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दीवार के पार की आवाज़

पढ़ने का समय : 6 मिनट

कमरा छोटा था। दीवारें पतली। दिल्ली के उस पुराने मकान में किराए के कमरे एक-दूसरे से सटे हुए थे। अमन पिछले छह महीने से यहाँ रह रहा था। ऑफिस से थककर लौटता, रोशनी जलाता, खाना बनाता और फिर चुपचाप बिस्तर पर लेट जाता। शहर की आवाजें खिड़की से आती रहतीं हॉर्न, कुत्तों का भौंकना, कभी-कभी दूर कोई गाना। लेकिन सबसे ज्यादा साफ सुनाई देती थी दीवार के पार की आवाज़।

 

पहली बार उसने उस आवाज़ को रात के बारह बजे सुना। कोई धीरे-धीरे गुनगुना रहा था। स्वर महिलाओं का था मधुर, थोड़ा उदास। अमन ने कान दीवार पर लगाए। गाना अधूरा था, जैसे याद आ-आकर रुक रहा हो। अगली रात फिर वही आवाज़। इस बार कोई किताब के पन्ने पलटने की आहट भी थी।

 

अमन अकेला था। माता-पिता छोटे शहर में थे। दोस्त व्यस्त। प्रेमिका पिछले साल छोड़ गई थी। दीवार के पार की आवाज़ धीरे-धीरे उसकी रातों का हिस्सा बन गई। कभी हल्की खांसी, कभी पानी के गिलास रखने की आवाज़, कभी देर रात तक टाइपिंग की टिक-टिक। अमन ने अनुमान लगाया पड़ोस में कोई लड़की रहती है। शायद उसकी उम्र भी करीब-करीब वही।

 

एक रात अमन ने हिम्मत की। दीवार के पास जाकर धीरे से कहा, “आप रात को गाना गाती हैं न?”  

 

चुप्पी पसरी रही। फिर धीमी आवाज़ आई, “आपने सुन लिया?”  

 

अमन मुस्कुराया। “सुनाई देता है। आवाज़ अच्छी है।”  

 

“मैं सो नहीं पाती,” लड़की ने कहा। “गाना गा लेती हूँ तो नींद आ जाती है।”  

 

“मेरा नाम अमन है।”  

 

“मेरा… मीरा।”  

 

उस रात बात थोड़ी देर चली। मीरा ने बताया कि वह फ्रीलांस राइटर है। दिन में सोती है, रात में लिखती है। अमन ने अपना ऑफिस वाला जीवन बताया कोडिंग, मीटिंग्स, और घर लौटकर खालीपन। दीवार के आर-पार दो आवाजें मिल गईं।

 

अगले दिनों बातचीत बढ़ती गई। कभी मीरा कोई कविता सुनाती, कभी अमन अपनी ऑफिस की मजेदार घटनाएँ बताता। दोनों ने एक-दूसरे का चेहरा नहीं देखा था। दरवाजे अलग थे, गलियाँ अलग। बस एक पतली दीवार। कभी-कभी अमन दीवार पर हाथ रख देता और महसूस करता कि उस पार भी कोई हाथ रखे बैठा है।

 

एक रात मीरा की आवाज़ भारी थी। “आज लिख नहीं पा रही। यादें बहुत आ रही हैं।”  

 

अमन ने पूछा, “क्या हुआ?”  

 

मीरा चुप रही। फिर बोली, “दो साल पहले मेरी बहन चली गई। बीमारी से। घर में मैं अकेली रह गई। माँ-बाप भी नहीं रहे। अब सिर्फ शब्द बचते हैं… और दीवारें।”  

 

अमन ने कुछ नहीं कहा। बस सुना। फिर धीरे से बोला, “मैं भी अकेला हूँ। लेकिन आपकी आवाज़ सुनकर लगता है कोई है।”  

 

मीरा हल्के से हँसी। “आपकी आवाज़ भी वैसी ही लगती है जैसे कोई पुराना दोस्त।”  

 

बातचीत गहरी होती गई। दोनों ने अपने डर बताए। अमन ने बताया कि वह रिश्तों से डरता है, क्योंकि हर बार लोग चले जाते हैं। मीरा ने कहा कि वह लोगों से मिलने से कतराती है, क्योंकि चेहरे अक्सर झूठ बोलते हैं। आवाजें ज्यादा सच्ची होती हैं।

 

एक शाम अमन ने सुझाव दिया, “कल हम दोनों एक ही समय पर छत पर चलें? दूर से ही सही, एक-दूसरे को देख लें।”  

 

मीरा ने मना कर दिया। “नहीं। अभी नहीं। दीवार के पार रहना सुरक्षित लगता है। अगर हमने एक-दूसरे को देख लिया… तो शायद यह जादू टूट जाए।”  

 

अमन समझ गया। कुछ रिश्ते आवाजों में ही खिलते हैं। चेहरों की जरूरत नहीं पड़ती।

 

बारिश का मौसम आया। रातें लंबी हो गईं। दोनों घंटों बात करते। कभी चुप बैठते। अमन दीवार के पास तकिया लगाकर लेट जाता। मीरा भी वैसा ही करती होगी। एक रात अमन ने कहा, “अगर दीवार न होती तो…”  

 

मीरा ने जवाब काट दिया, “तो शायद हम कभी बात ही न करते। दीवार ने हमें जोड़ा है।”  

 

फिर एक दिन सब बदल गया। अमन ऑफिस से जल्दी लौटा। घर में अजीब सी चुप्पी थी। दीवार के पार कोई आवाज़ नहीं। रात भर उसने सुना कुछ नहीं। अगली रात भी वैसा ही। अमन बेचैन हो गया। उसने दीवार पर हाथ रखकर बुलाया, “मीरा? आप वहाँ हो?”  

 

कोई जवाब नहीं आया।  

 

तीसरी रात अमन ने पड़ोस के मकान मालिक से पूछा। मालिक ने बताया, “वहाँ वाली लड़की? दो दिन पहले चली गई। कमरा खाली कर दिया। कहाँ गई, पता नहीं।”  

 

अमन का दिल बैठ गया। दीवार अब सिर्फ दीवार रह गई थी। कोई गुनगुनाहट नहीं, कोई पन्ने पलटने की आवाज़ नहीं। कमरा पहले से ज्यादा खाली लगने लगा।  

 

अमन ने कई दिन तक रात में दीवार के पास बैठकर इंतजार किया। कभी-कभी खुद ही बोल पड़ता, “मीरा, तुम सुन रही हो?” लेकिन जवाब में सिर्फ अपनी ही आवाज़ की गूँज आती।  

 

एक रात उसे दीवार के पार हल्की सी खड़खड़ाहट सुनाई दी। दिल जोर से धड़का। उसने कान लगाए। कोई धीरे से बोल रहा था लेकिन आवाज़ मीरा की नहीं थी। नया किराएदार था। अजनबी।  

 

अमन ने कमरा बदलने का फैसला किया। पैकिंग करते समय दीवार के पास खड़ा रहा। आँखें भर आईं। उसने धीरे से कहा, “शुक्रिया मीरा। तुमने मेरी रातें आसान बना दीं।”  

 

नए घर में अमन ने जानबूझकर पतली दीवार वाला कमरा लिया। शायद कोई नई आवाज़ मिले। लेकिन कई हफ्ते बीत गए। कोई गुनगुनाहट नहीं आई।  

 

फिर एक दिन ऑफिस से लौटते हुए बारिश हो रही थी। बस स्टॉप पर खड़े-खड़े उसने सुना कोई धीरे से गुनगुना रहा है। वही पुराना स्वर। अमन ने मुड़कर देखा। एक लड़की छतरी के नीचे खड़ी थी। बाल गीले, चेहरा थका हुआ, लेकिन आँखें परिचित।  

 

अमन का गला सूख गया। “मीरा?”  

 

लड़की ने उसकी ओर देखा। कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से मुस्कुराई। “अमन… दीवार के पार वाले?”  

 

दोनों हँस पड़े। बारिश तेज हो रही थी। मीरा ने कहा, “मैं शहर छोड़कर चली गई थी। लेकिन वापस आ गई। लगा… आवाजें पीछे छूट गई हैं।”  

 

अमन ने पूछा, “अब दीवार के पार नहीं… आमने-सामने?”  

 

मीरा ने सिर हिलाया। “अब दीवार की जरूरत नहीं। लेकिन आवाज़… आवाज़ तो रहेगी।”  

 

वे साथ चलने लगे। बारिश में भीगते हुए। अब कोई दीवार नहीं थी। सिर्फ दो आवाजें थीं जो कभी दीवार के पार से शुरू हुई थीं और अब एक-दूसरे के बिल्कुल पास थीं।  

 

रात को अमन के नए कमरे में दोनों बैठे। खिड़की खुली थी। शहर की आवाजें आ रही थीं। मीरा ने धीरे से वही पुराना गाना गुनगुनाया। अमन ने आँखें बंद कर लीं। लगा जैसे दीवार फिर से मौजूद है लेकिन इस बार दीवार उनके बीच नहीं, बल्कि दुनिया और उन दोनों के बीच है। सुरक्षित। गर्म।  

 

मीरा ने अमन का हाथ थाम लिया। “कभी-कभी आवाजें चेहरों से ज्यादा सच होती हैं। लेकिन कुछ आवाजें… चेहरे मांग लेती हैं।”  

 

अमन ने जवाब दिया, “और कुछ चेहरे आवाजें मांग लेते हैं।”  

 

बाहर बारिश रुक गई थी। कमरे में दो दिलों की धड़कनें साफ सुनाई दे रही

थीं। दीवार के पार की आवाज़ अब दीवार के इस पार आ चुकी थी और कभी जाने वाली नहीं थी।

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