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एपिसोड 9: कालिन्दी – यमुना जो कृष्ण की रानी बनीं

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

भारत की पवित्र नदियों में यमुना का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। वह केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक दिव्य चेतना है। उसी यमुना को जब मानव रूप में प्रकट किया गया तो उनका नाम पड़ा – कालिन्दी। कालिन्दी श्रीकृष्ण की अष्टभार्या में से एक थीं। उनकी कथा जल की तरह गहन और भक्ति की तरह निर्मल है।

 

कालिन्दी सूर्य देव की पुत्री थीं। सूर्य की पत्नी संज्ञा से उनका जन्म हुआ था। उनके भाई यमराज थे, जो धर्मराज कहलाते हैं। कालिन्दी का वर्ण श्याम था, ठीक वैसे ही जैसे यमुना का जल गहरा और श्यामल दिखाई देता है। बचपन से ही उनमें विलक्षण गुण थे। वे चंचल नहीं थीं, बल्कि गंभीर और एकाग्र थीं। जब अन्य देवकन्याएँ विलास और वैभव की बातें करतीं, कालिन्दी एकांत में बैठकर ध्यान करतीं।

 

एक दिन उन्होंने नारद जी से श्रीकृष्ण की कथा सुनी। नारद जी ने बताया कि द्वापर युग में स्वयं नारायण कृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं। वे गोकुल में लीलाएँ कर चुके हैं, मथुरा में कंस का वध कर चुके हैं और अब द्वारका में राज्य कर रहे हैं। कालिन्दी ने जब कृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं का वर्णन सुना तो उनका हृदय जैसे थम गया। उन्होंने उसी क्षण निश्चय कर लिया – “मैं इन्हीं को पति के रूप में पाऊँगी। इनके अलावा और कोई मुझे स्वीकार नहीं।”

 

कालिन्दी ने कठोर तप शुरू कर दिया। वे हिमालय की ऊँची कंदराओं में चली गईं। वहाँ उन्होंने सूर्य के सामने खड़े होकर तपस्या की। गर्मी हो या सर्दी, वर्षा हो या आँधी – वे अडिग रहीं। वर्षों तक वे केवल वायु पीकर रहीं। उनका शरीर कृश हो गया, पर उनकी भक्ति और प्रबल होती गई। वे प्रतिदिन प्रार्थना करतीं, “हे कृष्ण, हे यदुनाथ, हे द्वारकाधीश! यदि मैं सच में आपकी अनन्या दासी हूँ तो मुझे अपनाइए। मैं जल रूप में युगों से आपकी लीलाओं की साक्षी रही हूँ। अब मुझे अपनी पत्नी बनाकर मेरे तप को सफल कीजिए।”

 

उनकी तपस्या से तीनों लोक प्रभावित हो गए। सूर्य देव स्वयं आकर बोले, “पुत्री, तुम इतना कठोर तप क्यों कर रही हो? कोई भी देवता या राजा तुम्हें पति के रूप में पाकर कृतार्थ हो जाएगा।”

 

कालिन्दी ने सिर झुकाते हुए कहा, “पिता, मैंने अपना हृदय पहले ही श्रीकृष्ण को दे दिया है। अब मैं किसी और को स्वीकार नहीं कर सकती। या तो वे मुझे स्वीकार करें, या मैं इस शरीर को यहीं त्याग दूँ।”

 

सूर्य देव समझ गए कि उनकी पुत्री का निश्चय अटल है। वे मौन हो गए।

 

इधर द्वारका में श्रीकृष्ण सब जानते थे। भक्त की पुकार उन्हें कभी अनसुनी नहीं रहती। एक दिन वे अपने सारथि दारुक के साथ रथ पर बैठकर निकले। रथ सीधे उस स्थान की ओर बढ़ा जहाँ कालिन्दी तपस्या कर रही थीं। जब रथ पहुँचा तो कालिन्दी ध्यान में डूबी हुई थीं। उनके चारों ओर तेज फैला हुआ था। कृष्ण रथ से उतरे और धीरे से उनके पास गए।

 

“कालिन्दी,” कृष्ण ने मधुर स्वर में पुकारा।

 

कालिन्दी की समाधि टूटी। उन्होंने आँखें खोलीं तो सामने स्वयं वे खड़े थे जिनके लिए उन्होंने वर्षों तप किया था। श्याम वर्ण, पीतांबर, गले में वनर्माला और मुख पर वह दिव्य मुस्कान। कालिन्दी के नेत्रों में अश्रु भर आए। वे तत्काल भूमि पर गिरकर उनके चरणों में झुक गईं।

 

“नाथ… आप आ गए,” उनकी आवाज काँप रही थी। “मैंने सोचा था कि मेरा तप अधूरा रह जाएगा। आपने कृपा कर दी।”

 

कृष्ण ने उन्हें उठाया और बोले, “कालिन्दी, तुम्हारी भक्ति ने मुझे खींच लिया। तुमने शरीर की सुध-बुध खोकर मेरा स्मरण किया। जो भक्त इतनी तन्मयता से पुकारता है, मैं उसके पास बिना बुलाए चला जाता हूँ। आज मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ।”

 

कालिन्दी ने सिर उठाकर देखा। उनके नेत्रों में विश्वास और प्रेम दोनों थे। वे बोलीं, “स्वामी, मैं यमुना हूँ। मैंने आपकी बाल लीलाएँ देखी हैं। जब आप गोकुल में थे तो मैंने अपने जल से आपके चरण धोए हैं। जब आपने कालीय नाग को नथना तो मेरा जल विषैला हो गया था, पर आपकी कृपा से फिर शुद्ध हो गया। अब आप मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा।”

 

कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम जल रूप में मेरी लीला की साक्षी रही हो। अब मानव रूप में मेरी धर्मपत्नी बनो। द्वारका तुम्हारा नया घर होगा।”

 

उसी पावन स्थल पर श्रीकृष्ण ने कालिन्दी के साथ विवाह रचाया। कोई विशाल समारोह नहीं हुआ, कोई राजसी ठाठ नहीं था। केवल दो हृदय थे – एक अनंत के और एक तपोमय के। सूर्य देव ने आकाश से पुष्प वर्षा की और यमराज ने दूर खड़े होकर प्रणाम किया।

 

कालिन्दी द्वारका आईं। वहाँ की अन्य रानियाँ पहले तो आश्चर्यचकित हुईं कि यह श्यामवर्णा रानी कौन हैं जिनके नेत्रों में नदी जैसी गहराई है। पर जब उन्होंने कालिन्दी का शांत स्वभाव, उनकी सेवा भावना और कृष्ण के प्रति उनकी अनन्य भक्ति देखी तो सभी उन्हें सम्मान देने लगीं।

 

कालिन्दी अन्य रानियों से अलग थीं। वे कम बोलती थीं। महल के कोलाहल से दूर रहना पसंद करती थीं। वे अक्सर महल के उस भाग में बैठी रहतीं जहाँ से समुद्र दिखाई देता था। कभी-कभी वे श्रीकृष्ण से कहतीं, “स्वामी, समुद्र कितना विशाल है, पर मेरा मन तो अब भी उस यमुना तट पर भटकता है जहाँ आपने बाल लीलाएँ की थीं।”

 

कृष्ण उत्तर देते, “कालिन्दी, यमुना और तुम अब एक नहीं रहे। तुम मेरे साथ हो, अतः यमुना भी मेरे साथ है। तुम्हारे रूप में वह पवित्रता द्वारका में आ गई है।”

 

कालिन्दी ने कृष्ण को पुत्र भी दिए। उनके पुत्रों में श्रुत और अन्य वीर योद्धा हुए। पर कालिन्दी मातृत्व में भी भक्ति को नहीं भूलीं। वे अपने पुत्रों को सदैव यही शिक्षा देतीं कि उनके पिता साधारण राजा नहीं, बल्कि तीनों लोकों के आधार हैं।

 

एक बार सत्यभामा ने हल्के स्वर में कहा, “कालिन्दी, तुम इतनी शांत कैसे रहती हो? हमें तो छोटी-छोटी बातों में भी ईर्ष्या हो जाती है, पर तुम्हारे मुख पर कभी विकार नहीं आता।”

 

कालिन्दी मुस्कुराईं और बोलीं, “बहन, मैं नदी हूँ। नदी का स्वभाव होता है बहना, न रुकना। मैंने तप करके स्वामी को पाया है। अब मुझे और क्या चाहिए? जो मिल गया है वह अनंत है। अनंत को पाकर फिर अल्पकालिक भावों में उलझना मूर्खता है।”

 

कृष्ण जब भी कालिन्दी के कक्ष में जाते तो एक अजीब शांति अनुभव करते। रुक्मिणी के पास धर्म और गंभीरता थी, सत्यभामा के पास तेज और अधिकार था, जाम्बवती के पास प्राचीन भक्ति थी – पर कालिन्दी के पास वह गहराई थी जो केवल जल में होती है। वे कृष्ण के मन के भावों को बिना कहे समझ जाती थीं।

 

कभी-कभी कृष्ण उनसे कहते, “कालिन्दी, तुम मुझे याद दिलाती हो कि मैं केवल द्वारकाधीश नहीं, बल्कि वह भी हूँ जो कभी यमुना तट पर गाय चरता था।”

 

कालिन्दी उत्तर देतीं, “नाथ, आप चाहे जहाँ रहें, मैं तो वही रहूँगी – आपकी चरणरज को धारण करने वाली। चाहे नदी रूप में, चाहे रानी रूप में।”

 

इस प्रकार कालिन्दी का जीवन श्रीकृष्ण के साथ भक्ति, समर्पण और गहन शांति से भरपूर रहा। वे अष्टभार्या में सबसे कम चर्चित रानी कही जाती हैं, पर उनकी कथा सबसे अधिक गहरी है। क्योंकि उन्होंने न रूप का अहंकार किया, न वैभव का, न अधिकार का। उन्होंने केवल तप किया और पा लिया।

 

आज भी जब कोई यमुना तट पर खड़ा होता है तो लगता है मानो कालिन्दी अभी भी वहीं कहीं मौजूद हैं – अपने प्रभु की प्रतीक्षा में, या फिर उनके स्मरण में डूबी हुई। क्योंकि जो नदी भगवान की पत्नी बन जाए, उसका जल कभी साधारण नहीं रह जाता। वह जल फिर स्पर्श मात्र से पाप हर लेने वाला हो जाता है।

 

कालिन्दी की कथा हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम माँगने से नहीं, तप और समर्पण से मिलता है। और जब वह मिल जाए तो फिर किसी और इच्छा की आवश्यकता नहीं रहती है। 

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Lakshmi Kumari

NSW  अनुभवी लेखक -🥇

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