आज मेरा बत्तीसवाँ जन्मदिन था।
कमरे में हल्की रोशनी थी। दीवार पर टँगी पुरानी घड़ी नौ बज रहे थे। मेज पर एक छोटा-सा केक रखा था—वही वाला, जो हर साल मैं खुद बाजार से लाता था। कोई गाना नहीं, कोई पार्टी नहीं, कोई भीड़ नहीं। सिर्फ मैं और मेरी चुप्पी।
पत्नी रिया रसोई में थी। उसने कहा था, “आज कुछ स्पेशल बनाऊँगी।” लेकिन उसकी आवाज में वह पुरानी गर्माहट नहीं थी। पिछले दो साल से हमारे बीच जैसे कोई काँच की दीवार खड़ी हो गई थी। बातें होती थीं, लेकिन दिल नहीं छूती थीं। बेटा आरव स्कूल से आने के बाद अपने कमरे में चला गया था। उसने सुबह सिर्फ इतना कहा था, “पापा, हैप्पी बर्थडे,” और चले गए थे।
मैं खिड़की के पास खड़ा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। अचानक दरवाजे पर खटखटाहट हुई।
रिया चिल्लाई, “कौन है?”
मैंने दरवाजा खोला।
बाहर एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था। उम्र साठ के करीब। हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा। चेहरा थका हुआ, लेकिन आँखों में कोई अजीब//सी चमक।
“आप… अनुज मिश्रा हैं न?” उसने पूछा।
“हाँ।”
उसने डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया। “यह आपके लिए है। जन्मदिन का तोहफा।”
मैंने हैरानी से देखा। “आप…?”
“मेरा नाम महेश है। मैं आपके पिताजी का पुराना दोस्त था। उन्होंने यह आपको देने को कहा था… बहुत पहले।”
पिताजी।
वह शब्द सुनते ही मेरा गला सूख गया। पिताजी को गए हुए ग्यारह साल हो चुके थे। अचानक दिल का दौरा। कोई चेतावनी नहीं, कोई अलविदा नहीं। बस एक सुबह अखबार पढ़ते-पढ़ते चले गए थे।
मैंने डिब्बा लिया। महेश जी मुस्कुराए और बिना और कुछ कहे चले गए। बारिश में उनकी छाया गायब हो गई।
रिया पास आकर बोली, “कौन था?”
“पिताजी का कोई पुराना जानने वाला… तोहफा दे गया।”
मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक पुरानी डायरी थी। काली कवर, कोनों से घिसी हुई। पहली पृष्ठ पर पिताजी का हाथ—
*“अनुज के लिए।
जब तुम तैयार हो, तब खोलना।
—पापा”*
मैंने डायरी बंद कर दी। अचानक कमरा बहुत छोटा लगने लगा।
रिया ने पूछा, “क्या है?”
“कुछ नहीं। बाद में देखूँगा।”
रात के खाने में सब चुप थे। केक काटा गया। आरव ने जल्दी-जल्दी अपना पीस खाया और कमरे में चला गया। रिया ने बर्तन धोए। मैं डायरी को टेबल पर रखे देखता रहा।
बारह बजने वाले थे। मैंने डायरी खोली।
पहला पन्ना—
*“बेटे, आज तुम्हारा ग्यारहवाँ जन्मदिन है। तुम सो रहे हो। मैं यह लिख रहा हूँ क्योंकि कुछ बातें कहनी हैं जो मुँह से नहीं कह पाता।”*
आगे के पन्ने साल-दर-साल भरे हुए थे। हर जन्मदिन पर एक चिट्ठी।
*बारहवाँ जन्मदिन…*
*पंद्रहवाँ…*
*अठारहवाँ…*
*जब तुम कॉलेज गए…*
*जब तुम्हारी माँ बीमार पड़ीं…*
*जब तुमने नौकरी छोड़ दी थी और मैंने डांटा था…*
और फिर आखिरी चिट्ठी। तारीख वही थी जब पिताजी का देहांत हुआ था—एक दिन पहले की।
*“बेटे,
अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो शायद मैं नहीं हूँ।
मुझे माफ करना।
मैंने तुम्हें बहुत डांटा। बहुत सख्ती की। तुम्हें लगता होगा कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता था।
सच यह है कि मैं डरता था।
डरता था कि तुम मेरी तरह मेहनत में खो जाओगे। डरता था कि दुनिया तुम्हें तोड़ देगी।
मैंने प्यार को डांट में छुपा लिया।
आज तुम्हारा इक्कीसवाँ जन्मदिन है। मैं चाहता था कि खुद आकर कहूँ… लेकिन हिम्मत नहीं हो रही।
इस डायरी को मैंने महेश के पास रख दिया है। उसने वादा किया है कि जब समय आएगा, तुम्हें दे देगा।
अनुज,
तुम काफी हो।
तुम्हारी कमी नहीं है।
और हाँ… मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।
हर जन्मदिन पर।
—पापा”*
डायरी हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गई।
मैं रो नहीं पाया। बस बैठ गया। सालों का गुबार एक साथ उठ आया। पिताजी की सख्ती, उनकी चुप्पी, उनकी वो आँखें जो कभी नहीं मुस्कुराती थीं… सब एक-एक करके याद आने लगा।
रिया कमरे में आई। उसने डायरी उठाई और चुपचाप पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भी भर गईं। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“यह तोहफा अनचाहा था ना?” उसने धीरे से कहा।
मैंने सिर हिलाया। “हाँ। मैं नहीं चाहता था कि वे वापस आएँ। न यादों में, न शब्दों में।”
रिया बोली, “लेकिन कभी-कभी अनचाहा तोहफा ही सबसे जरूरी होता है।”
मैंने डायरी फिर उठाई। आखिरी पन्ने पर एक छोटी-सी नोट थी—
*“अगर एक दिन तुम्हारा बेटा तुमसे नाराज हो, तो उसे यह डायरी दिखाना।
ताकि वह समझे कि पिता भी इंसान होते हैं।”*
मैं उठकर आरव के कमरे में गया। वह सो रहा था। मैंने उसके माथे पर हाथ रखा। फिर वापस आकर रिया के पास बैठ गया।
“रिया… क्या हम बात कर सकते हैं? सच-सच?”
उसने सिर हिलाया।
रात भर हमने बात की। सालों से जमा शिकायतें, अनकहे शब्द, थकान, डर… सब निकले। कोई चीख-पुकार नहीं हुई। बस दो थके हुए लोग एक-दूसरे को सुन रहे थे।
सुबह हुई। बारिश रुक चुकी थी।
मैंने केक का बचा हुआ टुकड़ा आरव को दिया। उसने हैरानी से देखा।
“पापा, आप रोए हैं?”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ। लेकिन अच्छे आँसू थे।”
फिर मैंने उसे डायरी दिखाई।
आरव ने धीरे-धीरे पढ़ा। पढ़कर बोला, “दादाजी… अच्छे थे ना?”
“हाँ बेटे। बहुत अच्छे थे। बस बता नहीं पाए।”
उस जन्मदिन के बाद घर की हवा बदल गई। पूरी तरह नहीं, लेकिन काफी हद तक। रिया फिर से हँसने लगी। आरव मेरे साथ बैठकर बात करने लगा। और मैं… हर साल उस डायरी को खोलता रहा।
अब जब भी कोई पूछता है कि उस जन्मदिन पर सबसे अच्छा तोहफा क्या मिला, तो मैं कहता हूँ।
“एक अनचाहा तोहफा।
जो मैंने कभी माँगा नहीं था।
लेकिन जिसने मुझे वह सब लौटा दिया जो मैंने खो दिया था
अपने पिता का प्यार,
अपने घर की गर्माहट,
और खुद को माफ करने की हिम्मत।”
कभी-कभी जिंदगी अनचाही चीजें देती है।
और वही अनचाही चीजें… सबसे ज्यादा बदल देती हैं।

NSW अनुभवी लेखक -🥇


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