ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मैंने सोचा था कि यह सफर भी बाकी सफरों की तरह ही बीत जाएगा। दिल्ली से वाराणसी जाने वाली वह रात की ट्रेन थी। डिब्बे में भीड़ थी, लेकिन मेरी सीट खिड़की वाली होने की वजह से थोड़ी राहत थी। मैं अपने काम के सिलसिले में जा रहा था। मन भारी था। घर में माँ बीमार थीं, पत्नी से अनबन चल रही थी और ऑफिस का दबाव सिर पर सवार था। जिंदगी जैसे रुक-रुककर साँस ले रही थी।
रात के करीब ग्यारह बजे ट्रेन रूकी। एक छोटा-सा स्टेशन था। कुछ यात्री उतरे, कुछ चढ़े। तभी मेरी बगल वाली सीट पर एक छोटी-सी बच्ची बैठ गई। उम्र शायद आठ-नौ साल की होगी। फटी हुई फ्रॉक पहनी हुई, बाल बिखरे हुए, पैरों में कोई चप्पल नहीं। उसके हाथ में एक फटी हुई पॉलीथीन की थैली थी, जिसमें दो-तीन सूखे रोटियाँ और एक प्लास्टिक की पानी की बोतल थी।
वह चुपचाप बैठ गई। मैंने उसकी ओर देखा तो उसने भी मेरी ओर देखा। आँखें बड़ी-बड़ी थीं, लेकिन उनमें कोई बचपन वाली चमक नहीं थी। बस एक अजीब-सी थकान और कुछ छिपा हुआ दर्द।
थोड़ी देर बाद ट्रेन चल पड़ी। बच्ची ने अपनी थैली खोली और एक रोटी निकालकर खाने लगी। धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत कीमती चीज खा रहा हो। मैंने सोचा कि शायद भूखी है। मैंने अपने बैग से बिस्किट का पैकेट निकाला और उसकी ओर बढ़ाया।
“लो, खा लो।”
वह झिझकी। फिर धीरे से बोली, “नहीं भैया… माँ ने कहा है पराया खाना नहीं खाना।”
आवाज बहुत हल्की थी, लेकिन साफ। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “यह पराया नहीं है। तुम खा लो। मैं भी खाऊँगा।”
उसने एक बिस्किट लिया और बहुत धीरे-धीरे खाने लगी। फिर अचानक उसने पूछा, “भैया, आप कहाँ जा रहे हो?”
“वाराणसी।”
“मैं भी… वाराणसी जा रही हूँ।”
“अकेली?” मैंने हैरानी से पूछा।
वह चुप रही। फिर बोली, “माँ स्टेशन पर उतर गई थीं… दवा लेने। कहा था कि जल्दी आ जाएँगी। लेकिन ट्रेन चल पड़ी… और माँ नहीं आईं।”
मेरा दिल एक पल के लिए रुक-सा गया। “तो तुम अकेली हो?”
उसने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन माँ आ जाएँगी। वे वादा करके गई थीं।”
मैंने उसकी ओर देखा। बच्ची की आँखों में आँसू नहीं थे। बस एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वह बहुत दिनों से इस इंतजार की आदी हो चुकी हो।
मैंने धीरे से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
“गुड़िया।”
“गुड़िया… तुम्हारी माँ कहाँ काम करती हैं?”
वह थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “माँ बीमार हैं। बहुत दिनों से। डॉक्टर साहब ने कहा था कि शहर में इलाज कराना पड़ेगा। इसलिए हम गाँव से चले। पापा… पापा तो पहले ही चले गए थे।”
“पापा कहाँ गए?”
गुड़िया ने रोटी का एक छोटा टुकड़ा तोड़ा और बोली, “स्वर्ग। माँ कहती हैं कि पापा स्वर्ग में हैं। वहाँ से हमें देख रहे हैं। इसलिए रोना नहीं चाहिए।”
मेरी साँस अटक गई। आठ साल की बच्ची इतनी सहजता से अपने पिता की मौत की बात कर रही थी, जैसे कोई रोजमर्रा की बात हो।
ट्रेन की आवाज के बीच उसकी आवाज साफ सुनाई दे रही थी। “भैया, क्या स्वर्ग में भी ट्रेन जाती है? माँ कहती हैं कि पापा हमें लेने आएंगे एक दिन। लेकिन मैं सोचती हूँ कि अगर पापा आ गए तो माँ को कौन संभालेगा? माँ तो बहुत कमजोर हो गई हैं। खड़े भी नहीं हो पातीं ठीक से।”
मैं कुछ बोल नहीं पाया। गला सूख गया था।
गुड़िया आगे बोली, “कल रात माँ ने मुझे गले से लगाया था। कहा था—गुड़िया, अगर कभी मैं खो जाऊँ तो तुम घबराना मत। कोई अच्छा आदमी मिल जाएगा जो तुम्हें पहुँचा देगा। और तुम हँसते रहना। क्योंकि पापा को हँसते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं।”
उसने अपनी थैली से एक पुरानी तस्वीर निकाली। फटी हुई, मुड़ी हुई। उसमें एक पतला-दुबला आदमी था, गोद में छोटी गुड़िया और बगल में एक औरत। सब मुस्कुरा रहे थे।
“यह हमारे घर की है। जब पापा थे।” उसने तस्वीर दिखाते हुए कहा। “अब घर भी नहीं रहा। किराया नहीं दे पाए तो मालिक ने निकाल दिया। माँ ने कहा—चले चलो, कोई जगह मिल जाएगी।”
मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था। हर शब्द दिल के किसी कोने को छू रहा था। मैंने अपनी जिंदगी के झमेलों को याद किया—माँ की बीमारी, पत्नी से अनबन, ऑफिस का तनाव—और अचानक सब कुछ बहुत छोटा लगने लगा।
गुड़िया ने अचानक मेरी ओर देखा। “भैया, आप उदास क्यों हो?”
मैंने मुस्कुराने की कोशिश की। “नहीं… कुछ नहीं।”
“माँ कहती हैं कि उदास रहने से दिल कमजोर हो जाता है। और कमजोर दिल वाला इंसान जल्दी थक जाता है। आपको थकना नहीं चाहिए।”
उसकी बात सुनकर मेरी आँखें भर आईं। मैंने चेहरा खिड़की की तरफ कर लिया ताकि वह न देख सके। लेकिन आँसू रुक नहीं रहे थे।
रात गहराने लगी। गुड़िया धीरे-धीरे मेरी बाँह पर सर रखकर सो गई। उसकी साँसें हल्की-हल्की चल रही थीं। मैं उसे देखता रहा। उस छोटी-सी जिंदगी में इतना बोझ, इतनी समझ, इतनी मजबूरी… और फिर भी वह सो रही थी, जैसे उसे पूरा भरोसा हो कि सुबह माँ आ ही जाएँगी।
सुबह हुई। ट्रेन वाराणसी पहुँचने वाली थी। मैंने गुड़िया को जगाया। उसने आँखें रगड़ते हुए पूछा, “माँ आईं?”
मैंने सिर हिलाया। “अभी नहीं… लेकिन हम ढूँढ़ेंगे।”
स्टेशन पर मैंने टीटीई को बताया। पुलिस को सूचना दी गई। घोषणा हुई। थोड़ी देर बाद एक कमजोर-सी औरत दौड़ती हुई आई। साड़ी फटी हुई, चेहरा पीला, साँसें फूल रही थीं। उसने गुड़िया को देखते ही गले लगा लिया और रोने लगी।
“मैं दवा लेने गई थी… लाइन लग गई… ट्रेन छूट गई… मैंने सोचा तू खो गई…”
गुड़िया ने माँ का चेहरा पोंछते हुए कहा, “माँ, मैं नहीं रोई। पापा को हँसते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं ना?”
माँ और जोर से रो पड़ी।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरा गला भर आया। मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और माँ के हाथ में थमा दिए। उन्होंने मना किया, लेकिन मैंने कहा, “यह पराया नहीं है। गुड़िया की तरह ही अपना है।”
ट्रेन फिर खुलने वाली थी। मैं डिब्बे में चढ़ गया। खिड़की से देखा—गुड़िया हाथ हिला रही थी। माँ भी।
ट्रेन चल पड़ी। मैंने खिड़की से बाहर देखा तो आँखों से आँसू बह रहे थे। दिल भारी था, लेकिन अजीब तरह से हल्का भी।
उस छोटी-सी बच्ची ने कुछ ऐसा कह दिया था जो मैं सालों से सुनना चाहता था, लेकिन किसी ने नहीं कहा था।
कि जिंदगी कितनी भी कठिन हो, हँसते रहना चाहिए।
कि वादा निभाना चाहिए।
कि कभी-कभी सबसे छोटे लोग सबसे बड़े सबक सिखा देते हैं।
उस दिन के बाद जब भी मैं उदास होता, गुड़िया की आवाज कानों में गूंज जाती
“आपको थकना नहीं चाहिए।”
और मेरा दिल… सच में रो उठता।
लेकिन इस बार आँसू दर्द के नहीं, शुक्र के होते।
क्योंकि सफर में मिली उस बच्ची ने मुझे याद दिला दिया था कि जिंदगी की असली ताकत बड़े-बड़े लोगों में नहीं, छोटी-छोटी बातों और छोटे-छोटे दिलों में छिपी होती है।

NSW अनुभवी लेखक -🥇


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