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नन्हा दीपक और अँधेरे का डर😱

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

Q 

एक छोटे-से गाँव में मोहन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत समझदार और प्यारा बच्चा था, लेकिन उसे एक चीज़ से बहुत डर लगता था—अँधेरे से।

 

जैसे ही शाम होती और सूरज आसमान से विदा लेने लगता, मोहन अपनी माँ के पास जाकर बैठ जाता।

 

“माँ, आज जल्दी दिया जला दो ना,” वह डरते हुए कहता।

 

माँ मुस्कुराकर कहतीं, “बेटा, अँधेरा डरने की चीज़ नहीं है। अँधेरे के बाद ही तो उजाला आता है।”

 

लेकिन मोहन को माँ की बात समझ नहीं आती थी।

 

एक दिन गाँव में बहुत तेज़ आँधी आई। पेड़ हिलने लगे, खिड़कियाँ जोर-जोर से बजने लगीं और कुछ ही देर में पूरे गाँव की बिजली चली गई।

 

घर में चारों तरफ अँधेरा छा गया।

 

मोहन डरकर माँ से लिपट गया।

 

“माँ, बहुत अँधेरा है।”

 

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “डर मत बेटा। हमारे पास एक छोटा-सा दीपक है।”

 

माँ ने अलमारी से मिट्टी का एक पुराना दीपक निकाला। उसमें तेल डाला और बाती जलाकर उसे मोहन के हाथ में दे दिया।

 

दीपक की छोटी-सी लौ कमरे में हल्की रोशनी फैलाने लगी।

 

मोहन ने आश्चर्य से दीपक को देखा।

 

“इतना छोटा दीपक और इतनी रोशनी?”

 

माँ हँसते हुए बोलीं, “हाँ बेटा, रोशनी हमेशा बड़ी चीज़ से नहीं होती। कभी-कभी एक छोटी-सी लौ भी बहुत बड़े अँधेरे को हरा देती है।”

 

मोहन देर तक दीपक को देखता रहा।

 

उसी रात उसने मन ही मन तय किया कि अब वह अपने डर से भागेगा नहीं।

 

अगली सुबह आँधी रुक चुकी थी। गाँव में जगह-जगह पेड़ों की टहनियाँ गिरी थीं। रास्ते भी कीचड़ से भर गए थे।

 

मोहन अपने दोस्तों के साथ बाहर खेलने निकला। तभी उसे रास्ते के किनारे एक छोटी बच्ची दिखाई दी। वह रो रही थी।

 

मोहन उसके पास गया।

 

“तुम क्यों रो रही हो?”

 

बच्ची ने आँसू पोंछते हुए कहा, “मेरा नाम रानी है। मैं रास्ता भूल गई हूँ। मुझे घर नहीं मिल रहा।”

 

मोहन ने चारों तरफ देखा। रास्ता सुनसान था। थोड़ी दूर पर एक कच्चा रास्ता जंगल की तरफ जाता था।

 

मोहन को भी डर लग रहा था, लेकिन उसने रानी को अकेला नहीं छोड़ा।

 

“डरो मत। हम दोनों मिलकर तुम्हारा घर ढूँढ़ेंगे।”

 

दोनों आगे बढ़ने लगे।

 

कुछ दूर जाते ही रास्ता और अँधेरा हो गया। पेड़ों की घनी शाखाओं के कारण सूरज की रोशनी भी जमीन तक नहीं पहुँच रही थी।

 

मोहन के मन में फिर डर पैदा हुआ।

 

उसे माँ की बात याद आई—“डर के आगे ही साहस छिपा होता है।”

 

उसने रानी का हाथ पकड़ा और बोला, “हम डरेंगे नहीं।”

 

तभी उसे अपनी जेब में कुछ महसूस हुआ।

 

वह वही छोटा दीपक था, जिसे उसकी माँ ने सुबह उसे रास्ते के लिए दे दिया था। माँ ने जाते समय कहा था, “कभी किसी को इसकी जरूरत पड़े तो इसे जरूर जलाना।”

 

मोहन ने दीपक जलाया।

 

छोटी-सी लौ ने उनके आसपास का रास्ता रोशन कर दिया।

 

रानी मुस्कुराई।

 

“मोहन, तुम तो बहुत बहादुर हो!”

 

मोहन भी मुस्कुरा दिया।

 

कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक बूढ़े बाबा मिले। उन्होंने रानी को पहचान लिया।

 

“अरे, तुम तो रामू काका की बेटी हो! तुम्हारा घर तो गाँव के दूसरी तरफ है।”

 

बाबा दोनों बच्चों को गाँव तक लेकर आए।

 

रानी को देखते ही उसके माता-पिता की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

 

रानी की माँ ने मोहन को गले लगाकर कहा, “बेटा, आज तुमने मेरी बच्ची को घर पहुँचाया है। भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।”

 

मोहन चुपचाप मुस्कुराता रहा।

 

उस दिन उसे पहली बार समझ आया कि बहादुर वह नहीं होता जिसे डर नहीं लगता। बहादुर तो वह होता है जो डर लगने के बाद भी सही काम करने की हिम्मत रखता है।

 

कुछ दिनों बाद गाँव में एक और घटना हुई।

 

गाँव के स्कूल में बच्चों को पौधे लगाने के लिए कहा गया। सभी बच्चों ने एक-एक पौधा लगाया, लेकिन कुछ दिनों बाद कई बच्चे अपने पौधों को पानी देना भूल गए।

 

मोहन रोज अपने पौधे को पानी देता।

 

उसका दोस्त सोनू बोला, “मोहन, तुम रोज-रोज इतना काम क्यों करते हो? पौधा अपने आप बड़ा हो जाएगा।”

 

मोहन ने कहा, “अगर हम उसकी देखभाल नहीं करेंगे, तो वह कैसे बड़ा होगा?”

 

दिन बीतते गए।

 

कुछ महीनों बाद मोहन का पौधा एक सुंदर पेड़ बन गया, जबकि बाकी कई पौधे सूख गए।

 

स्कूल के अध्यापक ने मोहन को बुलाकर कहा, “बच्चों, मोहन ने हमें एक बहुत अच्छी बात सिखाई है। किसी भी चीज़ को बड़ा बनने के लिए मेहनत, धैर्य और देखभाल की जरूरत होती है।”

 

सोनू ने सिर झुकाकर कहा, “अब मैं भी अपने पौधे की देखभाल करूँगा।”

 

मोहन मुस्कुराया।

 

समय बीतता गया। अब मोहन बड़ा हो रहा था। उसका अँधेरे का डर भी धीरे-धीरे खत्म हो चुका था।

 

एक रात वह अपनी माँ के साथ घर के बाहर बैठा था। आसमान में बहुत सारे तारे चमक रहे थे।

 

मोहन ने माँ से कहा, “माँ, अब मुझे अँधेरे से डर नहीं लगता।”

 

माँ ने पूछा, “ऐसा क्यों?”

 

मोहन ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि अब मुझे पता है कि अँधेरा कितना भी बड़ा हो, अगर हम एक छोटी-सी रोशनी जलाने की हिम्मत रखें, तो रास्ता जरूर मिल जाता है।”

 

माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“बिल्कुल बेटा। और जिंदगी में भी ऐसा ही होता है। मुश्किलें अँधेरे की तरह होती हैं। हमें उनसे भागना नहीं चाहिए। हमें अपने अंदर की छोटी-सी उम्मीद को जलाए रखना चाहिए।”

 

मोहन ने आसमान की तरफ देखा।

 

उसे लगा जैसे सारे तारे भी उसी की बात सुनकर मुस्कुरा रहे हों।

 

उस दिन से मोहन ने एक बात हमेशा याद रखी—

 

“मुश्किल समय में हार मान लेना आसान है, लेकिन उम्मीद की छोटी-सी लौ जलाए रखना ही असली हिम्मत है।”

 

और वह छोटा-सा दीपक?

 

मोहन ने उसे संभालकर अपने कमरे में रख लिया।

 

जब भी कोई बच्चा डरकर उसके पास आता, वह दीपक दिखाकर कहता—

 

“देखो, रोशनी कितनी छोटी है… लेकिन अँधेरे से लड़ने के लिए इतनी ही काफी है।”

 

सीख

 

हमें मुश्किलों और डर से भागना नहीं चाहिए। साहस, मेहनत और उम्मीद के साथ आगे बढ़ने वाला इंसान बड़ी से बड़ी परेशानी को भी पार कर सकता है। साथ ही, हमें जरूरत के समय दूसरों की मदद जरूर करनी चाहिए।

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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