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रात को रोशनी वाला पेड़

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

गाँव के किनारे एक पुराना आम का पेड़ खड़ा था। दिन में वह बिल्कुल साधारण लगता। पत्ते हरे, तना मोटा, जड़ें धरती में गहरी धँसी हुई। बच्चे उसके नीचे खेलते, बूढ़े बैठकर बातें करते। लेकिन रात होते ही वह पेड़ बदल जाता। अँधेरे में उसकी शाखाओं से हल्की सी सुनहरी रोशनी फूटने लगती। इतनी मंद कि दूर से कोई नोटिस न करे, लेकिन पास जाने पर दिल थाम ले।

 

अनिका पहली बार उस पेड़ को रात में देखी थी जब वह शहर से गाँव लौटी थी। माँ की बीमारी की खबर मिलते ही वह आ गई थी। घर पहुँचते-पहुँचते रात हो चुकी थी। माँ सो रही थीं। अनिका बेचैन होकर बाहर निकली। चाँद नहीं था। अँधेरी कच्ची सड़क पर चलते हुए अचानक उसने देखा दूर एक पेड़ हल्के सुनहरे रंग से जगमगा रहा है।

 

वह पास गई। रोशनी पत्तों के बीच से झर रही थी जैसे कोई अदृश्य दिया जल रहा हो। अनिका ने तने पर हाथ रखा। गर्माहट थी। अजीब सी शांति। उसने फुसफुसाकर पूछा, “यह क्या जादू है?” कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ पत्तियाँ सरसराईं।

 

अगली रात वह फिर गई। इस बार एक बुजुर्ग आदमी भी वहाँ बैठा था। गाँव के सबसे पुराने रहने वाले दादा जी। उन्होंने अनिका को देखकर मुस्कुराया। “पहली बार देख रही हो न?”  

 

अनिका ने सिर हिलाया। “यह रोशनी कहाँ से आती है?”  

 

दादा जी ने लंबी साँस ली। “बहुत पुरानी बात है। तुम्हारे बाबा के बाबा के जमाने की। उस समय यहाँ एक लड़का रहता था सूरज। और एक लड़की चांदनी। दोनों इस पेड़ के नीचे मिलते थे। परिवार वाले मानते नहीं थे। एक रात दोनों ने यहीं बैठकर वादा किया कि चाहे कुछ भी हो, वे एक-दूसरे को कभी नहीं छोड़ेंगे। लेकिन अगले ही हफ्ते सूरज को शहर भेज दिया गया। चांदनी यहाँ रह गई। हर रात वह इस पेड़ के नीचे आकर रोती। एक दिन उसने पेड़ से कहा ‘अगर मेरी आवाज़ उसे पहुँच सके…’ और उसी रात पहली बार पेड़ में रोशनी जगी।”

 

अनिका चुपचाप सुनती रही। दादा जी ने आगे कहा, “सूरज कभी नहीं लौटा। चांदनी बुढ़ापे तक इसी पेड़ के नीचे बैठती रही। मरते समय उसने कहा था कि रोशनी तब तक जलती रहेगी जब तक कोई सच्चा दिल वाला इसे समझ न ले।”

 

अनिका के मन में कुछ हलचल हुई। माँ बीमार थीं। डॉक्टर ने कहा था कि समय कम है। अनिका दिन भर माँ की सेवा करती, रात को चुपके से पेड़ के पास चली जाती। कभी बैठी रहती, कभी पेड़ से बातें करती जैसे कोई पुराना दोस्त हो। “माँ ठीक हो जाएँगी न?” वह पूछती। पत्तियाँ सिर्फ हिलतीं। लेकिन रोशनी हर रात पहले से थोड़ी तेज लगती।

 

एक रात अनिका देर तक बैठी रही। अचानक रोशनी में हल्की सी हलचल हुई। लगा जैसे कोई धीरे से गुनगुना रहा हो। आवाज़ परिचित थी माँ की। अनिका काँप गई। उसने चारों तरफ देखा। कोई नहीं। फिर रोशनी के बीच से माँ की आवाज़ साफ सुनाई दी, “बेटा, डरना मत। कुछ रिश्ते पेड़ों में बस जाते हैं।”

 

अनिका रो पड़ी। उसने पेड़ को कसकर पकड़ लिया। “माँ… आप?”  

 

आवाज़ फिर आई, इस बार और साफ। “मैं यहाँ हूँ। और जब तक तुम मुझे याद रखोगी, मैं यहीं रहूँगी।”

 

उस रात अनिका घर लौटी तो माँ की हालत पहले से बेहतर थी। डॉक्टर हैरान थे। माँ ने आँखें खोलकर अनिका का हाथ थामा और मुस्कुराईं। “रात को मैंने सपना देखा। एक रोशनी वाला पेड़… और तुम उसके नीचे बैठी थी।”

 

अनिका ने कुछ नहीं कहा। बस माँ के माथे पर हाथ फेरा।

 

दिन बीतते गए। माँ धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगीं। अनिका अब हर रात पेड़ के पास जाती। कभी अकेली, कभी माँ को लेकर। माँ पेड़ के नीचे बैठकर पुरानी बातें बतातीं अपनी शादी की, अनिका के बचपन की, और उन दिनों की जब गाँव में बिजली नहीं थी और लोग दीयों से काम चलाते थे।

 

एक रात माँ ने कहा, “इस पेड़ की रोशनी सिर्फ यादों की नहीं है। यह उन दिलों की है जो अधूरे रह गए। जो कह नहीं पाए, जो मिल नहीं पाए। तुम जब भी अकेली महसूस करना, यहाँ आ जाना।”

 

अनिका ने पूछा, “क्या सूरज और चांदनी कभी मिले थे?”  

 

माँ ने सिर हिलाया। “नहीं। लेकिन उनकी रोशनी अब भी जल रही है। मतलब वे कहीं न कहीं साथ हैं।”

 

गाँव में धीरे-धीरे बात फैल गई। लोग रात को पेड़ के पास आने लगे। कोई अपनी मुश्किल बताता, कोई चुपचाप बैठता। रोशनी कभी कम होती, कभी ज्यादा। लेकिन कभी बुझती नहीं थी। अनिका ने नोटिस किया कि जब कोई सच्चा दिल लेकर आता, रोशनी और चमक उठती।

 

एक शाम अनिका शहर वापस जाने वाली थी। माँ अब ठीक थीं। उसने पेड़ से विदा ली। “मैं लौटूँगी,” उसने कहा। पत्तियों ने जवाब में सरसराहट की। रात को जब वह ट्रेन पकड़ने निकली, तो दूर से पेड़ की रोशनी दिखी इस बार थोड़ी सी चांदनी जैसी सफेद। अनिका मुस्कुराई।

 

शहर में अनिका व्यस्त हो गई। ऑफिस, फ्लैट, भीड़। लेकिन हर रात सोने से पहले वह आँखें बंद करके उस पेड़ को याद करती। कभी-कभी सपने में वह पेड़ के नीचे बैठती और माँ की आवाज़ सुनती। एक रात सपने में सूरज और चांदनी दोनों दिखाई दिए। वे पेड़ के नीचे हाथ थामे खड़े थे। सूरज ने अनिका की ओर देखा और कहा, “रोशनी तुम्हारे पास है। इसे जलाए रखना।”

 

महीनों बाद अनिका फिर गाँव आई। माँ ने गले लगाया। शाम होते ही दोनों पेड़ के पास पहुँचे। रोशनी पहले जैसी ही थी नरम, सुनहरी, दिल को छू लेने वाली। अनिका ने पेड़ के तने पर अपना सिर टिकाया। “मैं वापस आ गई,” उसने फुसफुसाया।  

 

हवा चली। पत्तियों ने जवाब दिया। लगा जैसे कोई कह रहा हो “हम जानते थे।”

 

उस रात अनिका ने फैसला किया कि वह गाँव में ही रहेगी। शहर की चमक छोड़कर इस रोशनी को चुन लिया। उसने पेड़ के नीचे एक छोटी सी बेंच रखवाई। लोग आने लगे। कोई अपनी कहानी लिखकर छोड़ जाता, कोई दीया जलाकर रख देता। लेकिन असली रोशनी हमेशा पेड़ की ही रहती।

 

साल बीत गए। अनिका की शादी हुई। उसका बेटा जब पाँच साल का हुआ तो पहली बार रात को पेड़ दिखाया। बच्चे ने आँखें फाड़कर देखा। “मम्मी, यह जादू है?”  

 

अनिका ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ बेटा। लेकिन यह जादू दिल से जलता है।”  

 

बच्चे ने पेड़ को छुआ। रोशनी थोड़ी और चमक उठी।  

 

अब भी जब गाँव में रात होती है, वह आम का पेड़ जलता है। कोई नहीं जानता कि रोशनी कहाँ से आती है। कोई कहता है पुरानी यादें हैं, कोई कहता है प्रेम की बाकी बची हुई साँसें। लेकिन जो भी उसके नीचे बैठता है, उसे लगता है कि वह अकेला नहीं।  

 

अनिका कभी-कभी रात के तीसरे पहर अकेली वहाँ चली जाती है। तने से लगकर बैठती है और फुसफुसाती है, “धन्यवाद।” पत्तियाँ हिलती हैं। रोशनी थोड़ी तेज हो जाती है। और अँधेरी रात में एक पेड़ चुपचाप जलता रहता है उन सबके लिए जो कभी अधूरे रह गए थे, और उन सबके लिए जो अभी भी पूरा होना चाहते हैं। 

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