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श्रेणी: कहानी

दिल से दिल तक पहुंचने वाली एहसास कहानी बनती है।

  • दर्द ऐ दिल…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मुझे तुम्हारे साथ पूरी कहानी लिखनी थी

     

    और एक तुम मेरे साथ एक ही पन्ने में सिमट कर रह 

    गए…!!🥹🥹

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • काश उस दिन मैने

    काश उस दिन मैने

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Writer Lakshmi Kumari

    Story titel “काश उस दिन मैंने…”

     

    बारिश की बूंदें आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ थीं… जैसे आसमान भी किसी के बिछड़ने का ग़म मना रहा हो। सड़क के किनारे खड़ा अर्जुन भीगता रहा… लेकिन उसे परवाह नहीं थी। उसकी आँखों में खालीपन था… और दिल में सिर्फ एक ही आवाज़ गूंज रही थी।।

     

    “काश उस दिन मैंने अपने दिल की सुन ली होती…”

     

    उसने अपनी मुट्ठी कस ली, सामने कब्रिस्तान था और एक कब्र पर नाम लिखा था “रोहन”

     

    उस नाम को देखते ही उसकी सांसें भारी हो गईं… और यादों का सैलाब उसे बहा ले गया।

     

    कॉलेज का पहला दिन हर तरफ नए चेहरे नई उम्मीदें और थोड़ी सी घबराहट थी।

     

    अर्जुन क्लास के एक कोने में बैठा था… सिर झुकाए… किताब खोलकर। वह हमेशा से ऐसा ही था चुप चाप, सीधा, अपनी दुनिया में रहने वाला लड़का।

     

    तभी किसी ने उसके सामने कुर्सी खींची “भाई, यहाँ बैठ जाऊं? या ये सीट भी तेरी तरह अकेली रहना चाहती है?”

     

    अर्जुन ने सिर उठाया—एक लड़का मुस्कुरा रहा था… आँखों में शरारत और चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    “बैठ जाओ…” अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

     

    “वैसे नाम क्या है तेरा? मैं रोहन… कॉलेज का फ्यूचर सुपरस्टार”

     

    अर्जुन हँस पड़ा “मैं अर्जुन… बस एक आम इंसान…”

     

    तभी पीछे से एक धीमी आवाज आई“अगर आम लोगों की बात हो रही है… तो मैं भी शामिल हो सकता हूँ?”

     

    दोनों ने मुड़कर देखा, एक लंबा, शांत लड़का… जिसकी आँखों में गहराई थी।

     

    उसने अपना हाथ आगे “कबीर…” उसने अपना नाम बताया।

     

    बस… वहीं से शुरू हुई एक ऐसी दोस्ती… जो वक्त के साथ और गहरी होती चली गई।

     

    तीनों साथ बैठते साथ हँसते साथ लड़ते और फिर खुद ही मना भी लेते।

     

    एक दिन कैंटीन में बैठे-बैठे रोहन ने कहा “यार, अगर हमारी दोस्ती पर कोई फिल्म बने ना… तो सुपरहिट जाएगी!”

     

    कबीर मुस्कुराया “लेकिन उसका एंडिंग sad नहीं होना चाहिए…”

     

    अर्जुन ने हाथ बढ़ाया “तो वादा करते हैं… हम कभी अलग नहीं होंगे”

     

    तीनों ने एक-दूसरे के हाथ पर हाथ रखा “हमेशा साथ”

     

    सब कुछ सही चल रहा था… जब तक सिया नाम की लड़की उनकी जिंदगी में नहीं आई थी

     

    पहली बार जब सिया क्लास में आई… तो जैसे वक्त थम गया। उसकी आँखों में मासूमियत थी… और मुस्कान में एक सुकून।

     

    धीरे-धीरे तीनों उससे दोस्ती करने लगे… और अनजाने में तीनों के दिल में उसके लिए एक खास जगह बन गई।

     

    लेकिन… किसी ने कुछ कहा नहीं, एक रात हॉस्टल की छत पर बैठे हुए रोहन बोला “यार… मुझे लगता है मैं सिया को पसंद करने लगा हूँ…”

     

    अर्जुन चुप हो गया… क्योंकि वह भी यही महसूस कर रहा था।

     

    कबीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा “तो बता दे उसे…”

     

    लेकिन उसके दिल में हलचल थी क्योंकि वह भी सिया को चाहता था।

     

    तीनों दोस्त… एक ही लड़की से प्यार करने लगे थे… और किसी को इसका अंदाज़ा नहीं था।

     

    कुछ दिनों बाद अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और एक चिट्ठी लिखी।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे… लेकिन दिल साफ था “सिया मैं तुम्हें पसंद करता हूँ… शायद ये सही समय नहीं है… लेकिन मैं और छुपा नहीं सकता हूं”

     

    उसने वह चिट्ठी कबीर को दी “यार… तू इसे सिया तक पहुँचा दे… मुझसे नहीं होगा…”

     

    कबीर ने चिट्ठी ली… और उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी आ गई। वह अकेले में गया… और चिट्ठी को देखा…

     

    कुछ पल के लिए वह चुप रहा… फिर धीरे-धीरे चिट्ठी को फाड़ दिया।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे “मुझे माफ कर देना अर्जुन…”

     

    फिर वह अर्जुन के पास आया “यार… सिया ने मना कर दिया…”

     

    अर्जुन की आँखों में एक पल को उम्मीद चमकी… फिर बुझ गई।

     

    “ओह… ठीक है…” उसने मुस्कुराने की कोशिश की… लेकिन उसकी आवाज टूट गई।

     

    उस रात… अर्जुन बहुत रोया।

     

    अब कबीर अपने झूठ में फंस चुका था। कुछ दिनों बाद रोहन ने कहा “मैं सिया को प्रपोज करने वाला हूँ…”

     

    कबीर का दिल फिर से डगमगाया “नहीं… तू नहीं कर सकता…” उसने जल्दी से कहा।

     

    “क्यों?” रोहन ने पूछा, “क्योंकि अर्जुन और सिया एक-दूसरे को पसंद करते हैं…”

     

    रोहन सन्न रह गया “क्या? लेकिन उसने कभी बताया नहीं…”

     

    “शायद वो तुझसे छुपा रहा है…” कबीर ने झूठ को और गहरा कर दिया।

     

    रोहन का चेहरा उतर गया “ठीक है अगर ऐसा है  तो मैं पीछे हट जाऊँगा।”

     

    धीरे-धीरे… तीनों के बीच खामोशी आ गई।

     

    एक दिन…

     

    “तूने मुझसे झूठ क्यों बोला?” रोहन ने अर्जुन से पूछा।

     

    “मुझ से झूठ तो तुम दोनों ने बोला!” अर्जुन चिल्लाया।

     

    “तू सिया से प्यार करता है और मुझे बताया तक नहीं!” रोहन का गुस्सा फूट पड़ा।

     

    अर्जुन हैरान था “क्या? मैंने कब कहा ऐसा?”

     

    कबीर बीच में आया “बस करो”

     

    “तू चुप रह!” दोनों एक साथ बोले।

     

    उस दिन… उनकी दोस्ती बिखर गई।

     

     

    कुछ महीनों बाद रोहन की मुलाकात सिया से हुई। “तुम लोग इतने दूर क्यों हो गए?” सिया ने पूछा।

     

    रोहन ने सब बताया।

     

    सिया चौंक गई “मुझे तो कभी कोई चिट्ठी मिली ही नहीं…”

     

    रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या…?”

     

    उसे सब समझ आ गया। वह भागा… अर्जुन के पास… सब सच बताने…

     

     

    बारिश हो रही थी… सड़क फिसलन भरी थी…

     

    रोहन जल्दी में था… उसके दिल में सिर्फ एक बात थी।

     

    “मुझे अर्जुन से माफी मांगनी है…”

     

    लेकिन एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने रोहर को टक्कर मार दी

     

     

    अर्जुन और कबीर दौड़ते हुए अस्पताल पहुँचे।

     

    रोहन ICU में था… साँसें टूट रही थीं। अर्जुन उसका हाथ पकड़कर रो पड़ा “रोहन उठ जा प्लीज।”

     

    रोहन ने धीरे से आँखें खोलीं “अर्जुन” उसकी आवाज कमजोर थी…

     

    “मुझे… सच पता चल गया…”

     

    अर्जुन की आँखें भर आईं “कुछ मत बोल… तू ठीक हो जाएगा…”

     

    रोहन मुस्कुराया “काश… उस दिन… मैंने अपने दिल की सुन ली होती और तुझसे पूछ लिया होता…”

     

    उसने कबीर की तरफ देखा “और तू… अपने दिल से मत भागना…”

     

    इतना कहकर… उसकी सांस रुक गई।

     

     

    अर्जुन जमीन पर बैठ गया “नहीं रोहन नहीं…”

     

    कबीर फूट-फूट कर रोने लगा “मैंने उसे मार दिया… ये सब मेरी गलती है…”

     

     

    आज अर्जुन और कबीर रोहन की कब्र के सामने खड़े थे।

     

    हवा शांत थी… लेकिन दिलों में तूफान उठा हुआ था।

     

    अर्जुन बोला “काश… उस दिन हम एक बार बैठकर बात कर लेते…”

     

    कबीर रोते हुए बोला “काश… उस दिन मैंने अपने दिल की सुन ली होती… और सच बता दिया होता।”

     

    दोनों ने कब्र पर हाथ रखा “हम तुझे कभी नहीं भूलेंगे।”

     

     

    कुछ कहानियाँ अधूरी रह जाती हैं कुछ गलतफहमियाँ जिंदगी छीन लेती हैं और कुछ पछतावे उम्र भर साथ चलते हैं तीनों की दोस्ती खत्म हो गई…

     

    लेकिन एक सच्चाई हमेशा गूंजती रहेगी “काश उस दिन हमने अपने दिल की सुन ली होती।”

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • झूठी दीवार

    झूठी दीवार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    सूर्य अस्त हो रहा था, और उसकी अंतिम नारंगी किरणें, एक समय जीवंत रहे, पर अब मौन पड़े घर के आंगन में फैली हुई थीं। उस आंगन में, जहाँ कभी हँसी और खिलखिलाहट गूंजती थी, आज सिर्फ सन्नाटा था। यह घर था आदित्य का, और उस सन्नाटे का कारण था, उसका भाई—अर्जुन।

     

    आदित्य और अर्जुन दो भाई थे, जो एक ही पेड़ की दो मजबूत डालियों की तरह थे। दोनों में गहरा प्रेम था, उनका बचपन साझा सपनों और शरारतों से भरा था। उनके पिता ने उन्हें सिखाया था कि खून का रिश्ता दुनिया में सबसे पवित्र होता है।

     

    लेकिन समय के साथ, जीवन की दौड़ शुरू हुई। आदित्य बड़े थे, उन्होंने जल्द ही अपने पिता का व्यापार संभाल लिया और उसमें सफल हुए। अर्जुन ने पढ़ाई पूरी करके एक बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की। दोनों की राहें अलग थीं, पर मंजिल एक थी,बअपने परिवार की खुशी।

    समस्या तब शुरू हुई, जब उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े। पिता ने वसीयत बनाने का फैसला किया। उन्होंने व्यापार का एक बड़ा हिस्सा आदित्य को दिया, क्योंकि वह पहले से ही उसे संभाल रहे थे, और अर्जुन को पैतृक जमीन का एक मूल्यवान टुकड़ा और पर्याप्त धन दिया।

     

    अर्जुन को लगा कि उसके साथ अन्याय हुआ है। उसके दिल में यह बात बैठ गई कि पिता ने आदित्य को उससे अधिक प्यार किया, अधिक मूल्यवान समझा। उसने सोचा कि आदित्य ने पिता को प्रभावित किया होगा। उस रात, क्रोध और निराशा से भरे अर्जुन ने आदित्य से झगड़ा किया। उसने कठोर, अपमानजनक शब्द कहे, जिनकी उम्मीद आदित्य ने कभी नहीं की थी।

     

    “तुम हमेशा से पिता के पसंदीदा रहे हो, है ना? तुमने उन्हें फुसला लिया! यह न्याय नहीं है, यह छल है!” अर्जुन ने चिल्लाकर कहा था।

     

    आदित्य, जो अपने छोटे भाई से इतना प्रेम करता था, उन शब्दों से टूट गया। उसने बचाव करने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन ने सुनने से इंकार कर दिया। उसके दिल में एक ‘झूठी दीवार’ खड़ी हो गई थी, एक गलतफहमी, अहंकार और कड़वाहट की दीवार।

     

    उस झगड़े के बाद, अर्जुन ने वह घर छोड़ दिया। वह अपनी वसीयत का हिस्सा लेकर शहर के दूसरे छोर पर चला गया। उसके जाने से पहले, आदित्य ने उसे रोकने की कोशिश की थी, “अर्जुन, यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है। यह हमारा घर है, हमारा रिश्ता है! वापस आ जाओ।”

    “रिश्ता? अब कोई रिश्ता नहीं,” अर्जुन का जवाब एक नुकीले तीर की तरह था।

     

    उन दोनों भाइयों के बीच वर्षों का मौन पसर गया।

    पिता कुछ समय बाद गुजर गए। उनकी अंतिम इच्छा थी कि दोनों भाई मिल जाएं, पर ऐसा न हो सका। पिता के निधन ने आदित्य को अंदर तक झकझोर दिया, लेकिन अर्जुन अपने दुःख में भी अपनी ‘झूठी दीवार’ के पीछे छिपा रहा।

     

    आदित्य ने अपनी पत्नी, नेहा, और बच्चों के साथ जीवन व्यतीत करना जारी रखा, पर उसके चेहरे पर हमेशा एक उदासी छाई रहती थी। वह सफल था, लेकिन उसके घर का एक कोना हमेशा खाली रहता था। वह हर साल अर्जुन के जन्मदिन पर एक पत्र लिखता, पर कभी भेजता नहीं। बस उन पत्रों में अपनी भावनाओं और अपने दर्द को उतार देता।

     

    कई साल बीत गए। अर्जुन ने अपने हिस्से की जमीन पर एक छोटा सा घर बना लिया था, और वह अपने काम में व्यस्त हो गया था। बाहर से वह खुश दिखता था, पर रात की खामोशी में, उसे हमेशा आदित्य के चेहरे की निराशा याद आती थी। उसे पता था कि उसने गलती की थी। वसीयत वास्तव में न्यायपूर्ण थी, और उसके कठोर शब्द अनुचित थे। लेकिन अब अहंकार, उस ‘झूठी दीवार’ ने उसे जकड़ रखा था।

     

    फिर एक दिन, एक भयानक तूफान आया। अर्जुन का नया बना घर उस तूफान में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। वह बाल-बाल बचा, पर उसका सब कुछ बिखर गया था। वह अकेला, बेघर और टूटा हुआ महसूस कर रहा था।

    अगली सुबह, जब अर्जुन टूटी हुई छत के नीचे बैठा था, उसने एक कार को रुकते देखा। कार से एक जाना-पहचाना चेहरा उतरा, आदित्य।

     

    आदित्य ने बिना एक भी शब्द कहे अर्जुन की ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं, और चेहरे पर वर्षों पुराना दर्द झलक रहा था। वह सीधा अर्जुन के पास आया और उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    अर्जुन की ‘झूठी दीवार’ उस एक आलिंगन के स्पर्श से रेत के महल की तरह ढह गई। वर्षों से दबा हुआ पश्चाताप आंसुओं के रूप में बह निकला।

    “माफ़ कर दो भाई! मुझे माफ़ कर दो! मैंने बहुत बड़ी गलती की! मैंने तुम्हारे प्यार का अपमान किया! पिता का अपमान किया! मैं अंधा हो गया था!” अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    आदित्य ने उसे संभाला। उसकी आवाज़ में वर्षों का स्नेह भरा था। “अर्जुन, यह माफ़ी की बात नहीं है। यह मेरे भाई के वापस आने की बात है। मुझे पता था कि तुम एक दिन समझोगे। मैंने तुम्हें कभी दोष नहीं दिया।”

    आदित्य ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। उसने बताया कि कैसे उसने पैतृक घर को हमेशा उसी तरह बनाए रखा, यह सोचकर कि अर्जुन किसी भी पल वापस आ सकता है।

     

    जब अर्जुन वापस अपने पुराने घर के आंगन में पहुंचा, तो उसने देखा कि सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसने छोड़ा था। नेहा ने दौड़कर उसे गले लगाया, और बच्चे, जिन्हें उसने कभी देखा भी नहीं था, उत्सुकता से उसे देख रहे थे।

     

    सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब आदित्य उसे उसके पुराने कमरे में ले गया। कमरे की दीवार पर अब भी वह निशान था, जहाँ दोनों भाइयों ने बचपन में एक क्रिकेट मैच के बाद एक-दूसरे को ‘सर्वश्रेष्ठ दोस्त’ लिखा था।

    मेज पर एक पुरानी लकड़ी की पेटी रखी थी। आदित्य ने पेटी खोली। उसमें पिछले कई वर्षों के अन-भेजे गए पत्र थे।

     

    “यह क्या है?” अर्जुन ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।

    “ये वो ख़त हैं, जो मैंने हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर लिखे। माफ़ी मांगने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए कि यहाँ सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं,” आदित्य ने कहा।

     

    अर्जुन ने एक पत्र निकाला। तारीख 14 अगस्त, 2018।

    उसमें लिखा था: “अर्जुन, आज तुम्हारा जन्मदिन है। माँ ने तुम्हारी पसंद की खीर बनाई है। मैं तुम्हें मिस कर रहा हूँ। वह ज़मीन का टुकड़ा जो तुम्हें मिला था, वह सबसे उपजाऊ है। पिता ने हमेशा कहा था कि तुम एक अच्छे किसान बनोगे। लौट आओ, भाई। घर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”

     

    अर्जुन के दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसने अपने भाई के निःस्वार्थ प्रेम को ठुकराया था, जबकि आदित्य ने हर पल उसके लिए प्रार्थना की थी। माफ़ी सिर्फ शब्द नहीं थे; वे आदित्य के इन अन-भेजे गए पत्रों में, उसके वर्षों के इंतज़ार में, और उसके निस्वार्थ आलिंगन में समाए हुए थे।

     

    माफ़ी की वह घड़ी, तूफान से अधिक शक्तिशाली थी। वह ‘झूठी दीवार’ हमेशा के लिए गिर गई।

    अर्जुन ने उस रात खाना नहीं खाया। वह बस आदित्य के पास बैठा रहा, उस रिश्ते की गर्माहट महसूस कर रहा था जिसे उसने वर्षों पहले खो दिया था। उसने कसम खाई कि वह अपने जीवन के हर क्षण से उस गलती का प्रायश्चित करेगा। उसने सीखा कि सबसे बड़ी संपत्ति ज़मीन या पैसा नहीं, बल्कि अपने ही दिल में मौजूद निस्वार्थ प्रेम और माफ़ी देने की शक्ति है।

     

    और उस रात, उस आंगन में, जहाँ वर्षों से सन्नाटा था, फिर से एक भाई के वापस आने की खुशी और माफ़ी मिल जाने का सुकून, दोनों की शांतिपूर्ण साँसों में गूंज उठा।

     

    Lakshmi Kumari 

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • कर्मों का फल

    कर्मों का फल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    गाँव का नाम था हरियाली, जहाँ लोग मेहनती और सच्चे थे। गाँव के बीचों-बीच एक विशाल बड़ का पेड़ था, जिसके नीचे सब लोग इकट्ठा होते थे। इस पेड़ के पास ही एक गरीब ब्राह्मण, नाम था उसका रामू, अपने छोटे से झोपड़े में रहता था। रामू का जीवन साधारण था, लेकिन उसके दिल में अच्छाई का वास था।

    रामू रोज़ सुबह उठकर अपने छोटे से बाग में काम करता, हल्का-फुल्का खेती करता और जो भी थोड़ा-बहुत कमा पाता, उसी से अपने परिवार कापालन करता। उसकी पत्नी, सीता, हमेशा उसकी मदद करती, और दोनों मिलकर अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की कोशिश करते थे। रामू का मानना था कि अपने कर्मों का फल जरूर मिलता है।

    एक दिन, गाँव में एक साधु महात्मा आए। गाँव के लोग उनके पास आए और उनसे आशीर्वाद मांगा। रामू भी साधु के पास पहुँचा। साधु ने रामू को देखा और कहा, “तुमhari मेहनत और ईमानदारी के फल तुम्हें जल्दी मिलेंगे।”

    कुछ दिनों बाद, रामू ने सोच लिया कि वह गाँव में थोड़ा और मेहनत कर के और पैसे इकट्ठा करेगा। उसने खेतों में ज्यादा मेहनत की, और उस साल फसल भी अच्छी हुई। रामू ने अपने मेहनत के फल को देखा और अपनी स्थिति में सुधार करने लगा।

    परंतु, गाँव के कुछ लोग उसकी सफलता से जलने लगे। उनमें से एक था उसका पड़ोसी, सुरेश। सुरेश का दिल जलन से भरा हुआ था और उसने सोच लिया कि वह रामू को नुकसान पहुँचाएगा। एक रात, सुरेश ने रामू के खेतों में आग लगा दी। अगली सुबह रामू ने देखा कि उसकी पूरी फसल जलकर राख हो गई है। रामू का दिल टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने साधु के वचनों को याद किया और कहा, “मेरे कर्मों का फल मुझे अवश्य मिलेगा, मुझे धैर्य रखना होगा।”

    रामू ने अपनी मेहनत से फिर से खेतों को तैयार किया और नई फसल बुवाई की। इस बार उसने सोचा कि उसे और भी सावधानी बरतनी होगी। उसने अपने परिवार को भी खेती में मदद करने के लिए प्रेरित किया और सबने मिलकर मेहनत की। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और रामू की फसल फिर से अच्छी हुई।

    इस बीच, सुरेश की स्थिति खराब होती गई। उसकी जमीन उगाही की कमी के कारण सूखने लगी, और उसका धंधा भी ठप्प हो गया। सुरेश ने रामू की सफलता को देखकर सोचा कि इसे पलटा जाना चाहिए। उसने रामू के खिलाफ गांव के लोगों में अफवाहें फैलाने की कोशिश की कि रामू ने जो भी काम किया है, उसमें कुछ छिपा हुआ है।

    लेकिन गाँव के लोग रामू की सच्चाई को जानते थे। उन्होंने सुरेश की बातों को खास नहीं माना। धीरे-धीरे, रामू की मेहनत और ईमानदारी की ख़ुशबू पूरे गाँव में फैल गई। लोग उसका सम्मान करने लगे। रामू ने अपने फसल को बेचकर पर्याप्त धन दौलत कमाई और अपनी स्थिति को मजबूत किया।

    सुरेश को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने रामू के पास जाकर माफी मांगी। रामू ने उसे माफ कर दिया और कहा, “हम सबके कर्मों का फल ही हमें दिखाई देता है, मैं बस अपने कर्मों पर ध्यान देता हूँ। तुम्हें भी यही करना चाहिए।”

    इस घटना ने गाँव के लोगों को यह सिखाया कि कर्मफल का सिद्धांत सचमुच काम करता है। रामू की मेहनत और सच्चाई ने उसे सफलता दिलाई, जबकि सुरेश की जलन और गलतियों ने उसे गिराया।

    गाँव में रामू की सच्चाई और मेहनत की चर्चा हर ओर होने लगी। लोग उसकी ईमानदारी और दयालुता को देखकर प्रेरित होते थे। बच्चे रामू के पास बैठकर उसकी दास्तानें सुनते और बड़े होकर उसकी तरह अच्छे कर्म करने का सपना देखते।

    रामू ने अपनी सफलताओं का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना शुरू कर दिया। उसने गाँव के गरीब किसानों को खेतों की तकनीक सिखाई, ताकि वे भी अच्छे से फसल उगा सकें। वह माहौल बनाकर उन्हें अपने धंधे में मदद कर रहा था।  धीरे-धीरे हरियाली गाँव एक खुशहाल और संपन्न गाँव में बदलने लगा।

    उसी बीच, सुरेश ने रामू से प्रेरित होकर अपने कर्मों पर पुनर्विचार करना शुरू किया। उसने अपनी गलतियों को स्वीकारा और गाँव के लोगों से माफी मांगने का निर्णय लिया। सुरेश ने रामू से मदद मांगी और कहा, “मैंने तुम्हारे प्रति गलत मानसिकता रखी। कृपया मुझे सिखाओ कि कैसे मैं भी अपनी स्थिति को सुधार सकता हूँ।”

    रामू ने सुरेश को सहारा दिया और उसे अपने साथ खेतों में ले गया। रामू ने सुरेश को मेहनत का महत्व समझाया और कहा, “सच्चा धन मेहनत, ईमानदारी और सद्भावना में है। यदि तुम अच्छे कर्म करोगे, तो तुम्हारा कर्मफल भी अच्छा होगा।”

    सुरेश ने रामू के साथ मिलकर मेहनत करने का निश्चय किया। दोनों ने मिलकर खेतों की बुनियाद को मजबूती दी। सुरेश ने अपनी संपत्ति को सही दिशा में लगाना सीखा और रामू की मदद से धीरे-धीरे उसकी स्थिति भी सुधारने लगी। अब दोनों किसान एक-दूसरे के मददगार बन गए थे।

    समय बीतता गया, और गाँव की स्थिति निरंतर सुधरती गई। अब हरियाली गाँव में खुशहाली, समर्पण, और एकता का माहौल था। गाँव के लोग एक-दूसरे का सहयोग करते और सच्चे रिश्ते बनाते। रामू और सुरेश की दोस्ती ने उदाहरण पेश किया कि किस तरह कर्मफल से जुड़े अच्छे कार्यों की बदौलत दोस्ती और भाईचारा स्थापित होते हैं।

    इस बीच, गाँव ने एक बड़ा उत्सव मनाने का निर्णय लिया। गाँव के लोगों ने फसल के अच्छे उत्पादन के लिए रामू और सुरेश को सम्मानित करने का कार्यक्रम रखा। सभी लोग इकट्ठा हुए। इस अवसर पर गाँव के सरपंच ने कहा, “आज हम सब यहाँ इस बात की गवाही देने के लिए इकट्ठा हुए हैं कि ईमानदारी और मेहनत का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। रामू और सुरेश ने हमें यह सिखाया है कि आत्मसमर्पण और सहयोग से हम सभी कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं।”

    रामू को सम्मानित किया गया, लेकिन उसने सुरेश को भी अपने साथ खड़ा किया। उसने कहा, “सच्ची पहचान और सफलता अकेले नहीं आते। ये हमारे सभी कर्मों का फल होते हैं। सुरेश ने भी अब बदलाव किया है और हमें उसके साथ खड़ा होना चाहिए।”

    सभी गाँव वाले तालियाँ बजाने लगे। सुरेश ने रामू की ओर देखते हुए कहा, “तुमने मुझे सिखाया कि खुद को बदलना कितना महत्वपूर्ण है। मुझे अपने कर्मों का फल समझ में आ गया है। अब मैं मेहनत और ईमानदारी से जीवन बिताने का वचन देता हूँ।”

    गाँव में उत्सव धूमधाम से मनाया गया। लोग एक-दूसरे के साथ नृत्य कर रहे थे, गीत गा रहे थे और खुशियों का आदान-प्रदान कर रहे थे। सब मिलकर यह महसूस कर रहे थे कि सच्चे कर्म हमेशा अच्छे फल लाते हैं।

    इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारे कर्म ही हमें पहचान देते हैं। अच्छाई का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन यदि हम सही रास्ते पर रहें,

    Lakshmi Kumari ,,,,,
    #

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • सोचने वाली बात है न…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    न्यायालय में दोनों पक्षों को 

    सच पता होता है

    असल में तो जज कटघरे में होता है।

     

    (बात बहुत गहरी है… 🥹)

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • मेरा चांद…!!

    मेरा चांद…!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    रोशन है ऐ चांद तुमसे धरती का कोना- कोना,

    एक चांद मेरे पास भी है जिससे

    रोशन है मेरी जिंदगी का अंधियारा,

    ऐ चांद तुम पर बंदिशें है बादलों,

    बारिशों और आसमान में छाए धुंध की,

    मेरा चांद है मेरे पास मेरे हर लम्हें ,

    मेरे हर वजूद की परछाई में ,

    मैं तुम्हें देखूं जो बादलों से

    आ़खंमिचौली करता है,

    या उसे जो मेरे साथ मेरे हाथों

    में डालें हाथ एकटक तुम्हें निहारता है, 

    वो प्रमाण है मेरी जिंदगी की

    हर उधेड़बुन का,

    तुम्हीं बताओ अब उसे कैसे

    ना देखूं मैं तुमसे पहले ,

    तुम पर हक कविता शायरी

    करने का हक सबको मिला है  ,

    मेरा चांद मेरे दिल का चैन 

    उसने अपने सारे हक़ मेरे नाम किये,

    वो सिर्फ मेरा है  ,

    मेरे इस दिल ,जज़्बात ,ज़िन्दगी ,पर

    हक़ सिर्फ उसका है …!!

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈 लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।

  • तकदीर का खेल

    तकदीर का खेल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट
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    तकदीर का खेल

    भूमिका

    तकदीर, किस्मत, भाग्य – ये शब्द इंसान की ज़िंदगी में उतने ही मायने रखते हैं, जितने मेहनत और हौसले। कोई अपनी मेहनत से तकदीर बदलने की कोशिश करता है, तो कोई इसे अपनी नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है। लेकिन क्या तकदीर सच में पहले से लिखी होती है, या इंसान अपने कर्मों से इसे बदल सकता है? यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो तकदीर के खेल में उलझा, संघर्ष किया, और अंत में अपनी मेहनत से अपनी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी।

    गंगा किनारे बसा एक छोटा सा गाँव “शिवपुर”। गाँव के बाहर कच्चे रास्ते पर एक झोपड़ी में रहता था अर्जुन। उम्र लगभग 25 साल, चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक, मगर किस्मत ने जैसे उसके हिस्से में संघर्ष ही लिख दिया था। माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे, और एक छोटी बहन राधा उसकी जिम्मेदारी थी।

    अर्जुन बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था, मगर गरीबी ने उसे ज्यादा आगे नहीं बढ़ने दिया। मजबूरी में उसे मजदूरी करनी पड़ी, ताकि बहन की देखभाल कर सके। गाँव के बड़े लोग कहते थे, “अरे अर्जुन, तकदीर में जो लिखा है, वही होगा। मेहनत कर भी लेगा तो क्या होगा?” लेकिन अर्जुन इस सोच को मानने को तैयार नहीं था

    दूसरा अध्याय: संघर्ष की राह

    अर्जुन का सपना था कि वह बहन को अच्छी शिक्षा दिलाए और खुद भी अपनी जिंदगी सुधार सके। लेकिन तकदीर बार-बार उसकी परीक्षा लेती रही।

    एक दिन गाँव के जमींदार रतनलाल ने अर्जुन को बुलाया।

    “अर्जुन, मेरी जमीन पर मजदूरी करेगा? अच्छा पैसा दूँगा।”

    अर्जुन के पास कोई और चारा नहीं था, उसने हामी भर दी। दिनभर खेतों में मेहनत करता और रात को थका-हारा घर लौटता। मगर मन में एक ही सवाल घूमता – क्या यह जिंदगी भर चलने वाला है?

    एक दिन उसकी मुलाकात रमेश से हुई, जो शहर में नौकरी करता था।

    “अर्जुन, तू बहुत मेहनती है, शहर चल, वहाँ अच्छा काम मिलेगा,” रमेश ने सुझाव दिया।

    अर्जुन के मन में उम्मीद की किरण जागी। उसने फैसला किया कि वह भी शहर जाएगा और अपनी तकदीर को आजमाएगा।

    अर्जुन अपनी बहन को पड़ोसी के पास छोड़कर शहर चला गया। वहाँ नौकरी की तलाश शुरू की, मगर हर जगह सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। बिना किसी जान-पहचान के उसे कोई काम नहीं मिल।

    एक दिन, जब अर्जुन भूखा-प्यासा सड़क किनारे बैठा था, तब एक व्यापारी महेश गुप्ता ने उसे देखा।

    “क्या हुआ बेटा? परेशान क्यों है?” महेश जी ने पूछा।

    अर्जुन ने अपनी पूरी कहानी सुना दी। महेश जी ने उसे अपनी दुकान पर काम दे दिया। धीरे-धीरे अर्जुन मेहनत करने लगा और अपनी ईमानदारी से महेश जी का विश्वास जीत लिया।

    अर्जुन अब दुकान में अच्छा काम करने लगा था। वह सिर्फ सेल्समैन नहीं, बल्कि व्यापार के हर पहलू को समझने लगा था। महेश जी ने उसकी लगन को देखकर उसे और बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी।

    कुछ सालों बाद, अर्जुन महेश जी का सबसे भरोसेमंद व्यक्ति बन गया। लेकिन तभी तकदीर ने एक और खेल खेला – महेश जी का अचानक देहांत हो गया। उनकी फैमिली को बिजनेस में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए उन्होंने दुकान बेचने का फैसला किया।

    अर्जुन के सामने बड़ा सवाल था – क्या वह अपनी अब तक की मेहनत को यूँ ही छोड़ दे? या कुछ बड़ा करने की सोचे?

    पाँचवाँ अध्याय: तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ?

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और अपनी सारी बचत और थोड़े पैसे उधार लेकर वही दुकान खरीद ली। अब वह खुद का मालिक बन चुका था। उसकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा।

    कुछ सालों में उसने अपने व्यापार को इतना बढ़ाया कि वह अब सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि कई दुकानों का मालिक बन चुका था। वह गाँव लौटा और अपनी बहन को अच्छे कॉलेज में पढ़ने भेजा।

    गाँव के लोग जो कभी उसे तकदीर का मारा समझते थे, अब कहते थे, “देखो, अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद लिखी!”

    निष्कर्ष: तकदीर बनती है मेहनत से

    अर्जुन की कहानी बताती है कि तकदीर का खेल असल में मेहनत का ही खेल है। अगर वह भी दूसरों की तरह तकदीर को दोष देकर बैठ जाता, तो उसकी जिंदगी वहीं खेतों में मजदूरी करते बीत जाती। लेकिन उसने अपने हौसले से, अपनी मेहनत से अपनी तकदीर खुद लिखी।

    तो, तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ? जवाब साफ है – तकदीर का खेल असल में मेहनत और संघर्ष की परीक्षा ही है!

    अर्जुन ने अपनी मेहनत से अपना व्यापार खड़ा कर लिया था, लेकिन ज़िंदगी में सफलता के साथ चुनौतियाँ भी आती हैं। जब उसका बिज़नेस अच्छा चलने लगा, तो कई लोगों की नज़रें उस पर टेढ़ी हो गईं।

    गाँव के जमींदार रतनलाल, जो कभी उसे मजदूरी के लिए बुलाते थे, अब उसकी बढ़ती सफलता से जलने लगे। उन्होंने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं कि अर्जुन ने गलत तरीकों से पैसा कमाया है।

    एक दिन गाँव की पंचायत में यह मामला उठा। रतनलाल ने कहा,

    “अर्जुन, तू गाँव का एक गरीब लड़का था, अचानक इतना अमीर कैसे बन गया? जरूर कोई बेईमानी की होगी!”

    अर्जुन चुपचाप सबकी बातें सुनता रहा। फिर उसने जवाब दिया,

    “मैंने दिन-रात मेहनत की, संघर्ष किया, शहर में धक्के खाए, तब जाकर इस मुकाम तक पहुँचा हूँ। अगर कोई यह साबित कर दे कि मैंने गलत तरीके से कुछ कमाया है, तो मैं खुद सारा व्यापार छोड़ दूँगा!”

    गाँव के बुजुर्ग जानते थे कि अर्जुन ईमानदार है। उन्होंने पंचायत में ही उसका समर्थन किया और कहा,

    “तकदीर उसी की बदलती है जो मेहनत करना जानता है। अर्जुन ने अपने कर्मों से अपना भाग्य लिखा है।”

    रतनलाल चुप हो गए, लेकिन अर्जुन समझ गया कि सफलता के साथ आलोचना भी मिलती है।

    इधर अर्जुन की बहन राधा ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली और उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। अर्जुन ने सोचा कि अब उसकी बहन की शादी करवा दी जाए। उसने राधा से पूछा,

    “क्या तुम किसी को पसंद करती हो, या फिर मैं तुम्हारे लिए अच्छा रिश्ता देखूं?”

    राधा थोड़ी संकोच में थी, फिर उसने कहा,

    “भइया, मेरा एक दोस्त है, जो बहुत अच्छा इंसान है। अगर आप मिलना चाहें, तो मैं उसे घर बुला सकती हूँ।”

    अर्जुन को खुशी हुई कि उसकी बहन अपने फैसले खुद लेने के लायक बन गई थी। उसने उस लड़के से मुलाकात की और जब देखा कि वह वाकई ईमानदार और मेहनती है, तो उसने शादी के लिए हाँ कर दी।

    शादी के दिन पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। अर्जुन को देखकर लोग कहते,

    “अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद बनाई और अब अपनी बहन की जिंदगी भी संवार दी!”

    राधा की शादी के बाद अर्जुन ने अपने बिज़नेस को और आगे बढ़ाने का फैसला किया। उसने गाँव के कई बेरोजगार युवाओं को अपने काम से जोड़ा और उन्हें नौकरी दी।

    अब वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गाँव की तकदीर बदलने की कोशिश कर रहा था। उसने गाँव में एक स्कूल भी खुलवाया, ताकि किसी और अर्जुन को अपनी पढ़ाई अधूरी न छोड़नी पड़े।

    धीरे-धीरे, गाँव के लोग भी मेहनत की अहमियत समझने लगे। वे भी किस्मत को कोसने के बजाय अपने हाथों से अपना भविष्य गढ़ने में जुट गए।

    एक दिन अर्जुन अपनी दुकान के बाहर बैठा था, जब एक बुजुर्ग ने आकर कहा,

    “बेटा, सच ही कहते हैं – तकदीर कोई लिखकर नहीं लाता, उसे मेहनत से गढ़ना पड़ता है। तूने यह साबित कर दिया!”

    अर्जुन मुस्कुराया और बोला,

    “हाँ काका, तकदीर का खेल असल में हमारे हाथ में ही होता है। अगर हम मेहनत करें, तो हम अपनी ज़िंदगी खुद बना सकते हैं।

    उस दिन अर्जुन को अहसास हुआ कि उसने सिर्फ अपनी तकदीर नहीं बदली, बल्कि अपने गाँव की सोच भी बदल दी थी। अब कोई भी तकदीर को कोसकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता था – सब मेहनत की ताकत को समझ चुके थे।

    और इस तरह, तकदीर का खेल अर्जुन की मेहनत के आगे हार गया।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • स्वाद की खोज

    स्वाद की खोज

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

    जॉन एक युवा शेफ था जो न्यूयॉर्क शहर में रहता था। उसका सपना था कि वह दुनिया के विभिन्न हिस्सों के व्यंजनों को सीखकर अपने रेस्तरां में पेश करे। एक दिन, उसने यूरोप की यात्रा करने का निर्णय लिया ताकि वहाँ के पारंपरिक व्यंजनों का अध्ययन कर सके।

    पहला पड़ाव इटली था, जहाँ उसने पिज़्ज़ा और पास्ता के विभिन्न प्रकारों को बनाना सीखा। नेपल्स में, उसने असली नेपोलिटन पिज़्ज़ा के रहस्यों को जाना, जबकि बोलोग्ना में उसने टैग्लिएटेल अल रागू की विधि सीखी।

    इसके बाद, वह फ्रांस गया, जहाँ उसने पेस्ट्री और बेकिंग की कला में महारत हासिल की। पेरिस में, उसने क्रोइसेंट और बैगेट बनाना सीखा, जबकि लियोन में उसने कोक औ विन और बुफ़ बौर्गिन्योन जैसे पारंपरिक व्यंजनों का ज्ञान प्राप्त किया।

    स्पेन में, जॉन ने तपस और पेला की विविधताओं का अध्ययन किया। बार्सिलोना में, उसने पेला वेलेंसियाना बनाना सीखा, जबकि मैड्रिड में उसने विभिन्न तपस व्यंजनों का स्वाद लिया और उनकी तैयारी की विधियाँ सीखीं।

    यूरोप की इस यात्रा ने जॉन के ज्ञान को समृद्ध किया और उसे पाश्चात्य व्यंजनों की गहराई और विविधता का अनुभव कराया। अपने देश लौटकर, उसने अपने रेस्तरां में इन सभी व्यंजनों को शामिल किया, जिससे उसके ग्राहकों को विभिन्न पाश्चात्य स्वादों का आनंद मिला।

    इस प्रकार, जॉन की यह यात्रा न केवल उसके व्यक्तिगत विकास का साधन बनी, बल्कि उसने अपने समुदाय को भी पाश्चात्य व्यंजनों की समृद्ध विरासत से परिचित कराया।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • वो आखरी मेसेज

    वो आखरी मेसेज

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    तकरीबन सवा साल बीत गया था उसे गए हुए,

    कल अचानक उसका एक मैसेज आया

    सिर्फ एक शब्द लिखा था, 

     

    “सुनो…”

     

    मैंने फोन हाथ में लिया, पर उंगलियाँ कांप रही थीं,

    दिल ने कहा सब कह डालो जो इन महीनों में सहा है,

    दिमाग ने कहा खामोश रहो, उसने तुम्हें कब का भुला दिया है।

    ​मैंने टाइप करना शुरू किया

    “पता है? तुम्हारे जाने के बाद मैंने हंसना छोड़ दिया है,” (फिर मिटा दिया…) फिर लिखा

    “आज भी रात को जब नींद खुलती है, तो फोन में तुम्हारा नाम ढूंढते है,” (फिर मिटा दिया…) 

     

    आखिर में मैंने सिर्फ इतना लिखा “कहो, कैसे हो?” उसका जवाब आया

    “बस यूं ही याद आ गई थी, लगा तुम बदल गए होगे।” मैंने मन ही मन मुस्कुराया,

    अंदर एक टीस उठी और आंखों के कोर भीग गए।

    बदल तो वो लोग जाते हैं जिनके पास कोई और होता है,

    हम जैसे लोग तो बस एक ही याद के सहारे पूरी उम्र गुज़ार देते हैं।

     

    ​तभी स्क्रीन पर ‘Typing…’ दिखा और फिर गायब हो गया,

    शायद उसे भी एहसास हो गया था…

    कि कुछ सवाल पूछने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है।

    ​उस दिन फिर समझ आया

    कुछ लोग हाल पूछने नहीं,

    सिर्फ ये तसल्ली करने आते हैं,

    कि तुम आज भी उनकी यादों की कैद में हो या रिहा हो गए!💔💔💔

     

     

    Anushka Dutta

    NSW  नया लेखक -🥉

  • परी मां (जलपरी की कहानी)

    परी मां (जलपरी की कहानी)

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     एक गाँव में सुहानी नाम की एक लड़की अपने पिता उदय और सौतेली माँ  मधु के साथ रहती थी , सुहानी की एक सौतेली बहन भी  निशा भी थी , सुहानी की माँ अपनी बेटी को बहुत प्यार करती थी , लेकिन वह सुहानी से नफरत करती थी और दिन भर घर के काम में लगा कर रखती थी , और उसे ठीक से खाना भी नहीं देती थी। 

     

    एक दिन मधु सुहानी को लेकर जंगल जाती है , और लकड़ी काटने लगती है ,  मधु के दिमाग में सुहानी को लेकर कुछ षडयंत्र चल रहा था।

     

    मधु सुहानी से बोली ,” मुझे बहुत प्यास लगी है , जरा पानी ले आओ “!

     

    सुहानी पानी लेने के लिए नदी के पास जाती है ,तो मधु भी दबे पाव सुहानी के पीछे चली जाती है।

     

    सुहानी बहुत ही मासूम थी , उसे पानी से डर लगता था , पर क्योंकि उसकी मां को प्यास लगी थी , इसलिए  वह डर डर के नदी के पास चली गई।

     

    अभी सुहानी पानी भरने के लिए झुकी ही थी कि मधु ने उसे नदी में धक्का दे दिया।

     

    सुहानी जैसे ही पानी में गिरी खुद को बचाने की कोशिश करने लगी पर क्योंकि उसे तैरना नहीं आता था इसलिए वह नदी के किनारे नहीं आ पाई।

     

    सुहानी चीखते हुए बोली ,” मां प्लीज मुझे बचा लो “! 

     

    पर मधु पर कोई असर नहीं पड़ा और वह नफरत से हंसते हुए बोली , ” तुझे बचा लूं , ताकि  मेरी बेटी के हिस्से की खुशी तू खा जाए ,तेरे रहते मेरी बेटी का रिश्ता नहीं हो पाएगा , भगवान ने अक्ल तुझे भला ही कम दी है पर शक्ल बहुत अच्छी दी है , इसलिए जब तक तू जिंदा मेरी बेटी को दुनिया की सबसे अच्छी चीज नहीं मिलेगी “!

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,” प्लीज मां बचा लो , मैं बेटी हूं आपकी “!

     

    मधु वह से जाते हुए बोली ,” तू बेटी नहीं है मेरी , सौतेली बेटी है “!

    सुहानी पानी में डूबती रही पर मधु वहां से जा चुकी थी।

     

     कुछ देर बाद जब सुहानी को होश आता है तो वह एक अलग ही दुनिया में होती है, जो बहुत खूबसूरत थी।

     

    सुहानी धीरे से अपनी आंखे खोलती है और इधर उधर देखती है तो उसे ही  तरफ सुंदर  पद पौधे फूल दिख रहे थे,  ये सब देखकर  एक पल के लिए वह बहुत खुश होती है ,और इधर उधर घूमते-घूमते थक जाती है तो पेड़ के नीचे बैठ जाती है।

     

    सुहानी घबराते हुए बोली ,” यह मैं कहां आ गई ,यह कौन सा गांव है “? तभी उसकी नजर एक हवेली पर पड़ती है , सुहानी वह  से उठकर  उस हवेली का दरवाजा खोलती है ,तो उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती है।

     

    सुहानी को वहाँ एक खूबसूरत सी औरत दिखती है जो बड़ी सी कुर्सी में बैठी हुई थी।

     

    वह औरत मुस्कराकर बोली ,” तुम कौन हो ? और यहां कैसे आई “?

     

    सुहानी घबराते हुए बोली ,” मैं सुहानी हूं , और रामपुर गांव में रहती हूं ,और मैं नदी में गिर गई और यहां आ गई “!

     

    सुहानी की बात सुनकर वह औरत सोच में पड़ जाती है ,कि आखिर एक इंसान उनके  जललोक में कैसे आई ?

     

    वह औरत अपनी आंखे बंद करती है और उसे  सब सच पता चल जाता है।

     

     सुहानी बोली ,” आप कौन है और मैं कौन से गांव में हूं “?

     

    वह औरत मुस्कराकर उसके पास जाकर उसका सिर सहलाकर बोली ,” मैं   उर्वशी हूं इस जल लोक की रानी पारी और तुम नदी में गिर गई इसलिए हमारे लोक आ गई हो “!

     

    उर्वशी की बात सुनकर सुहानी घबरा गई , और डरते हुए पीछे होने लगी ।

     

    उर्वशी सुहानी का हाथ पकड़कर बोली ,” घबराओ मत बेटा ,मैं तुम्हे कुछ नुकसान नहीं पहुंचाऊंगी  ,मुझे मालूम है तुम्हारी मां ने तुम्हे मारने की कोशिश की “!

     

    उर्वशी की बात सुनकर सुहानी की आंखे भर आई और वह रोने लगी और उर्वशी को गले लगा लिया।

     

    सुहानी के उर्वशी को गले लगाते ही उर्वशी को  एक अलग सा एहसास हुआ जो वो समझ नहीं पा रही थी।

    उर्वशी  ने सुहानी को खाना खिलाया और फिर अपने साथ सुला दिया।

     

    सुहानी को सोता देख उर्वशी सोचने लगी , कि आखिर एक साधारण लड़की उनके लोक में कैसे आई ? और आखिर क्यों यह अपनी सी लग रही है ।

     

    अब ऐसे ही कुछ दिन निकल गए और सुहानी जल लोक में ही रहने लगी ,और उर्वशी और सुहानी के बीच एक अलग ही रिश्ता बन गया , सुहानी उर्वशी को परी मां कहने लगी।

     

    एक दिन पारियों की बैठक में उर्वशी की दुश्मन शकीरा परी ने भरी सभा में शिकायत की कि उर्वशी ने इंसानों के साथ हाथ मिला लिया है ,जिससे उनके लोक को खतरा है तभी तो इंसानों के जासूस को अपनी बेटी बनाकर रखा है।

     

    शकीरा की बात सुनकर उर्वशी गुस्से से बोली ,” शकीरा सब तुम्हारी तरह स्वार्थी नहीं होते, और यह मासूम सी बच्ची तो खुद अपनो की ठुकराई हुई है किसी को क्या धोखा देगी “!

     

    शकीरा मुस्कराकर बोली ,” रानी परी आप भी तो सब छोड़कर इंसानी दुनिया चली गई थी , तो फिर है आप पर कैसे भरोसा करे “!

     

    शकीरा की बार सुनकर उर्वशी चुप हो गई ,उर्वशी को चुप होता देखकर शकीरा का हौसला बढ़ गया।

     

    शकीरा बोली ,” देखिए रानी परी या तो आप इस लड़की को मार दीजिए या इसकी दुनिया वापिस भेज दीजिए “!

     

    रात के समय  सुहानी खिड़की में बैठी कुछ सोच रही थी , और उसकी आँखें नम थी।

     

    सुहानी को उदास देख उर्वशी उसके पास जाकर बोली ,” क्या हुआ सुहानी इतनी उदास क्यों हो ? घर की याद आ रही है “?

     

    सुहानी नम आंखों से उर्वशी को गले लगा लेती है। और रोते हुए बोली ,” आखिर क्यों मेरी मां मुझे छोड़कर चली गई ? छोटी मां सही कहती थी मैं मनहूस हूं तभी उन्होंने मुझे नदी में फेंक दिया फिर भी मैं बच गई ,और यहां आकर आपके लिए भी मुसीबत बन गई “!

     

    उर्वशी सुहानी का सिर सहलाते हुए बोली ,” परेशान मत हो , मैं अब संभाल लूंगी , और  शकीरा तो हमेशा मेरे खिलाफ षडयंत्र रचती रहती है , चिंता मत करो मैं अब देख लूंगी “!

     

    सुहानी बोली ,” मैं अपनी दुनिया में वापिस जाना चाहती हूं “!

     

    उर्वशी बोली ,” यह क्या बोल रही हो ? उस दुनिया में तुम्हारी मां तुम्हारी जान की दुश्मन है , और तुम्हारे पिता भी हमेशा काम से बाहर रहते है , तो ऐसे में हमेशा तुम्हारी जान को खतरा रहेगा “!

     

    सुहानी बोली ,” परी मां आप चिंता मत करो , मां को अपनी गलती का एहसास हो गया होगा और वो भी मुझे याद करती होगी , इसलिए मैं अपने गांव जाना चाहती हूं”!

     

     उर्वशी परेशान होते हुए बोली ,”  सुहानी जल लोक में है किसी को भी उसकी मर्जी के खिलाफ नहीं रख सकते , अगर तुम जाना चाहती हो तो जाओ ,पर यह अंगूठी  हमेशा अपने पास रखना “!

     

    सुहानी अंगूठी देखते हुए बोली ,”  परी मां यह क्या है “?

     

    उर्वशी सुहानी की उंगली में अंगूठी पहनाते हुए बोली ,” यह जादुई अंगूठी है ,  अगर तुम किसी मुसीबत में हो और  जैसे ही इसे अपने होंठों से चूमकर मुझे याद करोगी , मैं आ जाऊंगी “!

     

     

    सुहानी उर्वशी को गले लगाकर अपने मन में सोचने लगी ,” मैं आपको किसी मुसीबत में नहीं डालना चाहती इसलिए यहां से जा रही हूं ,पर आपसे मुझे मां का प्यार मिला है , मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगी कि अगले जन्म में आप मेरी मां बने “!

     

     सुहानी यह सब मन में बोल रही थी, पर उर्वशी सुहानी के मन की बात सुन पा रही थी , उर्वशी की आंखे भी नम हो जाती है।

     

    कुछ देर बाद सुहानी नदी के किनारे खड़ी थी, सुहानी एक नजर नदी की ओर देखती है और फिर अपने घर चली जाती है।

     

    सुहानी जैसे ही अपने घर जाती है ,तो उसकी मां की नजर उस पर पड़ती है ,और वह बोली ,” यह क्या मैं सपना देख रही हूं , यह तो मर गई थी ,तो फिर यहां कैसे आई “?

     

     

    मधु गुस्से से सुहानी का हाथ पकड़कर बोली ,” यहां क्या कर रही है “?

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,” मां मै घर लौट आई”!

     

    मधु बोली ,” निकल जा यहां से ,अब क्या लेने आई है कुलटा “!

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,”मां  आप यह क्या कह रही है “?

     

    अभी सुहानी रो ही रही थी तभी उदय आ गया , उदय को देख कर मधु रोते हुए बोली ,” देखिए जी आपकी यह बेटी हमारी नाक कटा के चली गई थी , जैसे तैसे हमने निशा की शादी की और अब यह लौट आई ताकि हमारी पूरे गांव में थू थू हो “!

     

     

    सुहानी अपने पिता के पास जाकर बोली ,” नहीं पिता जी , ऐसा कुछ नहीं है ,मैने कुछ भी किया “!

     

    सुहानी के पिता गुस्से से उसके गाल में एक थप्पड़ मारकर बोले ,” झूठ मत बोलो , तुम भी अपनी मां की तरह धोखेबाज निकली ,मेरी इज्जत उछाल कर भाग गई “!

     

    सुहानी बोली ,” नहीं पिता जी, मैं कहीं नहीं भागी , मां ने मुझे नदी में फेंक दिया था”!

     

    सुहानी की बात सुनकर  मधु सुहानी के बाल पकड़कर खींचते हुए घर के बाहर फेंक देती है और बोली ,” झूठ मत बोल , तू ही अपने किसी यार के साथ भाग गई ,जैसे तेरी मां तुझे पैदा करते ही अपने यार के साथ भाग गई ,तुझे इतनी शर्म नहीं की मैने अपनी बेटी की तरह थे पाला और तू यह इल्जाम लगा रही है मुझपर “!

     

     सुहानी रोते हुए बोली ,” छोटी मां झूठ मत बोलो ,जब जम जंगल लकड़ी लेने गए थे ,आपने ही मुझसे पानी मंगाया और जब मैं नदी में पानी लेने गई तो आपने धक्का दे दिया “!

     

    मधु सुहानी की बात सुनकर घबरा गई, और अपना झूठ छुपाने के लिए रोते हुए उदय के पास गई और बोली ,” यह झूठ बोल रही है ,आप तो जानते है इसी तैरना नहीं आता ,और अगर मैने इसे नदी में फेंका, तो यह बच कैसे गई “!

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,” मुझे भी पता पर मैं बच गई ,और जल लोक में चली गई, और वहां परी मां के साथ रहने लगी “!

     

    सुहानी की बात सुनकर मधु उदय की ओर देखकर बोली ,” देखा यह खुद को बचाने के लिए कैसे झूठी कहानी बना रही है “!

     

    उदय मधु की बात में यकीन कर लेता है , और गुस्से से बोला ,” सुहानी झूठ मत बोलो “!

     

    पिता जी मैं झूठ नहीं बोल रही हूं। सुहानी ने रोते हुए कहा।

     

    मधु बोली ,” अच्छा झूठ नहीं बोल रही हो ,तो सबूत दो की तुम पानी में पारियों की दुनिया में चली गई थी ,और परी के साथ रह रही थी ,अरे तुम एक काम करो उस परी को ही क्यों। नहीं बुला लेती “! यह शब्द मधु ने हंसते हुए बोले।

     

    मधु की बात से सुहानी को उर्वशी का ख्याल आया ,और उसने अपने हाथ में पहनी अंगूठी को चूमकर उर्वशी को याद किया।

     

    कुछ ही पल में एक तेज रोशनी उत्पन्न हुई जिससे सभी की आंखे बंद हो गई, जब सुहानी ने आंखे खोली , तो उसके सामने उर्वशी थी।

     

    मधु और उदय ने जैसे ही आंखे खोली , उनकी आंखे उर्वशी को देखकर फटी की फटी रह गई।

     

    सुहानी उर्वशी को गले लगाते हुए बोली ,” परी मां आप आ गई “!

     

    उर्वशी की नजरे मधु और उदय में टिकी हुई थी, और वह सुहानी का सिर सहला रही थी।

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,” परी मां , छोटी मां कह रही है कि मैं भाग गई थी किसी के साथ , आप बताइए ना मैं आपके साथ थी, इन्हें लग रहा है मैं अपनी मां की तरह भाग गई थी “!

     

    उर्वशी हैरानी से बोली ,” मां , क्या तुम्हारी मां जिंदा है “?

     

    उदय बोला ,” हां जिंदा है इसकी मां , और  इसके सामने खड़ी है “!

     

    उदय की बात सुनकर उर्वशी और सुहानी एक दूसरे को देखने लगे “!

     

    उदय बोला ,” हां सुहानी यही है तुम्हारी मां उर्वशी, जो तुम्हे जन्म देते ही कहीं चली गई ,और सालों ढूंढा मैने इसे पर यह कहीं नहीं मिली, और आज मुझे पता चल रहा है यह एक परी है “!

     

    उर्वशी नम आंखों से बोली ,” मुझे माफ कर दो उदय , मैं क्या  करती , मैं जल लोक से बाहर की दुनिया देखने आई , और मेरी मुलाकात तुमसे हुई , और मुझे तुमसे प्यार हो गया , पर जब मैने तुमसे शादी की और मेरी बेटी का जन्म हुआ , तो मेरे पिता जी की हमारे दुश्मनों ने हत्या कर दी , और मुझे जल लोक को बचाने के लिए अपनी दुनिया में लौटना पड़ा , अगर मेरे दुश्मनों को मेरी बेटी का पता चलता तो उसकी जान को खतरा था इसलिए मैं वापिस लौट गई “!

     

    सच जानकर उदय और सुहानी की आंखे नम हो गई।

     

    सुहानी उर्वशी को गले लगाते हुए बोली ,” परी मां आप मेरी मां है”!

    उर्वशी सुहानी का माथा चूमती है और फिर उसके गालों को एक एक कर चूमकर अपनी ममता लुटाते हुए बोली ,” हां मैं हूं तुम्हारी मां , जिस दिन तुम जल लोक में आई , मैं उसी दिन सोच में पड़ गई थी कि आखिर एक साधारण इंसान जल लोक में कैसे आ सकता है ,काश मैने पहले सच जानने की कोशिश की होती “!

    उदय ने मधु को एक झन्नाटेदार थप्पड़ मारकर कहा ,” तुमने मेरी बेटी की जान लेने की कोशिश की निकल जाओ यहां से “!

    मधु ने बहुत मन्नते की पर उदय ने उसकी एक ना सुनी और मधु को घर से बाहर निकाल दिया।

     उदय ने अपने अविश्वास के लिए उर्वशी और सुहानी से माफी मांगी। 

    उर्वशी ने भी उदय से माफी मांगी , और उदय से इजाजत लेकर  उर्वशी सुहानी को लेकर अपने जल लोक लौट गई ,और उसे परी की सारी शक्तियां दे दी, और जल लोक की राजकुमारी बना दिया। 

    इस तरह एक मासूम सी लड़की इतनी तकलीफें झेलने के बाद अपनी मां से मिल गई , और राजकुमारी बनकर जल लोक की परी बन गई ।

     

     

    Mysterious Chand 

     

     

     

     

     

    Mysterious Chaand

    NSW  नया लेखक  -🥉