दूसरी सुबह पुलिस को शहर के पुराने रेलवे गोदाम से एक फोन आया।
गोदाम कई वर्षों से बंद पड़ा था।
अंदर एक आदमी की लाश मिली थी।
इंस्पेक्टर अर्जुन राठौड़ तुरंत वहाँ पहुँचा।
लाश देखकर वह कुछ क्षण के लिए चुप रह गया।
मृत व्यक्ति की पहचान हुई—
विनय कपूर।
विनय एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था।
अर्जुन ने उसकी जेब की तलाशी ली।
एक छोटी चाबी मिली।
और उसके साथ एक कागज़।
कागज़ पर लिखा था—
“पहली मौत सिर्फ शुरुआत थी।”
अर्जुन के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।
दो हत्याएँ।
दोनों के बीच कोई संबंध जरूर था।
विनय के फोन की जाँच की गई।
उसकी आखिरी कॉल भी विवेक के नंबर पर थी।
लेकिन वह कॉल हत्या से तीन दिन पहले की थी।
अर्जुन ने अपनी टीम से कहा—
“विवेक और विनय के बीच संबंध खोजो।”
कुछ घंटों बाद एक पुरानी फाइल सामने आई।
दोनों लगभग दस साल पहले एक ही कंपनी में काम करते थे।
और उस कंपनी में एक महिला भी काम करती थी।
माधवी।
वही माधवी जो विवेक की पत्नी थी।
अर्जुन के लिए अब मामला और गंभीर हो गया।
उसने पुराने रिकॉर्ड निकलवाए।
दस साल पहले कंपनी में आर्थिक घोटाला हुआ था।
कंपनी के खाते से लगभग दो करोड़ रुपये गायब हुए थे।
जाँच में विवेक और विनय दोनों के नाम सामने आए थे।
लेकिन मामला दबा दिया गया।
क्यों?
क्योंकि कंपनी के मालिक ने अचानक शिकायत वापस ले ली थी।
अर्जुन ने मालिक से पूछताछ की।
उसने कहा—
“मुझे इस मामले के बारे में कुछ नहीं पता।”
अर्जुन ने सामने फाइल रख दी।
“दस साल पुरानी रिपोर्ट में आपका हस्ताक्षर है।”
मालिक चुप हो गया।
“सच बताइए।”
वह आखिरकार बोला—
“माधवी को सब पता था।”
“क्या?”
“उसे पता था कि पैसे किसने चुराए थे।”
“किसने?”
वह डरते हुए बोला—
“विनय।”
अर्जुन ने पूछा—
“और विवेक?”
“विवेक ने उसे बचाने की कोशिश की थी।”
“क्यों?”
“क्योंकि विवेक भी इसमें शामिल था।”
अर्जुन को जैसे पूरा मामला समझ आने लगा।
लेकिन तभी एक और बात सामने आई।
विनय की हत्या वाली जगह के पास लगे पुराने कैमरे की फुटेज मिली।
रात 1:14 बजे एक व्यक्ति गोदाम के अंदर जाता दिखाई दिया।
उसने चेहरा ढक रखा था।
कद मध्यम था।
वह व्यक्ति कुछ देर बाद बाहर आया।
लेकिन उसके हाथ में एक चीज थी—
एक लाल रंग का बैग।
अर्जुन ने फुटेज को बार-बार देखा।
फिर उसे कुछ अजीब दिखाई दिया।
वह व्यक्ति चलते समय हल्का-सा लंगड़ा रहा था।
अर्जुन को तुरंत एक नाम याद आया—
राहुल।
राहुल के दाहिने पैर में पुरानी चोट थी।
पुलिस उसके घर पहुँची।
राहुल वहाँ नहीं था।
कमरे की तलाशी ली गई।
अलमारी में एक लाल बैग मिला।
उसमें खून से सना कपड़ा था।
और एक पुराना मोबाइल।
अर्जुन ने मोबाइल चालू किया।
उसमें सिर्फ एक वीडियो था।
वीडियो में विवेक बैठा था।
उसके सामने कैमरा रखा था।
विवेक कह रहा था—
“अगर मेरी हत्या हो जाए तो समझ लेना कि मैंने जो सच छिपाया था, वह अब किसी के लिए खतरा बन चुका है।”
वीडियो अचानक बंद हो गया।
अर्जुन ने तुरंत राहुल की तलाश शुरू कर दी।
रात करीब दस बजे राहुल खुद पुलिस स्टेशन पहुँचा।
उसने कहा—
“मैंने किसी को नहीं मारा।”
अर्जुन ने पूछा—
“फिर तुम्हारा बैग हत्या की जगह क्यों मिला?”
राहुल का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मुझे नहीं पता।”
“तुम विनय को जानते थे?”
“हाँ।”
“क्यों?”
राहुल चुप रहा।
अर्जुन ने कहा—
“तुम्हारे पास दो विकल्प हैं। सच बताओ या गिरफ्तार हो जाओ।”
राहुल ने आखिरकार कहा—
“विनय ने मेरे भाई को ब्लैकमेल किया था।”
“किस बात पर?”
“दस साल पुराने घोटाले पर।”
“और तुम्हारे भाई ने पैसे दिए?”
“हाँ।”
“कितने?”
“हर साल।”
अर्जुन ने पूछा—
“तुम्हें यह सब कैसे पता?”
राहुल ने कहा—
“क्योंकि मैं खुद विनय से मिला था।”
“कब?”
“विवेक की हत्या से एक दिन पहले।”
अर्जुन ने उसे घूरा।
“तुमने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”
राहुल ने सिर झुका लिया।
“क्योंकि मुझे डर था।”
“किससे?”
राहुल ने जवाब नहीं दिया।
उसी समय पुलिस स्टेशन के बाहर गोली चलने की आवाज़ आई।
सभी अधिकारी बाहर भागे।
सड़क पर कोई नहीं था।
लेकिन जमीन पर एक लिफाफा पड़ा था।
अर्जुन ने उसे उठाया।
अंदर एक कागज़ था—
“गलत आदमी को पकड़ रहे हो।”
और नीचे लिखा था—
“अगली लाश तुम्हारे बहुत करीब होगी।”
अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।
उसने तुरंत नैना और सुमन को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया।
लेकिन रात करीब दो बजे पुलिस स्टेशन में बिजली चली गई।
सिर्फ दस सेकंड के लिए।
जब रोशनी वापस आई…
सुमन गायब थी।
उसके कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था।
खिड़की बंद थी।
लेकिन कमरे के फर्श पर खून की कुछ बूंदें थीं।
अर्जुन ने दरवाज़ा तोड़कर अंदर प्रवेश किया।
सुमन वहाँ नहीं थी।
टेबल पर सिर्फ एक कागज़ पड़ा था।
उस पर लिखा था—
“वह मरने वाली नहीं थी। उसे सच बोलने के लिए ले जाया गया है।”
अर्जुन ने तुरंत आसपास के कैमरों की फुटेज देखी।
करीब 1:58 बजे एक व्यक्ति पुलिस स्टेशन के पीछे दिखाई दिया।
उसने सुमन को बाहर ले जाते समय अपना चेहरा छिपाया हुआ था।
लेकिन कैमरे ने उसके हाथ की घड़ी साफ रिकॉर्ड की।
काली घड़ी।
अर्जुन को याद आया—
वही घड़ी उसने नैना के हाथ में देखी थी।
अगली सुबह नैना को हिरासत में लिया गया।
उसने कोई विरोध नहीं किया।
अर्जुन ने पूछा—
“सुमन कहाँ है?”
नैना ने कहा—
“मुझे नहीं पता।”
“तुम्हारी घड़ी कैमरे में दिखाई दी है।”
नैना कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली—
“हाँ। मैं वहाँ थी।”
अर्जुन ने टेबल पर हाथ मारा।
“तो सुमन को तुमने उठाया?”
नैना ने धीरे से कहा—
“नहीं।”
“तो कौन?”
नैना ने उसकी आँखों में देखा।
और बहुत धीमी आवाज़ में बोली—
“आप जिसे खोज रहे हैं… वह आपसे एक कदम आगे है।”
अर्जुन ने पूछा—
“कौन है?”
नैना ने कहा—
“आपके अपने विभाग में कोई।”
अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।
“क्या मतलब?”
नैना ने कहा—
“विवेक की हत्या के बाद सबसे पहले घटनास्थल पर कौन पहुँचा था?”
अर्जुन चुप हो गया।
नैना मुस्कुराई।
“आप।”
उसी क्षण अर्जुन के फोन पर एक संदेश आया।
एक अज्ञात नंबर से।
संदेश में एक तस्वीर थी।
तस्वीर में सुमन एक अंधेरे कमरे में बंधी हुई थी।
उसके पीछे एक व्यक्ति खड़ा था।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन हाथ में वही काली घड़ी थी।
नीचे लिखा था—
“अगर कातिल को पकड़ना है, तो आज रात पुराने थिएटर में अकेले आना।”
अर्जुन ने फोन बंद किया।
अब उसे यकीन था—
कातिल पुलिस से एक कदम आगे था।
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि पुराने थिएटर में उसका सामना सिर्फ कातिल से नहीं…
बल्कि दस साल पुराने उस राज से होने वाला था, जिसके कारण पहली हत्या हुई थी।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
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शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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