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“बारिश वाली मुलाकात”

पढ़ने का समय : 2 मिनट

शाम का समय था। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। सड़क किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान पर भीड़ लगी थी। रिया भीगती हुई वहाँ आकर रुकी। उसके हाथ में किताबें थीं और चेहरे पर गुस्सा।

“आज ही बारिश आनी थी…” उसने धीरे से कहा।

 

तभी पास खड़े एक लड़के ने अपनी छतरी उसकी तरफ बढ़ा दी।

“अगर चाहो तो इस्तेमाल कर सकती हो।”

 

रिया ने उसकी तरफ देखा। लड़का मुस्कुरा रहा था। सफेद शर्ट पूरी भीग चुकी थी, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर अजीब सी शांति थी।

 

“और तुम?” रिया ने पूछा।

 

“मैं बारिश पसंद करता हूँ।” उसने हँसते हुए कहा।

 

रिया ने बिना कुछ बोले छतरी ले ली। कुछ देर बाद दोनों एक ही बस में बैठे थे। संयोग ऐसा था कि सीट भी साथ मिली।

 

“वैसे मैं आरव हूँ।”

 

“रिया।”

 

बस की खिड़की से बारिश की बूंदें अंदर आ रही थीं। दोनों छोटी-छोटी बातें करने लगे। रिया ने अपने बैग से एक नोट बुक निकाली ओर उसने कुछ लिखने लगी पता ही नहीं चला कब रास्ता खत्म हो गया। उतरते समय रिया जल्दी में थी। उसकी किताब नीचे गिर गई। आरव ने उठाकर उसे दी। तभी उसके अंदर से एक छोटा सा कागज़ गिरा।

 

आरव ने अनजाने में उसे उठा लिया।

उस पर हल्के नीले पेन से लिखा था—

 

“कुछ मुलाकातें अजीब होती हैं…

सिर्फ कुछ मिनटों में कोई इंसान अपना सा लगने लगता है…”

 

रिया की धड़कन जैसे रुक गई। उसने जल्दी से वो कागज़ उसके हाथ से ले लिया। “वो… बस ऐसे ही लिखा था मैंने।” उसने नजरें चुराते हुए कहा।

 

आरव कुछ पल उसे देखता रहा। फिर हल्का सा मुस्कुराया।

“अच्छा लिखा है…” उसने धीमी आवाज़ में कहा,

“क्योंकि मुझे भी आज कुछ ऐसा ही महसूस हुआ।”

 

रिया ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।

बारिश की बूंदें अब भी गिर रही थीं, बस फर्क इतना था कि अब उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।

 

दोनो अपने अपने रस्ते की ओर चले गए दोनों बिना ये सोचे कि फिर मुलाकात होगी कि नहीं रिया अक्सर आरव के बारे में सोचने लगी वो हर बार बस उस प्लान को अपने दिमाग में दोहराती ओर ऐसा ही कुछ हाल आरव का था ऐसे ही सालों बीत गए पर रिया उस दिन के अलावा कभी आरव को सोच नहीं पाई शायद वो फिर मुलाकात नहीं उस पल में ही खुश रहना चाहती थी शायद यही होता है कुछ पल का सुकून या प्यार 

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