(भाग 4)
( तृणावर्त का अंत: जब नन्हे कृष्ण ने बवंडर को भी रोक दिया)
गोकुल में नंदलाल की बाल-लीलाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थीं।
अभी कुछ ही समय पहले की बात थी, जब एक भारी बैलगाड़ी के नीचे सोए हुए नन्हे कृष्ण ने अपने छोटे-से पैर से उसे पलट दिया था। गोकुलवासी उस घटना को लेकर आज भी चर्चा करते थे।
कोई कहता—
“यह अवश्य कोई दैवी शक्ति है।”
कोई कहता—
“न जाने इस बालक के जन्म के साथ गोकुल में कैसी-कैसी अद्भुत घटनाएँ होने लगी हैं!”
लेकिन यशोदा मैया इन बातों को सुनकर मुस्कुरा देतीं।
उनके लिए कृष्ण कोई रहस्यमय शक्ति नहीं थे।
वे तो बस उनके लाला थे।
उनकी आँखों का तारा।
उनकी गोद की शोभा।
उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी।
कृष्ण अब थोड़ा बड़े होने लगे थे। उनके हाथ-पैरों में चंचलता आ गई थी। वे कभी करवट लेने का प्रयास करते, कभी हाथ-पैर चलाकर अपने पास रखे खिलौनों को छूने की कोशिश करते।
जब भी वे मुस्कुराते, यशोदा मैया की आँखों में खुशी छलक उठती।
वह अक्सर अपनी सखियों से कहतीं—
“मेरा कन्हैया जब मुस्कुराता है न, तब लगता है जैसे पूरा घर उजाला हो गया।”
गोपियाँ हँसतीं और कहतीं—
“यशोदा, तुम्हें तो अपने लाल के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता।”
यशोदा कहतीं—
“माँ को अपने बच्चे के अलावा भला क्या दिखाई देगा?”
और सच ही तो था।
माँ का हृदय अपने बच्चे में ही संसार देखता है।
लेकिन उस दिन गोकुल में जो होने वाला था, वह यशोदा मैया के हृदय को कंपा देने वाला था।
—
कंस की बेचैनी फिर बढ़ी
उधर मथुरा में कंस को जब यह समाचार मिला कि पूतना का भी अंत हो गया, तो उसका भय और बढ़ गया।
वह अपने महल में क्रोध से इधर-उधर घूमने लगा।
उसने अपने मंत्रियों से कहा—
“पूतना जैसी शक्तिशाली राक्षसी उस बालक का कुछ नहीं बिगाड़ सकी। आखिर वह बालक है कौन?”
एक मंत्री ने धीरे से कहा—
“महाराज, संभव है कि वह साधारण बालक न हो।”
कंस ने घूरकर देखा।
“क्या कहना चाहते हो?”
मंत्री काँपते हुए बोला—
“शायद आकाशवाणी सत्य होने वाली है।”
यह सुनते ही कंस का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।
“चुप!”
उसने अपना मुकुट उतारकर फेंक दिया।
“मैं किसी बालक से नहीं हार सकता। चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।”
तभी सभा में उपस्थित एक राक्षस आगे आया।
उसका नाम था—
तृणावर्त।
वह अत्यंत शक्तिशाली मायावी राक्षस था।
वह अपने शरीर को भयंकर बवंडर में बदल सकता था।
जहाँ वह जाता, वहाँ धूल का ऐसा तूफान उठता कि कुछ दिखाई नहीं देता।
तृणावर्त ने कंस से कहा—
“महाराज, यदि आपको उस बालक की चिंता है तो मुझे गोकुल जाने की अनुमति दीजिए।”
कंस ने पूछा—
“तुम क्या करोगे?”
तृणावर्त मुस्कुराया।
“मैं उसे आकाश में ले जाऊँगा। इतनी ऊँचाई पर कि कोई उसे बचा नहीं सकेगा।”
कंस की आँखों में चमक आ गई।
“जाओ।”
तृणावर्त ने प्रणाम किया।
“उस बालक को मैं आपके पास वापस नहीं आने दूँगा।”
कंस को क्या पता था कि वह स्वयं अपने विनाश की ओर एक और कदम बढ़ा रहा है।
—
गोकुल का शांत दिन
उधर गोकुल में एक दिन सब कुछ सामान्य था।
सुबह की हल्की धूप चारों ओर फैल रही थी।
गायें चरने के लिए बाहर जा रही थीं।
गोप अपने काम में व्यस्त थे।
गोपियाँ घरों में दही मथ रही थीं।
यशोदा मैया अपने कन्हैया को लेकर आँगन में बैठी थीं।
कृष्ण आज कुछ अधिक ही चंचल दिखाई दे रहे थे।
वे बार-बार यशोदा मैया की ओर हाथ बढ़ा रहे थे।
यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।
“क्या चाहिए मेरे लाला?”
कृष्ण ने अपनी छोटी-सी उँगली से बाहर की ओर संकेत किया।
यशोदा बोलीं—
“बाहर जाना है?”
कृष्ण मुस्कुरा दिए।
यशोदा हँसकर बोलीं—
“अभी नहीं। बाहर धूप है।”
कृष्ण ने फिर अपनी उँगली हिलाई।
“अच्छा-अच्छा, मेरी बात नहीं मानोगे?”
कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े।
यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।
“बड़े नटखट हो गए हो।”
पास बैठी एक गोपी बोली—
“अभी से नटखट है, यशोदा। बड़ा होकर तो पूरे गोकुल को नचा देगा।”
सभी हँसने लगीं।
—
अचानक मौसम बदल गया
कुछ समय बाद अचानक वातावरण बदलने लगा।
आकाश पर धूल छाने लगी।
हवा धीरे-धीरे तेज होने लगी।
पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया।
लेकिन थोड़ी ही देर में हवा इतनी तेज हो गई कि पेड़ों की डालियाँ जोर-जोर से हिलने लगीं।
गायें बेचैन होकर रंभाने लगीं।
पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटने लगे।
गोपियाँ अपने बच्चों को घर के भीतर बुलाने लगीं।
एक गोपी ने आकाश की ओर देखकर कहा—
“अरे! यह अचानक कैसी आँधी आ गई?”
दूसरी बोली—
“इतनी तेज हवा तो मैंने बहुत दिनों से नहीं देखी।”
तीसरी ने अपने बच्चे को पकड़ते हुए कहा—
“सब लोग अपने-अपने घरों में चले जाओ।”
धीरे-धीरे हवा का वेग बढ़ता गया।
आकाश में धूल ही धूल दिखाई देने लगी।
कुछ ही क्षणों में ऐसा लगने लगा कि दिन के समय भी रात उतर आई हो।
—
यशोदा मैया की गोद में कृष्ण
उस समय कृष्ण यशोदा मैया की गोद में थे।
यशोदा मैया ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।
उन्होंने कहा—
“डरना मत मेरे लाल। मैया यहीं है।”
कृष्ण बिल्कुल शांत थे।
वह अपनी माँ की ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।
लेकिन अचानक उनका शरीर यशोदा मैया को बहुत भारी लगने लगा।
यशोदा ने आश्चर्य से उन्हें संभाला।
“अरे! मेरा लाला इतना भारी कब हो गया?”
उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में सँभालने की कोशिश की।
लेकिन कुछ ही क्षणों में उन्हें लगा कि वह बालक को उठा नहीं पा रही हैं।
यशोदा ने उन्हें धीरे से नीचे बैठा दिया।
“अच्छा, तू यहीं रह। मैया अभी आती है।”
उन्होंने कृष्ण को सुरक्षित स्थान पर लिटाया।
उन्हें क्या पता था कि यह सब उसी मायावी शक्ति का प्रभाव था।
तृणावर्त अपना समय देख चुका था।
—
तृणावर्त का आगमन
अचानक हवा का एक भयंकर चक्र उठा।
वह धूल और मिट्टी को अपने भीतर समेटता हुआ तेजी से घूमने लगा।
किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
वह कोई साधारण आँधी नहीं थी।
वह स्वयं तृणावर्त था।
उसने बवंडर का रूप धारण कर लिया था।
उसकी गति इतनी तेज थी कि वृक्षों की शाखाएँ टूटने लगीं।
छप्पर उड़ने लगे।
गोपियाँ अपने बच्चों को पकड़कर घरों में छिपने लगीं।
गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं।
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसा संकट आ गया।
तृणावर्त ने कृष्ण को देखा।
नन्हा बालक शांत पड़ा था।
उसने मन ही मन कहा—
“यही है वह बालक!”
वह तेज गति से नीचे आया और देखते ही देखते कृष्ण को अपने साथ आकाश में उठा ले गया।
—
यशोदा मैया का हृदय काँप उठा
जब यशोदा मैया वापस आईं, तो उन्होंने देखा—
जहाँ कृष्ण लेटे थे, वहाँ कोई नहीं था।
“कन्हैया?”
उन्होंने इधर-उधर देखा।
“कन्हैया!”
लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।
यशोदा की आँखें भय से फैल गईं।
उन्होंने चारों ओर देखा।
कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दिए।
उन्होंने घबराकर पुकारा—
“मेरा लाल कहाँ गया?”
गोपियाँ दौड़कर उनके पास आईं।
“क्या हुआ यशोदा?”
यशोदा रोते हुए बोलीं—
“मेरा कन्हैया… मेरा कन्हैया यहाँ था। अभी यहीं था। मैं थोड़ी देर के लिए गई और…”
उनकी आवाज रुक गई।
उन्होंने अपने सिर पर हाथ रख लिया।
“हे भगवान! मेरा बच्चा कहाँ चला गया?”
गोपियाँ भी घबरा गईं।
किसी ने कहा—
“शायद कहीं लुढ़क गया हो।”
किसी ने कहा—
“आँगन में खोजो।”
किसी ने घर के भीतर देखा।
लेकिन कृष्ण कहीं नहीं थे।
—
आकाश में तृणावर्त
उधर तृणावर्त कृष्ण को लेकर बहुत ऊँचाई तक पहुँच चुका था।
उसे लगा—
“अब यह बालक मेरे हाथ से नहीं बच सकता।”
वह और ऊपर जाने लगा।
नीचे पूरा गोकुल बहुत छोटा दिखाई दे रहा था।
लेकिन तभी उसे अपने शरीर पर एक विचित्र भार महसूस हुआ।
पहले उसे लगा कि शायद हवा का प्रभाव है।
लेकिन भार बढ़ता गया।
तृणावर्त ने सोचा—
“यह क्या हो रहा है?”
उसने कृष्ण को और ऊपर ले जाने का प्रयास किया।
लेकिन अब कृष्ण का शरीर उसे अत्यंत भारी लगने लगा।
कुछ ही क्षणों में उसकी गति रुक गई।
उसकी साँसें भारी होने लगीं।
वह सोचने लगा—
“यह बालक इतना भारी कैसे हो गया?”
तृणावर्त ने पूरी शक्ति लगा दी।
लेकिन अब तो वह स्वयं नीचे खिंचने लगा।
—
भगवान का अद्भुत रूप
तृणावर्त को अब समझ में आने लगा कि यह कोई साधारण बालक नहीं है।
उसने कृष्ण को अपने शरीर से अलग करने का प्रयास किया।
लेकिन कृष्ण ने अपनी छोटी-सी भुजा उसके गले के चारों ओर डाल दी।
और देखते ही देखते उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई कि तृणावर्त का दम घुटने लगा।
उसकी आँखें बाहर निकल आईं।
उसने अपनी पूरी शक्ति लगा दी।
लेकिन भगवान के सामने उसकी सारी शक्ति समाप्त हो गई।
तृणावर्त की गति रुक गई।
उसका बवंडर समाप्त होने लगा।
आकाश से धूल नीचे गिरने लगी।
गोकुल में धीरे-धीरे प्रकाश लौटने लगा।
और फिर—
धड़ाम!
तृणावर्त का विशाल शरीर एक ऊँचे स्थान से धरती पर आ गिरा।
उसका प्राणांत हो चुका था।
और उसके ऊपर नन्हे कृष्ण सुरक्षित बैठे थे।
—
गोकुलवासियों ने देखा अद्भुत दृश्य
जैसे ही धूल बैठी, गोकुलवासियों ने देखा कि एक विशाल राक्षस धरती पर पड़ा है।
उसके ऊपर नन्हा कृष्ण सुरक्षित था।
एक गोप चिल्लाया—
“कन्हैया!”
सब लोग दौड़ पड़े।
यशोदा मैया तो अपने लाल को देखते ही रोती हुई दौड़ीं।
उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया।
“मेरा लाल!”
उन्होंने कृष्ण को बार-बार चूमा।
उनके आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
“तुझे कुछ हो जाता तो?”
कृष्ण अपनी माँ की गोद में शांत थे।
जैसे उन्हें कुछ हुआ ही न हो।
यशोदा मैया ने उन्हें अपने आँचल में छिपा लिया।
“अब मैं तुझे पलभर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ूँगी।”
—
नंद बाबा की चिंता
जब नंद बाबा को घटना का समाचार मिला, वे भी तुरंत वहाँ पहुँचे।
उन्होंने तृणावर्त का विशाल शरीर देखा और फिर कृष्ण को देखा।
उनका मन भय और आश्चर्य से भर गया।
उन्होंने कहा—
“यह कैसी अद्भुत घटना है?”
एक वृद्ध गोप ने कहा—
“नंद बाबा, यह बालक साधारण नहीं लगता।”
नंद बाबा कुछ क्षण चुप रहे।
फिर बोले—
“जो भी हो, भगवान ने आज मेरे बालक की रक्षा की है।”
उन्होंने कृष्ण को गोद में लिया।
कृष्ण ने उनकी दाढ़ी पकड़ ली।
नंद बाबा हँस पड़े।
“अरे! तुझे तो कोई चिंता ही नहीं है।”
गोपियाँ भी मुस्कुराने लगीं।
कुछ ही समय पहले जिस गोकुल में भय छाया हुआ था, वहीं अब हँसी लौटने लगी थी।
—
यशोदा मैया की ममता
उस रात यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी गोद से नीचे नहीं उतारा।
वह उन्हें देखती रहीं।
कभी उनके माथे पर हाथ फेरतीं।
कभी उनके पैरों को सहलातीं।
फिर धीरे से बोलीं—
“लाला, आज तू मुझे बहुत डरा गया।”
कृष्ण ने आँखें खोलकर माँ की ओर देखा।
यशोदा मुस्कुराईं।
“क्या देख रहा है?”
कृष्ण ने अपनी छोटी-सी उँगली से यशोदा के चेहरे को छुआ।
यशोदा की आँखों से फिर आँसू निकल आए।
उन्होंने कृष्ण को चूमते हुए कहा—
“तू मेरा है।”
भगवान स्वयं उनके सामने थे।
फिर भी यशोदा उन्हें अपना मानती थीं।
यही तो प्रेम की शक्ति है।
—
इस लीला का गहरा संदेश
तृणावर्त केवल एक राक्षस का नाम नहीं था।
वह अहंकार और अंधी शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है।
उसे अपनी शक्ति पर इतना अभिमान था कि उसने सोचा—
“मैं इस छोटे-से बालक को आकाश में ले जाकर समाप्त कर दूँगा।”
लेकिन जिस बालक को उसने कमजोर समझा, वही उसके लिए सबसे भारी बन गया।
यह लीला हमें सिखाती है कि केवल बाहरी शक्ति ही सब कुछ नहीं होती।
जिसके भीतर अहंकार होता है, वह अपनी ही शक्ति के कारण विनाश की ओर जा सकता है।
और जो भगवान की शरण में होता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
—
गोकुल में फिर मुस्कान लौटी
अगली सुबह गोकुल में फिर वही चहल-पहल थी।
गोपियाँ एक-दूसरे से कल की घटना के बारे में बातें कर रही थीं।
एक बोली—
“मैंने तो ऐसा बवंडर कभी नहीं देखा।”
दूसरी बोली—
“और देखो, हमारा कन्हैया फिर बच गया।”
तीसरी हँसते हुए बोली—
“अब तो मुझे लगता है कि यह बालक स्वयं गोकुल की रक्षा करने आया है।”
यशोदा मैया ने यह बात सुनी तो बोलीं—
“अरे, ऐसी बातें मत करो। मेरा लाला तो अभी बहुत छोटा है।”
गोपियाँ हँसने लगीं।
“हाँ-हाँ, तुम्हारा लाला बहुत छोटा है!”
यशोदा भी मुस्कुरा दीं।
लेकिन मन ही मन वह कल की घटना को भूल नहीं पा रही थीं।
उन्होंने कृष्ण को देखा।
कृष्ण उस समय एक छोटी-सी लकड़ी की वस्तु से खेल रहे थे।
यशोदा ने सोचा—
“यह मेरा नन्हा-सा बालक आखिर कौन है?”
लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने उस विचार को मन से निकाल दिया।
“जो भी है, मेरा तो है।”
उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी गोद में भर लिया।
और कृष्ण ने अपनी माँ के गले में हाथ डाल दिए।
—
आगे की लीला की शुरुआत
गोकुल में अब कृष्ण की ख्याति बढ़ती जा रही थी।
हर दिन कोई नई शरारत।
हर दिन कोई नई मुस्कान।
हर दिन कोई नई लीला।
लेकिन अब उनकी सबसे बड़ी शरारतें आरंभ होने वाली थीं।
कृष्ण धीरे-धीरे घुटनों के बल चलना सीखने वाले थे।
वे घर के एक कोने से दूसरे कोने तक जाते।
माखन की मटकी को देखते।
दही को देखते।
और फिर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से यशोदा मैया की ओर देखते।
यशोदा समझ जातीं—
“कुछ तो शरारत होने वाली है।”
लेकिन वह शरारत क्या थी?
एक दिन कृष्ण ने अपने छोटे-से हाथ से माखन की मटकी की ओर बढ़ना शुरू किया।
गोपियों ने उन्हें देख लिया।
एक गोपी चिल्लाई—
“अरी यशोदा! संभाल अपने लाल को!”
यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।
कृष्ण मटकी की ओर बढ़ रहे थे।
उन्होंने कहा—
“कन्हैया! उधर क्या कर रहे हो?”
कृष्ण तुरंत रुक गए।
यशोदा उनकी ओर बढ़ीं।
कृष्ण ने मासूम चेहरा बना लिया।
यशोदा बोलीं—
“तू माखन खाने जा रहा था न?”
कृष्ण ने आँखें झुका लीं।
गोपियाँ हँसने लगीं।
यशोदा भी मुस्कुरा उठीं।
लेकिन उस दिन से गोकुल में एक नई पहचान बनने वाली थी—
माखनचोर कन्हैया की।
जो माखन चुराएगा।
जो मटकी फोड़ेगा।
जो गोपियों को सताएगा।
और फिर ऐसी मासूम मुस्कान देगा कि कोई उसे डाँट ही नहीं पाएगा।
यही थी नंदलाल की अगली लीला की शुरुआत।
क्रमशः…

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