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पागल राजा

पढ़ने का समय : 5 मिनट

पागल राजा

 

घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से गांव का नाम था रामपुरा। गांव के बीचों-बीच एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी, जिसमें लगभग पचपन साल का एक आदमी रहता था। उसके कपड़े फटे हुए थे, बाल बिखरे रहते थे और चेहरे पर लंबी सफेद दाढ़ी थी।

 

लेकिन उसकी सबसे अजीब बात यह थी कि वह हर मिलने वाले से एक ही बात कहता था—

 

“मैं इस राज्य का असली राजा हूं… मेरा सिंहासन मुझसे छल से छीना गया है।”

 

गांव वाले उसकी बात सुनते और ठहाका लगाकर हंस पड़ते।

 

“लो, फिर शुरू हो गया पागल राजा!”

 

बच्चे उसके पीछे-पीछे दौड़ते और चिढ़ाते, “महाराज की जय हो… महाराज की जय हो!”

 

वह कभी गुस्सा नहीं होता। बस मुस्कुरा देता और धीरे से कहता,

 

“एक दिन सच सबके सामने आएगा।”

 

उसका नाम था वीरेंद्र।

 

गांव में कोई नहीं जानता था कि उसकी आंखों में इतना दर्द क्यों है। लोग उसे पागल समझते थे, लेकिन उसकी आंखों में कभी-कभी ऐसा तेज दिखाई देता था कि अच्छे-अच्छे लोग पल भर के लिए चुप हो जाते।

 

एक दिन गांव में एक बूढ़ी औरत आई। उसने वीरेंद्र को देखा तो उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

वह उसके पैरों में बैठ गई।

 

“महाराज… क्या आपने मुझे पहचाना?”

वीरेंद्र ने ध्यान से उसे देखा।

“तुम… दाई मां?”बूढ़ी औरत रो पड़ी।

“मैंने सोचा था आप अब इस दुनिया में नहीं होंगे।”

यह देखकर गांव वाले हैरान रह गए।

वीरेंद्र ने उसे उठाया और झोपड़ी के अंदर ले गया।

उस रात दाई मां ने गांव वालों को एक ऐसी कहानी सुनाई जिसने सबकी नींद उड़ा दी।

 

करीब तीस साल पहले इस राज्य के राजा वीरेंद्र सिंह थे। जनता उनसे बहुत प्रेम करती थी। वे न्यायप्रिय और दयालु राजा थे।

 

लेकिन उनके सबसे भरोसेमंद सेनापति भानु प्रताप की नज़र सिंहासन पर थी।

 

एक रात उसने महल के कुछ लालची मंत्रियों के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा।

 

राजा के खाने में बेहोशी की दवा मिला दी गई।

 

जब राजा बेहोश हुए तो उन्हें रातों-रात जंगल में फेंक दिया गया।

 

पूरे राज्य में यह खबर फैला दी गई कि राजा की हत्या डाकुओं ने कर दी।

 

फिर भानु प्रताप ने एक ऐसे आदमी को, जो राजा की तरह दिखता था, राजा बनाकर सिंहासन पर बैठा दिया।

 

वह बहरूपिया था।

 

क्योंकि असली राजा की शक्ल बहुत कम लोगों ने करीब से देखी थी, इसलिए किसी को शक नहीं हुआ।

 

दाई मां ने उस रात सब कुछ अपनी आंखों से देखा था।

वह राजा को बचाना चाहती थी, लेकिन उसे भी मारने की कोशिश हुई।

वह किसी तरह बचकर भाग गई।

उधर जंगल में घायल राजा को कुछ साधुओं ने बचा लिया।

लेकिन राजा की याददाश्त कई सालों तक कमजोर रही।

जब सब कुछ याद आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

वे अकेले थे न सेना…न महल…न कोई पहचानने वाला।

वे गांव-गांव भटकते रहे और लोगों को अपना सच बताते रहे।

लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया।

लोग उन्हें पागल कहते रहे।

दाई मां की बातें सुनकर पूरे गांव में सन्नाटा छा गया।

पहली बार सबको लगा कि शायद यह आदमी सच बोल रहा है।

अगले दिन गांव के मुखिया ने कहा,

“अगर आप सच में राजा हैं, तो कोई सबूत होना चाहिए।”

वीरेंद्र कुछ पल चुप रहे।

फिर उन्होंने अपनी कमर से बंधी एक पुरानी कपड़े की थैली निकाली।

उसमें एक सोने की अंगूठी थी।

अंगूठी पर राजघराने का विशेष चिन्ह बना हुआ था।

साथ ही एक आधा फटा हुआ राजकीय फरमान भी था, जिस पर राजा की मुहर लगी थी।

 

मुखिया ने वह अंगूठी पहले कभी नहीं देखी थी।

लेकिन दाई मां ने तुरंत पहचान लिया।

“यही राजमुद्रा है… यही असली निशान है।”

अब गांव वालों को यकीन होने लगा।

उन्होंने तय किया कि वे राजा को लेकर राजधानी जाएंगे।

कई दिनों की यात्रा के बाद वे राजधानी पहुंचे।

वहां पूरे राज्य में उत्सव का माहौल था।

बहरूपिया राजा अपनी ताजपोशी की तीसवीं वर्षगांठ मना रहा था।

वीरेंद्र महल के सामने पहुंचकर जोर से बोले,

“सिंहासन पर बैठा आदमी नकली है… मैं इस राज्य का असली राजा हूं।”

सैनिक हंसने लगे।

“एक और पागल आ गया!”

लेकिन तभी महल के सबसे बूढ़े राजगुरु की नजर वीरेंद्र पर पड़ी।

उनके हाथ कांपने लगे।

वे दौड़ते हुए नीचे आए।

उन्होंने वीरेंद्र के माथे पर बचपन का वह छोटा-सा निशान देखा, जो सिर्फ असली राजा के पास था।

राजगुरु की आंखें भर आईं।

वे झुक गए।

“महाराज… आप जीवित हैं!”

पूरा दरबार सन्न रह गया।

बहरूपिया राजा का चेहरा पीला पड़ गया।

उसने भागने की कोशिश की, लेकिन सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।

पूछताछ हुई।

सारे राज खुल गए।

 

उसने कबूल कर लिया कि वह असली राजा नहीं है।

उसे सेनापति भानु प्रताप ने धन का लालच देकर सिंहासन पर बैठाया था।

भानु प्रताप तो कई साल पहले मर चुका था, लेकिन उसका झूठ इतने वर्षों तक पूरे राज्य पर राज करता रहा।

पूरे राज्य में खबर आग की तरह फैल गई।लोग रोने लगे।

उन्हें पछतावा था कि उनका असली राजा इतने वर्षों तक दर-दर भटकता रहा और वे पहचान भी नहीं पाए।

राजा वीरेंद्र को दोबारा राजगद्दी पर बैठाया गया।राजा वीरेंद्र ने अगले ही दिन पूरे राज्य में एक विशेष सभा बुलाई। दूर-दूर के गांवों से लोग उन्हें देखने आए। जैसे ही वे राजसिंहासन पर बैठे, पूरा राजदरबार उनकी जय करने लगा 

 

लेकिन उन्होंने सिंहासन पर बैठते ही सबसे पहला आदेश दिया,

 

“आज से किसी इंसान को उसके कपड़ों, उसकी गरीबी या उसकी हालत देखकर पागल मत कहना। कभी-कभी सबसे बड़ा सच उसी इंसान के पास होता है, जिसे दुनिया सबसे कम समझती है।”

 

इसके बाद उन्होंने उन सभी गांव वालों को भी राजधानी बुलाया जिन्होंने कठिन समय में उन्हें दो वक्त की रोटी दी थी।

 

उन्होंने हर गरीब परिवार की मदद की और राज्य में न्याय का ऐसा शासन स्थापित किया कि वर्षों तक लोग उन्हें याद करते रहे।

रामपुरा गांव के लोग जब भी अपने बच्चों को उस पुराने बरगद के नीचे ले जाते, तो एक बात जरूर कहते

“बेटा, किसी की बात का मजाक उड़ाने से

पहले उसका दर्द समझने की कोशिश करना। क्योंकि कभी-कभी जिसे दुनिया पागल समझती है, वही सच में इतिहास का सबसे बड़ा राजा होता है

 

 

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