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भक्त के बस में हैं भगवान

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

 

हिमालय की ऊँची चोटियों पर कैलाश पर्वत अपनी दिव्य आभा से चमक रहा था। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर बिछी थी। मंद-मंद हवा चल रही थी और वातावरण में “ॐ नमः शिवाय” की ध्वनि गूँज रही थी।

 

भगवान शिव समाधि में लीन थे और माता पार्वती उनके पास बैठी थीं। कुछ समय तक माता पार्वती भगवान शिव को देखती रहीं। उनके मन में एक प्रश्न उठ रहा था।

 

उन्होंने धीरे से पूछा,

 

“स्वामी, एक बात मैं बहुत समय से सोच रही हूँ। आप तो देवों के देव महादेव हैं। समस्त संसार आपकी पूजा करता है। राजा हो या रंक, देवता हो या मनुष्य—सब आपके चरणों में शीश झुकाते हैं। लेकिन मैंने कई बार देखा है कि आप अपने भक्तों की छोटी-सी पुकार पर भी तुरंत उनकी सहायता के लिए पहुँच जाते हैं। ऐसा क्यों?”

 

भगवान शिव ने अपनी आँखें खोलीं और मंद-मंद मुस्कुराए।

 

उन्होंने कहा,

 

“देवी, यह संसार सोचता है कि भक्त भगवान के अधीन होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि जब भक्ति सच्ची हो, जब उसमें स्वार्थ न हो, जब भक्त अपने भगवान से कुछ माँगने के बजाय स्वयं को उनके चरणों में समर्पित कर दे, तब भगवान भी उस भक्त के प्रेम में बंध जाते हैं।”

 

माता पार्वती ने आश्चर्य से पूछा,

 

“क्या सच में भगवान अपने भक्त के वश में हो जाते हैं?”

 

शिवजी बोले,

 

“हाँ देवी। शक्ति से भगवान को नहीं बाँधा जा सकता, धन से भगवान को नहीं खरीदा जा सकता और अहंकार से भगवान को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। लेकिन सच्चा प्रेम और निष्काम भक्ति ऐसी शक्ति है, जिसके आगे स्वयं महादेव भी झुक जाते हैं।”

 

माता पार्वती ने कहा,

 

“स्वामी, मैं यह बात अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ।”

 

भगवान शिव मुस्कुराए।

 

“तो आइए देवी, आज आपको एक ऐसे भक्त की कथा सुनाता हूँ, जिसकी भक्ति ने मुझे भी उसके द्वार तक आने के लिए विवश कर दिया था।”

 

 

एक गरीब भक्त की कहानी

 

बहुत समय पहले हिमालय की तलहटी में एक छोटा-सा गाँव था।

 

उस गाँव में शिवदास नाम का एक गरीब युवक रहता था।

 

उसके पास न बड़ा घर था, न धन-दौलत और न ही खेती के लिए पर्याप्त भूमि।

 

उसका एक छोटा-सा मिट्टी का घर था।

 

वह जंगल से लकड़ियाँ काटकर लाता और उन्हें बेचकर अपना जीवन चलाता था।

 

लेकिन उसके पास एक ऐसी संपत्ति थी, जो संसार के किसी धनवान व्यक्ति के पास भी नहीं थी।

 

वह था—भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास।

 

हर सुबह सूर्य निकलने से पहले शिवदास उठता।

 

नदी में स्नान करता और जंगल के पास स्थित एक छोटे-से शिवलिंग पर जल चढ़ाता।

 

उसके पास पूजा के लिए न चाँदी की थाली थी, न सोने का मुकुट और न ही महंगे फूल।

 

वह जंगल से कुछ बेलपत्र लेकर आता।

 

नदी से जल भरता।

 

और शिवलिंग के सामने बैठकर कहता,

 

“हे मेरे भोलेनाथ, मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है। मेरे पास न धन है, न सुंदर वस्त्र और न ही बड़ी पूजा करने की क्षमता। मेरे पास यदि कुछ है तो केवल मेरा विश्वास है। आप इसे स्वीकार कर लेना।”

 

फिर वह आँखें बंद करके कहता,

 

“ॐ नमः शिवाय।”

 

उसकी आवाज में इतनी श्रद्धा होती कि आसपास का वातावरण भी जैसे शांत हो जाता।

 

 

 

एक वर्ष गाँव में भयंकर सूखा पड़ गया।

 

नदियाँ सूखने लगीं।

 

खेतों में फसल नष्ट हो गई।

 

लोगों के घरों में अन्न समाप्त होने लगा।

 

शिवदास के घर में भी कई दिनों से भोजन नहीं बना था।

 

उसकी बूढ़ी माँ ने उससे कहा,

 

“बेटा, आज घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं है।”

 

शिवदास मुस्कुराया।

 

“माँ, चिंता मत करो। भोलेनाथ सब ठीक करेंगे।”

 

माँ ने कहा,

 

“बेटा, भगवान पर विश्वास रखना अच्छी बात है, लेकिन पेट की आग भी तो बुझानी होगी।”

 

शिवदास ने माँ के चरण छुए।

 

“माँ, जब तक मेरी साँस चल रही है, मैं मेहनत करूँगा। लेकिन अपने भोलेनाथ पर विश्वास नहीं छोड़ूँगा।”

 

उस दिन वह जंगल की ओर चला गया।

 

बहुत दूर जाने पर उसे एक व्यापारी मिला।

 

व्यापारी ने कहा,

 

“यदि तुम मेरे लिए यह भारी सामान पहाड़ के उस पार पहुँचा दो तो मैं तुम्हें इतना धन दूँगा कि तुम्हारे घर में कई दिनों तक भोजन हो जाएगा।”

 

शिवदास ने सामान उठा लिया।

 

लेकिन रास्ता बहुत कठिन था।

 

पत्थरों से उसके पैर घायल हो गए।

 

कंधे पर भारी बोझ था।

 

फिर भी वह चलता रहा।

 

रास्ते में उसने देखा कि एक वृद्ध व्यक्ति भूख से कमजोर होकर रास्ते के किनारे पड़ा है।

 

शिवदास के पास केवल एक छोटी-सी रोटी थी, जो उसकी माँ ने उसे दी थी।

 

उसने वह रोटी वृद्ध को दे दी।

 

वृद्ध ने पूछा,

 

“बेटा, तूने अपनी रोटी मुझे क्यों दे दी?”

 

शिवदास मुस्कुराया।

 

“बाबा, मुझे भूख अभी लगी है, लेकिन आपको देखकर लगा कि आपकी भूख मुझसे बड़ी है।”

 

वृद्ध ने उसे आशीर्वाद दिया।

 

शिवदास आगे बढ़ गया।

 

लेकिन उसे नहीं पता था कि वह वृद्ध कोई साधारण व्यक्ति नहीं था।

 

वह स्वयं भगवान शिव की परीक्षा लेने के लिए साधारण मनुष्य का रूप धारण करके आए थे।

 

 

 

शिवदास जब सामान लेकर व्यापारी के पास पहुँचा तो व्यापारी ने जानबूझकर उससे कहा,

 

“तुमने देर कर दी। अब मैं तुम्हें तय धन का आधा ही दूँगा।”

 

शिवदास ने कुछ नहीं कहा।

 

वह जानता था कि व्यापारी गलत कर रहा है।

 

फिर भी उसने सोचा,

 

“यदि मैं इससे लड़ूँगा तो मेरा मन अशांत होगा। जो मेरे भाग्य में होगा, वह मुझे मिल जाएगा।”

 

व्यापारी ने आधा धन उसके हाथ में रख दिया।

 

शिवदास घर लौटने लगा।

 

रास्ते में उसे एक छोटा बच्चा मिला जो रो रहा था।

 

उसने पूछा,

 

“बेटा, क्यों रो रहे हो?”

 

बच्चे ने कहा,

 

“तीन दिनों से मेरे घर में भोजन नहीं बना। मेरी माँ बीमार है।”

 

शिवदास ने अपनी सारी कमाई उस बच्चे के हाथ में रख दी।

 

अब उसके पास घर ले जाने के लिए एक भी पैसा नहीं था।

 

लेकिन उसके चेहरे पर फिर भी संतोष था।

 

वह आकाश की ओर देखकर बोला,

 

“भोलेनाथ, आज आपकी कृपा से मैं किसी के काम आ गया। इससे बड़ी कमाई और क्या 

 

उधर कैलाश पर माता पार्वती यह सब देख रही थीं।

 

उन्होंने शिवजी से पूछा,

 

“स्वामी, यह भक्त इतना गरीब है, फिर भी हर परिस्थिति में दूसरों की सहायता करता है। क्या इसे कभी धन नहीं मिलना चाहिए?”

 

शिवजी बोले,

 

“देवी, यह भक्त धन नहीं माँगता। यह केवल मुझे माँगता है।”

 

माता पार्वती ने कहा,

 

“तो फिर आप इसे दर्शन क्यों नहीं देते?”

 

भगवान शिव मुस्कुराए।

 

“क्योंकि अभी इसकी भक्ति की एक और परीक्षा बाकी ..

 

अगले दिन शिवदास रोज की तरह शिव मंदिर पहुँचा।

 

लेकिन उस दिन मंदिर में एक बड़ा परिवर्तन था।

 

गाँव के धनवान लोगों ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।

 

अब वहाँ चाँदी के दरवाजे थे।

 

सोने की सजावट थी।

 

महँगे फूल थे।

 

बड़े-बड़े दीपक जल रहे थे।

 

शिवदास के पास केवल नदी का जल और कुछ बेलपत्र थे।

 

मंदिर के पुजारी ने उसे देखकर कहा,

 

“तुम्हें अंदर आने की अनुमति नहीं है। यह मंदिर अब बड़े लोगों के लिए है।”

 

शिवदास का हृदय टूट गया।

 

उसने कहा,

 

“महाराज, क्या भगवान शिव भी अब अमीर और गरीब में अंतर करने लगे हैं?”

 

पुजारी ने उसे बाहर कर दिया।

 

शिवदास मंदिर के बाहर बैठ गया।

 

उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे।

 

उसने आकाश की ओर देखा।

 

“भोलेनाथ, यदि मेरे पास आपको चढ़ाने के लिए सोना नहीं है, तो क्या मेरा प्रेम भी आपके लिए कम हो गया?”

 

फिर उसने अपने आँसू पोंछे।

 

“नहीं। आप मेरे भगवान हैं। मैं मंदिर के अंदर नहीं आ सकता तो क्या हुआ? आप मेरे हृदय में तो हैं।”

 

वह मंदिर के बाहर बैठकर ही शिव का ध्यान करने लगा।

 

उसने आँखें बंद कीं।

 

“ॐ नमः शिवाय…”

 

एक बार…

 

दो बार…

 

फिर लगातार…

 

उसकी आवाज धीरे-धीरे पूरे वातावरण में गूँजने लगी।

 

 

 

अचानक मंदिर के भीतर रखे शिवलिंग से दिव्य प्रकाश निकलने लगा।

 

सभी लोग घबरा गए।

 

मंदिर के घंटे अपने आप बजने लगे।

 

दीपक की लौ तेज हो गई।

 

और तभी एक दिव्य स्वर गूँजा—

 

“जिसे तुमने मेरे मंदिर से बाहर निकाला है, वह मेरे हृदय में रहता है।”

 

सभी लोग काँप उठे।

 

शिवदास ने आँखें खोलीं।

 

उसके सामने स्वयं भगवान शिव खड़े थे।

 

मस्तक पर चंद्रमा।

 

जटाओं में गंगा।

 

गले में सर्प।

 

हाथ में त्रिशूल।

 

और चेहरे पर करुणा।

 

शिवदास तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ा।

 

“भोलेनाथ!”

 

शिवजी ने उसे उठाकर अपने हृदय से लगा लिया।

 

माता पार्वती भी वहाँ प्रकट हुईं।

 

उन्होंने शिवदास की ओर देखकर कहा,

 

“वत्स, तुमने आज सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति क्या होती है।”

 

शिवदास रोते हुए बोला,

 

“माता, मैंने तो कुछ भी नहीं किया। मैं तो केवल अपने भोलेनाथ का नाम लेता हूँ।”

 

भगवान शिव मुस्कुराए।

 

“यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति है।”

 

फिर शिवजी ने मंदिर में उपस्थित लोगों से कहा,

 

“याद रखो, मुझे सोने के मुकुट से प्रसन्नता नहीं होती। मुझे उस हृदय से प्रेम है जिसमें किसी के लिए द्वेष नहीं।”

 

उन्होंने आगे कहा,

 

“जो व्यक्ति मेरे मंदिर में हजार दीपक जलाता है लेकिन किसी गरीब के घर का चूल्हा बुझा देता है, उसकी पूजा अधूरी है।”

 

“और जो व्यक्ति स्वयं भूखा रहकर किसी भूखे को भोजन देता है, उसके हृदय में मैं स्वयं निवास करता हूँ।”

 

सभी लोग सिर झुकाकर खड़े थे।

 

 

 

भगवान शिव ने शिवदास से कहा,

 

“वत्स, आज मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। माँगो, क्या चाहते हो?”

 

शिवदास ने हाथ जोड़ लिए।

 

“प्रभु, मुझे धन नहीं चाहिए।”

 

“तो क्या चाहिए?”

 

“मेरी माँ के लिए स्वस्थ जीवन चाहिए।”

 

शिवजी मुस्कुराए।

 

“और?”

 

“मेरे गाँव में किसी को भूखा न सोना पड़े।”

 

“और?”

 

“मेरे प्रभु, यदि संभव हो तो मेरे गाँव के सभी लोगों के हृदय में प्रेम भर दीजिए।”

 

भगवान शिव कुछ क्षण मौन रहे।

 

माता पार्वती की आँखों में भी प्रसन्नता थी।

 

शिवजी ने कहा,

 

“वत्स, तूने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। इसलिए आज मैं तुझे वह दूँगा, जो संसार का कोई धन नहीं दे सकता—मेरी भक्ति।”

 

उन्होंने शिवदास के मस्तक पर हाथ रखा।

 

उस क्षण शिवदास के भीतर अद्भुत शांति उत्पन्न हुई।

 

उसके जीवन में धीरे-धीरे समृद्धि आने लगी।

 

लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उसके गाँव के लोगों के मन भी बदल गए।

 

धनवान लोगों ने गरीबों की सहायता करनी शुरू की।

 

मंदिर के द्वार सभी के लिए खोल दिए गए।

 

गाँव में कोई भूखा नहीं सोता था।

 

और हर सुबह पूरे गाँव में एक ही आवाज गूँजती—

 

“हर हर महादेव!”

 

 

माता पार्वती ने समझी भक्ति की शक्ति

 

कैलाश लौटते समय माता पार्वती ने शिवजी से कहा,

 

“स्वामी, आज मैंने समझ लिया कि भक्त वास्तव में भगवान को कैसे अपने वश में कर लेता है।”

 

शिवजी मुस्कुराए।

 

“देवी, भक्त भगवान को आदेश देकर अपने वश में नहीं करता। वह अपने प्रेम, विश्वास और समर्पण से भगवान को अपना बना लेता है।”

 

माता पार्वती ने कहा,

 

“अर्थात सच्ची भक्ति में माँग नहीं, समर्पण होता है।”

 

शिवजी बोले,

 

“हाँ देवी। जब भक्त कहता है—‘प्रभु, मुझे यह दे दो’, तब वह भगवान से कुछ माँगता है। लेकिन जब वह कहता है—‘प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मुझे अपने चरणों में बनाए रखना’, तब भगवान स्वयं उसके जीवन की जिम्मेदारी उठा लेते हैं।”

 

 

कहानी की सबसे बड़ी सीख

 

हम सभी के जीवन में कठिन समय आता है।

 

कभी धन की समस्या होती है।

 

कभी परिवार की समस्या।

 

कभी असफलता मिलती है।

 

कभी लोग हमारा साथ छोड़ देते हैं।

 

ऐसे समय में मनुष्य सबसे पहले अपने विश्वास को खो देता है।

 

लेकिन भगवान शिव की भक्ति हमें यही सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, विश्वास मत छोड़ो।

 

शिवदास के पास धन नहीं था, लेकिन उसके पास विश्वास था।

 

उसके पास महल नहीं था, लेकिन उसके हृदय में महादेव थे।

 

उसके पास भगवान को चढ़ाने के लिए सोना नहीं था, लेकिन उसके पास सच्चे मन के बेलपत्र थे।

 

और अंत में स्वयं भगवान उसके पास चलकर आए।

 

इसलिए जीवन में जब सब रास्ते बंद दिखाई दें, तब एक बार आँखें बंद करके सच्चे मन से कहना—

 

“हे महादेव, मुझे रास्ता दिखाई नहीं दे रहा, लेकिन मुझे विश्वास है कि आप मेरे साथ हैं।”

 

हो सकता है भगवान आपकी समस्या उसी क्षण समाप्त न करें।

 

लेकिन वे आपको इतनी शक्ति अवश्य देंगे कि आप उस समस्या को पार कर सकें।

 

याद रखिए—

 

भक्ति का अर्थ यह नहीं कि भगवान हमारे जीवन में कभी दुख आने ही न दें।

 

 

जब दुख आए, तब भी हमारा विश्वास भगवान पर बना रहे।

 

क्योंकि महादेव उस भक्त का हाथ कभी नहीं छोड़ते, जो सच्चे मन से उनका हाथ थाम लेता है।

 

और यही कारण है कि संसार उन्हें केवल भगवान नहीं कहता—

 

उन्हें “भोलेनाथ” कहता है।

 

क्योंकि वे अपने भक्त की छोटी-सी पुकार भी सुन लेते हैं।

 

वे आँसुओं की भाषा समझते हैं।

 

वे दिखावा नहीं देखते, हृदय देखते हैं।

 

उन्हें महंगे फूल नहीं चाहिए।

 

उन्हें चाहिए केवल सच्ची श्रद्धा।

 

उन्हें धन नहीं चाहिए।

 

उन्हें चाहिए केवल समर्पण।

 

और जहाँ सच्ची भक्ति होती है, वहाँ भगवान को आने से कोई रोक नहीं सकता।

 

क्योंकि सच्चा भक्त भगवान को खोजता नहीं—

उसकी भक्ति भगवान को स्वयं उसके द्वार तक ले आती है।

 

हर हर महादेव।

ॐ नमः शिवाय।

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