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टैग: दर्दनाक प्यार

  • Dil sabhal ja jara part – 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part – 2 pahli mulakat 

    शिमला की ठंडी हवा बस की खिड़की से अंदर आ रही थी। प्रिया ने अपनी पतली शॉल कसकर लपेटी और फोन को जेब में डाल दिया। वो अनजान कॉल अभी भी उसके दिमाग में गूंज रही थी – “कॉलेज मत जाना… वरना…”। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। बस में ज्यादातर लोकल लोग थे – कुछ पर्यटक, कुछ स्टूडेंट्स। कोई उसे घूर नहीं रहा था, लेकिन प्रिया को लगा जैसे कोई उसे देख रहा हो।

    बस आखिरकार शिमला बस स्टैंड पर रुकी। प्रिया उतरी। बाहर ठंड थी, लेकिन धूप निकली हुई थी। पहाड़ियों पर बर्फ की चमक दूर से दिख रही थी। शहर व्यस्त था – रिक्शा, टैक्सी, दुकानें। प्रिया ने अपना छोटा बैग कंधे पर टिकाया और कॉलेज की ओर चल पड़ी। कॉलेज बस स्टैंड से करीब दो किलोमीटर दूर था। उसने पैदल ही जाना ठाना – पैसे बचाने थे।

    रास्ते में वो बार-बार फोटो वाली डायरी छूती रही। पेंडेंट गले में झूल रहा था। “शिमला… क्या यहीं कहीं मेरा अतीत छिपा है?” उसने मन ही मन सोचा। लेकिन वो अनजान कॉल उसे चैन नहीं लेने दे रहा था।

    कॉलेज गेट पर पहुंचते ही प्रिया रुक गई। बड़ा सा लोहे का गेट, ऊपर लिखा था – “Shimla Women’s College – Established 1950″। अंदर हरे-भरे लॉन, पुरानी ब्रिटिश स्टाइल की इमारतें, और लड़कियां हंसती-बोलती घूम रही थीं। ज्यादातर लड़कियां ब्रांडेड कपड़ों में थीं – जींस, जैकेट्स, महंगे बैग। प्रिया ने अपनी सादी नीली सलवार-कमीज देखी और अचानक खुद को बहुत छोटा महसूस किया।

    एडमिशन ऑफिस में लाइन लगी थी। प्रिया ने अपना लेटर दिखाया। स्टाफ की मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा, “प्रिया शर्मा? स्कॉलरशिप वाली? वेलकम डियर। तुम्हारा हॉस्टल रूम 204 है। दूसरी मंजिल। सामान रखो और फिर प्रिंसिपल मैम से मिलना।”

    प्रिया ने थैंक यू कहा और हॉस्टल की ओर बढ़ी। हॉस्टल बिल्डिंग कॉलेज के पीछे थी – तीन मंजिला, पुरानी लेकिन साफ-सुथरी। सीढ़ियां चढ़ते वक्त उसके पैर भारी लग रहे थे। रूम 204 के दरवाजे पर उसने दस्तक दी।

    “आ जा!” अंदर से चुलबुली आवाज आई।

    प्रिया ने दरवाजा खोला। रूम छोटा लेकिन आरामदायक था – दो बेड, दो अलमारियां, एक टेबल, और खिड़की से पहाड़ दिख रहे थे। एक बेड पर एक लड़की बैठी थी – बालों में हाईलाइट्स, लिपस्टिक लगाए, मोबाइल पर स्क्रॉल कर रही। वो देखते ही उठी और बोली, “हाय! तू नई रूममेट है? मैं रिया मेहता। मुंबई से। और तू?”

    “प्रिया… प्रिया शर्मा।” प्रिया ने शर्माते हुए कहा और बैग नीचे रखा।

    रिया ने उसे ऊपर से नीचे देखा और फिर मुस्कुराई। “क्यूट लग रही है यार! सादगी का स्टाइल। चल, सामान रख और चाय पीते हैं। कैंटीन चलेंगी?”

    प्रिया ने हां कहा। रिया बहुत बातूनी थी। रास्ते में बताती गई – “ये कॉलेज टॉप है। अमीर लड़कियां ज्यादा हैं। लेकिन पार्टीज कमाल की होती हैं। तू क्या कोर्स कर रही है? बीए?”

    “हां… इंग्लिश ऑनर्स।” प्रिया ने धीरे से कहा।

    कैंटीन में पहुंचते ही प्रिया को लगा जैसे अलग दुनिया में आ गई हो। बड़ी-बड़ी टेबल्स, कॉफी मशीन, पिज्जा-बर्गर के मेन्यू। रिया ने दो चाय और समोसे ऑर्डर किए। बैठते हुए बोली, “बता ना, तू कहां से है? फैमिली? बॉयफ्रेंड?”

    प्रिया हिचकिचाई। फिर बोली, “हिमाचल के छोटे कस्बे से। अनाथ आश्रम में पली हूं। फैमिली… कोई नहीं।”

    रिया चुप हो गई। फिर प्रिया का हाथ थामा और बोली, “सॉरी यार। मैं बेवकूफ हूं। लेकिन तू स्ट्रॉन्ग है। यहां सबके पास्ट होते हैं। मैं भी… पापा-मम्मी अलग हो गए हैं। लेकिन हम फ्यूचर बनाएंगे ना?”

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। पहली बार किसी ने उसे जज नहीं किया। दोनों चाय पीते रहे। रिया ने कॉलेज की गॉसिप बताई – कौन सी लड़की किससे डेट कर रही, कौन सी टीचर स्ट्रिक्ट है।

    फिर क्लास का टाइम हुआ। पहली क्लास इंग्लिश की थी। हॉल बड़ा था, करीब सौ लड़कियां। प्रोफेसर ने कहा, “न्यू सेशन, न्यू स्टूडेंट्स। सब अपना इंट्रोडक्शन दें।”

    प्रिया की बारी आई। वो उठी, आवाज कांपी – “मेरा नाम प्रिया शर्मा है। मैं हिमाचल से हूं। स्कॉलरशिप पर आई हूं।”

    सब शांत। कुछ लड़कियां फुसफुसाईं। तभी पीछे से एक लड़के की आवाज आई – “प्रिया? कूल नेम। मैं आरव ठाकुर। वेलकम टू कॉलेज।”

    प्रिया ने पलटा। हॉल के आखिरी बेंच पर एक लड़का बैठा था – लंबा, गोरा, हल्की दाढ़ी, ब्रांडेड जैकेट। मुस्कुरा रहा था। आंखें गर्म। प्रिया का दिल एक पल को धड़का। लेकिन वो जल्दी से बैठ गई।

    क्लास के बाद रिया ने कहा, “वो आरव है यार। कॉलेज का क्रश। अमीर फैमिली, शिमला के बड़े बिजनेसमैन का बेटा। लेकिन घमंडी नहीं। सबको हेल्प करता है।”

    प्रिया ने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में कुछ हलचल हुई।

    शाम को हॉस्टल में प्रिया ने अपना सामान व्यवस्थित किया। डायरी निकाली। फोटो देखी। तभी रिया बोली, “कल फ्रेशर्स पार्टी है। तुझे ड्रेस चाहिए। मेरी अलमारी से ले ले।”

    प्रिया ने मना किया, लेकिन रिया नहीं मानी। एक ब्लू कुर्ती दी – “ये पहनना। क्यूट लगेगी।”

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। वो अनजान कॉल सोच रही थी। उसने फोन चेक किया – नंबर सेव नहीं था। ब्लॉक कर दिया। लेकिन डर लगा।

    अगले दिन क्लास में आरव ने प्रिया के पास नोट्स रख दिए। “ये ले, अगर मिस हो गया हो तो।” प्रिया ने थैंक्स कहा। लंच में रिया ने जबरदस्ती उसे अपने ग्रुप में बिठाया। आरव भी था।

    आरव ने पूछा, “सेटल हो गई? कोई प्रॉब्लम हो तो बता। मैं सीनियर हूं।”

    प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “थैंक यू। सब ठीक है।”

    आरव ने अपनी स्टोरी शेयर की – “मेरा घर शिमला में ही है। पापा होटल बिजनेस करते हैं। लेकिन मम्मी… दो साल पहले गुजर गईं। तब से थोड़ा अकेला फील करता हूं।”

    प्रिया को लगा जैसे कोई अपना सा मिल गया। दोनों की आंखें मिलीं। एक पल को दुनिया रुक सी गई।

    शाम को फ्रेशर्स पार्टी। हॉल सजा हुआ था – लाइट्स, म्यूजिक, डांस फ्लोर। प्रिया रिया की कुर्ती में थी। पहली बार मेकअप किया था। वो आईने में खुद को देखकर शर्मा गई।

    पार्टी में एंट्री करते ही रिया ने कहा, “वाह यार! बॉम्ब लग रही है।”

    डांस शुरू हुआ। प्रिया कोने में खड़ी थी। तभी आरव आया। सफेद शर्ट, ब्लैक जैकेट। हैंडसम। उसने हाथ बढ़ाया – “डांस करेगी?”

    प्रिया हिचकिचाई। “मुझे नहीं आता।”

    “कोई नहीं। मैं सिखाता हूं।”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ा। धीरे-धीरे डांस शुरू हुआ। संगीत रोमांटिक था। प्रिया का दिल तेज़ धड़क रहा था। पहली बार किसी लड़के ने इतना क्लोज फील किया।

    तभी एक लड़की आई – लंबे बाल, रेड ड्रेस। अवनी शर्मा। कॉलेज की क्वीन बी। वो आरव के पास आई और बोली, “आरव, डांस?” फिर प्रिया को घूरकर कहा, “स्कॉलरशिप वाली? यहां अमीरों का क्लब है बेबी। बाहर जाकर पढ़ाई कर।”

    सब हंस पड़े। प्रिया का चेहरा लाल हो गया। आंखें भर आईं। वो भागी। बाहर लॉन में अकेली बैठ गई। रोने लगी। “मैं यहां क्यों आई? सब मुझे जज करेंगे।”

    तभी आरव आया। “प्रिया… सॉरी। अवनी वैसी है। तू मत रो। तू स्पेशल है। तेरी आंखों में कुछ है… जो मुझे अच्छा लगता है।”

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “थैंक यू आरव। लेकिन मैं… मैं अनाथ हूं। मेरे पास कुछ नहीं।”

    आरव ने उसका हाथ थामा। “मेरे पास सब है, लेकिन खुशी नहीं। तू मुझे खुशी दे सकती है।”

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और रूम की ओर चली गई। दिल में तूफान था – प्यार की शुरुआत? या फिर खतरे की?

    रूम में पहुंचते ही उसने बैग खोला। अंदर एक लिफाफा था – जो पहले नहीं था। अंदर एक चिट – “प्रिया, तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।”

    प्रिया कांप गई। ये लिफाफा कैसे आया? कौन रख गया? और आरव… क्या वो जानता है कुछ?

    रात गहरा गई। बाहर हवा चल रही थी। प्रिया की नई जिंदगी शुरू हो चुकी थी – दोस्ती, प्यार, और छिपे राजों के साथ।

     

  • आत्मग्लानि (भाग 2)

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

                        आत्मग्लानि …

    अब तक हमने पढ़ा :— 

    शाम को घर पर पापा, चाचा ताऊ जी अपने काम से वापस आये तो उन्हें बताया कि ना जाने आज रीया को क्या हुआ है । वो स्कूल से आते ही अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर दिया, ना कुछ खाया है ना शाम की चाय पी है, न जाने आज क्या हुआ है उसे । सभी लोग ये सुनकर चिंतित हो गए और पापा उठकर उसके कमरे के बाहर खड़े होकर उसका नाम पुकारा, थोड़ी देर बाद रीया ने दरवाजा खोला तो पापा ने स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरते हुए पूछा ” क्या हुआ है मेरी बेटी को” स्कूल में किसी से कोई कहा सुनी हो गई है क्या जिसका गुस्सा खाने पर निकाला जा रहा है!! रीया ने चुपचाप गर्दन नीचे झुका लिया और बोली ऐसा कुछ नहीं है पापा, वो! सब्जेक्ट समझ नहीं आया तो सर ने डांट दिया था, बस! और कोई बात नहीं है, मैं बहुत कोशिश करती हूं कि सब अच्छे से हो जाए पर कहीं ना कहीं आकर मैं अटक जाती हूं, ये बोलते वक्त उसके दिल दिमाग में संजय व्यास जी  थे , उसकी बातें सुनकर सबके दिलों में सुकून उतर आया कि कोई बड़ी बात नहीं है.! उन्हें ख़बर नहीं थी कि उसके पैर किस दिशा में बढ़ गये हैं ।।

    दूसरे दिन भी उसका वही हाल रहा क्लास में , जब भी संजय जी क्लास में पढ़ाने आते वो उन्हें एकटक देखने में समय लगाती, क्या पढ़ा रहे हैं, क्या बोल रहे हैं कुछ दिखाई सुनाई देना बंद कर दिया, वो बस चुपचाप उन्हें देखा करती और आहें भरकर अपने मन को समझाती कि ” रीया! संजय जी सिर्फ तुम्हारे हैं, वो तुमसे प्यार करते हैं बस जताते नहीं हैं” और शर्माते हुए अपनी हथेलियों में अपना मुंह छुपा लेती..!!

    संजय जी ने उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ना ही उससे कोई कभी दुबारा इस विषय पर बहस की, क्योंकि वह उनके लिए एक बच्ची मात्र थी, जिसे उन्हें पढ़ाना था।। बस! इससे ज्यादा वो कुछ नहीं उसके बारे में सोचते थे । ऐसे ही अनदेखी में सर जी के दिन गुजर रहे थे और उनकी नजरंदाजी रीया को बहुत खल रही थी जिससे वो अंदर ही अंदर खल रही थी और इस वजह से उसका ध्यान अपनी पढ़ाई और खुद पर से हटता जा रहा था जिसके परिणामस्वरूप उसकी तबीयत धीरे धीरे बिगड़ती गई और परिवार वालों को उसकी चिंता होने लगी…..

    क्या हुआ है रीया को? और क्या संजय जी इस परेशानी से बाहर आ जाएंगे या और फंसते चले जाएंगे, जानते हैं कल के भाग में , लाईक कमेंट करें और मेरी कहानी को शेयर भी करें 🙏 ☺️ ☺️ 

  • हक़ीक़त…

    हक़ीक़त…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    हकीकत की कहानी कहूं या अपने दिल की जुबानी 

    परेशान हूं मैं अपने ही हाथों मजबूर होकर 

    ना चैन आता है दिल को,ना करार है रातों में 

    ये क्या हाल बना लिया है मैंने

    तुमसे बेहद इश्क फरमा के 

    तुम सामने होकर अपने से लगते हो 

    मुझ से दूर जाते ही ना जाने क्यों बेगाने बन जाते हो,

    कहो ये कैसा इश्क है तुम्हारा ,

    इश्क है भी मुझसे या जरिया बन

    कर रह गई हूं सब खेलने का,

    सच कहूं तो अब तकलीफ़ देता है

    मुझे इश्क तुम्हारा , मैं टूट गई हूं बेहद इश्क में,

    ना जाने ये क्या हश्र करेगा आगे,

    हक़ीक़त सामने है फिर भी धोखे में पड़ी हुई हूं ,

    लगता है ये दर्दनाक मौत पसंद आने लगा है मुझे…।।

     

     

     

     

     

     

     

     

     

  • बहुत कम बोलता हु…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    धीरे धीरे सबसे बात करना छोड़ दिया है,

     

    *अब खुद से भी बहुत कम बोलता हूं..!!*

  • किस्मत मे नहीं होते…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    फिर सुबह ये एहसास हुआ मुझे,

    कुछ रिश्ते साथ होकर भी साथ नहीं होते,

     

    जो ख्वाबों में भी हाथ छोड़ जाए,

    वो अक्सर किस्मत में नहीं होते…!!

    🥀✨

  • भाग – 1 इश्क का पैगाम

    भाग – 1 इश्क का पैगाम

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

     

     

     

    • भाग – 1 इश्क का पैगाम

    सकरी की माटी और रूह की पहली प्यास

     

    बिहार राज्य के पूर्णिया जिला के सकरी गाँव की सरहद पर जब शाम उतरती है, तो ऐसा लगता है मानो किसी नवयौवना ने अपनी सिंदूरी साड़ी का पल्लू पूरे आकाश पर फैला दिया हो। वह धूल भरी पगडंडी, जिसके दोनों ओर बाँस के झुरमुट हवा में धीरे-धीरे सरसराते थे, जैसे कोई पुराना आशिक अपनी प्रेमिका के कान में कोई गुप्त मंत्र फूँक रहा हो। इसी पगडंडी पर धूल उड़ाती हुई जब ईशान की काली जीप रुकी, तो पूरे गाँव के सन्नाटे में एक अजीब सी हलचल मच गई।

     

    ईशान, जिसके चेहरे पर दिल्ली की भागदौड़ और ‘ब्रेकअप्स’ की थकान साफ़ झलक रही थी, जीप से नीचे उतरा। उसने चश्मा हटाया और एक लम्बी साँस ली। हवा में नीम के पत्तों की कड़वाहट और जलते हुए उपलों की वह सोंधी महक थी, जिसे बहुत से लेखक ने अपनी कहानियों में अमर कर दिया था। ईशान के लिए यह केवल एक ‘लोकेशन’ नहीं थी; यह एक ऐसी दुनिया थी जहाँ प्रेम आज भी अपनी आदिम शुद्धता में जीवित था।

    “यही है सकरी…” ईशान बुदबुदाया। उसके हाथ में कैमरा था, लेकिन मन में एक ऐसी बेचैनी थी जिसे वह खुद समझ नहीं पा रहा था। वह यहाँ एक डॉक्यूमेंट्री शूट करने आया था, लेकिन उसके भीतर का आधुनिक युवा, जो केवल ‘शॉर्ट-टर्म’ रिश्तों और ‘कैजुअल डेटिंग’ का आदी था, यहाँ की शांति से डर रहा था। उसे क्या पता था कि सकरी की यह शांति किसी बड़े तूफान के आने की आहट है।

    गाँव के बीचों-बीच एक पुराना पोखर था, जिसे लोग ‘हंसिया पोखर’ कहते थे। शाम का वक्त था। गाँव की औरतें और लड़कियाँ अपने घड़ों में पानी भरने वहीं जुटती थीं। ईशान टहलता हुआ उधर ही निकल गया। वहीं उसकी मुलाकात मंजरी से हुई।

    मंजरी… वह कोई मामूली लड़की नहीं थी। वह सकरी की धूप और बारिश से बनी एक ऐसी मूरत थी, जिसे देखकर पत्थर भी पिघल जाए। उसने हलके नीले रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जिसका पल्लू उसके कंधे से ढलक कर उसकी सुडौल कमर पर आ टिका था। जब वह पानी भरने के लिए पोखर की सीढ़ियों पर झुकी, तो उसकी साड़ी का एक हिस्सा भीग गया। वह भीगा हुआ कपड़ा उसके जिस्म से इस तरह चिपक गया था, मानो साड़ी ने उसके शरीर की हर वक्रता (curve) को चूमने की कसम खा ली हो।

    ईशान का कैमरा हाथ में ही रह गया। उसने कई बार फैशन शोज़ में अधनंगी मॉडल को देखा था, लेकिन मंजरी के उस भीगे हुए रूप में जो ‘शुद्ध कामुकता’ थी, उसने ईशान के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी। वह आकर्षण केवल शारीरिक नहीं था; वह रूह की एक ऐसी पुकार थी जिसे ईशान ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मंजरी के गोरे और सुडौल बदन पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें सूरज की आखिरी किरणों में ऐसे चमक रही थीं, जैसे किसी कलाकार ने सोने की राख बिखेर दी हो।

    मंजरी ने जैसे ही आहट पाकर पीछे मुड़कर देखा, उसकी आँखें ईशान की आँखों से टकराईं। वह क्षण जैसे अनंत काल के लिए थम गया। मंजरी की आँखों में वह ग्रामीण लज्जा तो थी, लेकिन साथ ही एक ऐसी आग भी थी जो सीधे कलेजे को चीर कर पार निकल जाए। प्रेम की भाषा में कहें तो, “मंजरी की चितवन में वह जादू था, जो सावन की पहली फुहार में मिट्टी से उठने वाली उस महक में होता है, जो मन को पागल कर देती है।

    उसने अपनी पायल की छन-छन के साथ एक कदम पीछे हटाया। उसके भीगे बदन की सिहरन दूर खड़े ईशान तक पहुँच रही थी। ईशान के भीतर का आधुनिक पुरुष, जो हमेशा शब्दों और तर्कों से खेलता था, आज गूंगा हो गया था। उसे अपनी रगों में खून की गति तेज होती महसूस हुई। वह मंजरी के करीब जाना चाहता था, उसे छूना चाहता था, यह देखना चाहता था कि क्या यह हाड़-मांस की बनी कोई इंसान है या सिर्फ उसका कोई सपना।

    “कौन हैं आप?” मंजरी की आवाज़ में कोई डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सा अधिकार था। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे पुरानी बांसुरी से कोई विरह का राग निकल रहा हो।

    ईशान ने खुद को संभाला। “मैं… मैं शहर से आया हूँ। कुछ तस्वीरें खींचने।”

    मंजरी हल्का सा मुस्कुराई। उस मुस्कुराहट ने उसके चेहरे पर वह नूर बिखेरा कि ईशान को लगा जैसे पूरी कायनात सिमट कर वहीं आ गई हो। “तस्वीरें? हमारी क्या तस्वीरें खींचिएगा बाबू? यहाँ तो सब कुछ पुराना है, धूल भरा है।”

    “नहीं…” ईशान ने आगे बढ़कर कहा, उसकी आवाज़ में एक गहरी हूक थी, “यहाँ वो है, जो मेरी दुनिया में खो चुका है। यहाँ ‘इश्क’ अपनी असली शक्ल में है।”

    मंजरी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसके गालों पर गुलाबी रंग उभर आया, जो शायद उस शाम की लाली से भी ज्यादा गहरा था। वह अपनी गागर उठाकर जाने लगी, लेकिन उसका भीगा आँचल रास्ते में पड़ी एक झाड़ी में फँस गया। जैसे ही उसने उसे छुड़ाने के लिए ज़ोर लगाया, साड़ी का वह भीगा हिस्सा और भी तन गया, जिससे उसके शरीर की बनावट ईशान के सामने पूरी तरह स्पष्ट हो गई। ईशान का गला सूखने लगा। आज की ‘फास्ट लाइफ’ में जहाँ सेक्स सिर्फ एक ज़रूरत थी, यहाँ उसे महसूस हुआ कि एक स्पर्श की प्यास क्या होती है।

    मंजरी ने शरमाते हुए आँचल छुड़ाया और एक बार पीछे मुड़कर ईशान को देखा। उस एक नज़र में हज़ारों पैगाम थे, आमंत्रण भी, डर भी और एक अनकही चाहत भी।

    उस रात, सकरी के डाक-बंगले में लेटे हुए ईशान को नींद नहीं आई। बाहर झींगुरों का शोर था और दूर कहीं कोई बिरहा गा रहा था। उसे बार-बार मंजरी का वह भीगा बदन, उसकी सुराहीदार गर्दन पर थमी पानी की वो बूंद और उसकी आँखों की वो आग याद आ रही थी। उसने महसूस किया कि उसका शहरी दिल, जो अब तक केवल ‘डेटिंग ऐप्स’ के छोटे-छोटे पैगामों में खुशी ढूँढता था, अब एक बड़ी आग में जलने को तैयार है।

    सकरी की वह रात गवाह थी कि एक आधुनिक प्रेमी और एक ग्रामीण प्रेमिका के बीच की वह दीवार अब टूटने वाली थी। यह केवल एक प्रेम कहानी की शुरुआत नहीं थी; यह दो अलग-अलग दुनियाओं के टकराने और एक होने की दास्तान थी, जहाँ जिस्म की प्यास और रूह की तलाश एक दूसरे में मिलने वाली थी।

    जारी…..

     

    मेरे प्यारे पाठकों, “इश्क का पैगाम” का यह पहला भाग आपको कैसा लगा? क्या सकरी गाँव की माटी की महक और मंजरी की वो पहली सिहरन आपके दिल तक पहुँची?

    पढ़ने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया! ❤️

    यह एक लम्बी और रोमांचक यात्रा है। आपकी हर एक टिप्पणी (Comment) और प्रतिक्रिया मुझे आगे लिखने की ऊर्जा देगी। कृपया  अपने विचार जरूर लिखें और कहानी पसंद आये, तो उपहार स्वरूप स्टीकर भेजकर प्रोत्साहित करें।

    सधन्यवाद