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सपनों का शहर

पढ़ने का समय : 9 मिनट

सपनों का शहर

 

गाँव की धूल भरी गलियों में जब सूरज ढलता था तो आकाश में एक अलग सी चमक आ जाती थी। उसी चमक को देखकर अरुण के मन में सवाल उठते थे क्या शहर में भी सूरज ऐसे ही डूबता होगा? क्या वहाँ के सपने भी गाँव के सपनों जैसे टूटते होंगे या फिर पूरे हो जाते होंगे?

 

अरुण बाईस साल का था। पिता खेतों में काम करते थे, माँ घर का काम और बहन की शादी की चिन्ता। घर में दो कमरे थे, एक आँगन, और एक पुराना रेडियो जो शाम को फिल्मी गाने बजाता था। अरुण उन गानों को सुनते हुए सोचता था कि मुम्बई में सब कुछ सम्भव है। वहाँ लोग सपने बेचते हैं, सपने खरीदते हैं, और कभी-कभी सपनों के साथ खुद को भी बेच देते हैं।

 

एक दिन उसने तय कर लिया। सुबह चार बजे उठकर सामान बाँधा दो कमीजें, एक पैंट, माँ का दिया हुआ जनेऊ, और पिता का पुराना घड़ी। माँ रोई, पिता चुप रहे। बहन ने कहा, “भैया, लौटना मत भूलना।” अरुण मुस्कुराया, लेकिन दिल में कुछ और था। वह लौटना नहीं चाहता था। वह शहर में अपना नाम लिखना चाहता था।

 

ट्रेन में बीस घंटे लगे। मुम्बई पहुँचा तो स्टेशन पर भीड़ ने उसे निगल लिया। लोग दौड़ रहे थे, चीख रहे थे, धक्का दे रहे थे। अरुण ने पूछा, “भाई साहब, दादर कैसे जाऊँ?” एक आदमी ने बिना रुके कहा, “लोकल पकड़।” लोकल क्या होती है, यह उसने पहली बार देखा। लोग खिड़कियों से लटक रहे थे, दरवाजों पर चिपके हुए थे। अरुण किसी तरह घुस गया। हवा में पसीने की गन्ध, तेल की गन्ध, और सपनों की एक अजीब सी गन्ध थी।

 

दादर पहुँचा। वहाँ एक चाय की दुकान पर बैठकर उसने सोचा। पैसे कम थे। रात कहाँ बिताए? एक बुजुर्ग व्यक्ति ने देखा और पूछा, “नया है?” अरुण ने सिर हिलाया। बुजुर्ग ने कहा, “चल, मेरे साथ। नाम है रामलाल। मैं भी कभी गाँव से आया था।” रामलाल ने उसे एक छोटी सी झुग्गी में जगह दी। झुग्गी में चार लोग रहते थे। रात को छत से पानी टपकता था, लेकिन अरुण को लगा जैसे उसने महल पा लिया हो।

 

सुबह रामलाल ने कहा, “काम ढूँढ। यहाँ कोई मुफ्त में नहीं खिलाता।” अरुण सड़कों पर निकला। होटलों में पूछा, दुकानों में पूछा, कारखानों के बाहर खड़ा रहा। कहीं “अनुभव चाहिए”, कहीं “अंग्रेजी आनी चाहिए”, कहीं “सिफारिश चाहिए”। तीन दिन बाद एक छोटे से ढाबे में बर्तन धोने का काम मिला। मालिक ने कहा, “दो सौ रोज। खाना मुफ्त।” अरुण ने हाँ कर दी।

 

ढाबे में दिन भर बर्तन धोता, रात को झुग्गी लौटता। शरीर थक जाता, लेकिन मन नहीं थकता था। वह सोचता था एक दिन मैं भी बड़ा आदमी बनूँगा। एक दिन मेरा नाम अखबार में छपेगा। एक दिन माँ को मैं बड़ा घर दिखाऊँगा।

 

एक शाम ढाबे में एक लड़की आई। नाम था मेघा। वह कॉलेज की छात्रा थी, पास वाले इलाके में रहती थी। वह रोज चाय पीने आती थी। अरुण जब बर्तन धो रहा होता तो वह मुस्कुराती। एक दिन उसने पूछा, “तुम कहाँ से हो?” अरुण ने गाँव का नाम बताया। मेघा ने कहा, “सपनों का शहर में स्वागत है। लेकिन याद रखना, यहाँ सपने सस्ते नहीं मिलते।”

 

मेघा से बातें होने लगीं। वह किताबें पढ़ती थी, फिल्में देखती थी, और शहर की सच्चाइयाँ जानती थी। अरुण को उसने सिखाया कि अंग्रेजी के कुछ शब्द कैसे बोलें, कि रिज्यूम क्या होता है, कि इंटरव्यू में कैसे बैठना चाहिए। अरुण रात को झुग्गी में बैठा-बैठा उन शब्दों को दोहराता। रामलाल हँसता, “अरे, तू फिल्म स्टार बनने वाला है क्या?”

 

तीन महीने बाद अरुण ने ढाबा छोड़ दिया। एक छोटे से ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली। वेतन तीन हजार। कमरा किराए पर लिया एक छोटा सा कमरा, जहाँ खिड़की से ट्रेन की आवाज आती थी। मेघा कभी-कभी मिलने आती। दोनों समुद्र किनारे बैठते, लहरों को देखते, और सपनों की बात करते।

 

अरुण ने कहा, “मैं फिल्मों में काम करना चाहता हूँ।” मेघा चुप रही। फिर बोली, “बहुत लोग चाहते हैं। बहुत कम पहुँचते हैं।” अरुण ने जिद की, “मैं पहुँचूँगा।”

 

उसने एक छोटे से थिएटर ग्रुप में दाखिला लिया। शाम को रिहर्सल, दिन को ऑफिस। थकान शरीर को तोड़ती, लेकिन आँखों में चमक रहती। एक दिन डायरेक्टर ने कहा, “तुम्हारे में कुछ है। लेकिन शहर में सिर्फ ‘कुछ’ काफी नहीं। कनेक्शन चाहिए, पैसा चाहिए, और किस्मत चाहिए।”

 

अरुण ने कनेक्शन ढूँढे। एक असिस्टेंट डायरेक्टर से मिला, जिसने कहा, “पैसे दो, मैं तुम्हें एक छोटे रोल में डाल दूँगा।” अरुण के पास पैसे नहीं थे। उसने ऑफिस की नौकरी के साथ रात को टैक्सी चलायी। महीने भर में पैसे जमा किए और रोल खरीदा। फिल्म में उसका एक सीन था एक भीड़ में खड़ा आदमी जो सिर्फ मुस्कुराता है। फिल्म रिलीज हुई। किसी ने अरुण का नाम नहीं पूछा।

 

मेघा ने कहा, “तुमने देखा? शहर ऐसे ही खाता है।” अरुण ने जवाब दिया, “मैं अभी नहीं हारा।”

 

फिर एक और मौका आया। एक टीवी सीरियल में छोटा रोल। फिर एक विज्ञापन। फिर एक और फिल्म में बैकग्राउंड डांसर। पैसे आने लगे, लेकिन सम्मान नहीं। लोग पूछते, “तुम कौन हो?” अरुण जवाब देता, “मैं सपनों का शहर का एक सपना हूँ।”

 

एक दिन रामलाल बीमार पड़ गया। अस्पताल में जगह नहीं मिली। अरुण ने सारे पैसे लगा दिए। रामलाल बच गया, लेकिन अरुण फिर से खाली हो गया। कमरा छोड़ा, फिर झुग्गी में लौटा। मेघा आई और बोली, “चलो गाँव लौट चलो। यहाँ कुछ नहीं रखा।” अरुण ने मना कर दिया। “मैं लौटूँगा तब, जब मेरे पास कहने को कुछ होगा।”

 

समय बीतता गया। अरुण ने लिखा। कहानियाँ लिखीं, स्क्रिप्ट लिखीं। एक छोटी सी कहानी एक पत्रिका में छपी। फिर एक और। फिर एक रेडियो नाटक। पैसे कम थे, लेकिन नाम धीरे-धीरे फैलने लगा।

 

एक शाम समुद्र किनारे बैठे हुए मेघा ने कहा, “तुम बदल गए हो।” अरुण ने पूछा, “कैसे?” मेघा बोली, “पहले तुम्हारी आँखों में भूख थी। अब समझ है।” अरुण मुस्कुराया, “शहर ने सिखाया कि सपने सिर्फ देखने की चीज नहीं। उन्हें जीना पड़ता है। और जीने के लिए कभी-कभी सपने तोड़ने भी पड़ते हैं।”

 

फिर एक दिन एक बड़े प्रोडक्शन हाउस से फोन आया। उनकी एक स्क्रिप्ट पसंद आई थी। मीटिंग हुई। अरुण ने अपनी कहानी सुनाई गाँव से शहर आने वाले एक लड़के की कहानी, जो सपनों के पीछे भागता है, गिरता है, उठता है, और अंत में समझता है कि सपना शहर नहीं, खुद के अंदर होता है। डायरेक्टर ने कहा, “यह फिल्म बनेगी। तुम लिखोगे।”

 

फिल्म बनी। अरुण का नाम लेखक के रूप में आया। प्रीमियर पर माँ-पिता आए। माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, तुमने कर दिखाया।” पिता ने सिर्फ कन्धे पर हाथ रखा। बहन ने कहा, “अब घर आ जाओ।” अरुण ने जवाब दिया, “घर तो अब यहीं है। लेकिन मैं आऊँगा।”

 

फिल्म चली। लोग तारीफ करने लगे। अरुण अचानक जाना-माना नाम बन गया। इंटरव्यू में पूछा गया, “सपनों का शहर कैसा लगा?” अरुण ने कहा, “यह शहर सपनों को पूरा नहीं करता। यह सिर्फ आईना दिखाता है। जो खुद को देख पाता है, वही आगे बढ़ता है। बाकी लोग भीड़ में खो जाते हैं।”

 

मेघा अब उसकी पत्नी थी। दोनों एक छोटे से फ्लैट में रहते थे। खिड़की से समुद्र दिखता था। रात को जब लहरें टकरातीं तो अरुण याद करता झुग्गी की रातें, बर्तन धोते हुए हाथ, रामलाल की खांसी, और वह पहला दिन जब ट्रेन से उतरा था।

 

एक दिन रामलाल आया। बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो गया था। अरुण ने उसे गले लगाया। रामलाल बोला, “तूने कर लिया जो मैं नहीं कर पाया।” अरुण ने कहा, “आपके बिना मैं यहाँ नहीं टिक पाता।” रामलाल मुस्कुराया, “सपनों का शहर किसी को अकेला नहीं छोड़ता। या तो तोड़ देता है, या फिर नया बना देता है।”

 

अरुण ने एक और कहानी लिखनी शुरू की। इस बार शीर्षक था “सपनों का शहर: एक और अध्याय”। लेकिन वह जानता था कि असली कहानी कभी खत्म नहीं होती। शहर चलता रहता है। लोग आते रहते हैं। सपने टूटते रहते हैं और नए सपने जन्म लेते रहते हैं।

 

एक शाम अरुण समुद्र किनारे अकेला बैठा था। सूरज डूब रहा था। आकाश में वही चमक थी जो कभी गाँव में देखी थी। उसने सोचा क्या मैं पहुँच गया? क्या मेरा सपना पूरा हो गया?

 

जवाब हवा में था। शहर की रोशनियाँ जल रही थीं। दूर कोई ट्रेन की सीटी बज रही थी। पास कोई गाना गा रहा था। अरुण उठा और चला। उसके कदम अब पहले जैसे नहीं थे। अब उनमें थकान कम, समझ ज्यादा थी।

 

वापस फ्लैट पहुँचा तो मेघा ने पूछा, “क्या सोच रहे थे?” अरुण ने कहा, “सोच रहा था कि सपनों का शहर असल में कोई जगह नहीं है। यह एक यात्रा है। और यात्रा कभी खत्म नहीं होती। बस, रास्ते बदलते रहते हैं।”

 

मेघा ने हाथ थाम लिया। दोनों खिड़की के पास खड़े रहे। बाहर शहर चमकीला था, शोरगुल भरा था, और अनगिनत सपनों से भरा हुआ था। कुछ सपने पूरे हो रहे थे, कुछ टूट रहे थे, कुछ नए जन्म ले रहे थे।

 

अरुण ने धीरे से कहा, “मैं गाँव लौटूँगा एक दिन। लेकिन अभी नहीं। अभी मुझे और लिखना है। और कहानियाँ सुनानी हैं। क्योंकि इस शहर में हर किसी की एक कहानी है। और मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

 

रात गहरी हो गई। शहर सो नहीं रहा था। कभी सोता भी नहीं। सपनों का शहर जागता रहता है उन लोगों के लिए जो अभी आए हैं, उन लोगों के लिए जो हार चुके हैं, और उन लोगों के लिए जो अभी भी लड़ रहे हैं।

 

अरुण बिस्तर पर लेटा। आँखें बंद कीं। नींद में उसे गाँव दिख रहा था खेत, आँगन, माँ का चेहरा, और वह पुराना रेडियो। फिर दृश्य बदला। मुम्बई का स्टेशन, भीड़, रामलाल, मेघा, समुद्र, फिल्म का सेट, और अंत में वह खुद एक लेखक, जो अपनी कहानी खुद लिख रहा था।

 

सुबह जब उठा तो सूरज की पहली किरण खिड़की से आ रही थी। अरुण मुस्कुराया। उसने नोटबुक खोली और लिखा

 

“सपनों का शहर में कोई अंत नहीं होता। सिर्फ नए शुरूआत होती हैं। और हर शुरूआत एक नई कहानी लेकर आती है।”

 

कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन शहर में कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। अरुण की कहानी एक एपिसोड में पूरी हो गई गाँव से शहर, संघर्ष से सफलता, सपने से समझ तक। वह पहुँच गया जहाँ पहुँचना चाहता था। लेकिन असली जीत यह नहीं थी कि उसका नाम छापा। असली जीत यह थी कि उसने खुद को खोया नहीं। शहर ने उसे तोड़ा, फिर जोड़ा, और अंत में एक नया इंसान बना दिया।

 

और यही सपनों का शहर का सच है। यह तुम्हें वह सब कुछ देता है जो तुम चाहते हो बशर्ते तुम देने के लिए तैयार हो। कभी-कभी सपने, कभी-कभी अपनी पुरानी पहचान, और कभी-कभी सिर्फ समय।

 

 

 

अरुण अब समय के साथ चल रहा था। और शहर उसके साथ चल रहा था। दोनों एक-दूसरे को समझ चुके थे। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।

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