सावरी का कॉलेज का पहला दिन था। वह अपनी नाक पर चश्मा लगाकर, गोरखा पहनकर कॉलेज गई। गोरखा उसका पहचान का हिस्सा बन चुका था, और वह इससे कभी पीछे नहीं हटी। लेकिन आज, उसके गोरखे का रंग और अधिक चमकीला लग रहा था। गोरखा पहनने के पीछे उसका एक गहरा कारण था, जिसे शायद किसी ने नहीं समझा।
कॉलेज के नए माहौल में प्रवेश करते ही, लड़के और लड़कियां उसकी ओर टेढ़ी नजर से देखने लगे। कुछ ने उसे घूरा, कुछ बुदबुदाए और कुछ ने अदब से मुस्कुराते हुए एक-दूसरे से कहा, “क्या फर्क है, ये गोरखा पहनकर आई है!” सावरी के मन में एक डर सताने लगा। उसने हमेशा यही समझा था कि देखने के मामले में वह अलग है। उसके चेहरे पर एसिड के जले हुए निशान थे, जिन्हें वह किसी से छिपाना चाहती थी। उसे लगता था कि अगर किसी ने उसके चेहरे पर ध्यान दिया, तो सब उसकी उपहास करेंगे और उससे दूर रहना पसंद करेंगे।
जब उसकी दोस्त जिया ने उससे पूछा, “तू गोरखा क्यों पहनती है, हर कोई तो पैंट-टॉप्स में आता है?” तो सावरी ने संकोच में सिर झुका लिया। उसका चेहरा धुंधला हो गया, जैसे उसने अपने अंदर की लड़ाई को छिपा लिया हो। उसने कुछ नहीं कहा, बस अपनी आंखों के इशारे से जिया को समझाया कि यह एक गहरा विषय है, जिसे सुलझाना आसान नहीं है।
कॉलेज के पहले दिन, सावरी ने अपनी पूरी कोशिश की कि वह किसी को अपने बारे में कुछ न बताने दे। लेकिन एक दिन, जब वह लाइब्रेरी में बैठी थी, उसने एक दोस्ताना आवाज सुनी। “तो तुम गोरखा में क्यों आती हो? क्या तुम्हें लगता है कि इससे तुम किसी से अलग लगती हो?” यह आवाज आयशा की थी, जो मुस्लिम समुदाय की एक लड़की थी। सावरी ने अपने दिल की धड़कन को धीमा करने की कोशिश की। उसने अपनी आंखों में खामोशी के साथ जवाब दिया, “बस, मेरी पसंद है।”
आयशा ने उसकी आंखों में गहराई देखी और समझ गई कि सावरी कुछ छुपा रही है। वह पास आई और धीमी आवाज में समझाया, “तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। जब तुम अपनी पहचान को छुपाती हो, तो तुम खुद को एक बंधन में बांध लेती हो।” सावरी इस बात को सुनकर चुपचाप मुस्कुरा दी, लेकिन उसके दिल में एक हलचल थी। वह जानती थी कि आयशा सही कह रही है, लेकिन उसके लिए वह खुद को दिखाना बहुत कठिन था।
दिन बीतते गए, और सावरी ने धीरे-धीरे कुछ दोस्तों को बना लिया। लेकिन कॉलेज में जब भी कोई नया आया, सभी के बीच चर्चाओं का केंद्र बनी हुई थी सावरी का गोरखा। सावरी ने यह भी पाया कि कुछ लड़के उसे देखकर मजाक करते, “वह तो गोरखा की रानी है!” उसे भले ही इस बात का दुख नहीं हुआ लेकिन वह महसूस करती थी कि कुछ लोग उसके प्रति संवेदनशील नहीं थे।
एक दिन, कॉलेज में एक वर्कशॉप का आयोजन हुआ, जिसमें सभी को अपनी कहानी साझा करने के लिए कहा गया। सावरी ने सोचा कि शायद यहां वह अपनी कहानी साझा कर पाएगी। उसने अपनी आँखों को बंद किया और खुद को यह बताते हुए अंदर से मजबूत बनाने की कोशिश की, “मैं खुद को दूसरों के सामने क्यों नहीं रख सकती?” लेकिन जब उसकी बारी आई, तो वह झिझक गई।
सावरी ने अपने गोरखे का पल्ला खींचते हुए एक गहरी सांस ली। वह जानती थी कि उसका यह क्षण उसके लिए कितना महत्वपूर्ण था। कॉलेज की वर्कशॉप में जब उसने अपने गोरखे को नीचे फेंका, तो कमरे में गहरी खामोशी छा गई। सभी की आंखें उसकी ओर थीं। कुछ क्षणों के लिए, उसने सोचा कि क्या उसने सही किया? लेकिन फिर, उसके मन में एक ताकत का अहसास हुआ। यह केवल उसका चेहरा नहीं था, बल्कि यह उसकी पूरी कहानी थी, जिसे उसने अब तक छिपाने की कोशिश की थी।
“मैं सावरी हूँ,” उसने धीरे-धीरे कहना शुरू किया, “और मेरा ये चेहरा, इसने मुझे ताकत दी है। यह एक एसिड हमले का परिणाम है। मुझे पहले लगा कि अपने चेहरे को छिपाकर मैं खुद को औरों से अलग रख सकती हूँ, लेकिन आज मैंने समझा कि यह मुझे और भी अधिक खड़ा बनाता है।”
कमरे में उसके शब्दों की गूंज ने सबको झकझोर दिया। कुछ लड़कियों के चेहरे पर जबरदस्त सहानुभूति का भाव था, और कुछ लड़कों की आंखों में अफसोस। सावरी ने अपनी कहानी को आगे बढ़ाया, “यह सब एक दिन हुआ जब मैं स्कूल जा रही थी। अचानक मेरे किसी परिचित ने मुझ पर एसिड फेंक दिया। मेरे चेहरे के जले हुए निशान एक दाग हैं, लेकिन यह मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा हैं। मैंने इससे लड़ाई लड़ी है, और आज मैं इसे अपने गोरखे के माध्यम से स्वीकार कर रही हूँ।”
आगंतुकों में से एक लड़के ने पूछा, “ये गोरखा तुम्हारे लिए क्या मतलब रखता है?” सावरी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “यह मेरे साथ एक पहचान है। यह बताता है कि मैं खुद को कैसे देखती हूँ। मैं इसे पहन कर यह नहीं छिपा रही हूँ कि मैं अलग हूँ, बल्कि यह मेरे गर्व का प्रतीक है।”
धीरे-धीरे, लोग उसकी बातों को सुनने लगे। उन्हें समझ में आने लगा कि सावरी का गोरखा सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि यह उसके आत्मविश्वास, संघर्ष और साहस का प्रतीक था। कोई भी व्यक्ति जब खुद को स्वीकार करता है, तो वह बाकी दुनिया को भी साहस देता है।
उसने अपनी कहानी में यह भी कहा कि किस तरह पिछले दिनों में लोग उसके गोरखे को मज़ाक में लेते थे। “लेकिन अब मैं समझती हूँ कि यह उनका मामला है, मेरा नहीं। मैं अपनी पहचान के लिए शर्मिंदा नहीं हूँ। मेरे अंदर ऐसा कुछ नहीं है जिसकी मैं शर्म करूँ।” उसकी आवाज़ में अब आत्मविश्वास था।
इस शेयरिंग से न केवल सावरी, बल्कि अन्य छात्रों ने भी अपने अपने अनुभव साझा किए। यह वर्कशॉप एक जागरूकता कार्यक्रम बन गई थी, जिसमें सबने अपने जीवन की कठिनाइयों के बारे में खुलकर बात की। एक अन्य लड़की ने कहा, “मुझे भी मेरी क्यूटनेस के लिए हमेशा सफेद त्वचा की जरूरत महसूस होती थी। लेकिन अब मुझे अपने असली रूप को स्वीकार करने की जरूरत है।”
वर्कशॉप के अंत में, सभी छात्रों ने सावरी के प्रति एकजुटता दिखाई। उन्होंने उसे सराहा और कहा कि वह उनकी टेम्पलेट में हमेशा से थी। इसने सावरी के मन में एक नई ऊर्जा का संचार किया। वह जानती थी कि यह सिर्फ उसके लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए एक नई शुरुआत थी। उसने यह अनुभव किया कि सबका अनुभव अलग है, लेकिन सबकी लड़ाई एक ही है – खुद को स्वीकारना।
उस दिन के बाद, सावरी ने कॉलेज में अपनी आवाज़ को और ऊँचा किया। इस तरह साबरी ने कुरूप चेहरे को सबके सामने गोरखे की मदद
से अपनी एक नई पहचान बना ली।

NSW उभरते लेखक – 🥈


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