हकीकत की कहानी कहूं या अपने दिल की जुबानी
परेशान हूं मैं अपने ही हाथों मजबूर होकर
ना चैन आता है दिल को,ना करार है रातों में
ये क्या हाल बना लिया है मैंने
तुमसे बेहद इश्क फरमा के
तुम सामने होकर अपने से लगते हो
मुझ से दूर जाते ही ना जाने क्यों बेगाने बन जाते हो,
कहो ये कैसा इश्क है तुम्हारा ,
इश्क है भी मुझसे या जरिया बन
कर रह गई हूं सब खेलने का,
सच कहूं तो अब तकलीफ़ देता है
मुझे इश्क तुम्हारा , मैं टूट गई हूं बेहद इश्क में,
ना जाने ये क्या हश्र करेगा आगे,
हक़ीक़त सामने है फिर भी धोखे में पड़ी हुई हूं ,
लगता है ये दर्दनाक मौत पसंद आने लगा है मुझे…।।

NSW उभरते लेखक – 🥈
लेखक नहीं हूं फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं ,

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