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फटी हुई राखी

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

नंदिनी और उसका बड़ा भाई दीपक शहर की एक झुग्गी बस्ती में रहते थे। उनके पिता रिक्शा चलाते थे, लेकिन एक दुर्घटना के बाद उनका पैर खराब हो गया था। माँ घरों में काम करती थीं।

 

घर में पैसे इतने कम थे कि कई बार रात का खाना भी नहीं बनता था।

 

दीपक सिर्फ सत्रह साल का था, लेकिन उसने पढ़ाई छोड़कर एक गैराज में काम करना शुरू कर दिया था।

 

नंदिनी अभी स्कूल में पढ़ती थी।

 

दीपक का सपना था कि उसकी बहन खूब पढ़े और एक दिन अपने पैरों पर खड़ी हो।

 

वह रोज गैराज में घंटों काम करता।

 

हाथों पर तेल लगा रहता।

 

कपड़े हमेशा मैले रहते।

 

लेकिन जब वह घर आता और नंदिनी को किताब लेकर बैठा देखता, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।

 

एक दिन नंदिनी ने कहा—

 

“भैया, आपकी तबीयत खराब है। आज काम पर मत जाइए।”

 

दीपक हँसा।

 

“अगर मैं नहीं जाऊँगा तो तेरी किताबें कौन खरीदेगा?”

 

नंदिनी चुप हो गई।

 

उसने भाई के हाथों को देखा।

 

हाथों पर जगह-जगह कटे के निशान थे।

 

उसने धीरे से कहा—

 

“भैया, मैं पढ़ाई छोड़ देती हूँ।”

 

दीपक ने तुरंत उसकी किताब बंद कर दी।

 

“ये बात दोबारा मत कहना।”

 

“लेकिन…”

 

“तू पढ़ेगी। मेरी जिंदगी में अगर कोई सपना बचा है तो वह तू है।”

 

नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

 

रक्षाबंधन आने वाला था।

 

उसके पास राखी खरीदने के पैसे नहीं थे।

 

उसने माँ से कहा—

 

“माँ, मुझे थोड़े पैसे दे दो।”

 

माँ ने खाली डिब्बा दिखा दिया।

 

“बेटी, इस बार घर में कुछ नहीं है।”

 

नंदिनी उदास हो गई।

 

अगले दिन उसने अपनी पुरानी स्कूल ड्रेस का लाल धागा निकाला।

 

उसने एक छोटे कपड़े के टुकड़े को मोड़कर राखी बना ली।

 

बीच में उसने अपनी पुरानी पेंसिल की लाल रबर का छोटा टुकड़ा लगा दिया।

 

राखी थोड़ी टेढ़ी थी।

 

धागा भी जगह-जगह से उधड़ा हुआ था।

 

लेकिन नंदिनी के लिए वह दुनिया की सबसे सुंदर राखी थी।

 

रक्षाबंधन की सुबह दीपक काम पर जाने लगा।

 

नंदिनी ने कहा—

 

“आज काम पर मत जाओ।”

 

“क्यों?”

 

“आज मेरी राखी है।”

 

दीपक मुस्कुराया।

 

“अच्छा! तो जल्दी बाँध।”

 

नंदिनी ने राखी बाँधी।

 

दीपक ने अपनी जेब टटोली।

 

उसके पास सिर्फ बीस रुपये थे।

 

उसने बीस रुपये बहन के हाथ में रख दिए।

 

नंदिनी ने तुरंत वापस कर दिए।

 

“मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

 

“तो क्या चाहिए?”

 

“बस एक वादा।”

 

“बोल।”

 

“आप कभी मुझे अकेला मत छोड़ना।”

 

दीपक की आँखें भर आईं।

 

उसने कहा—

 

“जब तक मेरी साँस है, तू अकेली नहीं है।”

 

कुछ दिनों बाद गैराज में काम करते हुए दीपक का हाथ मशीन में फँस गया।

 

उसे अस्पताल ले जाया गया।

 

डॉक्टर ने कहा कि हाथ में गंभीर चोट है और कुछ समय तक वह काम नहीं कर पाएगा।

 

घर की आमदनी बंद हो गई।

 

नंदिनी ने स्कूल के बाद घरों में काम करना शुरू कर दिया।

 

दीपक को बहुत दुख हुआ।

 

“मैंने तुझे पढ़ाने का वादा किया था।”

 

नंदिनी मुस्कुराई।

 

“आपने वादा तोड़ा नहीं है भैया। बस अब मैं भी आपका हाथ बँटा रही हूँ।”

 

धीरे-धीरे दीपक ठीक होने लगा।

 

लेकिन उसके हाथ में पहले जैसी ताकत नहीं रही।

 

गैराज के मालिक ने उसे काम से निकाल दिया।

 

दीपक टूट गया।

 

एक रात उसने नंदिनी से कहा—

 

“शायद अब मैं तुझे पढ़ा नहीं पाऊँगा।”

 

नंदिनी ने उसकी हथेली पकड़ ली।

 

“भैया, आपने मुझे किताबें नहीं दीं। आपने मुझे हिम्मत दी है। मैं खुद पढ़ूँगी।”

 

उस दिन से नंदिनी ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

 

वह स्कूल जाती, शाम को काम करती और रात में पढ़ाई करती।

 

कई साल बाद उसने प्रतियोगी परीक्षा पास कर ली।

 

उसे सरकारी नौकरी मिल गई।

 

पहली तनख्वाह लेकर वह घर आई।

 

उसने दीपक के सामने एक डिब्बा रखा।

 

दीपक ने खोला।

 

अंदर एक सुंदर घड़ी थी।

 

“ये क्या है?”

 

नंदिनी बोली—

 

“आपके लिए।”

 

दीपक ने घड़ी पहनने से मना कर दिया।

 

“इतना महंगा सामान क्यों खरीदा?”

 

नंदिनी मुस्कुराई।

 

“क्योंकि आपने मेरी जिंदगी का समय बदल दिया।”

 

दीपक की आँखों में आँसू आ गए।

 

उसी समय नंदिनी ने अपनी अलमारी से एक पुरानी चीज निकाली।

 

वह वही फटी हुई राखी थी।

 

दीपक ने उसे देखते ही पहचान लिया।

 

“तूने इसे संभालकर रखा?”

 

नंदिनी बोली—

 

“ये राखी नहीं है भैया। इसमें मेरा पूरा बचपन बंधा है।”

 

दीपक ने काँपते हाथों से राखी को छुआ।

 

उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।

 

“मैंने तो सोचा था कि मैं तेरा भविष्य नहीं बना पाया।”

 

नंदिनी ने कहा—

 

“आपने बनाया है भैया। अगर उस दिन आप मुझे पढ़ने के लिए मजबूर नहीं करते, तो मैं आज यहाँ नहीं होती।”

 

अगले रक्षाबंधन पर नंदिनी ने फिर भाई की कलाई पर राखी बाँधी।

 

इस बार राखी बहुत सुंदर थी।

 

लेकिन दीपक की नजर उसी पुरानी फटी राखी पर थी।

 

उसने कहा—

 

“मेरे लिए सबसे कीमती राखी यही है।”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

दीपक ने मुस्कुराकर कहा—

 

“क्योंकि इसी ने मुझे याद दिलाया था कि गरीब आदमी के पास पैसा कम हो सकता है, लेकिन प्यार कभी कम नहीं होना चाहिए।”

 

दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगे।

 

उनकी झुग्गी वही थी।

 

गरीबी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।

 

लेकिन उस छोटे-से घर में अब उम्मीद बहुत बड़ी थी।

 

सीख:

 

रिश्तों की कीमत उनकी चमक से नहीं होती। एक फटी हुई राखी भी करोड़ों की दौलत से ज्यादा कीमती हो सकती है, अगर उसमें सच्चा प्यार और त्याग बंधा हो। जिंदगी में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने प्रियजनों का साथ और हिम्मत कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

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