**भाग 1: **
एक समय की बात है, एक हरे-भरे और सुंदर जंगल में कई जानवर रहते थे। इस जंगल का नाम था ‘हरीनगरी’। यह एक अद्भुत स्थान था, जहाँ हर तरह के जानवर, पक्षी, और कीड़े-मकोड़े एक साथ रहते थे। जंगल की हवा में मिठास थी और चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। यहाँ के पेड़ अपनी ऊँचाई में आसमान को छूते थे, जबकि उनके नीचे खिलने वाले फूलों की खुशबू ने पूरे जंगल को महका रखा था। पक्षियों की चहचहाहट और जल की शांत धारा की आवाज़ ने इस जगह को और भी मनमोहक बना दिया था।
हरीनगरी में रहने वाले जानवर बहुत खुश थे। सुबह होते ही, सूरज की किरणें पेड़ों के बीच से छनकर आती थीं और जंगल का हर कोना रोशन कर देती थीं। जानवर एक-दूसरे के साथ मिलकर खेलते थे, खाने की तलाश में निकलते थे, और जीवन की खुशियों का आनंद लेते थे। लेकिन इस खुशहाल जीवन के बीच एक छोटी सी समस्या थी – मित्रता की कमी।
जंगल में हर जानवर अपने में मशगूल था। सियार अपने शैतानी खेलों में, बंदर अपने यांगमय उलझनों में, और खरगोश अपनी दौड़ में इतने व्यस्त थे कि किसीने दूसरे के बारे में सोचना भी बंद कर दिया था। यह बात कुकी नाम की एक कछुए के लिए बहुत निराशाजनक थी। कुकी ने देखा कि जंगल में सभी जानवरों के पास एक दूसरे के लिए समय नहीं था और इसे बहुत बुरा लगा।
कुकी एक प्यारी सी कछुआ थी, जो हमेशा अपनी धीमी गति और छोटे पैरों के कारण मजाक का विषय बनती थी। लेकिन इस बात ने उसे कभी कमजोर महसूस नहीं कराया। कुकी जानती थी कि उसकी धैर्य शक्ति और समझदारी की कोई तुलना नहीं हो सकती। अपने अकेलेपन से परेशान होकर, एक दिन उसने अपने मन में ठान लिया कि उसे दोस्तों की तलाश करनी होगी।
उसने सोचा कि अगर वह जंगल के अन्य जानवरों से दोस्ती कर पाएगी, तो शायद उसकी जिंदगी में खुशियाँ वापस आ जाएंगी। उसने अपने अन्य दोस्तों से बात करने का निश्चय किया। पहले तो उसने मैनू नामक एक प्यारी-सी गिलहरी को बुलाया, जो एक ऊँचे पेड़ पर रहती थी। कुकी मैनू के पास पहुँची और बोली, “नमस्कार मैनू! क्या तुम मेरे साथ खेलोगी?”
मैनू ने उसकी ओर देखा और हँस कर बोली, “कुकी, तुम तो बहुत धीमी हो! मैं तुम्हारे साथ कैसे खेल सकती हूँ?”
कुकी थोड़ी निराश हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने सोचा, “मैं कहीं और कोशिश करूंगी।” फिर वह जंगल के पास एक छोटे तालाब की ओर चली गई, जहाँ कुछ मेंढ़क कूद रहे थे। उसने वहाँ जाकर कहा, “नमस्कार दोस्तों! क्या मैं आपके साथ खेल सकती हूँ?”
मेंढ़कों ने उसे घूरा और एक ने बोला, “तुम तो चल नहीं सकती, हम तुम्हारे साथ कैसे खेल सकते हैं? तुम बहुत धीमी हो।” कुकी का हृदय फिर से टूट गया, लेकिन उसने एक बार फिर खुद को संभाला।
इस प्रकार, दिन बीतते गए और कुकी ने एक-एक कर कई जानवरों से दोस्ती करने की कोशिश की, लेकिन सभी ने उसे उसकी धीमी गति के कारण अस्वीकार कर दिया। एक दिन, यकायक उसने सोचा, “क्या धीमें चलने में कुछ गलत है? क्या मैं इसे अपने फायदे में नहीं बदल सकती?” सोचते-सोचते, उसने यह फैसला किया कि उसे अपनी योग्यता का प्रभावी ढंग से उपयोग करना होगा।
उसने जंगल में एक नई योजना बनाई। उसने सोचा कि दोस्त बनाने का सबसे अच्छा तरीका यह हो सकता है कि वह उन जानवरों की सहायता करे जो तेज दौड़ने में सक्षम हैं। कुकी ने अपने दिमाग में यह योजना बनाई कि यदि वह अपने दोस्तों की मदद करेगी, तो शायद वे उसकी धीमी गति और धैर्य को समझेंगे और उसकी पहचान को सही मायने में सराहेंगे।
अगले दिन, जब सूरज की किरणें हरीनगरी पर बिखर गईं, कुकी ने एक योजना बनाई। उसने देखा कि एक बार तीन छोटे चूहों के झुंड में एक बड़ी समस्या आ गई थी। एक चूहा अपने रास्ते से भटक गया था और अब उसे अपने घर लौटने में बहुत कठिनाई हो रही थी। कुकी ने ठान लिया कि वह इस चूहे की मदद करेगी।
कुकी धीरे-धीरे चूहे के पास पहुँची और कहा, “नमस्कार! क्या मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूँ?” चूहा घबराया हुआ था, लेकिन उसके आँखों में एक आशा की किरण थी। चूहे ने कहा, “मैं अपने घर नहीं पहुँच पा रहा हूँ। रास्ता भूल गया हूँ।”
कुकी ने बिना किसी देर के कहा, “कोई बात नहीं! तुम मुझसे साथ आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुँचाने में मदद करूँगी।” चूहा थोड़ा संकोच में था क्योंकि वह जानता था कि कुकी धीमी थी, लेकिन उसे उसकी मदद की आवश्यकता थी। उसके पास कोई और विकल्प नहीं था, इसलिए वह कुकी के पीछे चलने लगा।
कुकी अपनी धीमी गति से चूहे के साथ चलने लगी। वह रास्ते में कई चीज़ें बताने लगी – वह पेड़, फुल और पत्तियों के बारे में बात कर रही थी। चूहा उसे सुनकर अच्छा महसूस करने लगा, और उसे मज़ा आने लगा। धीरे-धीरे वह उसकी छाया में चलने लगा और बातें करने लगा।
आखिरकार, कुकी और चूहा उस जगह पहुँचे जहाँ चूहे का घर था। चूहा खुशी से कूदने लगा और कहा, “धन्यवाद, कुकी! तुमने मेरी बहुत मदद की। मैंने सोचा था कि तुम धीमी हो, लेकिन तुमने मुझे यहाँ लाने में बड़ी सहायता की।”
कुकी को खुशी हुई। उसे पता चला कि उसकी धीमी गति ने उसे चूहे के साथ बातचीत करने का समय दिया, और उसके लिए यह एक महत्वपूर्ण अनुभव था।
इस घटना के बाद, कुकी ने यह काम जारी रखा। वह अन्य जानवरों की मदद करने लगी – कभी-पकड़ने में, कभी-खाने की तलाश में, और कभी-अच्छे विचार साझा करने में। धीरे-धीरे, जंगल के जानवरों ने उसकी मदद को पहचाना और उसकी सराहना करने लगे।
दिन-ब-दिन, कुकी के प्रति सभी जानवरों की धारणा बदलने लगी। अब जानवर उसे देखकर मुस्कुराते थे, उसे बुलाते थे, और उसके साथ खेलने के लिए उत्साहित रहते थे। अब कुकी अकेली नहीं थी, उसके चारों ओर दोस्त थे – गिलहरियाँ, मेंढ़क, चूहे और अन्य जानवर।
जंगल में वो खुशियों की भावना लौट आई, और सभी जानवर एक-दूसरे के साथ समय बिताने लगे। अब कुकी ने बहुत सी मित्रता की और उसे अपना मूल्य समझ में आ गया। उसने सिद्ध कर दिया कि सच्ची मित्रता उसी समय बढ़ती है जब हम एक-दूसरे का सम्मान करें और मदद करने के लिए आगे बढ़ें।
जंगल में अब हंसी और खेल का माहौल था, और कुकी ने यह सुनिश्चित किया कि वह हमेशा अपनी धीमी गति का उपयोग करके नए दोस्त बनाती रहे। अब हरीनगरी हमेशा हंसती-खिलखिलाती रहने लगी।

NSW उभरते लेखक – 🥈


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