रात के लगभग बारह बज चुके थे।आसमान में चाँद तो था, लेकिन उसके चारों ओर इतने घने बादल छाए थे कि उसकी रोशनी जमीन तक पहुँचने के लिए संघर्ष कर रही थी। पूरे गाँव पर अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।
गाँव का नाम था भैरवपुर।
छोटा-सा गाँव था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वहाँ एक ऐसी दहशत फैल चुकी थी, जिसने लोगों को रात में अपने ही घरों में कैद कर दिया था।
लोग कहते थे कि गाँव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ के नीचे एक डायन रहती है।
किसी ने उसे सफेद कपड़ों में देखा था।
किसी ने उसके लंबे बाल देखे थे।
किसी ने दावा किया था कि आधी रात को वह पेड़ के नीचे बैठकर किसी बच्चे की तरह रोती है।
और कुछ लोगों का कहना था कि जिसने भी उसकी आँखों में देख लिया, उसकी मौत निश्चित है।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि पिछले एक महीने में गाँव के तीन लोग रहस्यमय तरीके से गायब हो चुके थे।
उनमें से पहला था रामलाल।
दूसरी थी जमुना।
और तीसरा था गाँव का चौकीदार हरिया।
तीनों के घरों के बाहर सुबह सिर्फ एक चीज मिलती थी—
काले राख जैसे पैरों के निशान।
हरिया के गायब होने के बाद गाँव के मुखिया ने घोषणा कर दी थी—
“आज से सूरज ढलने के बाद कोई भी घर से बाहर नहीं निकलेगा।”
लेकिन उस रात एक लड़की घर से निकल चुकी थी।
उसका नाम था नंदिनी।
नंदिनी शहर से अपने गाँव आई थी। वह पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी। वह भूत-प्रेत और डायन जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करती थी।
उसके पिता की मृत्यु के बाद उसकी माँ गाँव में अकेली रहती थी, इसलिए नंदिनी कुछ दिनों के लिए गाँव आई थी।
उस रात अचानक उसकी माँ की तबीयत खराब हो गई।
दवा घर में नहीं थी।
नंदिनी ने घड़ी देखी।
बारह बजकर पाँच मिनट।
उसकी माँ ने कमजोर आवाज़ में कहा—
“बेटी… सुबह तक रुक जा।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—
“माँ, डरने की जरूरत नहीं है। मैं अभी दवा लेकर आती हूँ।”
माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बाहर मत जाना।”
“क्यों?”
माँ की आँखें डर से फैल गईं।
“वह आज रात फिर निकली है।”
नंदिनी कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
“माँ, कोई डायन नहीं है। गाँव वालों ने अफवाह फैला रखी है।”
माँ ने सिर हिलाया।
“काश तू सही होती…”
नंदिनी ने लालटेन उठाई और घर से बाहर निकल गई।
गली में कदम रखते ही उसे लगा जैसे पूरा गाँव उसे देख रहा हो।
हर घर का दरवाजा बंद था।
खिड़कियाँ बंद थीं।
कहीं कोई आवाज नहीं थी।
बस दूर कहीं कुत्ते के रोने की आवाज आ रही थी।
हूँऽऽऽ… हूँऽऽऽ…
नंदिनी तेज कदमों से आगे बढ़ने लगी।
तभी उसे अपने पीछे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।
छप… छप… छप…
वह रुक गई।
आवाज भी रुक गई।
उसने पीछे देखा।
सड़क खाली थी।
नंदिनी ने खुद को समझाया—
“शायद मेरा भ्रम है।”
वह फिर आगे बढ़ी।
कुछ कदम बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।
छप… छप… छप…
इस बार आवाज बिल्कुल उसके पीछे थी।
नंदिनी ने अचानक मुड़कर देखा।
एक सफेद कपड़े पहने औरत सड़क के बीच खड़ी थी।
उसके बाल चेहरे पर लटक रहे थे।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
नंदिनी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
उसने कांपती आवाज में पूछा—
“कौन हो तुम?”
औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।
नंदिनी ने लालटेन ऊपर उठाई।
अचानक हवा का तेज झोंका आया।
लालटेन बुझ गई।
अंधेरे में एक धीमी आवाज गूँजी—
“नंदिनी…”
नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“तुम मेरा नाम कैसे जानती हो?”
औरत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगी।
नंदिनी पीछे हटने लगी।
फिर औरत ने अपना सिर उठाया।
उसका चेहरा देखकर नंदिनी की चीख निकल गई।
चेहरा सफेद था।
आँखें बिल्कुल काली।
और होंठों पर एक अजीब मुस्कान।
वह औरत फुसफुसाई—
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”
नंदिनी भागने के लिए मुड़ी।
लेकिन तभी उसके सामने कोई आकर खड़ा हो गया।
वह उसका बचपन का दोस्त अमन था।
अमन ने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।
“भागो!”
दोनों पूरी ताकत से दौड़ने लगे।
पीछे से उस औरत की हँसी सुनाई दे रही थी।
हा… हा… हा…
दोनों दौड़ते हुए पुराने मंदिर तक पहुँचे।
अमन ने मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया।
कुछ पल बाद बाहर किसी के पैरों की आवाज सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
नंदिनी की साँसें तेज चल रही थीं।
अमन ने फुसफुसाकर कहा—
“वह यहाँ तक आ गई है।”
नंदिनी ने पूछा—
“तुमने उसे पहले भी देखा है?”
अमन ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“कब?”
“तीन दिन पहले।”
“फिर तुमने किसी को बताया क्यों नहीं?”
अमन कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“क्योंकि उस रात मैंने उसके पीछे जाकर जो देखा था… उसके बाद से मुझे डर लगता है।”
“क्या देखा?”
अमन ने मंदिर के फर्श की तरफ देखा।
“वह किसी इंसान की तरह चल रही थी।”
नंदिनी ने कहा—
“तो?”
अमन ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन उसके पैर उल्टी दिशा में थे।”
नंदिनी के चेहरे का रंग उड़ गया।
अचानक मंदिर के बाहर से एक आवाज आई—
“अमन…”
अमन काँप गया।
आवाज उसकी माँ की थी।
“बेटा… दरवाजा खोलो…”
अमन दरवाजे की ओर बढ़ने लगा।
नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको!”
“मेरी माँ बाहर है!”
“नहीं।”
“तुम्हें कैसे पता?”
नंदिनी ने कहा—
“क्योंकि तुम्हारी माँ तो पाँच साल पहले मर चुकी हैं।”
अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।
बाहर की आवाज अचानक बदल गई।
अब वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज थी।
“बहुत समझदार बनते हो…”
मंदिर का दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
नंदिनी और अमन पीछे हट गए।
फिर अचानक सब शांत हो गया।
लगभग पाँच मिनट तक कोई आवाज नहीं आई।
अमन ने धीरे से कहा—
“शायद वह चली गई।”
नंदिनी ने दरवाजे के पास जाकर बाहर झाँका।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन जमीन पर कुछ लिखा हुआ था।
राख से।
नंदिनी नीचे बैठी और पढ़ने लगी।
वहाँ लिखा था—
“पहला नाम मिल गया।”
नंदिनी के हाथ काँपने लगे।
“पहला नाम?”
अमन ने पूछा—
“किसका?”
नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।
उसी समय मंदिर के पीछे से घंटी बजने लगी।
टन… टन… टन…
दोनों पीछे मुड़े।
मंदिर में कोई नहीं था।
फिर भी घंटी लगातार बज रही थी।
अमन ने कहा—
“हमें यहाँ से निकलना होगा।”
दोनों मंदिर से बाहर आए।
सड़क पर पहुँचते ही उन्हें गाँव का बूढ़ा पुजारी हरिदास बाबा दिखाई दिया।
उसने दोनों को देखते ही कहा—
“तुम लोग उसके सामने आ गए?”
नंदिनी ने पूछा—
“किसके?”
हरिदास ने बरगद की तरफ देखा।
“गौरी के।”
नंदिनी ने पहली बार वह नाम सुना था।
“गौरी कौन?”
हरिदास ने गहरी साँस ली।
“जिसे इस गाँव ने डायन कहा था।”
अमन ने घबराकर पूछा—
“क्या वह सच में डायन थी?”
हरिदास ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“नहीं।”
दोनों चौंक गए।
“तो फिर?”
हरिदास ने कहा—
“वह एक निर्दोष लड़की थी।”
नंदिनी ने पूछा—
“फिर उसे डायन क्यों कहा गया?”
हरिदास कुछ कहने ही वाला था कि अचानक बरगद के पेड़ की तरफ से किसी लड़की के रोने की आवाज आई।
“मुझे बचा लो…”
हरिदास का चेहरा बदल गया।
उसने तुरंत दोनों से कहा—
“मेरे साथ चलो।”
तीनों मंदिर के अंदर वापस चले गए।
हरिदास ने दरवाजा बंद किया।
फिर उसने मंदिर के पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटी डायरी निकाली।
“इसमें गौरी की कहानी है।”
नंदिनी ने डायरी हाथ में ली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर कभी मेरा नाम डायन के रूप में लिया जाए, तो यह डायरी सच बताएगी।”
नंदिनी ने पढ़ना शुरू किया।
डायरी लगभग तीस वर्ष पुरानी थी।
गौरी गाँव की सबसे गरीब लड़की थी।
उसकी माँ जड़ी-बूटियों से लोगों का इलाज करती थी।
गौरी ने भी अपनी माँ से वही विद्या सीखी थी।
गाँव के लोग बीमार पड़ते तो गौरी उनकी मदद करती।
लेकिन एक दिन गाँव में अचानक कई लोग बीमार पड़ने लगे।
बच्चों को तेज बुखार आने लगा।
जानवर मरने लगे।
लोग डर गए।
तभी गाँव के जमींदार भैरव सिंह ने कहा—
“यह किसी डायन का काम है।”
और उसने गौरी पर आरोप लगा दिया।
गौरी ने बहुत समझाया।
“मैंने किसी का बुरा नहीं किया।”
लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।
एक रात गाँव वालों की भीड़ उसके घर पहुँच गई।
उन्होंने उसके घर में आग लगा दी।
गौरी भागी।
वह बरगद के पेड़ तक पहुँची।
लेकिन वहाँ जमींदार के आदमी पहले से मौजूद थे।
गौरी को पकड़ लिया गया।
और उसी रात…
वह गायब हो गई।
डायरी यहीं खत्म हो गई थी।
नंदिनी ने पूछा—
“आगे क्या हुआ?”
हरिदास ने कहा—
“यही तो रहस्य है।”
“गौरी की लाश कभी नहीं मिली।”
“लेकिन उसके बाद गाँव में एक-एक करके लोगों की मौत होने लगी।”
अमन ने धीरे से पूछा—
“क्या गौरी बदला लेने वापस आई?”
हरिदास ने उसकी तरफ देखा।
“शायद।”
अचानक मंदिर की दीवार पर लगी घंटी अपने आप हिलने लगी।
फिर एक काली परछाईं दीवार पर दिखाई दी।
तीनों ने उस परछाईं को देखा।
वह धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही थी।
फिर एक आवाज आई—
“मुझे डायन बनाने वालों को… मैं कभी नहीं भूलूँगी…”
दीवार पर खून जैसे लाल रंग से एक नाम उभर आया।
भैरव सिंह।
हरिदास के हाथ से डायरी गिर गई।
नंदिनी ने पूछा—
“लेकिन भैरव सिंह तो तीस साल पहले मर चुका है।”
हरिदास ने काँपते हुए कहा—
“हाँ…”
तभी परछाईं ने धीरे से दूसरा नाम लिखा।
हरिदास।
हरिदास पीछे हट गया।
“नहीं…”
नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बाबा, आपने क्या किया था?”
हरिदास की आँखों से आँसू निकल आए।
“मैंने…”
वह कुछ बोल नहीं पाया।
फिर मंदिर के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।
छप… छप… छप…
तीनों ने दरवाजे की तरफ देखा।
दरवाजे के नीचे से पानी अंदर आने लगा।
लेकिन वह पानी नहीं था।
वह काला था।
और उसमें छोटे-छोटे लाल अक्षर तैर रहे थे।
“सच बताओ…”
हरिदास घुटनों के बल बैठ गया।
“मैंने उसे नहीं मारा था…”
नंदिनी ने पूछा—
“तो फिर आपने क्या किया?”
हरिदास ने सिर झुका लिया।
“मैंने देखा था।”
“क्या?”
“उस रात मैंने गौरी को भागते देखा था।”
“और?”
“मैं उसे बचा सकता था।”
“फिर बचाया क्यों नहीं?”
हरिदास की आवाज टूट गई।
“क्योंकि मैं डर गया था।”
मंदिर के अंदर अचानक तेज हवा चली।
दीपक बुझ गए।
पूर्ण अंधकार छा गया।
और अंधेरे में एक लड़की की आवाज गूँजी—
“डरने वाले भी दोषी होते हैं…”
नंदिनी ने महसूस किया कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा है।
उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—
“अब दूसरा नाम तुम्हारा है…”
नंदिनी चीख पड़ी।
और उसी क्षण मंदिर की सारी घंटियाँ एक साथ बज उठीं।
टन… टन… टन… टन…
दूर बरगद के पेड़ पर एक सफेद आकृति दिखाई दी।
वह हवा में खड़ी थी।
उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।
और उसके चेहरे पर एक भयानक मुस्कान थी।
गौरी की आत्मा ने नंदिनी की तरफ देखा।
फिर उसने अपना हाथ उठाकर गाँव के पुराने हवेली की ओर इशारा किया।
और अचानक उसकी आवाज पूरे गाँव में गूँज उठी—
“सच… उस हवेली के नीचे दफन है…”
अगले ही पल वह गायब हो गई।
नंदिनी ने अमन की तरफ देखा।
अमन ने काँपते हुए पूछा—
“अब?”
नंदिनी ने हवेली की तरफ देखा।
“अब हमें वहाँ जाना होगा।”
लेकिन वे दोनों नहीं जानते थे कि उस हवेली के नीचे सिर्फ गौरी का राज नहीं दफन था।
वहाँ ऐसा सच छिपा था…
जिसे सामने आने के बाद पूरे गाँव की नींव हिलने वाली थी।
और सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था—
अगर गौरी निर्दोष थी, तो असली डायन कौन थी?
जारी रहेगा…

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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