वैद्यनाथ, जिसे देवघर, बाबा धाम भी कहा जाता है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह झारखंड में स्थित है।
यह शिव जी की पूजा का प्रमुख धाम है। सावन के महीने में लाखों लोग यहाँ आते हैं। कहा जाता है कि यहाँ माता सती का हृदय गिरा था। जब माता सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में गईं और वहाँ शिव जी का अपमान सहन नहीं कर सकीं, तब उन्होंने उसी अग्निकुंड में आत्मदाह कर लिया। जब भगवान शिव माता सती के शरीर को कंधे पर रखकर तांडव करने लगे, तब उनका हृदय यहाँ आकर गिरा। इसलिए यह 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
कहा जाता है कि जब रावण ने कठोर तपस्या कर अपने एक-एक सिर भगवान शिव को अर्पित किए और अंतिम सिर भी चढ़ाने वाले थे, तब भगवान शिव प्रकट हुए। रावण ने उनसे प्रार्थना की कि वे उसके साथ लंका चलें। शिव जी शिवलिंग के रूप में उसके साथ चलने को तैयार हो गए, लेकिन एक शर्त रखी कि जहाँ भी वह शिवलिंग को धरती पर रख देगा, वहीं वह स्थापित हो जाएगा।
देवताओं ने शिव जी को लंका जाने से रोकने के लिए झारखंड में रावण से छल कराया और शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। उसी स्थान पर माता सती का हृदय भी गिरा था। तभी से इस स्थान का नाम वैद्यनाथ धाम पड़ा।
इसी वैद्यनाथ मंदिर में सावन के महीने में लाखों भक्त बाबा के दर्शन करने और गंगाजल चढ़ाने के लिए आते हैं।
उन्हीं भक्तों में एक दंपति था—अमर और पूजा। वे पिछले 12 वर्षों से हर साल लगभग 200 किलोमीटर पैदल चलकर बाबा के दर्शन करने आते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने प्रण लिया था कि या तो बाबा उन्हें संतान देंगे, या फिर वे जीवन भर हर साल इसी तरह बाबा के दर्शन करने आते रहेंगे।
दोनों के पैरों में छाले पड़ जाते थे, फिर भी वे कभी नहीं रुकते थे। पूरे रास्ते वे कुछ खाते-पीते नहीं थे। बस एक ही नारा लगाते हुए चलते रहते—
“बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है।”
घर से निकलने से लेकर घर लौटने तक उनके होंठों पर बस यही जयकारा रहता था।
लोग कहते थे, “अगर कोई दे सकता है, तो केवल भोले बाबा ही दे सकते हैं। उनसे बड़ा दयालु कोई नहीं।”
समय बीतता गया। एक दिन पूजा की गोद भर गई। अमर और पूजा इसे भोले बाबा का आशीर्वाद मानने लगे। आखिर बाबा ने उनकी पुकार सुन ली थी।
इस वर्ष भी सावन का महीना आया, लेकिन इस बार पूजा आठ महीने की गर्भवती थी। डॉक्टर ने उसे कहीं भी यात्रा करने से मना किया था। घर के सभी लोग भी यही चाहते थे कि इस बार पूजा देवघर न जाए और अमर अकेले ही बाबा के दर्शन कर आए।
अमर ने भी प्यार से कहा,
“पूजा, इस बार तुम मत चलो। तुम्हारी और हमारे बच्चे की सुरक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।”
लेकिन पूजा मुस्कुराकर बोली,
“जब मेरे पास कुछ नहीं था, तब भी मैं बाबा के दर्शन के लिए जाती थी। आज जब भोले बाबा ने हमें यह अनमोल खुशी दी है, तो मैं उनके दर्शन किए बिना कैसे रह सकती हूँ? बारह साल तक उन्होंने हमारा साथ नहीं छोड़ा, तो अब मैं भी उनका साथ नहीं छोड़ूँगी। हम दोनों साथ चलेंगे।”
आखिरकार अमर उसकी जिद के आगे हार गया।
सावन के पहले सोमवार के दर्शन के लिए दोनों शुक्रवार को ही घर से निकल पड़े। रास्ते भर “बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है” का जयघोष करते हुए वे पैदल चलते रहे।
पूजा अपने पेट पर हाथ रखकर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रही थी और अमर हर पल उसका सहारा बना हुआ था। जब भी पूजा थक जाती, अमर उसे कुछ देर बैठाकर आराम कराता, लेकिन खुद कभी नहीं बैठता। उसकी बस एक ही चिंता थी कि पूजा सुरक्षित बाबा धाम पहुँच जाए।
आधे रास्ते तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन अचानक पूजा के पेट में तेज दर्द होने लगा। दर्द इतना बढ़ गया कि वह सड़क किनारे बैठ गई। अमर घबरा गया। आसपास चल रही कुछ महिला कांवरियों ने तुरंत दौड़कर पूजा को संभाला।
एक महिला ने पूजा की हालत देखकर कहा,
“लगता है बच्चे का जन्म होने वाला है। इसे तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।”
लेकिन पूजा दर्द से कराहते हुए बोली,
“नहीं… मैं बाबा के दर्शन किए बिना कहीं नहीं जाऊँगी। चाहे कुछ भी हो जाए।”
सबने उसे बहुत समझाया, पर वह नहीं मानी। आखिर सभी महिलाओं ने वहीं उसकी मदद करने का फैसला किया।
अमर बाहर बेचैन होकर इधर-उधर टहल रहा था। उसके हाथ जुड़े हुए थे और आँखों से आँसू बह रहे थे।
वह बार-बार बाबा से प्रार्थना कर रहा था,
“भोलेनाथ! आज तक कभी खाली हाथ नहीं लौटाया। मेरी पूजा और मेरे बच्चे की रक्षा करना।”
कुछ ही देर बाद बच्चे की किलकारी गूँज उठी।
महिलाएँ मुस्कुराते हुए बाहर आईं और बोलीं,
“बधाई हो… बेटा हुआ है।”
यह सुनते ही अमर की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उसने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और बोला,
“हर-हर महादेव! बाबा, आपने हमारी लाज रख ली।”
थोड़ी देर आराम करने के बाद पूजा ने अपने नवजात बेटे को गोद में उठाया और दोनों फिर बाबा धाम की ओर चल पड़े।
सोमवार की सुबह वे वैद्यनाथ धाम पहुँच गए। बाबा के दर्शन किए, गंगाजल अर्पित किया और अपने बेटे को भगवान शिव के चरणों में लिटा दिया।
दोनों ने हाथ जोड़कर कहा,
“भोले बाबा! यह आपका दिया हुआ प्रसाद है। इसकी रक्षा करना।”
उन्होंने अपने बेटे का नाम शिवशंकर रखा।
जिस बाबा से उन्होंने बारह वर्षों तक संतान माँगी थी, उसी बाबा ने उनकी झोली भर दी थी। उनकी श्रद्धा और विश्वास सफल हो गया।
लक्ष्मी कुमारी

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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