शहर से बहुत दूर एक छोटा-सा गाँव था, जहाँ कच्ची गलियों और मिट्टी के घरों के बीच एक गरीब परिवार रहता था। उस परिवार में सिर्फ दो भाई-बहन थे—अमन और उसकी छोटी बहन गुड़िया।
अमन गुड़िया से पाँच साल बड़ा था। पिता के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी अमन के कंधों पर आ गई थी। माँ पहले ही बीमारी के कारण बिस्तर पर रहती थीं। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।
अमन ने पढ़ाई छोड़ दी और गाँव के पास एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करने लगा।
हर सुबह वह अँधेरे में उठता, सूखी रोटी पानी में भिगोकर खाता और काम पर निकल जाता।
गुड़िया अक्सर दरवाजे पर खड़ी होकर उसे जाते हुए देखती।
वह पूछती, “भैया, आप स्कूल क्यों नहीं जाते?”
अमन मुस्कुराकर कहता, “मेरा स्कूल तो अब यही है।”
गुड़िया समझ नहीं पाती थी।
एक दिन उसने फिर पूछा, “आप बड़े होकर क्या बनना चाहते थे?”
अमन कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने मुस्कुराकर कहा, “डॉक्टर।”
गुड़िया की आँखें चमक उठीं।
“तो बनो ना भैया।”
अमन ने उसकी ओर देखा और धीरे से बोला—
“अब तू पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना। मेरा सपना तू पूरा करना।”
गुड़िया ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके मन में भाई की बात बस गई।
वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।
स्कूल की फीस बहुत कम थी, फिर भी उनके लिए वह रकम बड़ी थी।
कई बार अमन के पास घर का राशन खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे, लेकिन वह गुड़िया की फीस किसी न किसी तरह जमा कर देता।
एक दिन गुड़िया ने देखा कि अमन के पैरों में चप्पल नहीं थी।
उसने पूछा, “भैया, आपकी चप्पल कहाँ है?”
अमन हँसकर बोला, “टूट गई थी।”
“नई क्यों नहीं लेते?”
“ले लूँगा।”
लेकिन वह “ले लूँगा” कभी नहीं आया।
अमन हर बार अपनी जरूरत से पहले गुड़िया की जरूरत पूरी करता।
सर्दियों की रात में जब गुड़िया के पास गर्म कपड़े नहीं होते, अमन अपनी पुरानी चादर उसे दे देता।
जब गुड़िया बीमार पड़ती, वह पूरी रात उसके सिरहाने बैठा रहता।
और जब भी गुड़िया कहती—
“भैया, आप बहुत अच्छे हो।”
अमन बस इतना कहता—
“तू खुश रह, बस यही मेरी कमाई है।”
समय बीतता गया।
गुड़िया दसवीं कक्षा में पहुँच गई।
स्कूल में उसका नाम जिले के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में आने लगा।
अमन को उस पर बहुत गर्व था।
लेकिन उसके मन में एक चिंता भी थी।
गुड़िया की आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना जरूरी था।
शहर में रहने, किताबों और कॉलेज की फीस के लिए बहुत पैसे चाहिए थे।
एक शाम गुड़िया ने डरते हुए कहा—
“भैया, अगर पैसे नहीं हैं तो मैं आगे नहीं पढ़ूँगी।”
अमन ने उसकी तरफ देखा।
“ऐसा दोबारा मत कहना।”
“लेकिन भैया…”
“तू पढ़ेगी। चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।”
उस रात अमन देर तक घर नहीं आया।
अगले दिन गुड़िया ने देखा कि अमन की आँखों के नीचे काले निशान थे।
वह बोली, “भैया, आप रात में सोए नहीं?”
अमन मुस्कुराया।
“थोड़ा काम ज्यादा था।”
असलियत यह थी कि अमन ने रात में भी मजदूरी शुरू कर दी थी।
दिन में ईंट-भट्ठा और रात में ट्रक से सामान उतारने का काम।
उसका शरीर टूट जाता, लेकिन बहन की पढ़ाई नहीं टूटने देता।
कुछ महीनों बाद गुड़िया को शहर के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया।
वह बहुत खुश थी।
लेकिन उसी दिन उसने देखा कि अमन अपनी पुरानी साइकिल बेचकर उसके लिए किताबें खरीद रहा है।
गुड़िया की आँखों में आँसू आ गए।
“भैया, मेरी वजह से आपने अपनी साइकिल भी बेच दी?”
अमन हँस पड़ा।
“साइकिल तो फिर आ जाएगी। तेरी जिंदगी में मौका बार-बार नहीं आएगा।”
रक्षाबंधन नजदीक था।
गुड़िया शहर में थी और अमन गाँव में।
गुड़िया ने फोन किया—
“भैया, मैं इस बार राखी बाँधने जरूर आऊँगी।”
अमन बोला—
“नहीं, तू अपनी पढ़ाई कर। मैं समझ जाऊँगा।”
“नहीं भैया। राखी तो मैं आपके हाथ पर ही बाँधूँगी।”
लेकिन रक्षाबंधन से एक दिन पहले गुड़िया के कॉलेज में परीक्षा थी।
वह चाहकर भी घर नहीं आ सकी।
उसने फोन किया।
“भैया, मुझे माफ कर दो। मैं इस बार नहीं आ पाऊँगी।”
अमन ने कहा—
“पगली, परीक्षा ज्यादा जरूरी है। मेरी राखी अगले साल बाँध देना।”
गुड़िया रोने लगी।
“आप नाराज तो नहीं हो?”
“तुझसे कभी नाराज हो सकता हूँ क्या?”
फोन कट गया।
अमन ने अपनी आँखें पोंछ लीं।
उस रात उसने अकेले चूल्हा जलाया।
एक सूखी रोटी बनाई और सामने रखी अपनी बहन की पुरानी तस्वीर देखकर बोला—
“तू बस पढ़ती रह गुड़िया। मेरा सपना पूरा कर देना।”
कुछ साल बीत गए।
गुड़िया ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया।
वह डॉक्टर बनने की राह पर थी।
अमन के चेहरे पर गर्व था।
लेकिन उसका शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा था।
लगातार मेहनत ने उसकी सेहत खराब कर दी थी।
एक दिन काम करते समय वह बेहोश होकर गिर पड़ा।
उसे अस्पताल ले जाया गया।
डॉक्टर ने बताया कि उसे आराम की सख्त जरूरत है।
गुड़िया को खबर मिली तो वह तुरंत गाँव आई।
अपने भाई को अस्पताल के बिस्तर पर देखकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।
“भैया…”
अमन ने कमजोर आवाज में कहा—
“तू आ गई?”
“हाँ।”
“पढ़ाई छोड़कर तो नहीं आई?”
गुड़िया ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मेरी पढ़ाई से ज्यादा जरूरी आप हो।”
अमन मुस्कुराया।
“नहीं। तू डॉक्टर बनेगी। यही मेरा सपना है।”
गुड़िया ने उसका हाथ अपने माथे से लगा लिया।
उसने रोते हुए कहा—
“भैया, मैं डॉक्टर बनूँगी। लेकिन सबसे पहले आपका इलाज करूँगी।”
कुछ दिनों बाद अमन की हालत सुधरने लगी।
गुड़िया वापस शहर चली गई।
उसने दिन-रात मेहनत की।
आखिरकार वह डॉक्टर बन गई।
जब वह पहली बार डॉक्टर का सफेद कोट पहनकर गाँव लौटी, तो अमन दरवाजे पर खड़ा था।
गुड़िया ने दूर से ही उसे देखा और दौड़कर गले लग गई।
“भैया… आपका सपना पूरा हो गया।”
अमन की आँखों से आँसू बह निकले।
“नहीं गुड़िया… मेरा सपना नहीं। तू मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी बन गई।”
फिर गुड़िया ने अपनी जेब से एक राखी निकाली।
उसने अमन की कलाई पर राखी बाँधी और बोली—
“ये सिर्फ राखी नहीं है भैया। ये उस भाई के लिए है जिसने अपना सपना छोड़कर मेरी जिंदगी बना दी।”
अमन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।
“अब तू उन गरीब बच्चों का इलाज करना जिनके पास पैसे नहीं हैं।”
गुड़िया ने मुस्कुराकर कहा—
“वादा है भैया।”
उस दिन दोनों की आँखों में आँसू थे।
लेकिन उन आँसुओं में दर्द नहीं था।
उनमें वर्षों के संघर्ष की जीत थी।
सीख:—-सच्चा भाई वही है जो अपनी खुशियों और सपनों का त्याग करके बहन के भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश करे। रिश्तों की सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि त्याग और विश्वास है। अगर किसी अपने का सपना पूरा करने के लिए हमें अपनी कुछ इच्छाएँ छोड़नी पड़ें, तो वह त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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