भैया ने मेरी राखी कभी नहीं उतारी
रक्षाबंधन की सुबह अंशिका अपने भाई समीर की कलाई को देखकर अचानक चुप हो गई।
समीर की कलाई पर एक पुराना, फीका पड़ा हुआ धागा अब भी बंधा था।
उसके ऊपर हर साल नई राखी बंधती रही थी, लेकिन वह पुराना धागा कभी नहीं हटाया गया।
अंशिका ने धीरे से पूछा,
“भैया, ये पुराना धागा अब तक क्यों बांध रखा है?”
समीर मुस्कुराया।
“तुझे याद नहीं?”
अंशिका ने ध्यान से देखा।
“नहीं।”
समीर ने कहा,
“ये तूने पहली बार मुझे राखी बांधी थी।”
अंशिका हंस पड़ी।
“तब मैं कितनी छोटी थी!”
“पांच साल की।”
“और आप?”
“दस साल का।”
अंशिका ने मजाक में कहा,
“तो अब तक क्यों संभाल रखा है? ये तो कभी भी टूट सकता है।”
समीर ने अपनी कलाई को देखते हुए कहा,
“कुछ धागे टूटने के बाद भी नहीं टूटते।”
अंशिका ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।
“आप भी ना, बहुत इमोशनल बातें करने लगे हो।”
समीर बस मुस्कुरा दिया।
लेकिन उस दिन अंशिका को नहीं पता था कि उस पुराने धागे के पीछे एक ऐसा सच था, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था।
समीर और अंशिका एक छोटे से शहर में रहते थे।
पिता की एक छोटी-सी सिलाई की दुकान थी।
माँ घर संभालती थीं।
घर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन खुशियां बहुत थीं।
समीर पढ़ाई में बहुत अच्छा था।
उसका सपना था कि वह बड़ा होकर शहर जाकर पढ़े और अपने पसंद का काम करे।
जब भी स्कूल में कोई पूछता,
“बड़े होकर क्या बनोगे?”
समीर बिना सोचे जवाब देता,
“कुछ बड़ा।”
अंशिका तुरंत कहती,
“और मुझे क्या बनाओगे?”
समीर हंसता।
“तुझे?”
“हां।”
“तुझे दुनिया की सबसे परेशान करने वाली बहन।”
अंशिका गुस्सा होने का नाटक करती।
लेकिन दोनों बहुत करीब थे।
फिर एक साल पिता की तबीयत खराब रहने लगी।
दुकान बंद होने लगी।
घर की आमदनी कम हो गई।
समीर उस समय बारहवीं में था।
उसे शहर के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया।
उसका सपना पूरा होने वाला था।
घर में सभी खुश थे।
लेकिन फीस बहुत ज्यादा थी।
पिता ने कहा,
“मैं दुकान गिरवी रख दूंगा।”
समीर ने तुरंत मना कर दिया।
“नहीं पापा।”
“लेकिन बेटा, ये तुम्हारा सपना है।”
समीर ने मुस्कुराकर कहा,
“सपने कहीं नहीं जाते।”
कुछ दिनों बाद अंशिका ने देखा कि समीर अब अक्सर दुकान पर बैठने लगा है।
वह सोचती,
“भैया शायद पापा की मदद कर रहे हैं।”
फिर कॉलेज खुलने का दिन आ गया।
अंशिका ने उत्साह से पूछा,
“भैया, कब जा रहे हो?”
समीर ने कहा,
“अभी नहीं।”
“क्यों?”
“कुछ काम है।”
दिन बीतते गए।
फिर महीने।
फिर साल।
समीर शहर नहीं गया।
अंशिका बड़ी होती रही।
उसने पढ़ाई की।
कॉलेज में दाखिला लिया।
लेकिन उसे कभी नहीं पता चला कि उसके भाई ने अपना सपना क्यों छोड़ दिया।
समीर हमेशा कहता,
“मुझे यहीं अच्छा लगता है।”
समय के साथ पिता की तबीयत और कमजोर हो गई।
समीर ने दुकान पूरी तरह संभाल ली।
अंशिका की पढ़ाई चलती रही।
जब उसे बड़े शहर के कॉलेज में पढ़ने का मौका मिला, तो वह बहुत खुश हुई।
लेकिन फीस देखकर उसने कहा,
“माँ, शायद मैं यहीं पढ़ लूं।”
समीर ने तुरंत कहा,
“तू जाएगी।”
“लेकिन भैया, खर्चा?”
“मैं हूं ना।”
“आपके पास इतने पैसे कहां हैं?”
समीर ने हंसकर कहा,
“तेरा भाई दुकान चलाता है।”
अंशिका चली गई।
चार साल तक समीर ने हर महीने उसकी फीस भेजी।
उसने कभी उसे महसूस नहीं होने दिया कि पैसे की कोई परेशानी है।
अंशिका ने पढ़ाई पूरी की और नौकरी लग गई।
घर लौटते समय उसने सोचा—
अब भैया को आराम दूंगी।
पहली तनख्वाह मिलने के बाद वह बाजार गई।
उसने समीर के लिए एक सुंदर घड़ी खरीदी।
और रक्षाबंधन के दिन घर पहुंच गई।
राखी बांधने से पहले उसने कहा,
“भैया, आज आपको एक गिफ्ट देना है।”
समीर ने हंसकर कहा,
“मुझे पता है, बहुत महंगा होगा।”
अंशिका ने घड़ी उसके सामने रखी।
समीर कुछ पल चुप रहा।
“बहुत सुंदर है।”
“अब आपकी बारी।”
“मेरी?”
“हां। अब आप बताओ, आपको क्या चाहिए?”
समीर ने मजाक में कहा,
“आराम।”
अंशिका ने गंभीर होकर कहा,
“सच में।”
समीर ने उसकी तरफ देखा।
“कुछ नहीं चाहिए।”
“आपने पूरी जिंदगी मेरे लिए काम किया है। अब मेरी बारी है।”
समीर मुस्कुरा दिया।
“पगली, भाई-बहन हिसाब नहीं रखते।”
उस रात अंशिका अपने पुराने कमरे में सामान देख रही थी।
उसे एक पुरानी फाइल मिली।
वह फाइल शायद पिता की थी।
उसने खोलकर देखा।
अंदर कुछ कागज थे।
और एक पुराना पत्र।
ऊपर लिखा था—
“समीर के नाम—कॉलेज प्रवेश पत्र।”
अंशिका की सांस रुक गई।
उसने तारीख देखी।
वही साल, जब समीर ने शहर जाने का सपना छोड़ दिया था।
फाइल में कुछ बैंक की रसीदें भी थीं।
अंशिका ने ध्यान से देखा।
उसके भाई के नाम की एक छात्रवृत्ति थी।
फिर भी वह कॉलेज नहीं गया था।
तभी पीछे से माँ की आवाज आई।
“तुझे ये फाइल कहां मिली?”
अंशिका ने पलटकर पूछा,
“माँ… भैया कॉलेज क्यों नहीं गए थे?”
माँ चुप हो गईं।
“मुझे सच बताइए।”
माँ की आंखें भर आईं।
उन्होंने धीरे से कहा,
“उस साल तेरा स्कूल बदलना था।”
“तो?”
“तेरी फीस और घर के खर्च में बहुत परेशानी थी।”
अंशिका ने कहा,
“लेकिन भैया की छात्रवृत्ति थी।”
माँ ने सिर झुका लिया।
“छात्रवृत्ति पूरी फीस के लिए नहीं थी।”
“तो भैया ने क्या किया?”
माँ रो पड़ीं।
“उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।”
अंशिका की आंखें भर आईं।
“मेरे लिए?”
माँ ने कहा,
“तेरे लिए नहीं… परिवार के लिए।”
“उन्होंने कभी बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि वह नहीं चाहता था कि तू अपने सपनों को बोझ समझे।”
अंशिका वहीं बैठ गई।
उसके सामने भाई की पूरी जिंदगी जैसे एक-एक करके खुल रही थी।
वह कॉलेज नहीं गया।
दुकान संभाली।
पिता का इलाज कराया।
बहन की पढ़ाई कराई।
और हर बार मुस्कुराकर कहा—
“मैं हूं ना।”
अंशिका के हाथ में वह पुराना प्रवेश पत्र कांप रहा था।
वह तुरंत समीर के कमरे में गई।
समीर सोने की तैयारी कर रहा था।
अंशिका को देखकर बोला,
“क्या हुआ?”
अंशिका के हाथ में कागज देखकर उसका चेहरा बदल गया।
“तुझे ये कहां मिला?”
अंशिका की आंखों से आंसू बहने लगे।
“आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”
समीर ने धीरे से कहा,
“कौन-सी बात?”
“आपका कॉलेज!”
समीर कुछ पल चुप रहा।
फिर मुस्कुराया।
“बहुत पुरानी बात है।”
“मेरे लिए पुरानी नहीं है।”
“अंशिका…”
“आपने अपना सपना छोड़ दिया।”
समीर ने कहा,
“हर सपना पूरा करना जरूरी नहीं होता।”
अंशिका रोते हुए बोली,
“लेकिन आपको मौका मिला था।”
समीर ने उसकी आंखों में देखकर कहा,
“और तुझे भी तो मिला।”
“मेरे सपने के लिए आपका सपना क्यों रुका?”
समीर ने हल्के से कहा,
“क्योंकि उस समय मुझे लगा कि तेरे आगे बढ़ने में मेरा आगे बढ़ना भी शामिल है।”
अंशिका के पास कोई जवाब नहीं था।
समीर ने अपनी कलाई दिखाई।
वह पुराना धागा अब भी वहां था।
“याद है तूने पहली बार राखी बांधी थी?”
अंशिका ने आंसू पोंछते हुए सिर हिलाया।
“तब तूने क्या कहा था, पता है?”
“नहीं।”
“तूने कहा था—भैया, बड़े होकर मुझे कभी अकेला मत छोड़ना।”
अंशिका फूटकर रो पड़ी।
समीर ने कहा,
“बस वही बात मेरे दिमाग में रह गई।”
अंशिका ने उसकी कलाई पकड़ ली।
“लेकिन भैया, राखी का मतलब ये नहीं कि आप अपनी पूरी जिंदगी मेरे लिए छोड़ दें।”
समीर ने मुस्कुराकर कहा,
“मैंने जिंदगी नहीं छोड़ी।”
“तो क्या?”
“मैंने अपनी जिंदगी में एक नया कारण जोड़ लिया।”
अंशिका ने सिर हिलाया।
“अब मेरी बात सुनिए।”
“क्या?”
“इस बार राखी पर मुझे आपसे कुछ चाहिए।”
“क्या?”
“अब आप अपना एक सपना बताइए।”
समीर हंस पड़ा।
“अब मेरी उम्र सपने देखने की नहीं रही।”
अंशिका ने कहा,
“तो फिर मेरी उम्र भी कम नहीं थी जब आपने मेरे लिए सपने देखे।”
समीर चुप हो गया।
अंशिका ने कहा,
“इस बार मेरी राखी का वादा है—अब आप अपने लिए भी जिएंगे।”
समीर की आंखें भर आईं।
“बहुत मुश्किल काम दे रही है।”
“भाई हूं… या बहन?”
“बहन।”
“तो सुनना पड़ेगा।”
दोनों हंस पड़े।
कुछ महीनों बाद अंशिका ने समीर को एक लिफाफा दिया।
उसके अंदर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रवेश पत्र था।
वह वही काम था, जिसे समीर बचपन से सीखना चाहता था।
समीर ने पूछा,
“ये क्या है?”
अंशिका मुस्कुराई।
“आपका रुका हुआ सपना।”
समीर की आंखें भर आईं।
“मैं अब शुरू कर सकता हूं?”
अंशिका ने उसकी कलाई पर राखी बांधते हुए कहा,
“सपनों की कोई उम्र नहीं होती भैया।”
समीर ने पुरानी राखी के धागे को छुआ।
“और ये?”
अंशिका मुस्कुराई।
“इसे मत उतारना।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब ये सिर्फ आपके पुराने वादे की याद नहीं है।”
“तो?”
अंशिका ने कहा,
“अब ये याद दिलाएगी कि जिस भाई ने मेरी जिंदगी बनाने में अपना सपना रोक दिया था… उसकी बहन अब उसके सपनों को फिर से उड़ान देगी।”
समीर ने पहली बार उस पुरानी राखी को देखकर अलग तरह से मुस्कुराया।
और अंशिका ने समझ लिया—
राखी सिर्फ भाई के बहन की रक्षा करने का त्योहार नहीं है।
कभी-कभी बहन भी भाई की उस उम्मीद की रक्षा करती है…
जिसे उसने सबके लिए जीते-जीते कहीं पीछे छोड़ दिया हो।
और उस साल…
अंशिका की राखी ने समीर की कलाई पर सिर्फ एक धागा नहीं बांधा था।
उसने उसके अधूरे सपने को फिर से जीने की हिम्मत बांध दी थी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे