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आखिरी मुलाकात का वादा

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

वर्ष 1998 की एक ठंडी दिसंबर की शाम थी। लखनऊ के पुराने मोहल्ले में, नीम के पेड़ के नीचे बैठे दो दोस्त चुपचाप आसमान देख रहे थे। एक था अरुण, बाईस साल का, पतला-दुबला, आँखों में सपनों की चमक। दूसरा था विकास, उसी उम्र का, थोड़ा मोटा, लेकिन दिल का इतना बड़ा कि दुनिया समा जाए। दोनों बचपन से साथ थे—स्कूल, कॉलेज, गली के खेल, बारिश में भीगना, सब कुछ साझा।

 

उस शाम विकास ने कहा, “अरुण, मैं दिल्ली जा रहा हूँ। नौकरी मिल गई है। पता नहीं कब लौटूँ।”

 

अरुण की आँखें गीली हो गईं। उसने कहा, “फिर हम कभी नहीं मिलेंगे?”

 

विकास ने उसकी कंधे पर हाथ रखा, “मिलेंगे। वादा है। चाहे कितने भी साल बीत जाएँ, एक दिन हम यहीं, इसी नीम के नीचे मिलेंगे। आखिरी मुलाकात का वादा। अगर मैं नहीं आया, तो तू आ जाना। और अगर तू नहीं आया, तो मैं।”

 

दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और मुस्कुरा दिए। उस वादे को उन्होंने बहुत हल्के में लिया था, जैसे बच्चे कोई खेल खेल रहे हों। लेकिन समय ने उसे भारी बना दिया।

 

विकास दिल्ली चला गया। अरुण लखनऊ में ही रह गया। पहले तो पत्र आते रहे, फिर फोन के जमाने में कभी-कभार बात होती। फिर दोनों की शादी हो गई। विकास की एक बेटी हुई, अरुण का एक बेटा। जिंदगी ने दोनों को अपने कामों में उलझा लिया। साल बीतते गए। 2005, 2010, 2015… वादे की बात धीरे-धीरे यादों के कोने में सिमटती चली गई।

 

फिर 2020 आया। कोरोना की लहर। दुनिया थम गई। अरुण ने विकास को फोन किया। आवाज कमजोर थी।

 

“यार, याद है हमारा वादा?” अरुण ने पूछा।

 

विकास हँसा, “कौन सा? नीम वाले?”

 

“हाँ। अब कब मिलेंगे?”

 

“जल्दी। जैसे ही ये सब खत्म हो।”

 

लेकिन खत्म होने में समय लगा। फिर विकास का ट्रांसफर बेंगलुरु हो गया। अरुण की माँ बीमार पड़ गईं। दोनों फिर बिछड़ गए।

 

वर्ष 2024। अरुण अब अड़तालीस का हो चुका था। बाल सफेद होने लगे थे। उसकी पत्नी रेखा ने एक दिन कहा, “तुम हमेशा विकास की बात करते हो। मिल क्यों नहीं लेते?”

 

अरुण चुप रहा। वह जानता था कि विकास की जिंदगी बदल चुकी है। उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था कैंसर से। बेटी अमेरिका में पढ़ रही थी। विकास अकेला रह गया था।

 

एक दिन अरुण को विकास का मैसेज आया—  

“अरुण, याद है हमारा वादा? नीम के नीचे। इस साल 15 दिसंबर को। आखिरी मुलाकात। मैं आऊँगा।”

 

अरुण का दिल जोर से धड़का। उसने तुरंत जवाब दिया—  

“मैं भी आऊँगा। वादा निभाऊँगा।”

 

15 दिसंबर की सुबह अरुण ने ट्रेन पकड़ी। लखनऊ स्टेशन पर भीड़ थी, लेकिन उसका मन शांत था। उसने वही पुरानी गली याद की, जहाँ दोनों बच्चे दौड़ते थे। नीम का पेड़ अब भी वहाँ था—बड़ा, घना, जैसे समय को चुनौती दे रहा हो।

 

शाम के पाँच बजे अरुण नीम के नीचे पहुँचा। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। कोई नहीं था। उसने बेंच पर बैठकर इंतजार किया।

 

छह बजे हो गए। सात। अरुण की साँसें तेज हो गईं। क्या विकास नहीं आएगा? क्या वादा टूट जाएगा?

 

अचानक पीछे से आवाज आई—  

“देर हो गई यार।”

 

अरुण मुड़ा। विकास खड़ा था। बाल पूरी तरह सफेद, चेहरा दुबला, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर गले मिल गए। सालों का सन्नाटा टूट गया।

 

“कितना बदल गया तू,” अरुण ने कहा।

 

“तू भी,” विकास मुस्कुराया। “लेकिन नीम वही है।”

 

दोनों बेंच पर बैठ गए। बातें होने लगीं—पुराने दिनों की, स्कूल के मजाक की, कॉलेज की रातों की, पहली नौकरी की। फिर धीरे-धीरे बातें मौन में बदल गईं। दोनों चुपचाप आसमान देख रहे थे, जैसे 1998 में देखा था।

 

विकास ने कहा, “अरुण, मुझे कुछ बताना है।”

 

“क्या?”

 

“मुझे कैंसर है। अंतिम स्टेज। डॉक्टर कहते हैं, तीन-चार महीने।”

 

अरुण की दुनिया थम गई। उसने विकास की ओर देखा। आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर शांति।

 

“इसलिए तू आया?” अरुण की आवाज काँप गई।

 

“हाँ। वादा निभाना था। आखिरी मुलाकात का। मैं नहीं चाहता था कि तू अकेला बैठे और इंतजार करे।”

 

अरुण रो पड़ा। उसने विकास का हाथ पकड़ लिया। “तू मुझे क्यों नहीं बताया पहले?”

 

“क्या फर्क पड़ता? जिंदगी तो वैसे भी चल रही थी। लेकिन ये वादा… ये अधूरा नहीं रहना चाहिए था।”

 

रात गहराने लगी। दोनों ने पुरानी बातें दोहराईं। विकास ने अपनी बेटी की तस्वीर दिखाई। अरुण ने अपने बेटे की। दोनों ने हँसी, रोए, चुप रहे।

 

विकास ने कहा, “अगर मैं चला गया, तो तू हर साल 15 दिसंबर को यहाँ आना। नीम के नीचे बैठना। और याद करना कि एक बार हमने वादा किया था।”

 

अरुण ने सिर हिलाया। “मैं आऊँगा। हमेशा।”

 

रात के ग्यारह बजे विकास उठा। “अब जाना होगा। ट्रेन है।”

 

अरुण उसके साथ स्टेशन तक गया। प्लेटफॉर्म पर दोनों फिर गले मिले।

 

“अलविदा नहीं,” विकास ने कहा। “बस… अगली मुलाकात तक।”

 

“अगली मुलाकात तक,” अरुण ने दोहराया।

 

ट्रेन चल दी। अरुण प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा जब तक ट्रेन की रोशनी गायब नहीं हो गई।

 

तीन महीने बाद, मार्च 2025 में, अरुण को फोन आया। विकास की बेटी की आवाज थी। “पापा चले गए… पिछले हफ्ते।”

 

अरुण चुप रहा। आँसू रुक नहीं रहे थे। उसने फोन रखा और सीधे उस गली में पहुँच गया। नीम के नीचे बैठ गया। ठंडी हवा चल रही थी। पत्तियाँ हिल रही थीं।

 

उसने फुसफुसाया, “वादा निभ गया यार। तू आया। मैं भी आया।”

 

उस दिन के बाद अरुण हर साल 15 दिसंबर को वहाँ आता। कभी अकेला, कभी पत्नी के साथ, कभी बेटे के साथ। वह बैठता, पुरानी बातें याद करता, और मुस्कुराता।

 

एक साल, 2028 में, जब अरुण वहाँ बैठा था, तो एक युवती आई। विकास की बेटी। उसने कहा, “पापा ने कहा था कि अगर मैं कभी लखनऊ आऊँ, तो नीम के नीचे जरूर बैठूँ। और अंकल से मिलूँ।”

 

दोनों ने बात की। अरुण ने उसे बचपन की कहानियाँ सुनाईं। युवती ने कहा, “पापा हमेशा कहते थे कि जिंदगी के सबसे बड़े वादे छोटे लगते हैं, लेकिन वही सबसे भारी होते हैं।”

 

अरुण ने सिर हिलाया। “सही कहा उन्होंने।”

 

समय बीतता गया। अरुण बूढ़ा होता गया। उसके बाल और सफेद हो गए। शरीर कमजोर। लेकिन 15 दिसंबर का दिन वह कभी नहीं चूकता था।

 

वर्ष 2035। अरुण अब उनसठ का था। स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। डॉक्टर ने कहा था कि दिल कमजोर है। उस साल 15 दिसंबर को वह फिर नीम के नीचे पहुँचा। अकेला। बेंच पर बैठ गया। आँखें बंद कीं।

 

हवा में जैसे कोई आवाज आई—  

“देर हो गई यार।”

 

अरुण की आँखें खुल गईं। सामने कोई नहीं था। लेकिन उसे लगा जैसे विकास वहीं बैठा हो।

 

उसने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं यार। इस बार मैं समय पर आ गया हूँ।”

 

फिर वह लेट गया बेंच पर। आँखें बंद कीं। साँसें धीमी पड़ती गईं। नीम की पत्तियाँ हिलती रहीं। ठंडी हवा चलती रही।

 

अगली सुबह जब लोग आए, तो अरुण वहीं सोया मिला। चेहरे पर शांति थी, जैसे कोई पुराना वादा पूरा करके सुस्ता रहा हो।

 

लोगों ने कहा, “शायद दिल का दौरा पड़ा।”

 

लेकिन अरुण की पत्नी ने समझ लिया। उसने नीम के पेड़ को छुआ और फुसफुसाई, “वादा निभ गया। दोनों की आखिरी मुलाकात… हमेशा के लिए।”

 

उसके बाद भी हर साल 15 दिसंबर को लोग देखते कि नीम के नीचे कोई न कोई बैठता—कभी अरुण का बेटा, कभी विकास की बेटी, कभी उनके बच्चे। कोई कहता, “ये पेड़ वादा याद रखता है।”

 

और सच में, जब भी ठंडी हवा चलती और पत्तियाँ हिलतीं, लगता जैसे दो पुराने दोस्त अभी भी वहीं बैठे हों—हँस रहे हों, बात कर रहे हों, और एक अधूरा वादा बार-बार पूरा कर रहे हों।

 

क्योंकि कुछ वादे समय से बड़े होते हैं।  

कुछ मुलाकातें मौत से आगे भी चलती रहती हैं।  

और कुछ नीम के पेड़… हमेशा खड़े रहते हैं, गवाह बनकर।

 

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