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श्रेणी: ऑडियो कहानियां

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  • तकदीर का खेल

    तकदीर का खेल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट
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    तकदीर का खेल

    भूमिका

    तकदीर, किस्मत, भाग्य – ये शब्द इंसान की ज़िंदगी में उतने ही मायने रखते हैं, जितने मेहनत और हौसले। कोई अपनी मेहनत से तकदीर बदलने की कोशिश करता है, तो कोई इसे अपनी नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है। लेकिन क्या तकदीर सच में पहले से लिखी होती है, या इंसान अपने कर्मों से इसे बदल सकता है? यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो तकदीर के खेल में उलझा, संघर्ष किया, और अंत में अपनी मेहनत से अपनी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी।

    गंगा किनारे बसा एक छोटा सा गाँव “शिवपुर”। गाँव के बाहर कच्चे रास्ते पर एक झोपड़ी में रहता था अर्जुन। उम्र लगभग 25 साल, चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक, मगर किस्मत ने जैसे उसके हिस्से में संघर्ष ही लिख दिया था। माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे, और एक छोटी बहन राधा उसकी जिम्मेदारी थी।

    अर्जुन बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था, मगर गरीबी ने उसे ज्यादा आगे नहीं बढ़ने दिया। मजबूरी में उसे मजदूरी करनी पड़ी, ताकि बहन की देखभाल कर सके। गाँव के बड़े लोग कहते थे, “अरे अर्जुन, तकदीर में जो लिखा है, वही होगा। मेहनत कर भी लेगा तो क्या होगा?” लेकिन अर्जुन इस सोच को मानने को तैयार नहीं था

    दूसरा अध्याय: संघर्ष की राह

    अर्जुन का सपना था कि वह बहन को अच्छी शिक्षा दिलाए और खुद भी अपनी जिंदगी सुधार सके। लेकिन तकदीर बार-बार उसकी परीक्षा लेती रही।

    एक दिन गाँव के जमींदार रतनलाल ने अर्जुन को बुलाया।

    “अर्जुन, मेरी जमीन पर मजदूरी करेगा? अच्छा पैसा दूँगा।”

    अर्जुन के पास कोई और चारा नहीं था, उसने हामी भर दी। दिनभर खेतों में मेहनत करता और रात को थका-हारा घर लौटता। मगर मन में एक ही सवाल घूमता – क्या यह जिंदगी भर चलने वाला है?

    एक दिन उसकी मुलाकात रमेश से हुई, जो शहर में नौकरी करता था।

    “अर्जुन, तू बहुत मेहनती है, शहर चल, वहाँ अच्छा काम मिलेगा,” रमेश ने सुझाव दिया।

    अर्जुन के मन में उम्मीद की किरण जागी। उसने फैसला किया कि वह भी शहर जाएगा और अपनी तकदीर को आजमाएगा।

    अर्जुन अपनी बहन को पड़ोसी के पास छोड़कर शहर चला गया। वहाँ नौकरी की तलाश शुरू की, मगर हर जगह सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। बिना किसी जान-पहचान के उसे कोई काम नहीं मिल।

    एक दिन, जब अर्जुन भूखा-प्यासा सड़क किनारे बैठा था, तब एक व्यापारी महेश गुप्ता ने उसे देखा।

    “क्या हुआ बेटा? परेशान क्यों है?” महेश जी ने पूछा।

    अर्जुन ने अपनी पूरी कहानी सुना दी। महेश जी ने उसे अपनी दुकान पर काम दे दिया। धीरे-धीरे अर्जुन मेहनत करने लगा और अपनी ईमानदारी से महेश जी का विश्वास जीत लिया।

    अर्जुन अब दुकान में अच्छा काम करने लगा था। वह सिर्फ सेल्समैन नहीं, बल्कि व्यापार के हर पहलू को समझने लगा था। महेश जी ने उसकी लगन को देखकर उसे और बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी।

    कुछ सालों बाद, अर्जुन महेश जी का सबसे भरोसेमंद व्यक्ति बन गया। लेकिन तभी तकदीर ने एक और खेल खेला – महेश जी का अचानक देहांत हो गया। उनकी फैमिली को बिजनेस में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए उन्होंने दुकान बेचने का फैसला किया।

    अर्जुन के सामने बड़ा सवाल था – क्या वह अपनी अब तक की मेहनत को यूँ ही छोड़ दे? या कुछ बड़ा करने की सोचे?

    पाँचवाँ अध्याय: तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ?

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और अपनी सारी बचत और थोड़े पैसे उधार लेकर वही दुकान खरीद ली। अब वह खुद का मालिक बन चुका था। उसकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा।

    कुछ सालों में उसने अपने व्यापार को इतना बढ़ाया कि वह अब सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि कई दुकानों का मालिक बन चुका था। वह गाँव लौटा और अपनी बहन को अच्छे कॉलेज में पढ़ने भेजा।

    गाँव के लोग जो कभी उसे तकदीर का मारा समझते थे, अब कहते थे, “देखो, अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद लिखी!”

    निष्कर्ष: तकदीर बनती है मेहनत से

    अर्जुन की कहानी बताती है कि तकदीर का खेल असल में मेहनत का ही खेल है। अगर वह भी दूसरों की तरह तकदीर को दोष देकर बैठ जाता, तो उसकी जिंदगी वहीं खेतों में मजदूरी करते बीत जाती। लेकिन उसने अपने हौसले से, अपनी मेहनत से अपनी तकदीर खुद लिखी।

    तो, तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ? जवाब साफ है – तकदीर का खेल असल में मेहनत और संघर्ष की परीक्षा ही है!

    अर्जुन ने अपनी मेहनत से अपना व्यापार खड़ा कर लिया था, लेकिन ज़िंदगी में सफलता के साथ चुनौतियाँ भी आती हैं। जब उसका बिज़नेस अच्छा चलने लगा, तो कई लोगों की नज़रें उस पर टेढ़ी हो गईं।

    गाँव के जमींदार रतनलाल, जो कभी उसे मजदूरी के लिए बुलाते थे, अब उसकी बढ़ती सफलता से जलने लगे। उन्होंने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं कि अर्जुन ने गलत तरीकों से पैसा कमाया है।

    एक दिन गाँव की पंचायत में यह मामला उठा। रतनलाल ने कहा,

    “अर्जुन, तू गाँव का एक गरीब लड़का था, अचानक इतना अमीर कैसे बन गया? जरूर कोई बेईमानी की होगी!”

    अर्जुन चुपचाप सबकी बातें सुनता रहा। फिर उसने जवाब दिया,

    “मैंने दिन-रात मेहनत की, संघर्ष किया, शहर में धक्के खाए, तब जाकर इस मुकाम तक पहुँचा हूँ। अगर कोई यह साबित कर दे कि मैंने गलत तरीके से कुछ कमाया है, तो मैं खुद सारा व्यापार छोड़ दूँगा!”

    गाँव के बुजुर्ग जानते थे कि अर्जुन ईमानदार है। उन्होंने पंचायत में ही उसका समर्थन किया और कहा,

    “तकदीर उसी की बदलती है जो मेहनत करना जानता है। अर्जुन ने अपने कर्मों से अपना भाग्य लिखा है।”

    रतनलाल चुप हो गए, लेकिन अर्जुन समझ गया कि सफलता के साथ आलोचना भी मिलती है।

    इधर अर्जुन की बहन राधा ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली और उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। अर्जुन ने सोचा कि अब उसकी बहन की शादी करवा दी जाए। उसने राधा से पूछा,

    “क्या तुम किसी को पसंद करती हो, या फिर मैं तुम्हारे लिए अच्छा रिश्ता देखूं?”

    राधा थोड़ी संकोच में थी, फिर उसने कहा,

    “भइया, मेरा एक दोस्त है, जो बहुत अच्छा इंसान है। अगर आप मिलना चाहें, तो मैं उसे घर बुला सकती हूँ।”

    अर्जुन को खुशी हुई कि उसकी बहन अपने फैसले खुद लेने के लायक बन गई थी। उसने उस लड़के से मुलाकात की और जब देखा कि वह वाकई ईमानदार और मेहनती है, तो उसने शादी के लिए हाँ कर दी।

    शादी के दिन पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। अर्जुन को देखकर लोग कहते,

    “अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद बनाई और अब अपनी बहन की जिंदगी भी संवार दी!”

    राधा की शादी के बाद अर्जुन ने अपने बिज़नेस को और आगे बढ़ाने का फैसला किया। उसने गाँव के कई बेरोजगार युवाओं को अपने काम से जोड़ा और उन्हें नौकरी दी।

    अब वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गाँव की तकदीर बदलने की कोशिश कर रहा था। उसने गाँव में एक स्कूल भी खुलवाया, ताकि किसी और अर्जुन को अपनी पढ़ाई अधूरी न छोड़नी पड़े।

    धीरे-धीरे, गाँव के लोग भी मेहनत की अहमियत समझने लगे। वे भी किस्मत को कोसने के बजाय अपने हाथों से अपना भविष्य गढ़ने में जुट गए।

    एक दिन अर्जुन अपनी दुकान के बाहर बैठा था, जब एक बुजुर्ग ने आकर कहा,

    “बेटा, सच ही कहते हैं – तकदीर कोई लिखकर नहीं लाता, उसे मेहनत से गढ़ना पड़ता है। तूने यह साबित कर दिया!”

    अर्जुन मुस्कुराया और बोला,

    “हाँ काका, तकदीर का खेल असल में हमारे हाथ में ही होता है। अगर हम मेहनत करें, तो हम अपनी ज़िंदगी खुद बना सकते हैं।

    उस दिन अर्जुन को अहसास हुआ कि उसने सिर्फ अपनी तकदीर नहीं बदली, बल्कि अपने गाँव की सोच भी बदल दी थी। अब कोई भी तकदीर को कोसकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता था – सब मेहनत की ताकत को समझ चुके थे।

    और इस तरह, तकदीर का खेल अर्जुन की मेहनत के आगे हार गया।

  • चतुर खरगोश

    चतुर खरगोश

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    एक समय, एक घने और खुशनुमा जंगल में कई जानवर एकसाथ रहते थे। वहाँ के झाड़ियों और पेड़ों के बीच, छोटी-सी नदियाँ बहती थीं, और चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। इस जंगल में एक बहुत ही चतुर खरगोश था, जिसका नाम था चीकू। चीकू अपनी चतुराई और तेज़ी के लिए जाना जाता था। उसे अपनी बुद्धिमानी पर गर्व था, और वह हमेशा नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहता था।

    चीकू के पास एक बहुत अच्छा दोस्त था, जिसका नाम था टिनू। टिनू एक धीमा कछुआ था, लेकिन उसकी धैर्य और स्थिरता की प्रशंसा सभी करते थे। चीकू और टिनू अक्सर एक-दूसरे के साथ खेलते और बातचीत करते। चीकू की तेज़ी और टिनू की धैर्यतावाद, दोनों की दोस्ती जंगल में मशहूर थी।

    एक दिन, जंगल में एक बड़ा और महत्वपूर्ण घोषणा की गई। जल्द ही, जंगल के सभी जानवरों के बीच दौड़ आयोजित होने वाली थी। यह दौड़ जंगल के सबसे तेज़ जानवर का पता लगाने के लिए थी। चीकू ने तुरंत सोचा, “यह मेरे लिए एक शानदार मौका है! मैं अपनी चतुराई और तेज़ी से यह दौड़ जीत सकता हूँ।”

    दौड़ के दिन, सभी जानवर एकत्र हुए। जंगल के सबसे अनुभवी जानवर, हाथी बाबा, ने कहा, “दोस्तों, इस दौड़ में भाग लेना बहुत महत्वपूर्ण है। जो सबसे तेज़ दूर तक जाएगा, वही विजेता होगा।” सभी जानवर उत्साहित हो गए, और दौड़ शुरू करने का समय आया।

    चीकू ने खुद को विजेता मान लिया और दौड़ की शुरुआत से पहले टिनू से कहा, “क्या तुम सोचते हो कि तुम मेरे खिलाफ दौड़ सकते हो? तुम तो बहुत धीमे हो!” टिनू ने मुस्कुराते हुए कहा, “चीकू, तेज़ी ही सब कुछ नहीं है। धैर्य और आत्मविश्वास भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। मुझे अपनी गति पर विश्वास है।”

    दौड़ शुरू हुई, और चीकू ने तुरंत ऊँचाई पर पहुँचते हुए तेजी से दौड़ना शुरू कर दिया। उसने देखा कि उसके पीछे सभी जानवर धीरे-धीरे भागते हैं, और वह बहुत खुश था। “मैंने तो पहले ही जीत हासिल कर ली है,” उसने सोचा और अपनी गति को थोड़ा धीमा कर दिया। उसे लगा कि उसके जीतने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए उसने एक पेड़ के नीचे आराम करने का फैसला किया।

    चीकू ने सोचा, “कछुए को बहुत वक्त लगेगा यहाँ तक पहुँचने में। मैं थोड़ी देर आराम कर सकता हूँ। जब वह आएगा, तब मैं बस एक बार में दौड़कर जीत जाओंगा।” उसकी इस सोच ने उसे सुस्त कर दिया। वह पेड़ के नीचे लेट गया और नींद में चला गया।

    दूसरी ओर, टिनू ने धीरे-धीरे अपनी गति बनाए रखी। उसने अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित किया और स्थिरता से दौड़ता रहा। समय बीतता गया, और टिनू धीरे-धीरे चीकू के पास पहुँच गया। जैसे ही टिनू ने चीकू को सोते हुए देखा, उसने झिझकते हुए कहा, “चीकू, तुम क्यों सो रहे हो?”

    चीकू ने ध्यान नहीं दिया और सोता रहा। टिनू ने पास जाकर कहा, “तुम अपनी सभी तेज़ी को खो रहे हो, जबकि मैं आगे बढ़ रहा हूँ।” लेकिन चीकू ने इससे फर्क नहीं पड़ने दिया और आँखें बंद किए रखीं।

    टिनू आगे बढ़ता गया। कुछ दूर जाकर, उसने एक नदी को पार किया और दूसरी ओर पहुँच गया। उसका धैर्य और बढ़ता गया जबकि चीकू अभी भी सोता रहा। जब चीकू जागा, तो उसे महसूस हुआ कि काफी समय बीत चुका है।

    चीकू ने जल्दी से उठकर देखा कि टिनू उसके बिना ही आगे बढ़ चुका था। उसे एक क्षण के लिए आश्चर्य हुआ और फिर वह घबरा गया। “ये कैसे हो गया?” उसने सोचा। उसने सोचा, “मुझे उसे पकड़ लेना चाहिए!”

    चीकू ने अपनी तेज़ी दिखाते हुए दौड़ना शुरू किया। लेकिन जब उसने दौड़ना शुरू किया, तो टिनू पहले ही काफी दूर पहुंच चुका था। चीकू ने अपने सभी कौशल और तेज़ी के साथ दौड़ने की कोशिश की, लेकिन टिनू अपने धैर्य और स्थिरता के साथ आगे बढ़ता गया।

    जैसे ही चीकू ने उस स्थिति को देखा, उसने तैराकी से पुकारा, “टिनू, तुम बहुत धीमे हो! मुझे जीतने के लिए बस एक बार और दौड़ना है!”

    टिनू ने उत्तर दिया, “चीकू, मुझे पता था कि तुम तेज हो, लेकिन इस दौड़ में सिर्फ तेज़ होना ही काफी नहीं है। मुझे अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना था और अपने सहजता से दौड़ना था।”

    दौड़ के अंत तक पहुँचने में, चीकू ने अपनी सारी ताकत लगा दी, लेकिन वह टिनू को बहुत दूर नहीं कर सका। अंततः, टिनू ने दौड़ समाप्त की और विजेता बना। चीकू ने देखा कि उसने अपनी चतुराई और तेज़ी की जगह पर केवल आत्म-संतोष और अहंकार का सहारा लिया था।

    चीकू को इस हार से एक महत्वपूर्ण सबक मिला। उसने टिनू से कहा, “मैंने सोचा था कि मैं हमेशा तेज़ और सबसे अच्छा रहूँगा, लेकिन तुमने मुझे सिखाया कि धैर्य, आत्मविश्वास और स्थिरता कितनी महत्वपूर्ण हैं।”

    टिनू ने मुस्कुराते हुए कहा, “हर कोई अपनी विशेषताओं के अनुसार अद्वितीय है। तेज़ होना अच्छा है, लेकिन कभी-कभी slow and steady wins the race। चलो, हम साथ में इस हार का जश्न मनाते हैं!”

    चीकू ने अपनी हार को स्वीकार किया और उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामकर जंगल में बहुत खुश होकर खेलना और आनंद लेना शुरू किया। इस प्रकार, चीकू और टिनू की दोस्ती और भी मजबूत हो गई और चीकू ने हमेशा याद रखा कि जीत और हार दोनों ही जीवन का हिस्सा हैं।

    इस कहानी से हमें यह सीखने को मिलता है कि केवल तेज़ी ही नहीं, बल्कि धैर्य और समर्पण भी किसी भी चुनौती को पार करने में महत्वपूर्ण होते हैं।

    Lakshmi Kumari 

     

  • मेरी किताबों को पढ़ो

    मेरी किताबों को पढ़ो

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जानना है अगर मुझे

     तो मेरी कविताओं को पढ़ो

    शब्दों को नहीं उनमें छुपी

     मेरी भावनाओं को समझो

     पढ़ना है मुझे, तो उन लफ्ज़ों के बीच उतरना, 

    जहाँ हर खामोशी भी कुछ कहने की कोशिश करती है। 

    कुछ बातें ऐसी हैं, जो किसी ने कभी जानी नहीं,

     मैंने उन्हें चुपके से शब्दों में

     ढालकर कविताओं में छुपाया है।

    जानना चाहते हो मुझे, 

    तो मेरी किताबों को खोलो हर पन्ने पर लिखे 

    अनकहे एहसासों को पढ़ो।

     उतार दिया है मैंने अपना हाल-ए-दिल

    वो भी जो मैंने खुद से कभी कहा नहीं मेरी हर कविता में मेरा एक अधूरा हिस्सा रहता है कहीं।

    अगर सच में समझना है मुझे,

     तो लफ्ज़ों के उस समंदर में उतरना, 

    जहाँ दर्द भी लहर बनकर 

    चुपचाप किनारे छू जाता है। 

    शब्दों के इस विशाल समंदर से

     कुछ मोती चुराए हैं मैंने,

     और उनसे ही भावनाओं का

     एक पूरा जहां बनाया है। 

    एक बार उस समंदर में उतरकर तो देखो,

    शायद किनारे तक आते-आते

     तुम मुझे थोड़ा-सा समझ जाओ… 

    अगर जानना है मुझे, तो बस… 

    मेरी किताबों को पढ़ो। Lakshmi Kumari

  • प्यार करते हो तो तड़पाते क्यों हो

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    प्यार करते हो तो तड़पाते क्यों हो,

    दिल में बसाकर यूँ रुलाते क्यों हो।

    कहते हो जान हो मेरी हर घड़ी,

    फिर दूर रहकर ये सताते क्यों हो।

    वादा किया था साथ निभाने का,

    हर मोड़ पे हाथ थाम जाने का,

    फिर खामोशी की चादर ओढ़कर,

    मुझसे ही नज़रें चुराते क्यों हो।

    मेरे ख्वाबों में तुम ही तुम रहते हो,

    फिर हकीकत में बदल जाते क्यों हो।

    प्यार करते हो अगर सच्चे दिल से,

    तो हर बात पे यूँ आज़माते क्यों हो।

    दिल की हर धड़कन तेरे नाम कर दी,

    हर खुशी तेरे अरमान कर दी,

    फिर मेरी मोहब्बत को यूँ सवाल बना कर,

    मुझको ही गलत ठहराते क्यों हो।

  • तेरे जाने के बाद

    तेरे जाने के बाद

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट
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    तेरे जाने के बाद …!!

    रास नहीं आया मुझको मेरे 

    ही घर का कोई कोना,

    सुबह शाम तलक तुम चहकती थी ,

    जहां दिन और रात ,अब काटने को

    दौड़ता है मुझको मेरा ही घर सलोना,

    नहीं पता था ज़िंदगी तुम बिन

    अंधेरे में चली जाएगी,

    तेरे जाने के बाद  हां तेरे

    जाने के बाद एहसास हुआ

    मुझे कमी तेरी कमी यादों की

    चादर इस तरह तड़पाएगी ,

    तेरे जाने के बाद दिल

    खाली – खाली सा लगता है  ,

    तेरी पनाहों में आने को

    दिल कितना तड़पता है  ,

    आंखों से आंसू मेरे झरझर बहते हैं ,

    तेरे बिन कितना अधूरा हूं ये मुझसे कहते हैं…!!

  • निभा नहीं सकते

    निभा नहीं सकते

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तुम निभा नहीं सकते, तो हम ज़ाहिर क्यों करें,

    तुम चार कदम चल नहीं सकते, तो हम हाथ क्यों थामें,

    • एक तरफ है प्यार मेरा,

    तो इसे एक तरफ ही क्यों ना रहने दें।

  • बच्चों की यात्रा

    बच्चों की यात्रा

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में एक नन्हा चाँद रहता था। उसका नाम था चमकीला। चमकीला हमेशा आकाश में तारे के साथ खेलता और रात का नज़ारा देखने आता। लेकिन एक दिन, उसे एक सपना आया। उसने देखा कि वह धरती पर जाकर सारे बच्चों से मिलना चाहता है।

    चमकीला ने अपने दोस्तों, तारे और बादल से कहा, “मैं धरती पर जाना चाहता हूँ। मैं वहाँ के बच्चों के साथ खेलना चाहता हूँ।” तारे ने मुस्कुराते हुए कहा, “लेकिन चमकीला, तुम तो आकाश का चाँद हो। तुम धरती पर कैसे जा सकते हो?” 

    चमकीला ने कहा, “मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगा। मुझे सिर्फ एक मौका चाहिए।” उसने बादल से पूछा, “क्या तुम मुझे नीचे लाने में मदद करोगे?” बादल ने कहा, “बिल्कुल, मैं तुम्हें नीचे ले चलूँगा। लेकिन तुम्हें जल्दी आना होगा, वरना सूरज उग जाएगा।”

    तो चमकीला और बादल ने मिलकर एक योजना बनाई। बादल ने चमकीला को अपने विशाल पंखों में समेटा और धीरे-धीरे नीचे की ओर उड़ने लगा। जैसे ही वे धरती के करीब पहुँचे, चमकीला बहुत उत्साहित था।

    जब वे धरती पर पहुँचे, तो चमकीला ने देखा कि बच्चे खेल रहे थे, हंस रहे थे और खुश थे। चमकीला ने तुरंत बच्चों के बीच में आने की इच्छा व्यक्त की। बच्चे उसकी चमकीली रोशनी और सुंदरता को देखकर हैरान रह गए। उन्होंने चाँद से कहा, “क्या आप सच में चाँद हैं?

    चमकीला ने कहा, “हाँ, मैं ही हूँ! मैं यहाँ खेलने आया हूँ। चलो, हम साथ में खेलते हैं!” बच्चे बहुत खुश हुए और उन्होंने चमकीला के साथ खेलना शुरू कर दिया। वे दौड़ने लगे, कूदने लगे और चाँद की रोशनी में तारे की तरह चमकने लगे

    चमकीला ने देखा कि बच्चे कितने खुश हैं। वह उनके साथ खेलते हुए समय को भूल गया। लेकिन जल्द ही सूरज की किरणें फैलने लगीं। चमकीला को जल्दी समझ में आया कि अब उसे वापस आकाश में जाना होगा।

    बच्चों ने उसे रोकने की कोशिश की, “नहीं, चमकीला! मत जाओ!” लेकिन चमकीला ने कहा, “मुझे जाना होगा, लेकिन मैं हमेशा तुम सबके साथ रहूँगा। जब भी तुम रात में मुझे देखोगे, तो याद रखना, मैं तुम्हारे दोस्त हूँ।

    बादल ने फिर से चमकीला को अपने पंखों में समेटा और धीरे-धीरे उसे आसमान में ले जाने लगा। जब वह वापस चाँद पर पहुँचा, तो उसने अपने दोस्तों को बताया कि उसने धरती पर बच्चों के साथ कितना मजेदार समय बिताया

    उस रात, जब बच्चे सो रहे थे, उन्होंने चाँद को अपनी खिड़की से देखा और मुस्कुराने लगे। उन्हें पता था कि उन पर हमेशा चमकीला की नज़र है।

    सपने देखने और उन्हें पूरा करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। दोस्ती और खुशी हर जगह मिलती है, बस हमें उसे पहचानने का तरीका सीखना होता है।

  • सुना है बहुत ख़ुश है वो किसी और से मिलके…

    सुना है बहुत ख़ुश है वो किसी और से मिलके…

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    अर्ज किया है,,

    बिछड़े हुए लोग जब बुरे दौर से मिलेंगे 

    दर्द जब भी मिलेंगे चारों ओर से मिलेंगे!!

    सुना है बहुत खुश है वो किसी ओर से मिल कर 

    आग तो तब लगेगी जब हम किसी ओर से मिलेंगे… 😎😎

  • अच्छे इंसान की पहचान…

    अच्छे इंसान की पहचान…

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    स्त्री की भावनाएं सराय जैसी नहीं हैं

    कि कोई भी आया , रूका और चला गया

    स्त्री की भावनाएं मनमोहक महल जैसी हैं

    जिसमें या तो कोई आ नहीं सकता

    और यदि आ जाए

    तो फिर जीवन भर जा नहीं सकता

    एक औरत में अगर आपको कुछ जानना हैं

    तो मौन को पढ़िए..

    सुन्दरता देखनी हैं

    तो सादगी में ढूंढिए

    और खुशी देखनी हैं

    तो बंधनों से मुक्त करिये ….इससे बेहतर आप किसी स्त्री को समझ नहीं सकते. इसीलिए आप एक अच्छे स्त्री की संतान  है इसका पता बस ऐसे ही लग सकता है की आप दूसरे स्त्री को कितना समझते है और उसे कितना सम्मान देते है.. आपके कर्म ही आपको ऊंचा उठती है इसीलिए ज़ब भी कुछ कीजिये एक बार खुद से जरूर पूछिए क्या ये सही है.. और फिर ज़ब आपके अंदर से जवाब आये तो वो काम बिना डरे कर दीजिये.. पर इस बात का खास ध्यान रखे की आपके कारण किसी को तकलीफ ना हो.. क्योकि इस दुनिया मे गम देना आसान है पर किसी को ख़ुशी देना बहुत मुश्किल…तो किसी के चेहरे की ख़ुशी की वजह बने ना की उनकी तकलीफो की…✍️✍️

  • टैम्पो स्टैंड

    टैम्पो स्टैंड

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    अजय ऑटो आने का ईंतजार कर रहा होता है ! कुच्छ कुच्छ देर पर अपने जेब से अपना मोबाईल फोन नीकाल कर टाईम देखता रहता है ! पता नहीं क्या हो गया है….आज एक भी ऑटो नजर नहीं आ रही है ! अजय ऑटो के ईंतजार करते हुए बोला …..कुच्छ लोग और टैम्पो का ईंतजार कर रहे होते हैं ! भीड़ भार से थोरा दुर यह गांव का छोटा सा ऑटो स्टैन्ड है ! यहां भीड़ भार कम होती है ! आप जानते हीं हैं…की गांव की सड़क कैसी होती है…यहां कम लोगों के हीं आना जाना होती है ! इस लिए ईस रूट में सवारी गाड़ी कम हीं चला करती है ..अब शहर जितना सुविधा तो नहीं ना मिलती है ! गांव में रहने वाले लोगों को..
    शहर में रहने वालें लोगों को तो हर प्रकार की सविधा उनके घर तक भी…पहुंच जाती है ! क्यों की शहर में अमीर लोग बहुत पैसे वाले लोग रहते हैं……और वे लोग ज्यादा पैसा खर्च करके…अपने दैनिक सुविधाओं को पुरा कर अपने जिवन आसान बनाते हैं ! आधी से ज्यादा सवारी से भरी हुई  ऑटो आकर रूकती है ! 
    अजय भीड़ को देख कर नहीं बैठता है ! दो तीन लोग उसमें बैठ कर चले जाते हैं ! अजय परेशानी से फीर से ऑटो आने का ईंतजार करने लगता है ! तभी एक सवारी से भरी टैम्पो आती है…अजय अपने हांथ हिलाकर ऑटो को रूकने का ईशारा करता है….ऑटो नही रूकता है !
    तभी एक तरफ से शीला कान्धे में पर्श और हांथ में किताब कॉपी लिए आती हुई नजर आती है ! शीला भी आकर खड़ी होती है ! हे भगवान मैं काफी लेट हो गई हूं….बस जल्दी से कोई गाड़ी मिल जाये….यह बोलकर शीला ईधर उधर नजर घुमाके देखने लगती है…..तभी शीला की नजर अजय पर परती है ! जो मायुशी से किसी सवारी गाड़ी आने का ईंतजार कर रहा होता है ! आप…..आप भी कहीं जाने के लिए गाड़ी का ईंतजार कर रहे हैं क्या….शीला ने अजय के पास आते हुये बोलकर अजय के जबाव का ईंतजार करने लगी…हां हां हमे भी मार्केट जाना था….अजय ने शीला को जबाव देते हुए बोला….मैं काफी देर से कीसी ऑटो पकरने के लिए बहुत मस्सकत कर रहा हूं कोई मिल हीं नहीं रही है ! अजय शीला के तरफ देखकर एक बार फीर बोला……शीला कुच्छ बोल पाती उसी समय एक ई-रिक्सा दोनो के पास आकर रूकी..
    कहां जाना है आप लोगों को….ई- रिक्सा वाला सभी सवारियों के तरफ देखते हुए जोर से बोलता है ! मार्केट तक…अजय रिक्से वाले के तरफ मुरते हुए बोला….जब कोई भी गाड़ी नही आ रही थी तब अजय….दुसरे साईड मुरकर खड़ा था…जब रिक्से वाले के कड़क आवाज अजय के कानों में परा तब अचानक मुरते हुए जबाव दिया था ! 
    चलिये आपका ईंतजार खत्म हुआ….अबतो गाड़ी भी आ गई है…शीला अजय के तरफ देखते हुए मुश्कुरा कर बोली…और हाथों चलने के लिए ईसारा करने लगी….हां हां चलिए चलते हैं ! अजय शीला को बरे प्यार से देखते हुए बोला रिक्से के अन्दर बैठने के लिए चल दिया…..चलिए सभी लोग जल्दी जल्दी बैठिए….रिक्से वाला सभी सावारियों के तरफ देखकर जोर से बोलता है….सभी लोग बारी बारी से गाड़ी में आकर बैठ जाते हैं ! अजय शीला आमने सामने बैठते हैं और जब सब लोग गाड़ी में चढ़जाते हैं तो गाड़ी चल देती है !
    दोनो आमने सामने बैठ तो गये थे पर थे दोनो खामोश….कुच्छ भी नाहीं अजय बोल रहा था नाहीं शीला हीं कुच्छ बोल रही थी…..गाड़ी अपने तेज स्पीड मे चल रही थी अन्य सावारी अपने आप में कुच्छ कुच्छ बाते कर रहे थे…तो कोई अपने घर परिवार में फोन लगा कर बाते कर रहे थे की मै ऑटो में बैठ गया हूं…इतने देर में वहां पहुंच जाऊंगा….आदि आदि बातों से ऑटो गुन्जने लगा था….ईधर शीला और अजय एक दुसरे को देख भी नहीं रहे थे…एक की नजर गाड़ी के इस तरफ तो दुसरे की नजर गाड़ी के उस तरफ….हां बीच बीच में गाड़ी में ब्रेक लगने टाईम पर नजर की एक दो बार टक्कर जरूर होती थी….अईसा नही है की अजय शीला एक दुसरे को नही जानते हैं…..दोनो में बात नही होती है…बल्की अभी कुच्छ सेचुयेशन हीं कुच्छ अयशी थी की दोनो एक दुसरे से बात भी नहीं कर पा रहे थे….अजय शोच रहा था की आज ईस लड़की को क्या हो गया कबसे कुच्छ भी बोल भी नही रही है….उधर भी वही हाल था….शीला के मन में भी वही सब चल रही थी की…आज ये लड़का कुच्छ बोल भी नहीं रहा है….बस नजर से नजर मिल जाती थी वो भी गाड़ी में ब्रेक लगने के टाईम पर…गाड़ी रूकती है किसी के आवाज लगाने पर कि गाड़ी रोको ड्राईवर जी हमें उतरना है…
    ड्राईवर गाड़ी रोक देता है साईड में कर कर….एक लेडिस और एक जैन्स गाड़ी से उतर ते हैं ! और ड्राईवर को किराये का पैसा देकर साईड हो जाते हैं…और गाड़ी फीर से चल परती है ! अब जब दो सीट खाली हो गई थी तो….दोनो के मन थोरा नॉर्मल हुआ था…..अब दोनो बाते करने के बारे में सोच रहे थे…पर सुरूआत कौन करे यही फैसला नहीं हो पा रहा था …..एक बार जब अजय का नजर शीला के तरफ गया तो उसने देखा शीला भी उसी के तरफ ध्यान से देख रही है ! जब अजय का नजर शीला के नजर पर परी तो शीला नजर हटाई नहीं….बल्की उसकी मुंह खुल गई…..आपसे कई मुलाकात हो गई है ! पर अभी तक आपका नाम नहीं जान पाई हूं….आप का नाम क्या हुआ…बोलकर शीला अजय को ध्यान से देखने लगी……मैं भी यही सोच रहा था मैने कई बार चाहा की आपसे आपका नाम पूछ लूं पर नहीं पूछ पाया….अजय बोलकर शीला को देखने लगा था ! अब तो मैने हीं पूछ लिया आपसे तो अब आप बता दिजिए…..बोलकर शीला अजय के जबाव का वेट करने लगी …अजय….शीला से बोला…..मै शीला…मेरा नाम शील है !शीला अजय को जबाव देते हए बोली……और अजय को गॉर से देखने लगी…….परिवार में और कौन कौन हैं?अजय शीला से पूछा…..पापा मम्मी एक बहन दो भाई दादा दादी तीन चाचा दो चाची…..और आपके….बोलकर शिला खिल खीला कर हंसने लगी…..पापा मम्मी चाचा चाची दादा दादी एक भाई एक बहन छोटी……..बोलकर अजय शीला को देखकर मुश्कुरा देता है ! शीला अजय का अपनी साईकिल ठिक करने वाली बात को याद करने लगती है !
    अरे आप कहां खो गईं….बोलकर अजय हंस देता है ! शीला भी मुश्कुरा देती है…….नही कुच्छ….थोरी देर रूक कर…..आपकी पढ़ाई….बोलकर शीला अजय के तरफ देखने लगी….पढ़ाई बीच में ही छोरना पर गया चुकी मेरे घर के माली हालत ठिक नहीं थी तो पढ़ाई छोर कर काम करना पर गया…बोलकर अजय शीला को बरे प्यार से देखने लगा था…साईड में होके रिक्सा रूकता है….दो लोग गाड़ी से उतर कर ड्राईवर को पैसे देते हैं….और गाड़ी आगे की ओर चल परती है…..

    आगे की कहानी पढ़िए अगले भाग में……..

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