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30 साल पुराने प्रेम पत्र

पढ़ने का समय : 6 मिनट

30 साल पुराने प्रेम पत्र

सुबह के पाँच बजे थे। पूरे गाँव में अभी सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन एक बूढ़ा आदमी अपनी पुरानी साइकिल पर चमड़े का घिसा हुआ डाक का बैग टाँगे धीरे-धीरे कच्चे रास्ते पर चला जा रहा था। सफेद बाल, झुकी हुई कमर और काँपते हुए हाथ… फिर भी उसकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी।

उस बूढ़े डाकिए का नाम रामनाथ था।

सरकारी नौकरी से उसे रिटायर हुए पूरे तीस साल हो चुके थे। गाँव में अब नया डाकघर बन चुका था और नए डाकिए भी आ गए थे। लेकिन रामनाथ आज भी हर सुबह अपने बैग में कुछ पुराने खत रखकर निकल पड़ता था।

गाँव वाले उसे देखकर कहते, “बाबा की उम्र हो गई है… अब इनका दिमाग पहले जैसा नहीं रहा।”

कोई हँसता, कोई तरस खाता।

लेकिन रामनाथ किसी की बात का जवाब नहीं देता। वह बस मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता।

एक दिन शहर से आई युवा पत्रकार रिया की नज़र उस पर पड़ी। उसे यह बात बहुत अजीब लगी कि एक रिटायर डाकिया रोज़ किसे चिट्ठियाँ बाँटता है।

अगले दिन वह चुपचाप रामनाथ के पीछे चल पड़ी।

रामनाथ पूरे गाँव में कई घरों के सामने रुकता, दरवाज़े को देखता, जेब से एक पुराना खत निकालता, उसे हाथ में लेकर कुछ पल खड़ा रहता और फिर वापस बैग में रखकर आगे बढ़ जाता।

रिया से रहा नहीं गया।

 

उसने पूछा, “बाबा, आप ये खत देते क्यों नहीं?”

रामनाथ ने धीमी मुस्कान के साथ कहा, “जिसके नाम हैं… वही लेने नहीं आया।”

रिया और भी उलझ गई।

“किसके नाम हैं?”

रामनाथ ने बैग को सीने से लगा लिया और बोले, “ये प्रेम पत्र हैं… पूरे तीस साल पुराने।”

रिया हैरान रह गई।

रामनाथ उसे अपने छोटे-से घर ले गए।

घर के एक कोने में लकड़ी का पुराना संदूक रखा था। उसे खोलते ही उसमें सैकड़ों पुराने लिफाफे दिखाई दिए। हर खत पर एक ही नाम लिखा था—

‘सावित्री के नाम।’

भेजने वाले का नाम था—

‘मोहन।’

रिया ने पूछा, “ये इतने सालों से क्यों पड़े हैं?”

रामनाथ की आँखें भर आईं

उन्होंने कहना शुरू किया—

“आज से तीस साल पहले मोहन और सावित्री एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। लेकिन दोनों अलग-अलग जाति के थे। उस समय गाँव में ऐसी शादी की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।”

“दोनों ने भागने का फैसला किया था। लेकिन भागने से एक दिन पहले मोहन शहर काम करने चला गया। उसने सावित्री को हर हफ्ते एक प्रेम पत्र भेजा।”

“लेकिन…”

रामनाथ की आवाज़ भर्रा गई।

“वे पत्र कभी सावित्री तक पहुँचे ही नहीं।”

रिया ने पूछा, “क्यों?”

रामनाथ ने सिर झुका लिया।

“क्योंकि गलती मेरी थी।”

उन्होंने बताया कि उन्हीं दिनों उनके घर में उनकी पत्नी बहुत बीमार थी। अस्पताल, दवाइयों और भागदौड़ में वे कई चिट्ठियाँ डाकघर के एक पुराने बक्से में रखना भूल गए।

जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

सावित्री की शादी कहीं और कर दी गई थी।

 

और मोहन…

उसे लगा कि सावित्री ने उसके किसी भी खत का जवाब नहीं दिया, इसलिए उसने भी समझ लिया कि वह उसे भूल चुकी है।

दोनों हमेशा के लिए अलग हो गए।

 

रामनाथ की आँखों से आँसू बहने लगे।

“अगर मैंने उस समय अपना काम ईमानदारी से किया होता… तो शायद दो ज़िंदगियाँ बर्बाद न होतीं।”

रिया ने धीरे से पूछा, “फिर अब?”

 

रामनाथ बोले, “अब मैं रोज़ निकलता हूँ… शायद किसी दिन वे दोनों मिल जाएँ और मैं अपने हाथों से ये खत उन्हें दे सकूँ।”

रिया पूरी रात सो नहीं सकी।

अगले दिन उसने इस कहानी की तलाश शुरू कर दी।

कई दिनों की खोज के बाद उसे पता चला कि सावित्री अभी ज़िंदा थी। वह अपने बेटे के साथ दूसरे जिले के एक छोटे-से कस्बे में रहती थी।

रिया तुरंत रामनाथ को वहाँ ले गई।दरवाज़ा खुला।

सामने लगभग सत्तर साल की एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।

रामनाथ ने काँपते हाथों से पहला खत आगे ढ़ाया।

“बेटी… ये तुम्हारे लिए तीस साल पहले आया था।”

सावित्री ने लिफाफे को देखा।

उसके हाथ काँपने लगे।

उसने जैसे ही मोहन का नाम पढ़ा, उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

वह वहीं चौखट पर बैठ गई।

धीरे-धीरे उसने पहला खत खोला।

उसमें लिखा था”सावित्री, मैं अगले महीने लौट आऊँगा। बस मेरा इंतज़ार करना। अगर तुम्हारा जवाब नहीं आया तो भी मैं यकीन करूँगा कि तुम मजबूर होगी, बेवफा नहीं…”

सावित्री फूट-फूटकर रोने लगी।

उसने कहा, “मैंने तो हर दिन डाकिए का इंतज़ार किया था… लेकिन कोई खत ही नहीं आया।”

रामनाथ हाथ जोड़कर रो पड़े।

“मुझे माफ़ कर दो बेटी।”सावित्री ने आँसू पोंछे और कहा,

“गलती से बिछड़े लोग नफ़रत नहीं रखते बाबा। बस किस्मत से हार जाते हैं।”लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी।

रिया ने मोहन की तलाश भी शुरू कर दी।

करीब एक हफ्ते बाद पता चला कि मोहन भी ज़िंदा था। वह शहर में एक पुराने पुस्तकालय में काम करता था और उसने कभी शादी नहीं की।

जब उसे सावित्री के बारे में बताया गया, तो उसकी आँखें नम हो गईं।

कुछ दिनों बाद दोनों की मुलाकात तय हुई।

गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे…

जहाँ वे कभी मिला करते थे।

मोहन धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।सावित्री पहले से बैठी थी।

तीस साल बाद दोनों एक-दूसरे के सामने थे।

कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर मोहन ने काँपती आवाज़ में पूछा,

“अगर तुम्हें मेरे खत मिल जाते… तो क्या तुम मेरा इंतज़ार करती?”

सावित्री मुस्कुराई।

“मैंने तो बिना खत के भी कई साल तुम्हारा इंतज़ार किया था।”

दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।

रामनाथ थोड़ी दूर खड़े यह सब देख रहे थे।

उन्होंने अपने बैग से बाकी सारे प्रेम पत्र निकाले और मोहन के हाथों में रख दिए।

“आज मेरा तीस साल पुराना कर्ज उतर गया।”

मोहन ने एक-एक करके सभी खत सावित्री को पढ़कर सुनाए।

 

हर खत में प्यार था, भरोसा था और एक साथ ज़िंदगी बिताने का सपना था।

दोनों जानते थे कि बीता हुआ समय वापस नहीं आ सकता।

लेकिन उन्हें यह सुकून मिल गया कि उनमें से किसी ने भी कभी दूसरे से बेवफाई नहीं की थी।

कुछ महीनों बाद रामनाथ बहुत बीमार पड़ गए।

मोहन और सावित्री रोज़ उनसे मिलने आते।

एक शाम रामनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा,

“अब मुझे किसी और पते पर भी एक चिट्ठी पहुँचानी है… ऊपर वाले के नाम।”

तीनों हँस पड़े।

उसी रात रामनाथ हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गए।

उनकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ।

उनकी पुरानी साइकिल, चमड़े का बैग और खाली डाक का थैला भी उनके साथ रखा गया।

गाँव के लोगों ने पहली बार समझा कि डाकिया सिर्फ़ चिट्ठियाँ नहीं पहुँचाता…

वह लोगों की उम्मीदें, रिश्ते और अधूरी मोहब्बतें भी अपने कंधों पर ढोता है।

रामनाथ की याद में गाँव के डाकघर के बाहर एक छोटी-सी पट्टिका लगाई गई, जिस पर लिखा था

कुछ चिट्ठियाँ देर से पहुँचीं, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा प्यार समय से नहीं, भरोसे से ज़िंदा रहता है।

 

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