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टैग: #प्यार #दर्द #इंतज़ार

  • बेपरवाह लड़का

    बेपरवाह लड़का

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक समय की बात है। एक छोटे से शहर में कबीर नाम का लड़का रहता था। पूरे मोहल्ले में उसकी पहचान एक नादान, बेपरवाह और मस्तमौला लड़के के रूप में थी। उसे न किसी से प्यार था, न किसी रिश्ते की परवाह। दोस्त कहते, “कबीर, कभी तो किसी लड़की को देखकर दिल धड़केगा।”

     

    वह हंसकर जवाब देता, “मुझे इन सब चक्करों में नहीं पड़ना। जिंदगी बस खुलकर जीने के लिए मिली है।”

     

    दिन बीतते रहे। एक दिन कबीर पार्क में अपने दोस्त का इंतजार कर रहा था। तभी उसकी नजर कुछ दूर बच्चों के साथ खेल रही एक लड़की पर पड़ी। वह बच्चों के साथ कभी झूला झूलती, कभी उन्हें पकड़म-पकड़ाई खिलाती, कभी उनकी छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हंस पड़ती।

     

    उसकी हंसी में ऐसा अपनापन था कि कबीर पहली बार किसी को देखकर चुप हो गया।

     

    वह खुद से बोला, “यार… कोई इतना मुस्कुरा कैसे सकता है?”

     

    उस दिन वह बिना दोस्त से मिले ही घर लौट आया, लेकिन उसका मन बार-बार उसी मुस्कुराती लड़की के पास चला जाता।

     

    अगले दिन वह फिर उसी समय पार्क पहुंच गया।

     

    लड़की फिर वहीं थी।

     

    कबीर अब रोज पार्क आने लगा। कभी दूर बैठकर उसे देखता, कभी बच्चों के साथ खेलते हुए उसकी हंसी सुनता। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि जिसे वह प्यार जैसी बेकार चीज समझता था, वही उसके दिल में घर बना चुकी है।

     

    एक दिन उसने हिम्मत जुटाई।

     

    “हाय… मैं कबीर।”

     

    लड़की मुस्कुराई।

     

    “मैं अन्वी।”

     

    “तुम रोज यहां आती हो?”

     

    “हां… बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है।”

     

    “और मुझे…”

     

    वह रुक गया।

     

    अन्वी हंस पड़ी।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे तुम्हें देखना अच्छा लगता है।”

     

    अन्वी हल्का सा शर्माकर दूसरी तरफ देखने लगी।

     

    उस दिन दोनों देर तक बातें करते रहे।

     

    अब उनकी मुलाकातें रोज होने लगीं। कबीर की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। जो लड़का पहले किसी की परवाह नहीं करता था, अब अन्वी के लिए फूल खरीदता, उसकी पसंद का खाना लाता और उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखता।

     

    एक दिन कबीर ने कहा,

     

    “अन्वी… मुझे तुमसे प्यार हो गया है।”

     

    अन्वी कुछ पल चुप रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “कबीर… ऐसा मत कहो।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस… मत कहो।”

     

    लेकिन कबीर कहां मानने वाला था।

     

    उसने कई दिनों तक उसे मनाया, समझाया और आखिर एक शाम पार्क के उसी पुराने पेड़ के नीचे घुटनों पर बैठकर बोला,

     

    “अगर तुम हां नहीं कहोगी तो मैं जिंदगी भर इंतजार करूंगा।”

     

    अन्वी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    उसने कांपते हुए हाथ से कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हां… मैं भी तुमसे प्यार करती हूं।”

     

    कबीर खुशी से झूम उठा।

     

    उसे लगा जैसे पूरी दुनिया उसकी हो गई।

     

    दोनों ने साथ घूमना शुरू किया। बारिश में भीगना, सड़क किनारे चाय पीना, बच्चों के साथ खेलना, छोटी-छोटी लड़ाइयां करना… हर दिन एक नई याद बन जाता।

     

    लेकिन कबीर ने एक बात नोटिस की।

     

    अन्वी बहुत जल्दी थक जाती थी।

     

    कभी अचानक पेट पकड़कर बैठ जाती।

     

    कभी दर्द में भी मुस्कुराने की कोशिश करती।

     

    एक दिन कबीर ने पूछा,

     

    “सच बताओ… तुम ठीक तो हो?”

     

    “हां… बस थोड़ी कमजोरी है।”

     

    वह बात टाल गई।

     

    कुछ दिन बाद अन्वी अचानक पार्क आना बंद हो गई।

     

    कबीर परेशान हो गया।

     

    उसने उसके घर का पता ढूंढ लिया और वहां पहुंच गया।

     

    दरवाजा उसकी मां ने खोला।

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “आंटी… अन्वी कहां है?”

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “बेटा… अस्पताल में है।”

     

    कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह दौड़ता हुआ अस्पताल पहुंचा।

     

    कमरे में अन्वी बिस्तर पर लेटी थी।

     

    चेहरा पहले जैसा मुस्कुराता जरूर था, लेकिन बहुत कमजोर हो चुका था।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या हुआ है तुम्हें?”

     

    अन्वी चुप रही।

     

    तभी डॉक्टर अंदर आए।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “उन्हें स्टमक कैंसर है… और बीमारी आखिरी स्टेज पर है।”

     

    यह सुनते ही कबीर जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    वह डॉक्टर से बोला,

     

    “कुछ तो होगा… इलाज… ऑपरेशन… कुछ भी।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब समय बहुत कम है।”

     

    कबीर वहीं फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    उस रात उसने पहली बार भगवान से प्रार्थना की।

     

    “मेरी सारी खुशियां ले लो… बस उसे ठीक कर दो।”

     

    लेकिन जिंदगी हर दुआ नहीं सुनती।

     

    अगले दिन कबीर अस्पताल पहुंचा तो देखा अन्वी खिड़की से बाहर बच्चों को खेलते हुए देख रही थी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “देखो… कितने खुश हैं ना?”

     

    कबीर ने आंसू छिपाते हुए कहा,

     

    “तुम भी ठीक होकर इनके साथ खेलोगी।”

     

    अन्वी ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    “शायद नहीं।”

     

    “ऐसा मत बोलो।”

     

    “कबीर… सच से भागने से सच बदल नहीं जाता।”

     

    कुछ देर बाद उसने अपने बैग से एक छोटी डायरी निकाली।

     

    “ये तुम्हारे लिए है।”

     

    कबीर ने खोला।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस दिन तुमने पहली बार कहा था कि तुम्हें मुझे देखना अच्छा लगता है, उसी दिन मुझे तुमसे प्यार हो गया था। लेकिन मैं तुम्हें अपने दर्द में बांधना नहीं चाहती थी। इसलिए बार-बार तुम्हें दूर करती रही।”

     

    कबीर रो पड़ा।

     

    “तुमने मुझसे छिपाया क्यों?”

     

    अन्वी बोली,

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी रुक जाए।”

     

    कबीर ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “अगर जिंदगी तुम्हारे बिना है… तो वह जिंदगी नहीं है।”

     

    अन्वी मुस्कुराई।

     

    “नहीं… तुम जीओगे। मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

     

    उस दिन दोनों ने घंटों बातें कीं।

     

    उन्होंने अपनी अधूरी इच्छाओं की एक सूची बनाई।

     

    एक साथ आइसक्रीम खाना।

     

    बारिश में भीगना।

     

    बच्चों को खिलौने बांटना।

     

    सूर्योदय देखना।

     

    अनाथालय जाकर बच्चों के साथ पूरा दिन बिताना।

     

    डॉक्टर की अनुमति से कबीर उसे व्हीलचेयर पर बाहर ले गया।

     

    दोनों ने हर छोटी इच्छा पूरी की।

     

    अन्वी दर्द में होती थी, लेकिन हर तस्वीर में मुस्कुरा रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी तबीयत और बिगड़ गई।

     

    अब वह ठीक से बोल भी नहीं पाती थी।

     

    एक रात कबीर उसके पास बैठा था।

     

    अन्वी ने बहुत मुश्किल से कहा,

     

    “कबीर…”

     

    “हां… मैं यहीं हूं।”

     

    “एक वादा करोगे?”

     

    “हजार करूँगा।”

     

    “मेरे जाने के बाद… फिर से पहले वाले कबीर मत बन जाना। लोगों से प्यार करना, बच्चों के साथ खेलना, मुस्कुराना… और अगर कभी कोई लड़की तुम्हारी जिंदगी में आए, तो उसे ये मत कहना कि प्यार बेकार होता है।”

     

    कबीर की रुलाई छूट गई।

     

    उसने सिर हिलाकर कहा,

     

    “वादा है।”

     

    अन्वी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा।

     

    उसके होंठों पर वही पहली मुलाकात वाली मासूम मुस्कान थी।

     

    धीरे-धीरे उसकी आंखें बंद हो गईं।

     

    कमरे में मशीन की सीधी आवाज गूंज उठी।

     

    कबीर का संसार उसी पल जैसे थम गया।

     

    कई महीने तक वह हर शाम उसी पार्क में जाता रहा, जहां पहली बार उसने अन्वी को बच्चों के साथ खिलखिलाते देखा था।

     

    एक दिन उसने देखा कि कुछ गरीब बच्चे पुराने झूले के पास उदास बैठे हैं।

     

    उसे अन्वी की बात याद आई—”मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

     

    उसने बच्चों के लिए खिलौने खरीदे, किताबें लाया और हर रविवार उनके साथ खेलना शुरू कर दिया।

     

    धीरे-धीरे शहर के लोग भी उससे जुड़ते गए। उसने अन्वी के नाम से एक छोटी संस्था बनाई, जहां कैंसर से जूझ रहे बच्चों और जरूरतमंद परिवारों की मदद की जाने लगी।

    अब जब भी कोई उससे पूछता, “क्या तुम्हें कभी सच्चा प्यार मिला था?”

     

    वह आसमान की ओर देखकर मुस्कुरा देता और कहता,

     

    “हां… मुझे प्यार मिला था। वह बहुत कम समय के लिए मेरी जिंदगी में आई, लेकिन उसने मुझे पूरी जिंदगी के लिए इंसान बना दिया। कुछ लोग सालों साथ रहकर भी याद नहीं बनते, और कुछ लोग कुछ महीनों में पूरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन जाते हैं। अन्वी चली गई, लेकिन उसकी मुस्कान आज भी हर उस बच्चे की हंसी में जिंदा है, जिसे देखकर कभी एक बेपरवाह लड़के को पहली बार प्यार का मतलब समझ आया।”

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बेवफ़ा

    बेवफ़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    “तुम जैसी बेवफा लड़की मैंने आज तक नहीं देखी!”

     

    रोहन की आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूंज रही थी। उसके हाथ में एक शादी का कार्ड था और सामने खड़ी थी नंदिनी, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

     

    “आज के बाद कभी अपनी शक्ल मत दिखाना मुझे। तुमने सिर्फ मेरा दिल नहीं तोड़ा, मेरे भरोसे को भी मार दिया।”

     

    इतना कहकर रोहन वहां से चला गया।

     

    नंदिनी चाहकर भी उसे रोक नहीं पाई। उसके होंठ कांप रहे थे, लेकिन शब्द जैसे गले में ही अटक गए थे।

     

    उस दिन उसने सिर्फ एक बात धीरे से कही थी…

     

    “हकीकत क्या थी, ये कभी तुमने जाना ही नहीं… और मुझे दे दिया एक नया नाम—बेवफा।”

     

    लेकिन उस आवाज़ को सुनने वाला वहां कोई नहीं था।

     

     

    रोहन और नंदिनी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। दोस्ती हुई, फिर दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों को खुद भी पता नहीं चला।

     

    चार साल तक दोनों ने हर सपना साथ देखा था।

     

    रोहन हमेशा कहता था, “अगर मेरी जिंदगी में कोई सबसे जरूरी है, तो वो सिर्फ तुम हो।”

     

    नंदिनी मुस्कुराकर जवाब देती, “और मेरी दुनिया भी तुमसे ही शुरू होकर तुम पर ही खत्म होती है।”

     

    दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया था।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा इंसान की सोच के हिसाब से नहीं चलती।

     

    एक दिन नंदिनी के पिता को अचानक हार्ट अटैक आ गया।

     

    घर में पहले से ही बहुत कर्ज था। इलाज के लिए पैसे नहीं थे।

     

    उसी समय एक अमीर परिवार ने रिश्ता भेजा।

     

    लड़के का नाम आदित्य था। उसने साफ कहा था, “अगर नंदिनी शादी के लिए हां कह दे, तो मैं उसके पिता का पूरा इलाज करवाऊंगा और उनका सारा कर्ज भी चुका दूंगा।”

     

    नंदिनी के सामने एक तरफ उसका प्यार था…

    और दूसरी तरफ उसके पिता की सांसें।

    उसने पूरी रात रो-रोकर बिताई।

     

    सुबह जब अस्पताल में डॉक्टर ने कहा, “अगर जल्दी ऑपरेशन नहीं हुआ तो मरीज को बचाना मुश्किल होगा।”

     

    तब उसने अपने दिल को मार दिया।

    उसने आदित्य से शादी के लिए हां कह दी।

    लेकिन रोहन को कुछ भी नहीं बताया।क्योंकि उसे पता था…

    अगर वह सच बताएगी, तो रोहन अपनी जान तक लगा देगा।

     

    वह कर्ज लेगा…

    घर बेच देगा…

    अपना भविष्य खत्म कर देगा और नंदिनी कभी नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से रोहन बर्बाद हो।

     

    इसलिए उसने खुद को ही गलत बना लिया।

     

    जब रोहन को नंदिनी की शादी की खबर मिली, तो उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई।

     

    उसने नंदिनी को फोन किया। लेकिन नंदिनी ने फोन नहीं उठाया।

    उसने मैसेज किया।

    “बस एक बार मिल लो। लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    असल में नंदिनी हर मैसेज पढ़ती थी…और रोते-रोते फोन बंद कर देती थी।

     

    उसे डर था कि अगर उसने एक बार भी रोहन की आवाज़ सुन ली, तो वह अपने फैसले से पीछे हट जाएगी।

     

    शादी हो गई। रोहन टूट गया।

     

    उसने अपने दोस्तों से सिर्फ एक बात कही—

    “जिस लड़की के लिए मैं सब कुछ छोड़ सकता था… उसने मुझे पैसों के लिए छोड़ दिया।”

     

    धीरे-धीरे यही बात सबकी जुबान पर आ गई।

     

    हर कोई नंदिनी को एक ही नाम से बुलाने लगा…

     

    “बेवफा।”

    शादी के बाद नंदिनी की जिंदगी बिल्कुल वैसी नहीं थी जैसी लोगों ने सोची थी।

     

    आदित्य बुरा इंसान नहीं था।

    उसे शादी से पहले ही सब सच पता चल गया था।

     

    उसने एक दिन नंदिनी से कहा,

    “मैं जानता हूं कि तुम्हारे दिल में किसी और का नाम है। मैंने सिर्फ एक इंसान की जान बचाने के लिए तुमसे शादी की है। मैं कभी तुम पर किसी रिश्ते का दबाव नहीं डालूंगा।”

     

    ये सुनकर नंदिनी और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    वह हर रात अपने कमरे में बैठकर रोहन की पुरानी तस्वीरें देखती।

     

    लेकिन कभी उसे फोन नहीं करती।

     

    क्योंकि अब उसके पास कोई हक नहीं बचा था।

     

    उधर रोहन ने खुद को काम में डुबो दिया।

     

    उसने कभी शादी नहीं की।

    जब भी कोई उससे शादी की बात करता, वह सिर्फ मुस्कुरा देता।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द साफ दिखाई देता था।

     

    पांच साल बीत गए।

     

    एक दिन रोहन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    उन्हें उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां कभी नंदिनी के पिता का इलाज हुआ था।

     

    वहीं अस्पताल में रोहन की मुलाकात पुराने डॉक्टर से हुई।

     

    डॉक्टर ने उसे पहचान लिया।

     

    बातों-बातों में उन्होंने कहा,

     

    “तुम वही रोहन हो ना? नंदिनी वाला लड़का?”

    रोहन चुप रहा।

    डॉक्टर बोले,बहुत बड़ी लड़की थी वो। अपने पिता को बचाने के लिए उसने अपना प्यार कुर्बान कर दिया।

     

    रोहन ने चौंककर पूछा,”क्या मतलब?”

     

    फिर डॉक्टर ने उसे पूरी कहानी बता दी।कर्ज…

    ऑपरेशन…

    समझौता…और नंदिनी की खामोश कुर्बानी।

     

    रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसकी आंखों से आंसू अपने आप बहने लगे।

    उसे पहली बार एहसास हुआ…

     

    जिसे वह पांच साल से बेवफा कहता रहा…

     

    असल में वह सबसे ज्यादा वफादार थी।

    रोहन उसी शाम नंदिनी के घर पहुंच गया।

     

    दरवाजा आदित्य ने खोला।

     

    रोहन ने कांपती आवाज़ में पूछा,”क्या मैं नंदिनी से मिल सकता हूं?”

     

    आदित्य ने कुछ पल उसे देखा…

     

    फिर बिना कुछ कहे अंदर जाने का इशारा कर दिया।

     

    नंदिनी बरामदे में बैठी थी।

     

    वह पहले से बहुत कमजोर लग रही थी।

     

    रोहन को देखकर उसकी आंखें भर आईं।

     

    कुछ देर दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रोहन उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।

     

    “मुझे माफ कर दो…”

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    रोहन रो पड़ा।

     

    “मैंने तुम्हें समझने की कोशिश ही नहीं की। तुम्हारी आंखों के पीछे छिपे दर्द को पढ़ा ही नहीं। बस लोगों की बातों पर यकीन कर लिया और तुम्हें बेवफा कह दिया।”

     

    नंदिनी की आंखों से भी आंसू बह निकले।

     

    वह बोली,

     

    “मैं चाहती तो सच बता सकती थी… लेकिन फिर तुम्हारी जिंदगी बिखर जाती। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे प्यार की कीमत तुम अपनी पूरी जिंदगी देकर चुकाओ।”

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

    लेकिन अब वक्त उनके हाथ से निकल चुका था।

    कुछ महीनों बाद नंदिनी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई।

    लगातार तनाव और दुख ने उसके शरीर को कमजोर कर दिया था।

    अस्पताल के कमरे में उसकी आखिरी सांसें चल रही थीं।

    रोहन उसके पास बैठा था।

    नंदिनी ने कांपते हुए उसका हाथ पकड़ा और मुस्कुराकर बोली,

    “देखो… इस बार रोना मत। मैं जा रही हूं, लेकिन एक बात याद रखना… किसी भी रिश्ते का फैसला सिर्फ सुनी-सुनाई बातों से मत करना। कभी-कभी जो इंसान सबसे ज्यादा गलत दिखाई देता है, वही सबसे ज्यादा टूटकर प्यार करता है।”

     

    रोहन की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे।

    नंदिनी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

    “हकीकत क्या थी… ये तुमने आखिर जान ही लिया… बस अफसोस इतना है कि थोड़ा देर से।”

    इतना कहकर उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

    नंदिनी के जाने के बाद रोहन अक्सर उसकी कब्र पर बैठा करता था।

    एक दिन उसने वहां एक छोटा-सा पत्थर लगवाया, जिस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी

    “जिसे दुनिया ने बेवफा कहा… वह अपने प्यार की सबसे सच्ची मिसाल थी।”

    उस दिन रोहन ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,

    “काश… मैंने लोगों की बातें सुनने से पहले तुम्हारी खामोशी सुन ली होती। शायद आज मेरी जिंदगी इतनी खाली न होती।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया, जैसे किसी ने उसके आंसू चुपचाप पोंछ दिए हों।

    और उस दिन रोहन को समझ आया कि हर अधूरी प्रेम कहानी में कोई बेवफा नहीं होता…

    कभी-कभी सिर्फ हालात ही इतने बेरहम होते हैं कि सच्चे प्यार को भी दुनिया बेवफाई का नाम दे देती है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अधूरी मुहब्बत की डायन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अधूरी मोहब्बत की डायन

     

    पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गांव के किनारे एक पुरानी हवेली थी। गांव वाले कहते थे कि वहां एक शातिर डायन रहती है। उसका नाम मायरा था। लोग कहते थे कि जिसने भी उसकी आंखों में देख लिया, वह कभी वापस नहीं लौटा। बच्चे शाम ढलते ही घरों में बंद हो जाते और बड़े भी उस रास्ते से गुजरने की हिम्मत नहीं करते।

     

    लेकिन कोई नहीं जानता था कि मायरा हमेशा से डायन नहीं थी।

     

    सालों पहले वह एक बेहद खूबसूरत लड़की थी। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी कि हर कोई उसे देखकर खुश हो जाता। वह जंगल से जड़ी-बूटियां लाकर गांव वालों का इलाज करती थी। मगर गांव के कुछ लालची लोगों को उसका हुनर पसंद नहीं था। उन्होंने उस पर काला जादू करने का झूठा इल्जाम लगा दिया।

     

    उसी गांव में आरव नाम का एक युवक रहता था। वह मायरा से दिल ही दिल में प्यार करता था और मायरा भी उसे अपनी पूरी दुनिया मानती थी।

     

    एक शाम आरव ने कहा, “मायरा, मैं जल्दी ही तुम्हें अपने घर की बहू बनाऊंगा। चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो जाए।”

     

    मायरा मुस्कुरा दी। “बस इतना वादा है कि कभी मेरा साथ मत छोड़ना।”

     

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

     

    गांव वालों ने मायरा को पकड़कर जंगल के बीच बने पुराने मंदिर में जिंदा जलाने का फैसला कर लिया। आरव ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कुछ लोगों ने उसे बांध दिया।

     

    आग की लपटों में घिरी मायरा की आखिरी चीख पूरे जंगल में गूंज उठी।

     

    “अगर मेरा प्यार अधूरा रहा… तो मेरी आत्मा कभी शांति नहीं पाएगी…”

     

    उस रात तेज तूफान आया। बिजली कड़की और मंदिर के पास खड़ा बरगद का पेड़ दो हिस्सों में टूट गया।

     

    अगली सुबह मायरा की राख तो मिली, लेकिन उसका शरीर नहीं।

     

    उस दिन के बाद गांव में अजीब घटनाएं होने लगीं।

     

    रात होते ही लोगों को सफेद साड़ी पहने एक औरत दिखाई देती। जो भी उसका पीछा करता, वह हमेशा के लिए गायब हो जाता।

     

    धीरे-धीरे लोगों ने उसे शातिर डायन कहना शुरू कर दिया।

     

    मायरा अब इंसानों से नफरत करती थी। उसने कसम खा ली थी कि कोई भी प्रेम कहानी पूरी नहीं होने देगी।

     

    जिस गांव में शादी होती, वहां कोई न कोई अनहोनी हो जाती।

     

    कभी दूल्हा गायब हो जाता, कभी दुल्हन।

     

    लोग डर के मारे रात में शादी करना छोड़ चुके थे।

     

    लेकिन सच यह था कि मायरा हर प्रेमी जोड़े में खुद और आरव को ढूंढती थी।

     

    जब भी वह किसी को खुश देखती, उसका अपना टूटा हुआ दिल फिर से रो पड़ता।

     

    एक दिन गांव में विवान नाम का युवक अपनी मां के साथ रहने आया।

     

    वह पढ़ा-लिखा और निडर था।

     

    गांव वालों ने उसे चेतावनी दी, “हवेली के पास मत जाना। वहां मौत रहती है।”

     

    विवान हंसकर बोला, “अगर वहां कोई है, तो उसकी भी कोई कहानी होगी।”

     

    एक रात वह सच जानने के लिए हवेली पहुंच गया।

     

    अंदर चारों तरफ धूल जमी थी।

     

    अचानक ठंडी हवा चली।

     

    दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    पीछे से एक आवाज आई, “यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?”

     

    विवान ने पलटकर देखा।

     

    सामने लाल आंखों वाली एक औरत खड़ी थी।

     

    लंबे खुले बाल, सफेद साड़ी और चेहरे पर दर्द से भरी मुस्कान।

     

    वह मायरा थी।

     

    उसने अपने लंबे नाखून विवान की गर्दन पर रख दिए।

     

    “डर नहीं लगता?”

     

    विवान बोला, “डर उस इंसान से लगता है जिसके अंदर बुराई हो। तुम्हारी आंखों में तो सिर्फ दर्द दिखाई दे रहा है।”

     

    यह सुनकर मायरा कुछ पल के लिए चुप हो गई।

     

    सदियों बाद किसी ने उसे राक्षस नहीं, इंसान समझा था।

     

    मगर अगले ही पल वह फिर कठोर बन गई।

     

    “मेरे पास दया मांगने मत आना।”

     

    विवान बोला, “मैं दया नहीं… तुम्हारी कहानी सुनने आया हूं।”

     

    मायरा ने पहली बार किसी इंसान को जिंदा छोड़ दिया।

     

    उस रात दोनों घंटों तक बात करते रहे।

     

    मायरा ने अपनी अधूरी मोहब्बत का हर दर्द उसे बताया।

     

    विवान सब सुनता रहा।

     

    अगले कई दिनों तक वह रोज हवेली जाने लगा।

     

    गांव वालों ने उसे बहुत रोका।

     

    लेकिन वह नहीं माना।

     

    धीरे-धीरे मायरा के चेहरे पर फिर मुस्कान लौटने लगी।

     

    उसे लगने लगा कि शायद इस बार किस्मत उस पर मेहरबान हो जाएगी।

     

    लेकिन उसके दिल में एक डर भी था।

     

    वह जानती थी कि वह अब इंसान नहीं रही।

     

    एक रात उसने विवान से पूछा, “अगर मैं पहले जैसी होती… तो क्या तुम मुझे अपनाते?”

     

    विवान ने बिना सोचे कहा, “दिल से चाहने वालों का चेहरा नहीं देखा जाता।”

     

    मायरा की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    सैकड़ों साल बाद उसने फिर किसी पर भरोसा किया।

     

    लेकिन किस्मत ने एक बार फिर उसके साथ खेल खेला।

     

    गांव वालों को पता चल गया कि विवान रोज हवेली जाता है।

     

    उन्होंने फैसला किया कि इस बार डायन का हमेशा के लिए अंत कर देंगे।

     

    हथियारों और मशालों के साथ पूरा गांव हवेली पहुंच गया।

     

    विवान उनके सामने खड़ा हो गया।

     

    “कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा।”

     

    लोग चिल्लाए, “यह डायन है। इसने हमारे लोगों की जान ली है।”

     

    मायरा धीरे-धीरे बाहर आई।

     

    उसने गांव वालों को देखा।

     

    फिर विवान की तरफ मुस्कुराकर बोली, “आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है।”

     

    विवान उसका हाथ पकड़ना चाहता था।

     

    लेकिन मायरा पीछे हट गई।

     

    “नहीं… इस बार मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।”

     

    उसने अपनी सारी जादुई शक्ति इकट्ठी की।

     

    पूरा आसमान काले बादलों से भर गया।

     

    हवा इतनी तेज चलने लगी कि लोगों के हाथों की मशालें बुझ गईं।

     

    मगर मायरा ने किसी पर हमला नहीं किया।

     

    उसने सिर्फ विवान की तरफ देखा।

     

    “मैंने एक बार किसी इंसान से दिल से प्यार किया था… लेकिन उसे कभी पा नहीं सकी। आज फिर वही मोड़ सामने है। अगर इस बार भी तुम्हें अपने पास रखूंगी, तो पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन बन जाएगी।”

     

    विवान की आंखें भर आईं।

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

     

    मायरा हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “कुछ प्यार साथ रहने के लिए नहीं… याद बन जाने के लिए होते हैं।”

     

    इतना कहकर उसने अपना सारा जादू खुद पर ही चला दिया।

     

    तेज रोशनी हुई।

     

    जब रोशनी खत्म हुई, तो हवेली, काला जादू और मायरा… सब गायब हो चुके थे।

     

    वह हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गई।

     

    विवान वहीं घुटनों के बल बैठकर रोता रहा।

     

    उसके हाथ में केवल मायरा की चांदी की एक पुरानी पायल बची थी।

     

    उस दिन के बाद उस गांव में फिर कभी किसी ने डायन नहीं देखी।

     

    लेकिन हर साल उसी रात हवेली वाली जगह पर रातरानी के फूल अपने आप खिल जाते।

     

    लोग कहते हैं कि वह मायरा की

    आखिरी निशानी है।

     

    वह शातिर जरूर थी, उसने कई लोगों से बदला भी लिया था, लेकिन जब उसने पहली और आखिरी बार किसी इंसान को सच्चे दिल से चाहा, तब भी किस्मत ने उसे उसका प्यार नहीं दिया।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं