मायावी का भेष
शहर में पिछले कई महीनों से एक अजीब घटना लगातार हो रही थी। शहर के बड़े-बड़े अमीर परिवार अचानक अपनी मेहनत की कमाई और जमा-पूंजी खो रहे थे। किसी के बैंक खाते से करोड़ों रुपये गायब हो जाते, तो किसी की तिजोरी रातों-रात खाली मिलती। सबसे हैरानी की बात यह थी कि न कहीं चोरी के निशान मिलते थे और न ही किसी को यह याद रहता था कि आखिर उनके साथ हुआ क्या था।
पुलिस ने हर तरफ जांच शुरू कर दी, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ एक सवाल मिलता—”यह सब करता कौन है?”
एक दिन शहर के मशहूर उद्योगपति राघव मल्होत्रा अपने बेटे साहिल के सामने बैठे थे। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
“साहिल, तुम्हारे खाते से पच्चीस लाख रुपये निकल गए। बैंक कह रहा है कि सारे लेन-देन तुम्हारी मंजूरी से हुए हैं। आखिर यह कैसे हुआ?”
साहिल ने सिर पकड़ लिया।
“पापा, मुझे तो कुछ भी याद नहीं। मैं ऑफिस से निकला था, रास्ते में एक कैफे पर रुका था… उसके बाद जैसे सब धुंधला हो गया।”
यह सुनकर पूरा परिवार सन्न रह गया।
ऐसी ही घटनाएं शहर के कई और अमीर परिवारों के साथ भी हो चुकी थीं। किसी के बेटे के साथ, किसी की बेटी के साथ, तो किसी के बिजनेस पार्टनर के साथ। हर कोई एक ही बात कहता—”हमें कुछ याद नहीं।”
असल में इन सबके पीछे एक मायावी था।
वह कोई साधारण इंसान नहीं था। उसके पास ऐसा मायाजाल था कि वह पलभर में अपना रूप बदल सकता था। कभी वह ड्राइवर बन जाता, कभी सिक्योरिटी गार्ड, कभी ऑफिस का कर्मचारी, कभी डॉक्टर और कभी किसी होटल का वेटर। उसका असली चेहरा किसी ने कभी नहीं देखा था।
लेकिन वह जल्दबाजी नहीं करता था। पहले कई दिनों तक अपने शिकार पर नज़र रखता। वह देखता कि अमीर परिवार का बेटा या बेटी किस समय घर से निकलते हैं, कहाँ काम करते हैं, किस रास्ते से आते-जाते हैं और कहाँ रुकते हैं।
जब उसे पूरा यकीन हो जाता कि अब मौका सही है, तब वह उसी जगह किसी नए भेष में पहुंच जाता।
जिस दिन साहिल कैफे में कॉफी पीने रुका, उस दिन मायावी उसी कैफे का नया कर्मचारी बन चुका था।
वह मुस्कुराते हुए साहिल के पास आया।
“सर, आपकी कॉफी।”
साहिल ने जैसे ही उसकी तरफ देखा, मायावी की आंखों में एक अजीब चमक दिखाई दी। वह धीमी आवाज़ में कुछ रहस्यमयी शब्द बोलने लगा।
कुछ ही सेकंड में साहिल की आंखें बोझिल हो गईं। वह जैसे किसी गहरे नशे में चला गया।
“मोबाइल का पासवर्ड बताओ।”
साहिल ने बिना सोचे बता दिया।
“बैंक का ओटीपी?”
वह भी बता दिया।
कुछ ही मिनटों में लाखों रुपये अलग-अलग खातों में पहुंच चुके थे। मायावी ने साहिल का मोबाइल वापस उसकी जेब में रखा और बाहर निकल गया।
कैफे से बाहर आते ही उसका चेहरा बदलने लगा। अब वह एक बूढ़ा आदमी बन चुका था। सड़क पर चलते लोग उसे देखकर आगे निकल गए। किसी को जरा भी शक नहीं हुआ।
उधर साहिल कुछ देर बाद सामान्य हुआ, लेकिन उसे सिर्फ इतना याद था कि उसने कॉफी पी थी। बाकी सब कुछ उसकी याददाश्त से गायब था।
जब पुलिस ने कैफे के सीसीटीवी कैमरे देखे, तो उसमें सिर्फ एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। लेकिन बाहर लगे दूसरे कैमरे में वही आदमी अचानक गायब हो गया था।
पुलिस जितनी जांच करती, मामला उतना ही उलझता जा रहा था।
उसी समय शहर में एक नए पुलिस अधिकारी की नियुक्ति हुई। उनका नाम था अजय राणा।
उन्होंने सभी फाइलें पढ़ीं और धीरे से कहा,
“यह कोई साधारण चोर नहीं… बल्कि बहुत चालाक खिलाड़ी है। लेकिन हर खिलाड़ी एक न एक गलती जरूर करता है।”
अजय ने उसी पल फैसला कर लिया कि अब इस रहस्यमयी मायावी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने देगा।
अजय राणा ने पिछले छह महीनों की सभी घटनाओं का बारीकी से अध्ययन किया। उसने हर पीड़ित से अलग-अलग बात की। सभी की यादें धुंधली थीं, लेकिन एक बात हर कहानी में समान थी हर वारदात से पहले किसी अनजान व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई थी।
अजय ने समझ लिया कि अपराधी लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें अपने जाल में फँसाता है।
उसे पकड़ने के लिए उसने एक योजना बनाई।
अगले ही दिन पूरे शहर में खबर फैला दी गई कि एक बड़े उद्योगपति का बेटा विदेश से लौट रहा है। उसके पास करोड़ों रुपये की दुर्लभ हीरे-जवाहरात और नकदी है। यह खबर जानबूझकर फैलाई गई थी ताकि मायावी लालच में आ जाए।
लेकिन सच यह था कि वह युवक कोई उद्योगपति का बेटा नहीं, बल्कि पुलिस का एक जवान था। उसके आसपास सादे कपड़ों में पुलिस के कई अधिकारी हर समय मौजूद थे।
तीन दिन तक कुछ नहीं हुआ।
चौथे दिन वह जवान रोज़ की तरह एक होटल में खाना खाने पहुँचा। तभी एक नया वेटर उसके पास आया।
अजय, जो दूर बैठा सब देख रहा था, अचानक चौकन्ना हो गया।
वेटर की चाल बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी सीसीटीवी फुटेज में अलग-अलग लोगों की दिखाई देती थी।
वेटर मुस्कुराया और बोला, “सर, आपका ऑर्डर।”
जैसे ही उसने जवान की आँखों में देखा, उसकी आँखों से वही रहस्यमयी चमक निकली।
लेकिन इस बार जवान पहले से तैयार था। उसने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं और मेज के नीचे लगा अलार्म दबा दिया।
कुछ ही सेकंड में चारों तरफ से पुलिस ने होटल को घेर लिया।
मायावी मुस्कुराया।
“तुम लोग मुझे पकड़ नहीं सकते।”
इतना कहकर उसने अपना चेहरा बदलना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वह वेटर से बूढ़ा बन गया, फिर बूढ़े से साधु और अगले ही पल एक महिला का रूप धारण कर लिया।
पुलिस के कई जवान पलभर के लिए भ्रमित हो गए।
लेकिन अजय पहले से तैयार था।
उसने होटल के चारों ओर विशेष दर्पण लगवाए थे। उन दर्पणों में मायावी का असली रूप साफ दिखाई दे रहा था। पहली बार सबने देखा कि उसका चेहरा न बूढ़े जैसा था, न जवान जैसा और न ही किसी साधु जैसा। उसका असली चेहरा डरावना और रहस्यमयी था।
अजय ने बिना देर किए उस पर जाल फेंका। जाल पर विशेष मंत्र लिखे हुए थे, जिनकी वजह से मायावी अपना रूप बदल नहीं सका।
वह गुस्से से चिल्लाने लगा।
“मुझे कोई नहीं रोक सकता।”
लेकिन इस बार उसकी सारी शक्तियाँ बेकार हो चुकी थीं।
पुलिस उसे गिरफ्तार करके उसके गुप्त ठिकाने पर पहुँची। वहाँ से करोड़ों रुपये, सोना, हीरे और कई परिवारों का लूटा हुआ सामान बरामद हुआ।
सभी चीज़ें उनके असली मालिकों को वापस लौटा दी गईं।
साहिल और बाकी परिवारों ने राहत की साँस ली। पूरे शहर में अजय राणा की बहादुरी की चर्चा होने लगी।
अदालत ने मायावी को उसके अपराधों के लिए उम्रकैद की सज़ा सुनाई।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
एक रात जेल का एक पहरेदार अचानक बेहोश मिला। जब दूसरे पहरेदार उसकी मदद के लिए पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि मायावी अपनी कोठरी में तो बैठा है… लेकिन उसके चेहरे पर वही रहस्यमयी मुस्कान है।
उसने धीरे से कहा,
“मेरे जैसे मायावी कभी खत्म नहीं होते… हम सिर्फ अपना भेष बदलते हैं।”
इतना सुनते ही जेल की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।
कुछ पल बाद जब रोशनी वापस आई, तो मायावी अपनी कोठरी में बैठा
था… या शायद कोई और उसके भेष में था।
आज तक कोई यह पता नहीं लगा पाया कि उस रात सच में क्या हुआ था।
समाप्त।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं


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