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  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 5: आखिरी यात्री

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    आरव काफी देर तक रेलवे स्टेशन की पटरी के पास खड़ा रहा।

     

    उसके हाथ में वही पुराना टिकट था।

     

    मोबाइल जमीन पर पड़ा था और स्क्रीन पर अभी भी वही मैसेज चमक रहा था—

     

    “आपकी अगली यात्रा 14 अगस्त को है।”

     

    आरव ने मोबाइल उठाया।

     

    उसने मैसेज डिलीट कर दिया।

     

    फिर दोबारा स्क्रीन देखी।

     

    मैसेज गायब था।

     

    उसने राहत की सांस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि असली कहानी अभी बाकी थी।

     

    आरव घर पहुंचा तो उसकी माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    उन्हें देखते ही आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह दौड़कर माँ से लिपट गया।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव कुछ नहीं बोल पाया।

     

    उसने बस उन्हें कसकर पकड़ लिया।

     

    उस रात आरव ने अपनी माँ को ट्रेन के बारे में सब कुछ बताया।

     

    निशा।

     

    बूढ़ा यात्री।

     

    उसके पिता।

     

    और वह आखिरी यात्रा।

     

    माँ चुपचाप सुनती रहीं।

     

    कहानी खत्म होने के बाद उन्होंने एक सवाल पूछा—

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें कुछ दिया?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    उसने जेब से पुरानी चाबी निकाली।

     

    माँ ने चाबी देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

     

    उनकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें यह कहाँ मिली?”

     

    “पापा ने दी थी।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या मतलब?”

     

    माँ ने धीरे से बताया—

     

    “यह चाबी तुम्हारे पिता की नहीं थी।”

     

    “तो किसकी थी?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात आरव सो नहीं पाया।

     

    करीब दो बजे उसे ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    वह तुरंत खिड़की के पास गया।

     

    बाहर सड़क खाली थी।

     

    लेकिन दूर आसमान में काले धुएँ जैसी एक लकीर दिखाई दे रही थी।

     

    फिर उसकी खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    फिर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने पर्दा थोड़ा हटाया।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन कांच पर भाप से एक शब्द लिखा हुआ था—

     

    “स्टेशन।”

     

    आरव ने खिड़की बंद कर दी।

     

    सुबह उसने माँ को यह बात बताई।

     

    माँ ने तुरंत कहा—

     

    “आज घर से बाहर मत जाना।”

     

    लेकिन उसी समय दरवाजे के नीचे से एक लिफाफा अंदर आया।

     

    लिफाफे पर आरव का नाम लिखा था।

     

    उसने खोला।

     

    अंदर एक रेलवे टिकट था।

     

    यात्री: आरव

     

    ट्रेन: निशा एक्सप्रेस

     

    समय: 11:55 PM

     

    प्लेटफॉर्म: 6

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    माँ ने टिकट देखते ही कहा—

     

    “तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    माँ ने आखिरकार वह राज बताया जो उन्होंने दस साल से छिपाकर रखा था।

     

    आरव के पिता की मृत्यु के बाद उन्हें एक पत्र मिला था।

     

    उस पत्र में लिखा था—

     

    “अगर कभी आरव को 14 अगस्त की रात ट्रेन का टिकट मिले, तो उसे जाने देना। क्योंकि इस ट्रेन का आखिरी यात्री अभी बाकी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आखिरी यात्री कौन है?”

     

    माँ ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता नहीं।”

     

    “तो कौन?”

     

    माँ ने धीरे से कहा—

     

    “तुम।”

     

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    रात 11:30 बजे वह फिर उसी पुराने स्टेशन पर पहुंच गया।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 बिल्कुल खाली था।

     

    घड़ी में 11:55 बज रहे थे।

     

    ठीक उसी तरह जैसे पहली बार।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    इस बार उसे डर नहीं लग रहा था।

     

    उसे पता था कि उसे क्या करना है।

     

    11:55 पर ट्रेन दिखाई दी।

     

    वही काली ट्रेन।

     

    वही खिड़कियाँ।

     

    वही दरवाजे।

     

    लेकिन इस बार ट्रेन में एक भी यात्री नहीं था।

     

    आरव अंदर चढ़ गया।

     

    दरवाजा बंद हुआ।

     

    ट्रेन चल पड़ी।

     

    कुछ देर बाद लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में एक आवाज आई—

     

    “तुम वापस क्यों आए?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि कहानी अधूरी थी।”

     

    अंधेरे में एक छोटी बच्ची दिखाई दी।

     

    वह नैना थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा बिल्कुल शांत था।

     

    “भैया…”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब तुम असली हो?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तुम्हें किसने बुलाया?”

     

    नैना ने पीछे देखा।

     

    डिब्बे के आखिरी हिस्से में एक आदमी खड़ा था।

     

    रेलवे की वर्दी।

     

    आरव ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    उसके पिता।

     

    लेकिन इस बार उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “बेटा, तुम्हें वापस नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आखिरी यात्री कौन है?”

     

    पिता ने जवाब दिया—

     

    “मैं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन आप तो आजाद हो चुके हैं।”

     

    पिता ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सिर्फ अपनी आत्मा का एक हिस्सा आजाद कर पाया था।”

     

    “बाकी?”

     

    “वह इस ट्रेन में है।”

     

    तभी ट्रेन के सभी दरवाजे अपने आप खुल गए।

     

    बाहर अनंत अंधेरा था।

     

    पिता ने कहा—

     

    “यह ट्रेन तब तक चलती रहेगी जब तक कोई इसे पूरी तरह खत्म नहीं करता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “जिसने इसे बनाया था, उसे ढूंढना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    पिता ने सामने देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे डिब्बे में आ रहा था।

     

    आरव उसे देखते ही पहचान गया।

     

    वही बूढ़ा यात्री।

     

    लेकिन वह तो पहले ही आजाद हो चुका था।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “मैंने कभी नहीं कहा था कि मैं इस ट्रेन का यात्री हूँ।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “तो आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने अपनी पुरानी टोपी उतारी।

     

    उसके नीचे कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ काला अंधेरा।

     

    “मैं इस ट्रेन का पहला ड्राइवर हूँ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे रोकने की कोशिश की थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आप लोगों की आत्माएँ क्यों लेते हैं?”

     

    वह हँसा।

     

    “मैं आत्माएँ नहीं लेता। लोग खुद अपनी यादें मेरे पास छोड़ जाते हैं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हर इंसान अपने किसी प्रिय व्यक्ति को खोने से डरता है।”

     

    बूढ़े ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “तुमने अपनी माँ की याद छोड़ दी थी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मैंने उन्हें वापस पा लिया।”

     

    बूढ़ा हँसा।

     

    “तुमने चेहरा खो दिया है।”

     

    आरव के शरीर में ठंड दौड़ गई।

     

    उसे अचानक एहसास हुआ।

     

    उसे अपनी माँ का चेहरा याद नहीं था।

     

    वह माँ को पहचानता था।

     

    उनकी आवाज पहचानता था।

     

    लेकिन चेहरा…

     

    वह भूल चुका था।

     

    नैना ने कहा—

     

    “भैया, यही आखिरी जाल है।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने माँ की आवाज याद की।

     

    फिर उनके हाथ।

     

    फिर उनका स्पर्श।

     

    धीरे-धीरे चेहरा उसकी याद में वापस आने लगा।

     

    बूढ़ा चीखा—

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने आँखें खोलीं।

     

    “यादें किसी की संपत्ति नहीं होतीं।”

     

    उसने अपनी जेब से वह पुरानी चाबी निकाली।

     

    अचानक चाबी चमकने लगी।

     

    इंजन के पीछे एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उसने चाबी उस दरवाजे में लगा दी।

     

    दरवाजा खुलते ही तेज सफेद रोशनी निकली।

     

    हजारों आत्माएँ ट्रेन से बाहर निकलने लगीं।

     

    बूढ़ा चीखने लगा।

     

    निशा की आत्मा भी दिखाई दी।

     

    उसने आरव को मुस्कुराकर देखा।

     

    उसके पीछे आरव के पिता खड़े थे।

     

    पिता ने कहा—

     

    “अब आखिरी दरवाजा बंद कर दो।”

     

    आरव ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    पूरी ट्रेन कांपने लगी।

     

    फिर एक जोरदार विस्फोट हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं…

     

    वह उसी पुराने स्टेशन पर खड़ा था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर लोग आ-जा रहे थे।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    उसकी माँ सामने खड़ी थीं।

     

    आरव दौड़कर उनके पास गया।

     

    इस बार उसने उनका चेहरा साफ देखा।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आँखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “अब सब खत्म हो गया?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    उस रात के बाद कई साल बीत गए।

     

    आरव ने कभी वह ट्रेन नहीं देखी।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर अब नई लाइटें लग गईं।

     

    पुरानी रेल लाइन बंद कर दी गई।

     

    लोग उस घटना को भूल गए।

     

    लेकिन एक रात…

     

    रेलवे के एक नए कर्मचारी को पुराने रिकॉर्ड रूम में एक टिकट मिला।

     

    उस टिकट पर लिखा था—

     

    “निशा एक्सप्रेस — अंतिम यात्रा।”

     

    कर्मचारी ने टिकट पलटा।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जब कोई इंसान अपने सबसे प्यारे व्यक्ति को भूल जाता है, ट्रेन फिर लौट आती है।”

     

    और उसी समय स्टेशन के पुराने स्पीकर से एक आवाज आई—

     

    “यात्रियों से अनुरोध है…”

     

    कुछ सेकंड की खामोशी के बाद आवाज पूरी हुई—

     

    “प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर आने वाली आखिरी ट्रेन के लिए तैयार रहें।”

     

    दूर अंधेरे में ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    और प्लेटफॉर्म की घड़ी…

     

    धीरे-धीरे पीछे घूमने लगी।

     

    11:55।

     

    समाप्त।

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 4: मृत्यु जंक्शन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव के कानों में बूढ़े की बात गूंजती रही—

     

    “इस ट्रेन को चलाने वाला कोई इंसान नहीं है… तुम्हारे पिता हैं।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा—

     

    “मेरे पिता तो दस साल पहले मर चुके हैं।”

     

    बूढ़े ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर ट्रेन कौन चला रहा है?”

     

    बूढ़े ने सामने की ओर इशारा किया।

     

    “तुम्हारे पिता की आत्मा।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    ट्रेन अब पहले से कहीं ज्यादा तेज दौड़ रही थी।

     

    खिड़की के बाहर कोई शहर नहीं था।

     

    सिर्फ काला धुआँ और हजारों सफेद चेहरे ट्रेन के साथ दौड़ रहे थे।

     

    लाउडस्पीकर से आवाज आई—

     

    “मृत्यु जंक्शन आने वाला है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर हम वहाँ पहुंच गए तो?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “जो ट्रेन से उतर गया, वह वापस नहीं लौटता।”

     

    “और जो नहीं उतरा?”

     

    “वह हमेशा के लिए यात्री बन जाता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो बचने का रास्ता क्या है?”

     

    बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

     

    “इंजन तक जाओ।”

     

    “इससे क्या होगा?”

     

    “तुम्हारे पिता ने इसे मेरे पास छोड़ा था।”

     

    आरव ने चाबी हाथ में ली।

     

    उस पर एक छोटा-सा अक्षर बना था—

     

    A

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उन्होंने आपको यह कब दिया?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “जिस रात उनकी मृत्यु हुई।”

     

    आरव चौंका।

     

    “आप मेरे पिता को जानते थे?”

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    बूढ़े ने बताया कि आरव के पिता रेलवे में काम करते थे। दस साल पहले एक रात उनकी ड्यूटी इसी रेल लाइन पर थी।

     

    उस रात एक ट्रेन पटरी से उतर गई थी।

     

    कई यात्रियों की मौत हुई।

     

    आरव के पिता ने लोगों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी।

     

    लेकिन मरने के बाद उनकी आत्मा उसी ट्रेन में फंस गई।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता हर रात इस ट्रेन को चलाते हैं ताकि कोई और उसी हादसे में न मरे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर निशा?”

     

    “निशा इस ट्रेन को रोकना चाहती है।”

     

    अचानक ट्रेन इतनी जोर से हिली कि आरव गिरते-गिरते बचा।

     

    बूढ़ा चिल्लाया—

     

    “समय कम है!”

     

    दोनों आगे की ओर दौड़ने लगे।

     

    रास्ते में कई डिब्बे पार करने पड़े।

     

    पहले डिब्बे में सैकड़ों खाली सीटें थीं।

     

    दूसरे में सभी खिड़कियों पर खून से हाथों के निशान थे।

     

    तीसरे डिब्बे में बच्चों के खिलौने पड़े थे।

     

    चौथे में आरव ने अपने बचपन का घर देखा।

     

    वह कुछ पल के लिए रुक गया।

     

    खिड़की के अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह आगे बढ़ना चाहता था।

     

    लेकिन बूढ़े ने कहा—

     

    “यह असली नहीं है।”

     

    आरव ने मुट्ठी बांध ली।

     

    “मुझे पता है।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    आखिरकार इंजन का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    आरव ने चाबी लगाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर एक आदमी बैठा था।

     

    रेलवे की पुरानी वर्दी।

     

    सफेद बाल।

     

    कांपते हुए हाथ।

     

    आरव वहीं जम गया।

     

    “पापा…”

     

    आदमी ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    वह सच में आरव के पिता थे।

     

    उनकी आँखों में वही प्यार था जो आरव ने बचपन में देखा था।

     

    “बेटा…”

     

    आरव दौड़कर उनके पास जाना चाहता था।

     

    लेकिन उसके पिता ने हाथ उठाकर रोक दिया।

     

    “पास मत आना।”

     

    “पापा!”

     

    “यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है।”

     

    आरव रोते हुए बोला—

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।”

     

    “माँ को पता था?”

     

    पिता ने चुपचाप सिर झुका लिया।

     

    आरव समझ गया।

     

    उसकी माँ को सब पता था।

     

    “माँ ने मुझे यहाँ क्यों भेजा?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अब मेरी ताकत खत्म हो रही है।”

     

    अचानक इंजन के पीछे से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    निशा सामने खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “बहुत हो गया।”

     

    पिता ने तुरंत ट्रेन की गति बढ़ा दी।

     

    निशा चिल्लाई—

     

    “तुम मुझे हमेशा के लिए कैद नहीं रख सकते!”

     

    पिता ने जवाब दिया—

     

    “जब तक मैं जिंदा हूँ—”

     

    फिर वह रुक गए।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप तो जिंदा नहीं हैं।”

     

    पिता ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यही समस्या है।”

     

    निशा धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगी।

     

    “तुम्हारी आत्मा खत्म हो रही है।”

     

    पिता ने आरव से कहा—

     

    “बेटा, मुझे इंजन से निकालने का एक ही रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “ट्रेन रोक दो।”

     

    “कैसे?”

     

    पिता ने सामने लगे एक लाल लीवर की तरफ इशारा किया।

     

    “उसे खींचना होगा।”

     

    आरव ने लीवर पकड़ लिया।

     

    लेकिन निशा ने उसे रोक लिया।

     

    “अगर तुमने इसे खींचा… तो ट्रेन में मौजूद सभी आत्माएँ आजाद हो जाएँगी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही तो चाहिए।”

     

    निशा मुस्कुराई।

     

    “लेकिन तुम्हारे पिता भी।”

     

    आरव की आँखें भर आईं।

     

    “मैं उन्हें जाने दूँगा।”

     

    उसने पूरी ताकत से लीवर खींच दिया।

     

    धड़ाम!

     

    ट्रेन की गति कम होने लगी।

     

    हजारों चीखें एक साथ सुनाई देने लगीं।

     

    सभी डिब्बों की खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    सफेद धुएँ जैसी आत्माएँ बाहर निकलने लगीं।

     

    बूढ़ा आदमी मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार…”

     

    उसका शरीर धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगा।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “घर।”

     

    और वह गायब हो गया।

     

    निशा चीखती हुई पीछे हटने लगी।

     

    उसका शरीर टूटने लगा।

     

    लेकिन जाने से पहले उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी यादें लौटा दीं।”

     

    आरव चौंका।

     

    निशा की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

     

    “मेरे भाई की याद… मुझे वापस मिल गई।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    फिर उसका शरीर भी रोशनी में बदल गया।

     

    इंजन में अब सिर्फ आरव और उसके पिता थे।

     

    पिता ने कहा—

     

    “अब तुम्हें उतरना होगा।”

     

    आरव रोते हुए बोला—

     

    “मैं आपको छोड़ना नहीं चाहता।”

     

    पिता ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटा… कुछ सफर ऐसे होते हैं जिन्हें अकेले पूरा करना पड़ता है।”

     

    ट्रेन रुक गई।

     

    बाहर सुबह की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    पिता ने कहा—

     

    “जाओ।”

     

    आरव ट्रेन से उतर गया।

     

    जैसे ही उसने पीछे देखा…

     

    ट्रेन गायब हो चुकी थी।

     

    पटरी खाली थी।

     

    सिर्फ जमीन पर एक पुराना टिकट पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “वापसी — सफल।”

     

    लेकिन नीचे छोटे अक्षरों में एक और लाइन थी—

     

    “यात्रा समाप्त नहीं हुई।”

     

    आरव ने वह लाइन पढ़ी ही थी कि दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    वह पलटकर देखने लगा।

     

    पटरी खाली थी।

     

    फिर उसके मोबाइल में एक मैसेज आया।

     

    “आपकी अगली यात्रा 14 अगस्त को है।”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    क्योंकि आज भी तारीख थी—

     

    14 अगस्त।

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 3: टिकट चेकर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    काली आकृति धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रही थी।

     

    उसके हाथ में पुरानी टिकट पंच करने वाली मशीन थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    हर कदम के साथ ट्रेन का फर्श कांप रहा था।

     

    आरव पीछे हटता गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आकृति ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसका चेहरा पूरी तरह खाली था। न आँखें, न नाक, न होंठ।

     

    लेकिन फिर भी आरव को महसूस हो रहा था कि वह उसे देख रही है।

     

    बूढ़े ने आरव के कान में कहा—

     

    “अपना टिकट मत देना।”

     

    “लेकिन आपने ही कहा था कि टिकट पंच करवाना होगा।”

     

    “हाँ… लेकिन उससे नहीं।”

     

    आरव ने टिकट अपनी मुट्ठी में कस लिया।

     

    काली आकृति उसके सामने आकर रुक गई।

     

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    फिर उसके हाथ से एक आवाज निकली—

     

    “टिकट।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    आकृति ने फिर कहा—

     

    “टिकट।”

     

    इस बार उसकी आवाज इतनी भारी थी कि डिब्बे की खिड़कियाँ कांपने लगीं।

     

    अचानक पीछे से नैना की आवाज आई—

     

    “भैया, उसे टिकट दे दो।”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    नैना दरवाजे पर खड़ी थी।

     

    लेकिन बूढ़ा जोर से चिल्लाया—

     

    “उसकी बात मत सुनना!”

     

    नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसकी आँखें काली हो गईं।

     

    “तुम हमेशा मेरी बात नहीं मानते थे, भैया।”

     

    आरव की आँखों में डर उतर आया।

     

    “तुम नैना नहीं हो।”

     

    वह हँसने लगी।

     

    “तो पहचान लिया?”

     

    उसका शरीर धीरे-धीरे धुएँ में बदल गया।

     

    कुछ ही सेकंड बाद वहाँ एक लंबी औरत खड़ी थी।

     

    उसने काली साड़ी पहन रखी थी।

     

    उसके बाल जमीन तक पहुंच रहे थे।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “यही इस ट्रेन की मालकिन है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “इसका नाम क्या है?”

     

    बूढ़े ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “निशा।”

     

    निशा ने हाथ उठाया।

     

    पूरी ट्रेन की लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ उसकी आवाज गूँजी—

     

    “तुम्हें लगता है तुम इस ट्रेन से बाहर जा सकते हो?”

     

    आरव ने जवाब दिया—

     

    “हाँ।”

     

    निशा हँसी।

     

    “हर यात्री यही सोचता है।”

     

    अचानक ट्रेन की दीवारों पर तस्वीरें दिखाई देने लगीं।

     

    आरव ने देखा—अलग-अलग लोग ट्रेन में बैठे थे।

     

    कुछ रो रहे थे।

     

    कुछ मदद मांग रहे थे।

     

    कुछ खिड़की से बाहर देख रहे थे।

     

    फिर हर तस्वीर में एक ही चीज हुई।

     

    उन सभी लोगों ने धीरे-धीरे अपनी परछाई खो दी।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “यह ट्रेन लोगों को नहीं मारती।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो?”

     

    “यह उनकी यादें खा जाती है।”

     

    “फिर?”

     

    “जब उन्हें अपने बारे में कुछ याद नहीं रहता, वे हमेशा के लिए इस ट्रेन के यात्री बन जाते हैं।”

     

    आरव ने अपनी जेब टटोली।

     

    उसे अचानक एहसास हुआ कि उसे अपनी माँ का चेहरा याद नहीं आ रहा था।

     

    उसने आँखें बंद कीं।

     

    उसे माँ की आवाज याद थी।

     

    लेकिन चेहरा…

     

    खाली।

     

    “नहीं…”

     

    वह घबराकर सिर पकड़कर बैठ गया।

     

    “मुझे माँ का चेहरा क्यों याद नहीं आ रहा?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “क्योंकि निशा तुम्हारी यादें ले रही है।”

     

    आरव ने टिकट देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “वापसी — एक अवसर।”

     

    उसे कुछ याद आया।

     

    उसकी माँ ने स्टेशन पर जाते समय कहा था—

     

    “बेटा, अगर कभी डर लगे तो अपने बचपन की पहली याद याद करना।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे एक छोटा सा घर दिखाई दिया।

     

    बारिश हो रही थी।

     

    माँ उसे गोद में लेकर खिड़की के पास खड़ी थीं।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “आरव, मेरी तरफ देखो।”

     

    आरव ने आँखें खोलीं।

     

    निशा सामने खड़ी थी।

     

    “तुम्हें अपनी यादें चाहिए?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “तो मेरे साथ चलो।”

     

    निशा ट्रेन के आखिरी डिब्बे की ओर बढ़ गई।

     

    बूढ़े ने आरव को रोकने की कोशिश की।

     

    “मत जाना!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर मैं नहीं गया तो?”

     

    “तुम्हारी सारी यादें चली जाएंगी।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर वह निशा के पीछे चल पड़ा।

     

    आखिरी डिब्बे में पहुंचकर निशा एक पुराने दरवाजे के सामने रुकी।

     

    दरवाजे पर लिखा था—

     

    “यादों का डिब्बा।”

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर सैकड़ों छोटे-छोटे शीशे हवा में तैर रहे थे।

     

    हर शीशे के अंदर किसी इंसान की एक याद थी।

     

    कहीं कोई बच्चा हँस रहा था।

     

    कहीं कोई माँ अपने बेटे को गले लगा रही थी।

     

    कहीं कोई बूढ़ा अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर बैठा था।

     

    आरव ने एक शीशे में देखा।

     

    उसमें उसकी माँ दिखाई दी।

     

    “माँ!”

     

    वह शीशे की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यह याद तुम्हारी नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर किसकी है?”

     

    निशा ने कहा—

     

    “उस आदमी की, जो तुम्हारे पहले इस ट्रेन में आया था।”

     

    तभी एक शीशा टूट गया।

     

    उसमें से एक बूढ़ी औरत की चीख निकली।

     

    निशा ने कहा—

     

    “हर यात्री की याद मेरे पास रहती है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम ऐसा क्यों करती हो?”

     

    निशा कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “क्योंकि मैं भी कभी यात्री थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    निशा ने अपनी कहानी बताई।

     

    दस साल पहले वह इसी ट्रेन में बैठी थी। उसके साथ उसका छोटा भाई था। ट्रेन में एक हादसा हुआ। उसका भाई मर गया, लेकिन निशा की आत्मा इस ट्रेन से बंध गई।

     

    तब से वह दूसरों की यादें चुराकर अपनी यादों को जिंदा रखती रही।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो तुम्हें आजाद कैसे किया जा सकता है?”

     

    निशा मुस्कुराई।

     

    “किसी को अपनी सबसे प्यारी याद खुद छोड़नी होगी।”

     

    “कौन-सी याद?”

     

    “वही जिसे खोने से तुम्हें सबसे ज्यादा डर लगता है।”

     

    आरव समझ गया।

     

    उसे अपनी माँ की याद छोड़नी होगी।

     

    लेकिन तभी ट्रेन में जोरदार झटका लगा।

     

    सारे शीशे टूटने लगे।

     

    बूढ़े की आवाज आई—

     

    “आरव! जल्दी करो!”

     

    निशा ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास केवल एक मिनट है।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने अपनी माँ का चेहरा याद किया।

     

    माँ मुस्कुरा रही थीं।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “माँ… मैं आपको भूलना नहीं चाहता।”

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “लेकिन अगर मेरी याद की वजह से कोई और हमेशा कैद रहेगा… तो मैं इसे छोड़ दूँगा।”

     

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    एक चमकता हुआ शीशा उसके सामने आया।

     

    उसमें उसकी माँ का चेहरा था।

     

    आरव ने उसे छू लिया।

     

    शीशा टूट गया।

     

    पूरी ट्रेन रोशनी से भर गई।

     

    निशा चीखने लगी।

     

    और उसी पल ट्रेन की घंटी बजी—

     

    टन… टन… टन…

     

    लाउडस्पीकर से आवाज आई—

     

    “अगला स्टेशन… मृत्यु जंक्शन।”

     

    बूढ़े ने घबराकर कहा—

     

    “यह स्टेशन आ गया तो सब खत्म!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अब क्या होगा?”

     

    बूढ़े ने बाहर देखा।

     

    “अब हमें ट्रेन के इंजन तक जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “क्योंकि इस ट्रेन को चलाने वाला कोई इंसान नहीं है।”

     

    “तो कौन है?”

     

    बूढ़े ने कांपते हुए कहा—

     

    “तुम्हारे पिता।”

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 2: भैरव घाट स्टेशन

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    आरव ट्रेन के दरवाजे पर खड़ा था।बाहर प्लेटफॉर्म पर उसकी छोटी बहन नैना खड़ी थी।

     

    वही चेहरा।

     

    वही मासूम आँखें।

     

    वही सफेद फ्रॉक, जो उसने अपनी आखिरी तस्वीर में पहनी थी।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “नैना…”

     

    लड़की ने मुस्कुराकर हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “भैया… नीचे आओ।”

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ाने ही वाला था कि पीछे से बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत जाओ!”

     

    आरव ने झुंझलाकर कहा—

     

    “ये मेरी बहन है!”

     

    बूढ़ा बोला—

     

    “तुम्हारी बहन दस साल पहले मर चुकी है।”

     

    “मुझे पता है!”

     

    “तो फिर समझो… जो सामने खड़ी है, वह तुम्हारी बहन नहीं है।”

     

    आरव ने फिर बाहर देखा।

     

    नैना अब भी मुस्कुरा रही थी।

     

    लेकिन इस बार उसकी मुस्कान कुछ ज्यादा चौड़ी थी।

     

    बहुत ज्यादा।

     

    उसके होंठ धीरे-धीरे कानों तक फैलने लगे।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तभी स्टेशन की सारी लाइटें एक साथ बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ नैना की आँखें चमक रही थीं।

     

    और फिर उसकी आवाज आई—

     

    “भैया… तुम मुझे पहचान नहीं पाए?”

     

    अचानक ट्रेन का दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव पीछे गिर पड़ा।

     

    ट्रेन फिर चलने लगी।

     

    कुछ ही सेकंड बाद भैरव घाट स्टेशन अंधेरे में गायब हो गया।

     

    आरव हांफ रहा था।

     

    उसने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    “वह क्या था?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “इस ट्रेन का पहला जाल।”

     

    “पहला?”

     

    बूढ़े ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ। अभी चार जाल और आएंगे।”

     

    आरव की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

     

    “ये ट्रेन है क्या?”

     

    बूढ़े ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—

     

    “यह ट्रेन उन लोगों को लेकर चलती है जिनका समय पूरा हो चुका है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मैं जिंदा हूँ!”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अभी।”

     

    यह शब्द सुनकर आरव चुप हो गया।

     

    तभी ट्रेन की लाइटें झपकने लगीं।

     

    एक बार।

     

    दो बार।

     

    तीन बार।

     

    फिर अचानक पूरी ट्रेन अंधेरे में डूब गई।

     

    अंधेरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “माँ…”

     

    फिर दूसरी आवाज।

     

    “मुझे घर जाना है…”

     

    फिर तीसरी।

     

    “कोई दरवाजा खोलो…”

     

    आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    डिब्बा खाली था।

     

    जहाँ कुछ सेकंड पहले बीस यात्री बैठे थे, वहाँ अब कोई नहीं था।

     

    सिर्फ बूढ़ा आदमी अपनी सीट पर बैठा था।

     

    आरव ने घबराकर पूछा—

     

    “बाकी लोग कहाँ गए?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “अपने-अपने स्टेशन पर।”

     

    “लेकिन ट्रेन तो रुकी ही नहीं!”

     

    बूढ़े ने जवाब दिया—

     

    “यह ट्रेन हर यात्री के लिए अलग-अलग रुकती है।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    तभी उसके सामने वाली सीट पर एक छोटा सा बैग दिखाई दिया।

     

    बैग देखकर उसकी आँखें फैल गईं।

     

    वह बैग बिल्कुल वैसा ही था जैसा नैना स्कूल जाते समय इस्तेमाल करती थी।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    बैग के अंदर एक पुरानी कॉपी थी।

     

    कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “आरव भैया के लिए।”

     

    उसके हाथ कांपने लगे।

     

    उसने पन्ना खोला।

     

    अंदर बच्चे जैसी लिखावट में लिखा था—

     

    “भैया, अगर कभी रात की ट्रेन में बैठना पड़े तो खिड़की से बाहर मत देखना।”

     

    आरव ने दूसरा पन्ना पलटा।

     

    “अगर कोई तुम्हारा नाम लेकर बुलाए तो जवाब मत देना।”

     

    तीसरा पन्ना—

     

    “और अगर तुम्हें मैं दिखाई दूँ… तो मेरे पास मत आना।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उसने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    “ये कॉपी यहाँ कैसे आई?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “क्योंकि जिसने तुम्हें बुलाया है, वह तुम्हें बहुत अच्छी तरह जानती है।”

     

    “कौन?”

     

    बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

     

    तभी ट्रेन की खिड़की पर किसी ने बाहर से हाथ रखा।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    बाहर अंधेरा था।

     

    फिर वही हाथ दोबारा दिखाई दिया।

     

    इस बार वह हाथ कांच पर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरकने लगा।

     

    आरव ने पीछे हटकर बूढ़े को देखा।

     

    बूढ़ा आँखें बंद करके बैठा था।

     

    “मत देखो,” उसने कहा।

     

    लेकिन आरव खुद को रोक नहीं पाया।

     

    उसने खिड़की में देखा।

     

    बाहर एक लड़की ट्रेन के साथ-साथ चल रही थी।

     

    वह नैना थी।

     

    आरव के चेहरे से खून उतर गया।

     

    ट्रेन बहुत तेज चल रही थी।

     

    फिर भी नैना उसी गति से उसके साथ दौड़ रही थी।

     

    उसने खिड़की पर उंगली से कुछ लिखा।

     

    “भैया, अगला स्टेशन तुम्हारा है।”

     

    अचानक ट्रेन के अंदर घोषणा हुई—

     

    “अगला स्टेशन… आरवपुर।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “आरवपुर?”

     

    बूढ़े ने आँखें खोल दीं।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    “यह स्टेशन नहीं आना चाहिए था।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे नाम का कोई स्टेशन इस लाइन पर नहीं है।”

     

    ट्रेन की रफ्तार अचानक बढ़ गई।

     

    खिड़की के बाहर अंधेरा गायब हो गया।

     

    अब दोनों तरफ पुराने मकान दिखाई दे रहे थे।

     

    हर मकान के बाहर एक ही आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने गौर से देखा।

     

    वह आदमी…

     

    आरव खुद था।

     

    सड़क के किनारे।

     

    छतों पर।

     

    खिड़कियों में।

     

    हर जगह उसके जैसे चेहरे दिखाई दे रहे थे।

     

    सभी उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    आरव ने घबराकर खिड़की से पीछे हटते हुए पूछा—

     

    “ये सब क्या है?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “तुम्हारे अलग-अलग अंत।”

     

    “क्या?”

     

    “इस ट्रेन में हर यात्री को उसकी मौत के अलग-अलग रूप दिखाए जाते हैं।”

     

    आरव की सांसें तेज हो गईं।

     

    “तो मेरा अंत क्या है?”

     

    बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “यह अभी तय नहीं हुआ।”

     

    “किसने तय करना है?”

     

    बूढ़े ने सामने के दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “तुमने।”

     

    अचानक ट्रेन रुक गई।

     

    इस बार कोई स्टेशन नहीं था।

     

    सिर्फ एक लंबा, सुनसान पुल।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    बाहर घना कोहरा था।

     

    और कोहरे के बीच नैना खड़ी थी।

     

    लेकिन अब उसके हाथ में लाल रंग का एक टिकट था।

     

    उसने टिकट हवा में उठाया।

     

    “भैया…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    नैना बोली—

     

    “अगर तुम मुझे बचाना चाहते हो, तो ट्रेन से उतर जाओ।”

     

    आरव दरवाजे की तरफ बढ़ा।

     

    बूढ़ा चिल्लाया—

     

    “रुको!”

     

    लेकिन तभी नैना की आवाज बदल गई।

     

    अब वह बच्ची की आवाज नहीं थी।

     

    वह एक भारी, डरावनी आवाज थी—

     

    “क्योंकि तुम्हारे बिना मैं इस ट्रेन से कभी बाहर नहीं निकल सकती।”

     

    आरव जम गया।

     

    उसी पल बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुराना टिकट निकाला।

     

    उस टिकट पर तारीख देखकर आरव की आँखें फैल गईं।

     

    वह तारीख थी—

     

    14 अगस्त 2016।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “यह मेरी आखिरी यात्रा थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आप अभी तक…?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा।

     

    “मैं दस साल से इसी ट्रेन में हूँ।”

     

    आरव चीख पड़ा।

     

    “आप… मर चुके हैं?”

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने आरव को एक टिकट दिया।

     

    “लेकिन तुम अभी मरना नहीं चाहते… इसलिए इसे संभालकर रखना।”

     

    आरव ने टिकट लिया।

     

    उस पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—

     

    “वापसी।”

     

    तभी ट्रेन के बाहर से हजारों लोगों के चीखने की आवाज आने लगी।

     

    पुल के नीचे से काले हाथ ऊपर उठने लगे।

     

    नैना पीछे हट गई।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “जल्दी करो, आरव!”

     

    “क्या?”

     

    “अगले स्टेशन से पहले उस टिकट को पंच करवाना होगा।”

     

    “कौन करेगा?”

     

    बूढ़े ने ट्रेन के सबसे आगे की तरफ इशारा किया।

     

    “जिसका चेहरा इस ट्रेन में किसी ने कभी नहीं देखा।”

     

    और उसी क्षण ट्रेन के आखिरी डिब्बे से एक भारी कदमों की आवाज आने लगी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कोई धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रहा था।

     

    आरव ने अंधेरे गलियारे की तरफ देखा।

     

    एक लंबी काली आकृति दिखाई दी।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल नहीं था।

     

    लेकिन उसके हाथ में एक टिकट पंच करने वाली मशीन थी।

     

    और वह धीरे-धीरे बोल रही थी—

     

    “अगला यात्री… आरव।”

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 1: प्लेटफॉर्म नंबर 6

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।शहर का पुराना रेलवे स्टेशन लगभग खाली हो चुका था। प्लेटफॉर्म पर इक्का-दुक्का यात्री ही दिखाई दे रहे थे। ठंडी हवा के कारण स्टेशन की पीली लाइटें बार-बार झपक रही थीं।

     

    आरव प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर अकेला बैठा अपनी घड़ी देख रहा था।

     

    उसकी ट्रेन रात 11:55 पर आने वाली थी।

     

    आरव को अपने गाँव जाना था। उसकी माँ की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह ऑफिस से सीधे स्टेशन पहुंचा था।

     

    उसने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क गायब था।

     

    “अजीब है,” उसने खुद से कहा।

     

    स्टेशन पर इतनी भीड़ होने के बावजूद उसके फोन में नेटवर्क नहीं था।

     

    तभी लाउडस्पीकर से आवाज आई—

     

    “यात्रियों से अनुरोध है कि प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर आने वाली ट्रेन के लिए तैयार रहें।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल उसे कुछ अजीब लगा।

     

    स्टेशन की बाकी सभी घड़ियाँ 11:55 दिखा रही थीं।

     

    उसकी घड़ी में भी 11:55 था।

     

    लेकिन ट्रेन नहीं आई।

     

    पाँच मिनट बीते।

     

    दस मिनट।

     

    फिर आधा घंटा।

     

    प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे खाली होने लगा।

     

    आरव ने टिकट काउंटर की तरफ देखा।

     

    वहाँ बैठा कर्मचारी भी गायब था।

     

    चाय की दुकान बंद हो चुकी थी।

     

    सफाई करने वाला आदमी भी चला गया था।

     

    पूरा प्लेटफॉर्म सुनसान हो गया।

     

    आरव ने मोबाइल देखा।

     

    समय अभी भी 11:55 था।

     

    उसने घड़ी उतारी।

     

    घड़ी की सुइयाँ चल रही थीं।

     

    लेकिन समय आगे नहीं बढ़ रहा था।

     

    अचानक स्टेशन के दूसरे छोर से ट्रेन के आने की आवाज सुनाई दी।

     

    छुक… छुक… छुक…

     

    आरव खड़ा हो गया।

     

    दूर अंधेरे में एक ट्रेन दिखाई दी।

     

    उसकी सारी खिड़कियाँ काली थीं।

     

    कोई लाइट नहीं।

     

    कोई हॉर्न नहीं।

     

    ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।

     

    दरवाजा अपने आप खुला।

     

    अंदर बैठे यात्रियों ने आरव की तरफ देखा।

     

    सभी बिल्कुल शांत थे।

     

    किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

     

    आरव ने अपना टिकट देखा।

     

    टिकट पर ट्रेन का नाम लिखा था—

     

    “निशा एक्सप्रेस”

     

    लेकिन उसने ऐसी किसी ट्रेन का नाम पहले कभी नहीं सुना था।

     

    फिर भी उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

     

    वह ट्रेन में चढ़ गया।

     

    जैसे ही वह अंदर गया, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    डिब्बे में करीब बीस लोग बैठे थे।

     

    सभी लोग सीधे सामने देख रहे थे।

     

    कोई बात नहीं कर रहा था।

     

    आरव ने एक खाली सीट देखकर बैठने की कोशिश की।

     

    तभी सामने बैठे एक बूढ़े आदमी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यहाँ मत बैठो।”

     

    आरव घबरा गया।

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि यह सीट किसी और की है।”

     

    आरव ने सीट की तरफ देखा।

     

    सीट खाली थी।

     

    “किसकी?”

     

    बूढ़े ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    “जो अभी आएगा।”

     

    आरव ने मजाक समझकर बात टाल दी।

     

    कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी।

     

    लेकिन बाहर कोई स्टेशन, शहर या सड़क दिखाई नहीं दे रही थी।

     

    सिर्फ घना अंधेरा।

     

    आरव ने मोबाइल निकाला।

     

    अब उसमें नेटवर्क था।

     

    लेकिन स्क्रीन पर एक अजीब मैसेज आया—

     

    “आपका गंतव्य: मृत्यु जंक्शन।”

     

    आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने मैसेज हटाया।

     

    कुछ सेकंड बाद वही मैसेज फिर आया।

     

    फिर तीसरी बार।

     

    तभी सामने बैठे बूढ़े आदमी ने कहा—

     

    “पहली बार आए हो?”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “जो पहली बार आता है, वही मोबाइल देखता है।”

     

    “आप कितनी बार आए हैं?”

     

    बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ अपनी कलाई दिखाई।

     

    उसकी कलाई पर टिकट की तरह एक काला निशान बना हुआ था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “ये क्या है?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “वापसी का टिकट।”

     

    आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले ट्रेन अचानक रुक गई।

     

    चीईईईं…

     

    सभी यात्री एक साथ अपनी सीट से उठ खड़े हुए।

     

    दरवाजे खुल गए।

     

    बाहर स्टेशन था।

     

    लेकिन स्टेशन का नाम देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    बोर्ड पर लिखा था—

     

    “भैरव घाट स्टेशन”

     

    आरव ने मोबाइल में समय देखा।

     

    11:55

     

    अब भी वही समय।

     

    सामने बैठे बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “अब फैसला करना होगा।”

     

    “कैसा फैसला?”

     

    बूढ़े ने ट्रेन के बाहर देखा।

     

    “अगर तुम इस स्टेशन पर उतर गए… तो वापस कभी नहीं चढ़ पाओगे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और अगर नहीं उतरा?”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “तो ट्रेन तुम्हें वहाँ ले जाएगी जहाँ से कोई वापस नहीं आता।”

     

    तभी प्लेटफॉर्म पर एक लड़की दिखाई दी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहने थे।

     

    वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

     

    आरव ने उसे देखा।

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर आरव की सांस रुक गई।

     

    वह लड़की…

     

    आरव की छोटी बहन जैसी दिख रही थी, जिसकी मौत दस साल पहले हो चुकी थी।

     

    लड़की ने मुस्कुराकर हाथ हिलाया।

     

    फिर उसके होंठ हिले—

     

    “भैया… मुझे लेने क्यों नहीं आए?”

     

    आरव सीट से उठ गया।

     

    बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत उतरना!”

     

    लेकिन आरव ने उसकी पकड़ छुड़ा दी।

     

    और जैसे ही उसने ट्रेन के दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया…

     

    पूरे डिब्बे में बैठे यात्रियों ने एक साथ उसकी तरफ देखा।

     

    उन सबके चेहरे पर अब मुस्कान थी।

     

    और बूढ़े ने आखिरी बार कहा—

     

    “अब तुम भी उनमें से एक हो।”

  • आत्मग्लानि भाग 3

    आत्मग्लानि भाग 3

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

                   आत्मग्लानि …

    अब तक आपने पढ़ा :–

    संजय जी ने उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ना ही कोई कभी उस विषय पर बहस की , क्योंकि वह उनके लिए एक बच्ची मात्र थी जिसे उन्हें पढ़ाना था । बस ! इससे ज्यादा वो कुछ नहीं उसके बारे में सोचते थे । ऐसे ही अनदेखी में सर जी के दिन गुजर रहे थे और उनकी नजरंदाजी रीया को बहुत खल रही थी, जिससे वो अंदर ही अंदर खल रही थी और उसका ध्यान अपनी पढ़ाई पर से हटता जा रहा था । जिसके परिणामस्वरूप उसकी तबीयत बिगड़ती गई और उसके परिवार वालों को उसकी चिंता होने लगी , अब उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि रीया को क्या हुआ है? जो लड़की घर की जान थी वो गुमसुम सी क्यों रहती है ऐसा क्या दुःख हुआ जो वो बता भी नहीं रही है? 

    उसके माता-पिता उसे शहर के एक जाने माने डाक्टर के पास ले गए, डाक्टर ने रीया की अच्छी तरह जांच पड़ताल की और प्रेम से बोले – बेटा तुम्हे कुछ नहीं हुआ है, तुम बिल्कुल ठीक हो, तुम बाहर बैठो, मुझे तुम्हारी मां से कुछ बातें करनी हैं और मुस्कुरा दिए, रीया ने नजरें उठाकर उन्हें देखा और चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई, मां और पिताजी ने डर से डाक्टर को देखा तो डाक्टर उनकी मंशा भांप कर कहने लगे ” चिंता की कोई बात नहीं है ऐसा वैसा कुछ नहीं हुआ है, बस कोई बात है जो उसने अपने मन में दबा रखी है, आप उसकी मां हैं प्रेम से उसके मन को टटोलने की कोशिश कीजिए, इस उम्र में बच्चे अपनी इच्छाओं को अपने अंदर दबा दिया करते हैं कभी अपने माता-पिता के डर से कभी समाज के डर से। मां – डाक्टर चिंता की तो कोई बात नहीं है ना, हमारी बेटी ही हमारे जी़ीने का सहारा है और वो हाथ जोड़कर रोने लगी । डाक्टर ने कहा” देखिए ऐसे ना कीजिए वो ठीक है बस उसके मन को टटोलने की कोशिश कीजिए और जानिए उसके मन में क्या है जो वो दबा कर बैठी है किसी को बता नहीं रही, मैं एक डाक्टर हूं नींद आने के लिए दवाईयां लिख देता हूं वो दीजिए लेकिन विश्वास भी रखिए अपनी बेटी पर और दवाओं से ज्यादा प्यार से ठीक होगी इसका विचार अपने दिल में रखकर बात कीजिए वो आपको नहीं बताएगी तो किसे बताएगी ? इसलिए उसका ध्यान और प्रेम ज्यादा दीजिए। डाक्टर की बातों से आश्वस्त होकर वह दोनों रीया को लेकर घर आ गए और आराम करने को कहकर रीया को उसके कमरे में भेज दिया। मां ने सारी बात घर वालों को बताई तो एक बार सब चिंता में पड़ गए लेकिन पिता जी के कहने पर कि हमें उसका ध्यान प्रेम और विश्वास सबको बनाए रखना है जिससे वो हमसे अपने मन की बात कह सके, उनकी बातें सुनकर सबने सहमति जताई और रीया पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया। कुछ दिनों के लिए स्कूल से छुट्टी ले ली रीया ने, मन तो वैसे भी संजय व्यास जी की अनदेखी से खिन्न हो गया था, तो सोचा कुछ दिन घर में ही रहेगी।

     

     

     

  • काला साया — भाग 5

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सुबह होते ही आरव और कबीर गाँव की चौपाल में पहुँचे।

     

    गाँव के लोग रोज़ की तरह अपने काम में लगे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आज उनके सामने बीस साल पुराना एक ऐसा सच आने वाला है, जिसे सुनकर पूरे गाँव की नींव हिल जाएगी।

     

    आरव ने सबको बुलाया।

     

    धीरे-धीरे गाँव के बुज़ुर्ग, महिलाएँ और नौजवान वहाँ इकट्ठा हो गए।

     

    ठाकुर दीनदयाल भी आए।

     

    आरव ने उनके सामने पुरानी डायरी रख दी।

     

    “यह सावित्री की डायरी है।”

     

    चौपाल में सन्नाटा छा गया।

     

    एक बूढ़ी महिला ने काँपती आवाज़ में पूछा—

     

    “सावित्री?”

     

    “हाँ,” आरव ने कहा। “जिसे हम सब साया के नाम से जानते रहे।”

     

    फिर आरव ने डायरी में लिखी पूरी कहानी सबको सुनाई।

     

    उसने बताया कि सावित्री भागी नहीं थी।

     

    उसकी हत्या हुई थी।

     

    उसे पुराने मकान के नीचे बने कमरे में बंद किया गया था।

     

    उसके पति ने लोगों से झूठ बोला था।

     

    और वर्षों तक उसका सच दबा रहा।

     

    कुछ लोगों की आँखों में आँसू आ गए।

     

    सावित्री की छोटी बहन, जो अब बूढ़ी हो चुकी थी, भीड़ से आगे आई।

     

    उसने डायरी को छुआ और रोते हुए कहा—

     

    “मुझे पता था… मेरी बहन झूठ नहीं बोल सकती थी।”

     

    ठाकुर दीनदयाल ने सिर झुका लिया।

     

    उन्होंने कहा, “हमने उस समय सच जानने की कोशिश नहीं की। हमें लगा वह भाग गई होगी। शायद हमारी चुप्पी भी उसकी आत्मा को बाँधे रही।”

     

    आरव ने कहा, “अब हमें उसका नाम हमेशा के लिए साया नहीं, सावित्री कहना होगा।”

     

    सबने एक साथ सिर झुका दिया।

     

    उसी समय आसमान में बादल घिरने लगे।

     

    हवा तेज़ हो गई।

     

    दूर पुराने मकान की तरफ़ से घंटी बजने की आवाज़ आई।

     

    टन…

     

    टन…

     

    टन…

     

    गाँव के लोग डरकर उस दिशा में देखने लगे।

     

    आरव समझ गया।

     

    “वह हमें बुला रही है।”

     

    कुछ लोग उसके साथ पुराने मकान की ओर चल पड़े।

     

    मकान के अंदर पहुँचते ही उन्हें पहले से कहीं अधिक शांति महसूस हुई।

     

    वह घर अब डरावना नहीं लग रहा था।

     

    दीवारों पर जमी काली परत जैसे हल्की हो गई थी।

     

    नीचे वाले कमरे में पहुँचकर आरव ने दीपक जलाया।

     

    सावित्री की डायरी उसके सामने रखी थी।

     

    उसने आखिरी बार कहा—

     

    “सावित्री, तुम्हारे साथ जो हुआ उसका सच अब सब जानते हैं। तुम्हारा नाम अब किसी डर की पहचान नहीं, बल्कि तुम्हारे अस्तित्व की पहचान है।”

     

    कमरे में हल्की हवा चली।

     

    दीपक की लौ एक पल के लिए बहुत ऊँची हो गई।

     

    फिर सामने धुंध बनने लगी।

     

    धुंध के बीच सावित्री दिखाई दी।

     

    लेकिन इस बार वह वैसी नहीं थी जैसी आरव ने पहली रात देखी थी।

     

    उसके लंबे बाल व्यवस्थित थे।

     

    चेहरा शांत था।

     

    आँखों में डर नहीं था।

     

    उसने अपनी बहन की तरफ़ देखा।

     

    दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    सावित्री ने कुछ नहीं कहा।

     

    सिर्फ़ मुस्कुराई।

     

    उसकी बहन ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “जा बहन… अब तू आज़ाद है।”

     

    सावित्री ने धीरे से सिर झुका दिया।

     

    उसी क्षण कमरे में एक मधुर हवा चली।

     

    दीपक की लौ सुनहरी हो गई।

     

    सावित्री की आत्मा धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।

     

    उसके आसपास की अँधेरी परछाइयाँ गायब होने लगीं।

     

    आरव ने अपनी कलाई देखी।

     

    काला निशान पूरी तरह मिट चुका था।

     

    टूटा हुआ आईना भी अपने आप राख में बदल गया।

     

    और उस राख के साथ काला साया भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

     

    सावित्री की आत्मा प्रकाश की ओर उठने लगी।

     

    जाने से पहले उसने आरव और कबीर की तरफ़ देखा।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    आवाज़ बहुत धीमी थी—

     

    “धन्यवाद।”

     

    फिर वह प्रकाश में विलीन हो गई।

     

    कमरे में एक पल के लिए पूर्ण शांति छा गई।

     

    बाहर अचानक बारिश शुरू हो गई।

     

    लेकिन यह बारिश पिछली रात जैसी डरावनी नहीं थी।

     

    बूँदें धीरे-धीरे गिर रही थीं।

     

    आसमान साफ़ होने लगा।

     

    सूरज की किरणें बादलों के बीच से निकल आईं।

     

    गाँव वालों ने उसी दिन पुराने मकान के सामने सावित्री के नाम का एक छोटा-सा दीपक जला दिया।

     

    अब वहाँ कोई डर नहीं था।

     

    रात होने पर भी उस मकान से चीखें नहीं आती थीं।

     

    न पायल की आवाज़।

     

    न काली परछाईं।

     

    न बंद कमरे की दस्तक।

     

    सिर्फ़ हवा चलती और पेड़ों के पत्ते धीरे-धीरे हिलते।

     

    कुछ महीनों बाद उस पुराने मकान को गिराकर वहाँ एक छोटा-सा मंदिर और स्मृति-स्थान बनाया गया।

     

    दीवार पर एक पत्थर लगाया गया, जिस पर लिखा था—

     

    “सावित्री — जिसे दुनिया ने साया समझा, लेकिन जो अंत में सच की रोशनी बन गई।”

     

    आरव जब भी उस रास्ते से गुजरता, कुछ पल वहाँ रुकता।

     

    उसे आज भी पहली बारिश वाली रात याद आती।

     

    वही पुराना मकान।

     

    वही काली परछाईं।

     

    वही डर।

     

    लेकिन अब उसे डर नहीं लगता था।

     

    क्योंकि वह जान चुका था कि हर भटकती आत्मा बदला लेने नहीं आती।

     

    कुछ आत्माएँ सिर्फ़ अपना सच सुनाए जाने का इंतज़ार करती हैं।

     

    उस शाम आरव ने आसमान की ओर देखा।

     

    हल्की बारिश हो रही थी।

     

    एक पल के लिए बादलों के बीच उसे एक शांत चेहरा दिखाई दिया।

     

    सावित्री मुस्कुरा रही थी।

     

    फिर वह दृश्य धीरे-धीरे आसमान में घुल गया।

     

    बारिश थम गई।

     

    हवा शांत हो गई।

     

    और उस रात, बीस साल बाद, सावित्री की आत्मा को आखिरकार मुक्ति मिल गई।

     

    समाप्त।

  • काला साया — भाग 4

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    रात धीरे-धीरे बीत रही थी।

     

    पुराने मकान के नीचे बने उस कमरे में आरव और कबीर अब भी खड़े थे। टूटे हुए आईने के टुकड़े फर्श पर बिखरे पड़े थे। हर टुकड़े में अलग-अलग परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    एक टुकड़े में आरव था।

     

    दूसरे में कबीर।

     

    लेकिन तीसरे टुकड़े में वही काला साया था।

     

    लंबा, बिना चेहरे का और इंसानी शरीर से कहीं अधिक डरावना।

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने दरवाज़ा खींचा, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    “आरव… लगता है वह हमें जाने नहीं देगा।”

     

    आरव ने दीपक को कसकर पकड़ लिया।

     

    “हमें सुबह तक इंतज़ार करना होगा।”

     

    तभी कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    फिर किसी बूढ़े के कराहने की।

     

    फिर एक आदमी की चीख।

     

    जैसे इस घर में वर्षों से दबे हुए सारे दर्द एक साथ बाहर निकल आए हों।

     

    दीवारों पर काली परछाइयाँ दौड़ने लगीं।

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    तभी उसके कान के पास आवाज़ आई—

     

    “सच बोलोगे?”

     

    आरव ने आँखें खोलीं।

     

    साया उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    सिर्फ़ थकान थी।

     

    “तुम्हें डर लग रहा है?” उसने पूछा।

     

    आरव ने कहा, “हाँ।”

     

    साया बोली, “डरना गलत नहीं है। डर के कारण सच छिपाना गलत है।”

     

    अचानक साया के पीछे काला धुआँ जमा होने लगा।

     

    धुआँ धीरे-धीरे इंसानी आकार लेने लगा।

     

    वह काला साया था।

     

    उसने लंबा हाथ आरव की तरफ़ बढ़ाया।

     

    दीपक की लौ काँपने लगी।

     

    कबीर चिल्लाया, “आरव, दीपक बुझने मत देना!”

     

    आरव ने दोनों हाथों से दीपक ढक लिया।

     

    काला साया गुर्राया।

     

    “तुम इंसान हो। तुम्हारे भीतर भी डर है… लालच है… झूठ है…”

     

    आरव ने काँपते हुए कहा, “हाँ, मेरे अंदर भी डर है। लेकिन मैं तुम्हें अपना डर नहीं दूँगा।”

     

    काला साया अचानक उसके ऊपर झपटा।

     

    कमरा अँधेरे में डूब गया।

     

    आरव को लगा जैसे किसी ने उसका गला पकड़ लिया हो।

     

    उसे साँस लेने में परेशानी होने लगी।

     

    कबीर ने उसे खींचने की कोशिश की, लेकिन अदृश्य ताकत ने दोनों को दीवार से पटक दिया।

     

    दीपक उनके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया।

     

    लौ बुझने ही वाली थी।

     

    तभी साया ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथ दीपक के ऊपर कर दिए।

     

    दीपक फिर जल उठा।

     

    काला साया पीछे हट गया।

     

    साया की आवाज़ गूँजी—

     

    “यह घर डर से नहीं… सच से मुक्त होगा।”

     

    आरव ने डायरी उठा ली।

     

    उसने उसमें लिखी साया की पूरी कहानी जोर से पढ़नी शुरू की।

     

    उसका पति उसे इस कमरे में बंद करके गया था।

     

    उसने साया को मारने की कोशिश की थी।

     

    और बाद में गाँव वालों से झूठ कहा था कि साया भाग गई।

     

    साया की हत्या का सच कभी सामने नहीं आया।

     

    जैसे-जैसे आरव पढ़ता गया, कमरे की दीवारों पर बनी काली परछाइयाँ कमजोर होने लगीं।

     

    काला साया चीखने लगा।

     

    “चुप हो जाओ!”

     

    आरव पढ़ता रहा।

     

    “साया निर्दोष थी।”

     

    काला साया पीछे हटने लगा।

     

    “उसकी मृत्यु हत्या थी।”

     

    कमरे में तेज़ हवा चलने लगी।

     

    “और उसकी आत्मा को वर्षों तक झूठ के कारण भटकना पड़ा।”

     

    अचानक ऊपर से बहुत तेज़ आवाज़ आई।

     

    जैसे पूरा मकान हिल गया हो।

     

    फर्श में दरार पड़ गई।

     

    दरार के अंदर से काली राख निकलने लगी।

     

    कबीर ने कहा, “आरव! शायद यही वह चीज़ है जिसे खत्म करना होगा।”

     

    आरव ने दीपक उठाया।

     

    वह राख के पास गया।

     

    साया उसके सामने आ खड़ी हुई।

     

    “मेरा असली नाम लो।”

     

    आरव ने डायरी की तरफ़ देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “साया नहीं… मेरा नाम सावित्री है।”

     

    आरव ने ऊँची आवाज़ में कहा—

     

    “सावित्री!”

     

    कमरा अचानक शांत हो गया।

     

    उसने फिर कहा—

     

    “सावित्री निर्दोष थी!”

     

    तीसरी बार उसने कहा—

     

    “सावित्री अब आज़ाद है!”

     

    काले साये ने भयानक चीख मारी।

     

    उसका शरीर धुएँ की तरह बिखरने लगा।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

     

    उस हाथ की उँगलियाँ आरव की कलाई तक पहुँचीं।

     

    उसका काला निशान अचानक जलने लगा।

     

    आरव दर्द से चिल्लाया।

     

    साया ने उसे देखा।

     

    “डरो मत।”

     

    उसने आरव की कलाई पर हाथ रखा।

     

    काला निशान धीरे-धीरे मिटने लगा।

     

    उसी क्षण सुबह की पहली किरण टूटी हुई खिड़की से कमरे में आई।

     

    काला धुआँ गायब हो गया।

     

    साया वहीं खड़ी थी।

     

    अब उसके चेहरे पर शांति थी।

     

    लेकिन उसने अभी तक पूरी तरह आँखें बंद नहीं की थीं।

     

    “अभी एक काम बाकी है,” उसने कहा।

     

    “क्या?”

     

    “सच… गाँव तक पहुँचना चाहिए।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    दरवाज़ा खुल चुका था।

     

    आरव और कबीर बाहर आए।

     

    बारिश रुक चुकी थी।

     

    आसमान में हल्की लालिमा दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन पुराने मकान की सबसे ऊपरी खिड़की में उन्हें एक आखिरी बार साया दिखाई दी।

     

    उसने हाथ जोड़कर धन्यवाद किया।

     

    फिर अँधेरे में विलीन हो गई।

     

    आरव ने समझ लिया कि असली मुक्ति अभी बाकी थी।

     

    उसे पूरे गाँव के सामने सावित्री का सच बताना था।

     

    और अगली सुबह गाँव की चौपाल में वर्षों पुराना राज़ खुलने वाला था।

  • काला साया — भाग 3

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    अगली रात दोनों दोस्त टॉर्च लेकर पुराने मकान के सामने खड़े थे।

     

    आसमान में बादल थे। हवा ठंडी थी और पेड़ों की शाखाएँ लगातार खिड़कियों से टकरा रही थीं।

     

    कबीर ने कहा, “अगर कुछ भी अजीब लगे तो हम तुरंत वापस चले जाएँगे।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दरवाज़ा पहले से खुला था।

     

    दोनों अंदर गए।

     

    अंदर वही सन्नाटा था।

     

    लेकिन इस बार दीवारों पर लगी तस्वीरें अलग लग रही थीं।

     

    कबीर ने टॉर्च एक तस्वीर पर डाली।

     

    वह साया की तस्वीर थी।

     

    फिर उसने दूसरी तस्वीर देखी।

     

    उसमें साया अपने पति के साथ खड़ी थी।

     

    लेकिन तस्वीर में पति का चेहरा काले धब्बे से ढका हुआ था।

     

    “ये किसने किया होगा?” कबीर ने पूछा।

     

    आरव ने डायरी का नक्शा निकाला।

     

    “नीचे जाना है।”

     

    दोनों फर्श के एक पुराने हिस्से तक पहुँचे। नक्शे में बने निशान से जगह मिलती थी।

     

    कबीर ने लकड़ी हटाई।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    जैसे ही वे नीचे उतरे, हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई।

     

    कमरे के अंदर पुरानी वस्तुएँ पड़ी थीं।

     

    बीच में एक लोहे का संदूक था।

     

    आरव ने उसे खोला।

     

    अंदर कई पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक लाल कपड़े में बंधी डायरी थी।

     

    कबीर ने डायरी खोली।

     

    उसमें साया की लिखावट थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस रात मैं यह लिख रही हूँ, मुझे पता है कि शायद मैं सुबह तक जीवित न रहूँ।”

     

    दोनों ध्यान से पढ़ने लगे।

     

    साया ने लिखा था कि उसका पति उसे उस पुराने कमरे में ले गया था। उसने बताया था कि वर्षों पहले उनके परिवार ने धन और शक्ति पाने के लिए एक तांत्रिक से अनुष्ठान करवाया था।

     

    लेकिन अनुष्ठान के दौरान एक आत्मा को बुलाया गया और फिर उसे वापस भेजने का तरीका पूरा नहीं किया गया।

     

    उस आत्मा को “काला साया” कहा जाता था।

     

    वह आत्मा किसी एक व्यक्ति की नहीं थी।

     

    वह उन लोगों के डर, लालच और हिंसा से बनी एक भयावह शक्ति थी, जो वर्षों से उस मकान में मरते रहे थे।

     

    साया के पति ने उस आत्मा का इस्तेमाल लोगों को डराने और जमीन हड़पने के लिए किया था।

     

    लेकिन साया को सब पता चल गया।

     

    उसने विरोध किया।

     

    उस रात उसके पति ने उसे इसी कमरे में बंद कर दिया।

     

    डायरी के अगले पन्ने पर शब्द काँपती हुई लिखावट में थे—

     

    “मैंने दरवाज़े के पीछे उसे देखा। वह इंसान नहीं था। सिर्फ़ काली परछाईं थी। उसने मुझसे कहा कि अगर मैं उसका नाम भूल गई तो वह मुझे हमेशा के लिए अपने साथ बाँध लेगी।”

     

    फिर लिखा था—

     

    “मैंने आखिरी कोशिश की। मैंने उसकी परछाईं को शीशे में बंद कर दिया। लेकिन मुझे अपनी जान देनी पड़ी।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा, “तो साया मर गई थी?”

     

    कबीर ने अगला पन्ना पढ़ा।

     

    “हाँ।”

     

    कमरे में अचानक किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    दरवाज़े पर साया खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था।

     

    वह डरावनी कम और दुखी ज़्यादा लग रही थी।

     

    उसकी आँखों से काले आँसू बह रहे थे।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया क्योंकि मेरा सच किसी ने नहीं सुना।”

     

    आरव ने पूछा, “तुम्हें मुक्ति क्यों नहीं मिली?”

     

    साया ने कमरे के एक कोने की तरफ़ देखा।

     

    वहाँ एक टूटा हुआ आईना रखा था।

     

    “काला साया अभी भी उस आईने में कैद है।”

     

    कबीर ने आईना उठाया।

     

    उसमें दोनों की परछाईं दिखाई दी।

     

    लेकिन उनके बीच एक तीसरी परछाईं भी थी।

     

    लंबी।

     

    टेढ़ी।

     

    और बिना चेहरे की।

     

    अचानक आईना काँपने लगा।

     

    कमरे की सारी बत्तियाँ, जो बंद थीं, एक साथ जल उठीं।

     

    तीसरी परछाईं आईने से बाहर निकलने लगी।

     

    कबीर ने आईना छोड़ दिया।

     

    शीशा टूट गया।

     

    और कमरे में काला धुआँ फैल गया।

     

    धुएँ के बीच एक आवाज़ गूँजी—

     

    “तुमने मुझे फिर जगा दिया…”

     

    आरव ने डायरी के आखिरी पन्ने को देखा।

     

    वहाँ एक तरीका लिखा था।

     

    काले साये को मुक्त करने के लिए उस कमरे में रखे पुराने दीपक को जलाना था, साया का असली नाम लेना था और उसके साथ हुए अपराध का सच गाँव के सामने बताना था।

     

    लेकिन एक शर्त थी।

     

    जिस व्यक्ति ने सच पढ़ा है, उसे उस आत्मा का डर स्वीकार करना होगा।

     

    आरव ने दीपक उठाया।

     

    उसने माचिस जलाई।

     

    दीपक जलते ही काला धुआँ पीछे हट गया।

     

    साया की आत्मा कुछ पल के लिए शांत हो गई।

     

    उसने आरव से कहा—

     

    “सच बाहर लाओ… तभी मैं जा पाऊँगी।”

     

    फिर वह गायब हो गई।

     

    कमरे में सिर्फ़ टूटा हुआ आईना पड़ा था।

     

    लेकिन आईने के टुकड़े में अब भी वह काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

     

    और उसकी आँखें आरव को घूर रही थीं।

     

    अब आखिरी काम बाकी था।

     

    उन्हें सुबह होते ही पूरे गाँव के सामने साया की कहानी बतानी थी।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि काला साया उन्हें इतनी आसानी से जाने देगा या नहीं।

  • काला साया — भाग 2

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    अगली सुबह बारिश रुक चुकी थी, लेकिन आरव के मन में रात का डर अब भी जिंदा था।

     

    उसने कलाई पर बने काले निशान को कई बार साबुन से धोया, मगर वह निशान ज़रा भी हल्का नहीं हुआ। उसकी माँ ने पूछा तो उसने कह दिया कि बाइक से गिरने के कारण चोट लग गई है।

     

    लेकिन आरव जानता था कि वह झूठ बोल रहा है।

     

    दोपहर में उसका बचपन का दोस्त कबीर घर आया। आरव ने उसे पिछली रात की पूरी घटना बताई।

     

    कबीर कुछ देर चुप रहा।

     

    “तुमने उस घर में साया की तस्वीर देखी थी?”

     

    “हाँ।”

     

    कबीर का चेहरा बदल गया।

     

    “आरव, वह घर बीस साल से बंद है।”

     

    “लेकिन वहाँ कोई रहता था?”

     

    “रहता नहीं था… रहती थी।”

     

    “कौन?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा, “साया।”

     

    साया गाँव की रहने वाली एक लड़की थी। लगभग बीस साल पहले उसकी शादी शहर में हुई थी। लेकिन शादी के कुछ महीनों बाद वह अचानक गायब हो गई।

     

    गाँव वालों ने कहा था कि वह अपने पति के साथ भाग गई।

     

    लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं थी।

     

    साया की छोटी बहन ने बताया था कि शादी के बाद साया कई बार अपने घर लौटना चाहती थी। वह कहती थी कि उसके ससुराल के पास एक पुराना मकान है, जहाँ रात को कोई उसे बुलाता है।

     

    एक दिन उसने अपनी बहन से कहा था—

     

    “वहाँ मेरा साया नहीं है… किसी और का साया है।”

     

    इसके बाद साया गायब हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने उसी पुराने मकान के पास उसकी चूड़ियाँ और पायल पाई थीं।

     

    फिर मकान बंद कर दिया गया।

     

    कबीर ने कहा, “लोग कहते हैं कि साया की आत्मा वहीं भटकती है।”

     

    आरव ने अपनी कलाई का निशान दिखाया।

     

    कबीर का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “यह निशान… मैंने पहले भी देखा है।”

     

    “कहाँ?”

     

    “पुरानी हवेली के चौकीदार के हाथ पर।”

     

    दोनों उसी शाम गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति ठाकुर दीनदयाल के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने साया का नाम सुनते ही दरवाज़ा बंद कर दिया।

     

    “तुम दोनों वहाँ गए थे?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    बुज़ुर्ग ने लंबी साँस ली।

     

    “तो अब वह तुम्हें जाने नहीं देगी।”

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    दीनदयाल ने बताया कि साया की मौत साधारण नहीं थी।

     

    शादी के बाद उसके पति ने गाँव के बाहर बने उस मकान को अपने कारोबार के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया था। लेकिन वहाँ पहले से ही एक पुराना कमरा था, जिसे हमेशा बंद रखा जाता था।

     

    साया ने एक रात वह कमरा खोल दिया था।

     

    अंदर उसे एक पुरानी डायरी मिली थी।

     

    डायरी में लिखा था कि कई साल पहले एक तांत्रिक ने उस घर में किसी आत्मा को बाँधने की कोशिश की थी। लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया था। आत्मा पूरी तरह बंधी भी नहीं और मुक्त भी नहीं हुई।

     

    उस आत्मा को लोग काला साया कहते थे।

     

    वह किसी इंसान के शरीर पर अपना प्रभाव डाल सकती थी।

     

    दीनदयाल ने कहा, “साया ने उस कमरे का राज़ जान लिया था। उसके बाद वह बदलने लगी।”

     

    “क्या उसके पति ने उसे मार दिया?” आरव ने पूछा।

     

    बुज़ुर्ग ने उत्तर नहीं दिया।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “अगर सच जानना है तो उस घर में वापस जाना होगा।”

     

    आरव डर गया।

     

    उसी रात उसके कमरे की खिड़की पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने पर्दा हटाया।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फिर उसने नीचे देखा।

     

    कीचड़ में दो पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान खिड़की के नीचे से शुरू होकर घर के अंदर जाने वाले दरवाज़े तक जा रहे थे।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    उसकी माँ सो रही थी।

     

    तभी उसके कमरे के कोने से किसी लड़की के रोने की आवाज़ आई।

     

    “मुझे… बाहर निकालो…”

     

    आरव ने कमरे की बत्ती जलाई।

     

    कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके बिस्तर पर वही पुरानी डायरी पड़ी थी।

     

    जिसे उसने कभी देखा तक नहीं था।

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर यह डायरी तुम्हारे हाथ में है, तो साया ने तुम्हें चुन लिया है।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    अगले पन्ने पर एक नक्शा बना था।

     

    उसमें उसी पुराने मकान का चित्र था और नीचे एक निशान।

     

    निशान के पास लिखा था—

     

    “नीचे का कमरा।”

     

    अचानक डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे।

     

    आखिरी पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—

     

    “मेरी आत्मा को नहीं, मेरे सच को मुक्त करो।”

     

    उसी क्षण कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    बारिश की बूंदों के बीच आरव ने दूर पुराने मकान की छत पर एक औरत को खड़े देखा।

     

    काले कपड़े।

     

    खुले बाल।

     

    सफ़ेद आँखें।

     

    साया उसे देख रही थी।

     

    और फिर उसने अपनी उँगली से नीचे की तरफ़ इशारा किया।

     

    उस पुराने मकान के नीचे।

     

    उस बंद कमरे की तरफ़।

     

    आरव समझ गया कि अगली रात उसे वहाँ वापस जाना होगा।

     

    लेकिन इस बार वह अकेला नहीं जाएगा।

     

    कबीर उसके साथ होगा।

     

    और उन्हें उस कमरे में छिपा सच ढूँढना होगा।

     

    क्योंकि अब सवाल सिर्फ़ साया की आत्मा का नहीं था।

     

    सवाल यह था कि काला साया आखिर किसका था।