दिल्ली की शामें अक्सर अजीब होती हैं। कभी धूल भरी लू चलती है, कभी अचानक बादल घिर आते हैं और बरसने लगते हैं जैसे सालों का गम उतार रहे हों। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। अनन्या ऑफिस से निकली तो आसमान साफ था। बस स्टॉप तक पहुँचते-पहुँचते बादल इतने घने हो गए कि सूरज गायब हो गया। फिर पहली बूँद गिरी, दूसरी, और फिर झड़ी लग गई।
अनन्या के पास छतरी नहीं थी। सफेद कुर्ती और जींस भीगने लगीं। बाल चेहरे पर चिपक गए। वह भागती हुई एक पेड़ के नीचे रुकी, लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि पेड़ भी बेकार साबित हुआ। चारों तरफ लोग भाग रहे थे, ऑटो वाले दाम बढ़ा-बढ़ाकर चिल्ला रहे थे। अनन्या ने फोन निकाला बैटरी बीस प्रतिशत। कैब ऐप पर गाड़ियाँ नहीं दिख रहीं। वह बस खड़ी रही, ठंड से काँपती हुई।
तभी एक काली छतरी उसके सिर के ऊपर आ गई। अनन्या ने ऊपर देखा। एक लंबा युवक खड़ा था, सफेद शर्ट और काली पैंट में। बाल गीले थे, लेकिन मुस्कान साफ। “लगता है आपको छतरी की जरूरत है,” उसने कहा। आवाज में न कोई दिखावा था, न जल्दबाजी। बस एक साधारण सी पेशकश।
अनन्या ने झिझकते हुए कहा, “नहीं… मैं मैनेज कर लूँगी।”
“बारिश में भीगकर मैनेज करना कोई खास बात नहीं,” युवक हंसा। “मेरा नाम आरव है। और आप?”
“अनन्या।”
“अच्छा नाम है। चलिए, मैं आपको मेट्रो स्टेशन तक छोड़ दूँ। वहाँ से आप घर पहुँच जाएँगी।”
अनन्या ने सोचा—अजनबी है। लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि इंकार करना मुश्किल था। वह छतरी के नीचे आ गई। दोनों साथ चलने लगे। आरव ने छतरी थोड़ी अपनी तरफ झुका रखी थी ताकि अनन्या पूरी तरह सूखी रहे। अनन्या ने नोटिस किया कि उसकी अपनी बाईं बाजू पूरी तरह भीग चुकी है।
“आप ऑफिस से आ रहे हैं?” आरव ने पूछा।
“हाँ। डिजाइनर हूँ। आप?”
“आर्किटेक्ट। पुरानी इमारतों को बचाने वाला काम।”
अनन्या मुस्कुराई। “मतलब आप चीजों को टूटने नहीं देते।”
आरव ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया, “कोशिश तो करता हूँ। लेकिन कुछ चीजें टूटने के बाद ही सुंदर लगती हैं।”
बातचीत आसान हो गई। अनन्या ने बताया कि वह अकेली रहती है, फ्लैट में। आरव ने कहा कि वह भी किराए के घर में है, लेकिन उसकी माँ अक्सर आती रहती हैं। दोनों ने बारिश की शिकायत की, दिल्ली के ट्रैफिक की, और फिर अचानक चुप हो गए। चुप्पी अजीब नहीं लगी। बस छतरी के नीचे दो अजनबी चल रहे थे, और दुनिया धीमी पड़ गई थी।
मेट्रो स्टेशन पहुँचते-पहुँचते बारिश थमने लगी। आरव ने छतरी बंद की। अनन्या ने कहा, “शुक्रिया। आपने बचा लिया।”
आरव ने जेब से एक विजिटिंग कार्ड निकाला। “अगर कभी फिर भीग जाओ… या बस बात करनी हो।”
अनन्या ने कार्ड लिया। उंगलियाँ छू गईं। एक पल के लिए दोनों की नजरें मिलीं। आरव मुस्कुराया और चला गया। अनन्या खड़ी रही, कार्ड को निहारती हुई। बारिश रुक चुकी थी, लेकिन उसके अंदर कुछ नया बरस रहा था।
उस रात अनन्या सो नहीं पाई। आरव का चेहरा बार-बार याद आता। उसकी आवाज, छतरी के नीचे की गरमाहट, और वह एक वाक्य “कुछ चीजें टूटने के बाद ही सुंदर लगती हैं।” उसने कार्ड को टेबल पर रखा और सोचा कॉल करूँ या नहीं?
अगले दिन ऑफिस में काम नहीं बन पाया। शाम को उसने हिम्मत की और मैसेज किया “हाय, मैं अनन्या। कल वाली बारिश वाली। छतरी के लिए फिर से शुक्रिया।”
जवाब तुरंत आया “मुझे उम्मीद थी आप मैसेज करोगी। कैसी हो?”
बातचीत शुरू हुई। पहले सामान्य मौसम, ऑफिस, खाना। फिर धीरे-धीरे गहरी। आरव ने बताया कि उसकी माँ अकेली हैं, पिता की मृत्यु हो चुकी है। अनन्या ने बताया कि उसके माता-पिता छोटे शहर में रहते हैं, और वह दिल्ली आकर अकेली पड़ गई है। दोनों ने रात देर तक चैट की। एक रात आरव ने लिखा
“कल फिर बारिश का मौका है। छतरी लेकर चलूँ?”
अनन्या हँसी। “छतरी तो तुम्हारे पास है ही। लेकिन कॉफी?”
वे एक छोटी सी कैफे में मिले। बारिश फिर शुरू हो गई थी। खिड़की के बाहर बूँदें गिर रही थीं, अंदर दोनों बातें कर रहे थे। आरव ने अनन्या की ड्राइंग देखी जो उसने फोन में सेव कर रखी थी। “तुम अच्छा बनाती हो,” उसने कहा। अनन्या ने शर्माते हुए जवाब दिया, “तुम पुरानी इमारतें बचाते हो, मैं नई चीजें बनाती हूँ। दोनों का काम एक जैसा है कुछ न कुछ संभालना।”
आरव ने अनन्या का हाथ थाम लिया। हल्के से। “कुछ चीजें संभालने लायक होती हैं।”
अनन्या का दिल जोर से धड़का। बारिश बाहर तेज हो रही थी, लेकिन कैफे में सिर्फ उनके बीच की गर्माहट थी।
उसके बाद मुलाकातें नियमित हो गईं। कभी पुरानी इमारतों में घूमना, कभी रात को चाट खाना, कभी बस चुपचाप नदी किनारे बैठना। आरव अनन्या को पुरानी दिल्ली की गलियाँ दिखाता, जहाँ घर इतने पास-पास बने होते कि छत से छत जुड़ी लगती। अनन्या आरव को अपने डिजाइन बताती, रंगों की बात करती। दोनों एक-दूसरे के खालीपन को भर रहे थे।
एक शाम आरव ने अनन्या को अपने घर बुलाया। माँ से मिलवाया। माँ ने अनन्या का हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, तुम अच्छी लगती हो। आरव को हँसते हुए देखकर अच्छा लगा।” अनन्या की आँखें भर आईं। इतने दिनों बाद किसी माँ जैसी गर्माहट महसूस हुई।
लेकिन प्रेम हमेशा आसान नहीं होता। एक दिन आरव को मुंबई में एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला। तीन महीने के लिए जाना था। अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा, “जाओ। काम जरूरी है।” लेकिन अंदर से दिल बैठ गया। आरव ने अनन्या का चेहरा दोनों हाथों में लिया। “मैं लौटूँगा। और जब लौटूँगा, तब सिर्फ छतरी नहीं… पूरा आसमान लेकर आऊँगा।”
तीन महीने लंबे लगे। रोज की कॉल, वीडियो चैट, लेकिन दूरी का वजन महसूस होता। एक रात अनन्या बारिश में निकली। बिना छतरी। बस खड़ी रही उसी स्टॉप पर जहाँ पहली मुलाकात हुई थी। फोन बजा। आरव था।
“बारिश हो रही है न?”
“हाँ।”
“मैं भी भीग रहा हूँ। मुंबई में।”
अनन्या हँसी। “तुम हमेशा बारिश में भीगते हो क्या?”
आरव ने धीरे से कहा, “जब तक तुम्हें छतरी न दे दूँ, भीगता रहूँगा।”
तीन महीने बाद आरव लौटा। एयरपोर्ट पर अनन्या इंतजार कर रही थी। आरव ने उसे देखा और दौड़कर गले लगा लिया। लोग देख रहे थे, लेकिन दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ा। आरव ने जेब से एक छोटी सी छतरी निकाली बिल्कुल वैसी ही काली, जैसी पहली बार थी।
“यह तुम्हारी है। अब कभी मत भीगो अकेली।”
अनन्या ने छतरी ली और आरव के कंधे पर सिर रख दिया। “अब तुम्हारे साथ भीगना है तो भीगूँगी। अकेली नहीं।”
उसके बाद की बारिशें अलग थीं। दोनों साथ छतरी के नीचे चलते, कभी हाथ थामे, कभी चुपचाप। एक दिन आरव ने पुरानी इमारत के छत पर अनन्या को ले जाकर कहा, “यहाँ से शहर अलग लगता है। जैसे सब कुछ धीमा हो गया हो।” अनन्या ने आरव की ओर देखा। “तुम भी धीमे हो। अच्छे अर्थों में।”
आरव ने अनन्या को गले लगा लिया। बारिश शुरू हो गई। दोनों छतरी के नीचे खड़े रहे, लेकिन इस बार छतरी सिर्फ बारिश से बचाने के लिए नहीं थी। वह उनके बीच की उस जगह को बचा रही थी जहाँ दो अजनबी एक-दूसरे के हो गए थे।
साल बीत गए। अनन्या और आरव ने शादी की। शादी में छतरी थी काली, सादी, लेकिन उनके लिए सबसे खास। मेहमान हैरान थे कि दुल्हन-दूल्हा छतरी लेकर क्यों घूम रहे हैं। आरव ने हँसते हुए बताया, “क्योंकि हमारी कहानी यहीं से शुरू हुई थी।”
अब भी जब बारिश होती है, दोनों कभी-कभी पुराने बस स्टॉप पर चले जाते हैं। खड़े होते हैं, छतरी खोलते हैं, और याद करते हैं वह दिन जब एक अजनबी ने कहा था “लगता है आपको छतरी की जरूरत है।” अनन्या हर बार जवाब देती है, “नहीं… मुझे तुम्हारी जरूरत थी।”
बारिश रुक जाती है। शहर फिर से भागने लगता है। लेकिन दो दिलों के बीच वह छतरी हमेशा खुली रहती है नमी से नहीं, बल्कि प्यार से भीगी हुई।

NSW अनुभवी लेखक -🥇


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