने पिस्तौल नीचे कर दी।

 

“शायद तुम सही हो।”

 

उसने हथियार जमीन पर रख दिया।

 

पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

 

मामला अदालत पहुँचा।

 

जाँच में पुराने रिकॉर्ड दोबारा खोले गए।

 

माधवी की मौत को फिर से जाँचा गया।

 

विवेक और विनय के आर्थिक घोटाले का सच भी सामने आया।

 

राहुल और नैना को निर्दोष पाया गया।

 

सुमन ने अदालत में गवाही दी।

 

और कई सालों बाद माधवी के परिवार को न्याय मिला।

 

लेकिन कहानी का सबसे दुखद हिस्सा कुछ और था।

 

विक्रम ने अदालत में अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

 

सजा सुनाए जाने से पहले उसने अर्जुन से सिर्फ एक बात कही—

 

“तुम्हारे पिता ने कानून को बेचा था। मैंने कानून को अपने हाथ में लिया। फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों गलत थे।”

 

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

वह बाहर निकल आया।

 

आसमान में बारिश हो रही थी।

 

कई महीनों बाद एक शाम अर्जुन अपने घर में पुरानी फाइलें देख रहा था।

 

उसे अपने पिता की एक पुरानी डायरी मिली।

 

डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

 

“माधवी की मौत का असली सच मैं जानता हूँ। लेकिन अगर मैंने सच बताया तो मेरा परिवार खत्म हो जाएगा।”

 

अर्जुन कुछ देर तक उस पन्ने को देखता रहा।

 

फिर उसने डायरी बंद कर दी।

 

उसे समझ आ गया था कि इस कहानी में सिर्फ एक कातिल नहीं था।

 

एक ने लालच में अपराध किया।

 

एक ने सच छिपाया।

 

एक ने बदला लेने के लिए हत्या की।

 

और कई लोगों ने डर के कारण चुप्पी साध ली।

 

लेकिन कानून की नजर में…

 

कातिल सिर्फ एक था।

 

इंस्पेक्टर विक्रम।

 

और आखिरकार…

 

कातिल पकड़ा गया।

 

कहानी समाप्त।

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