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उपमन्यु की अटूट शिवभक्ति

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

 

बहुत समय पहले की बात है। हिमालय की गोद में एक छोटा-सा आश्रम था। वहाँ एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और छोटे पुत्र उपमन्यु के साथ रहते थे।

 

परिवार बहुत गरीब था।

 

आश्रम में न धन था, न भंडार में अनाज की भरमार और न ही सुख-सुविधाओं का कोई साधन।

 

लेकिन उस घर में एक चीज बहुत अधिक थी—

 

संस्कार।

 

उपमन्यु की माता बहुत धर्मपरायण स्त्री थीं। वे अपने पुत्र को बचपन से ही भगवान शिव की महिमा सुनाया करती थीं।

 

वह अक्सर कहतीं—

 

“बेटा, संसार में धन समाप्त हो सकता है, भोजन समाप्त हो सकता है, शरीर भी एक दिन समाप्त हो जाता है, लेकिन भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती।”

 

उपमन्यु अपनी माता की बातें ध्यान से सुनता था।

 

वह अभी बहुत छोटा था, इसलिए उसे संसार की चालाकियों का ज्ञान नहीं था।

 

जो उसकी माता कहतीं, वह उसे सत्य मानता था।

 

एक दिन की बात है।

 

उपमन्यु ने पास के एक समृद्ध आश्रम में जाकर कुछ बच्चों को दूध पीते देखा।

 

उनके हाथ में मिट्टी के पात्र थे और उनमें सफेद, गाढ़ा दूध भरा था।

 

उपमन्यु ने पहली बार इतना दूध देखा।

 

उसने एक बच्चे से पूछा,

 

“यह क्या है?”

 

बच्चे ने हँसकर कहा,

 

“तुम्हें इतना भी नहीं पता? यह दूध है। बहुत स्वादिष्ट होता है।”

 

उपमन्यु ने थोड़ा-सा दूध माँगा।

 

उसे दूध पीने को मिला।

 

दूध का स्वाद उसके मन में बस गया।

 

जब वह अपने आश्रम वापस लौटा, तो उसने अपनी माता से कहा,

 

“माँ, मुझे भी दूध चाहिए।”

 

माता मुस्कुराईं।

 

उन्होंने घर में देखा।

 

लेकिन घर में दूध नहीं था।

 

उन्होंने थोड़ा-सा आटा और पानी मिलाकर एक पतला-सा घोल बनाया और उसे दूध जैसा बनाकर उपमन्यु को दे दिया।

 

उपमन्यु ने उसे पी लिया।

 

लेकिन कुछ ही देर बाद उसने कहा,

 

“माँ, यह दूध नहीं है।”

 

माता चुप हो गईं।

 

उपमन्यु ने फिर पूछा,

 

“माँ, हमारे घर में दूध क्यों नहीं है?”

 

माता की आँखें नम हो गईं।

 

उन्होंने कहा,

 

“बेटा, हम गरीब हैं। हमारे पास गाय नहीं है। इसलिए मैं तुम्हें दूध नहीं दे सकती।”

 

उपमन्यु बोला,

 

“तो हम गाय क्यों नहीं खरीद लेते?”

 

माता ने धीरे से कहा,

 

“हमारे पास उसे खरीदने के लिए धन नहीं है।”

 

बालक कुछ देर शांत रहा।

 

फिर उसने अपनी माता से पूछा,

 

“क्या भगवान हमारे लिए गाय नहीं ला सकते?”

 

माता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

 

“बेटा, भगवान सबकी सुनते हैं। यदि तुम सच्चे मन से भगवान शिव की भक्ति करो, तो वे तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे।”

 

उपमन्यु की आँखें चमक उठीं।

 

उसने पूछा,

 

“माँ, भगवान शिव कहाँ रहते हैं?”

 

माता ने कहा,

 

“वे कैलाश पर निवास करते हैं, लेकिन सच्चे भक्त के लिए वे उसके हृदय में भी रहते हैं।”

 

उपमन्यु ने पूछा,

 

“अगर मैं उन्हें बुलाऊँ तो क्या वे आएँगे?”

 

माता ने कहा,

 

“यदि तुम्हारी पुकार सच्ची होगी, तो महादेव तुम्हारी पुकार अवश्य सुनेंगे।”

 

बस यही बात उस बालक के हृदय में बैठ गई।

 

उसने उसी क्षण निर्णय कर लिया—

 

“मैं भगवान शिव को प्रसन्न करके ही रहूँगा।”

 

 

बालक की कठोर तपस्या

 

अगली सुबह उपमन्यु जंगल की ओर चला गया।

 

वह एक शांत स्थान पर बैठ गया।

 

उसने अपने सामने मिट्टी से एक छोटा-सा शिवलिंग बनाया।

 

उसने हाथ जोड़कर कहा,

 

“हे महादेव, मेरी माता ने कहा है कि आप अपने भक्त की पुकार सुनते हैं। मैं आपको बुला रहा हूँ। कृपया मेरे पास आइए।”

 

फिर उसने आँखें बंद कीं और जाप करने लगा—

 

“ॐ नमः शिवाय…

ॐ नमः शिवाय…

ॐ नमः शिवाय…”

 

वह बालक था।

 

उसे पूजा की बड़ी विधि नहीं आती थी।

 

उसे मंत्रों का पूरा ज्ञान नहीं था।

 

लेकिन उसके भीतर विश्वास था।

 

वह प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाता।

 

जंगल से फूल लाता।

 

बेलपत्र खोजकर लाता।

 

और भगवान शिव से केवल एक ही बात कहता—

 

“महादेव, मुझे दूध चाहिए।”

 

लेकिन धीरे-धीरे उसकी माँ की कही हुई बात उसके मन में बदलने लगी।

 

अब वह केवल दूध के लिए भगवान को नहीं पुकारता था।

 

वह कहने लगा—

 

“महादेव, मुझे अपने चरणों की भक्ति चाहिए।”

 

“मुझे ऐसा मन दीजिए जो आपको कभी न भूले।”

 

“मेरी माता को सुख दीजिए।”

 

दिन बीतते गए।

 

उपमन्यु की तपस्या बढ़ती गई।

 

कथा-परंपरा के अनुसार उसने अत्यंत कठिन तप किया।

 

उसने भोजन तक का त्याग कर दिया।

 

उसका शरीर कमजोर होने लगा।

 

लेकिन उसका विश्वास और मजबूत होता गया।

 

 

देवताओं में चिंता

 

उपमन्यु की भक्ति देखकर देवताओं को भी आश्चर्य हुआ।

 

एक छोटा बालक इतनी कठोर तपस्या कर रहा था।

 

उसकी एक ही इच्छा थी—

 

भगवान शिव के दर्शन।

 

भगवान शिव ने कैलाश से उस बालक की भक्ति देखी।

 

माता पार्वती ने पूछा,

 

“स्वामी, यह बालक इतना कठोर तप क्यों कर रहा है?”

 

शिवजी मुस्कुराए।

 

“देवी, यह बालक दूध माँगते-माँगते अब मुझे माँगने लगा है।”

 

माता पार्वती ने कहा,

 

“तो फिर आप इसे दर्शन क्यों नहीं देते?”

 

भगवान शिव बोले,

 

“भक्ति की परीक्षा के बिना उसका प्रेम कितना गहरा है, यह कैसे पता चलेगा?”

 

माता पार्वती मुस्कुराईं।

 

“आप भी अपने भक्तों की बहुत परीक्षा लेते हैं।”

 

महादेव बोले,

 

“परीक्षा भक्त को तोड़ने के लिए नहीं होती, देवी। परीक्षा यह दिखाने के लिए होती है कि उसके भीतर का विश्वास कितना मजबूत है।”

 

 

भगवान शिव ने बदला रूप

 

एक दिन भगवान शिव ने एक देवता का रूप धारण किया और उपमन्यु के सामने प्रकट हुए।

 

उन्होंने कहा,

 

“बालक, तुम किसकी तपस्या कर रहे हो?”

 

उपमन्यु ने आँखें खोलीं।

 

“भगवान शिव की।”

 

उस व्यक्ति ने कहा,

 

“तुम भगवान शिव की तपस्या क्यों कर रहे हो?”

 

उपमन्यु ने कहा,

 

“क्योंकि वे मेरे भगवान हैं।”

 

वह व्यक्ति हँसकर बोला,

 

“तुम्हें पता भी है कि शिव कौन हैं?”

 

उपमन्यु शांत रहा।

 

उसने कहा,

 

“वे मेरे महादेव हैं।”

 

उस व्यक्ति ने कहा,

 

“वे तो भस्म लगाते हैं। उनके गले में साँप रहता है। वे श्मशान में रहते हैं। उनके पास धन-दौलत नहीं है। तुम किसी दूसरे देवता की पूजा क्यों नहीं करते? वे तुम्हें दूध, धन और सुख सब दे सकते हैं।”

 

उपमन्यु ने दृढ़ स्वर में कहा,

 

“मुझे ऐसा धन नहीं चाहिए जो मुझे मेरे महादेव से दूर कर दे।”

 

उस व्यक्ति ने फिर कहा,

 

“यदि मैं तुम्हें बहुत सारा धन दे दूँ तो?”

 

“नहीं।”

 

“यदि मैं तुम्हें दूध से भरा हुआ समुद्र दे दूँ तो?”

 

उपमन्यु ने कहा,

 

“मुझे दूध का समुद्र भी नहीं चाहिए यदि उसके बदले मुझे शिवभक्ति छोड़नी पड़े।”

 

अब उस व्यक्ति ने कहा,

 

“यदि तुम शिव की पूजा छोड़ दो तो मैं तुम्हें वह सब दे सकता हूँ जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।”

 

उपमन्यु ने आँखें बंद कर लीं।

 

उसके चेहरे पर अद्भुत तेज था।

 

उसने कहा,

 

“आप चाहे मुझे संसार का सबसे बड़ा राज्य दे दें, लेकिन मैं अपने महादेव का अपमान सुनकर भी चुप नहीं रह सकता।”

 

फिर उसने कहा,

 

“जिस भगवान ने मुझे जीवन दिया, जिनका नाम मेरी माता ने मुझे सिखाया, जिनके चरणों में मैंने अपना मन समर्पित किया—मैं उनके बारे में कोई अपमानजनक बात नहीं सुन सकता।”

 

उसने उस व्यक्ति की ओर देखा।

 

“आप यहाँ से चले जाइए।”

 

 

भक्ति की अंतिम परीक्षा

 

उपमन्यु ने शिव की ओर मुख करके प्रार्थना की—

 

“हे महादेव, यदि मेरी भक्ति सच्ची है तो मुझे अपनी शरण में स्वीकार कीजिए।”

 

उसने अपनी तपस्या और अधिक कठोर कर दी।

 

तभी अचानक आकाश में तेज प्रकाश फैल गया।

 

दिशाएँ दिव्य प्रकाश से भर गईं।

 

डमरू की ध्वनि सुनाई दी।

 

चारों ओर “हर हर महादेव” की गूँज होने लगी।

 

उपमन्यु ने आँखें खोलीं।

 

उसके सामने स्वयं भगवान शिव खड़े थे।

 

जटाओं में गंगा।

 

मस्तक पर चंद्रमा।

 

गले में सर्प।

 

हाथ में त्रिशूल।

 

चेहरे पर करुणा।

 

और उनके साथ माता पार्वती भी थीं।

 

उपमन्यु की आँखों से आँसू बहने लगे।

 

वह तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ा।

 

“महादेव!”

 

भगवान शिव ने उसे उठाया।

 

“वत्स, तुम्हारी भक्ति ने मुझे प्रसन्न कर दिया।”

 

उपमन्यु रोते हुए बोला,

 

“प्रभु, मुझे क्षमा कर दीजिए। मैंने आपको केवल दूध के लिए पुकारा था।”

 

महादेव मुस्कुराए।

 

“नहीं वत्स। तुमने दूध माँगकर शुरुआत की थी, लेकिन तुम्हारी भक्ति ने तुम्हें मुझ तक पहुँचा दिया।”

 

उन्होंने कहा,

 

“जो भक्त संसार की वस्तु माँगते-माँगते अंत में भगवान को ही माँगने लगे, उससे बड़ा भाग्यवान कौन हो सकता है?”

 

माता पार्वती ने उपमन्यु के सिर पर हाथ रखा।

 

“वत्स, आज से तुम हमारे प्रिय भक्तों में गिने जाओगे।”

 

भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया।

 

कथा-परंपरा में वर्णित है कि महादेव ने उपमन्यु को दिव्य वरदान प्रदान किए और उसके जीवन को समृद्ध किया।

 

जिस दूध के लिए वह बालक रोया था, उसके लिए अब उसे संसार के किसी धन पर निर्भर नहीं रहना था।

 

लेकिन उपमन्यु के लिए सबसे बड़ा वरदान था—

 

शिवभक्ति।

 

 

उपमन्यु अपनी माता के पास लौटा

 

उपमन्यु अपनी माता के पास वापस आया।

 

माता ने उसे देखा तो उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

 

उन्होंने पूछा,

 

“बेटा, तुम्हें भगवान शिव के दर्शन हुए?”

 

उपमन्यु ने माँ के चरण पकड़ लिए।

 

“हाँ माँ।”

 

माता ने कहा,

 

“उन्होंने तुम्हें क्या दिया?”

 

उपमन्यु ने मुस्कुराकर कहा,

 

“माँ, उन्होंने मुझे वह दिया जो संसार का कोई धन नहीं दे सकता।”

 

“क्या?”

 

“अपनी भक्ति।”

 

माता ने उसे गले लगा लिया।

 

उन्होंने कहा,

 

“बेटा, आज मेरी तपस्या सफल हो गई।”

 

उपमन्यु बोला,

 

“माँ, आपने ही तो मुझे बताया था कि सच्चे मन से भगवान को पुकारने पर वे अवश्य सुनते हैं।”

 

माता मुस्कुराईं।

 

“हाँ बेटा। लेकिन आज तुमने यह बात स्वयं संसार को दिखा दी।”

 

 

इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?

 

उपमन्यु की कथा केवल एक बालक और भगवान शिव की कहानी नहीं है।

 

यह हमें बताती है कि उम्र छोटी हो सकती है, लेकिन विश्वास बड़ा हो सकता है।

 

उपमन्यु के पास धन नहीं था।

 

उसके पास साधन नहीं थे।

 

उसके पास कोई बड़ी शक्ति नहीं थी।

 

लेकिन उसके पास विश्वास था।

 

और जब विश्वास सच्चा हो, तो एक छोटा-सा बालक भी ऐसी शक्ति प्राप्त कर सकता है कि स्वयं महादेव उसकी परीक्षा लेने के लिए उसके सामने आ जाएँ।

 

आज हम छोटी-सी असफलता से परेशान हो जाते हैं।

 

किसी ने हमारी मेहनत की प्रशंसा नहीं की तो हम काम करना छोड़ देते हैं।

 

एक बार असफल हुए तो कहते हैं—

 

“मुझसे नहीं होगा।”

 

लेकिन उपमन्यु हमें सिखाता है—

 

“यदि लक्ष्य सच्चा है और विश्वास अटूट है, तो कठिनाई चाहे जितनी बड़ी हो, मार्ग अवश्य निकलता है।”

 

 

भगवान तुरंत क्यों नहीं मिलते?

 

कई बार हम भगवान से प्रार्थना करते हैं और सोचते हैं कि हमारी इच्छा तुरंत पूरी क्यों नहीं हुई?

 

लेकिन याद रखिए—

 

भगवान हमारी प्रार्थना सुनते हैं, पर उसका उत्तर अपने समय पर देते हैं।

 

कभी उत्तर “हाँ” होता है।

 

कभी “नहीं”।

 

और कभी भगवान कहते हैं—

 

“थोड़ा और प्रतीक्षा करो, मैं तुम्हें तुम्हारी माँगी हुई वस्तु से भी बड़ा कुछ देने वाला हूँ।”

 

उपमन्यु ने दूध माँगा था।

 

लेकिन महादेव ने उसे अपनी भक्ति दे दी।

 

यही भगवान की कृपा का रहस्य है।

 

हम छोटी चीज माँगते हैं।

 

भगवान हमें बड़ी चीज देने की तैयारी कर रहे होते हैं।

 

 

महादेव की महिमा

 

भगवान शिव को आशुतोष कहा जाता है।

 

अर्थात वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं।

 

उन्हें बड़े-बड़े राजमहल नहीं चाहिए।

 

उन्हें महंगे आभूषण नहीं चाहिए।

 

उन्हें भक्त के हृदय की सच्चाई चाहिए।

 

एक बेलपत्र भी उन्हें प्रिय हो सकता है।

 

एक लोटा जल भी उन्हें प्रिय हो सकता है।

 

और सच्चे मन से बोला गया एक—

 

“ॐ नमः शिवाय”

 

भी भक्त और भगवान के बीच का संबंध जोड़ सकता है।

 

महादेव की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे अपने भक्तों में भेदभाव नहीं करते।

 

जो उन्हें सच्चे मन से पुकारता है, वे उसकी पुकार सुनते हैं।

 

कभी परीक्षा लेकर।

 

कभी मार्ग दिखाकर।

 

कभी शक्ति देकर।

 

और कभी स्वयं उसके जीवन में आकर।

 

 

अंतिम संदेश

 

इसलिए यदि आज आपके जीवन में कोई समस्या है, तो निराश मत होइए।

 

यदि आपकी मेहनत का परिणाम नहीं मिल रहा, तो प्रयास मत छोड़िए।

 

यदि लोग आपका मजाक उड़ाते हैं, तो अपने लक्ष्य से पीछे मत हटिए।

 

और यदि आपको लगता है कि आपकी प्रार्थना भगवान तक नहीं पहुँच रही, तो विश्वास मत खोइए।

 

हो सकता है भगवान आपको देख रहे हों।

 

हो सकता है आपकी परीक्षा चल रही हो।

 

हो सकता है आपकी प्रार्थना का उत्तर आने वाला हो।

 

बस अपने मन में यह विश्वास बनाए रखिए—

 

“मेरे महादेव मेरे साथ हैं।”

 

क्योंकि जब इंसान अपने कर्म करता है और उसके साथ भगवान पर अटूट विश्वास जुड़ जाता है, तो कठिन से कठिन रास्ता भी पार किया जा सकता है।

 

उपमन्यु ने हमें यही सिखाया—

 

भक्ति उम्र नहीं देखती।

भक्ति धन नहीं देखती।

भक्ति साधन नहीं देखती।

भक्ति केवल हृदय देखती है।

 

और जिस हृदय में सच्ची भक्ति होती है, वहाँ महादेव को आने से कोई नहीं रोक सकता।

 

क्योंकि—

 

“जब भक्त की पुकार सच्ची होती है, तो कैलाश पर बैठे महादेव भी अपने भक्त की ओर चल पड़ते हैं।”

 

हर हर महादेव।

ॐ नमः शिवाय।

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