घर पुराना था। दीवारों पर समय की परतें चढ़ चुकी थीं। अरेरा के उस मकान में तीन पीढ़ियाँ रह चुकी थीं, लेकिन पिछले दो साल से वह लगभग खाली पड़ा था। कबीर जब वहाँ पहुँचा तो दरवाज़े की चाबी घुमाते हुए उसके हाथ काँप रहे थे। बाबा की मृत्यु के बाद माँ ने कहा था, “बेटा, घर समेट लो। जो रखना हो रख लो, बाकी बेच देना।” कबीर ने सोचा था कि दो दिन में काम निपट जाएगा। लेकिन घर ने उसे रोक लिया।
पहले दिन उसने बाबा के कमरे की अलमारी खोली। कपड़े, किताबें, पुराने चश्मे। सबसे नीचे एक लकड़ी का बक्सा मिला। बक्सा खोलते ही धूल उड़ी। अंदर एक पुरानी डायरी थी—काले चमड़े की, पन्ने पीले। ऊपर बाबा का नाम लिखा था: “रमेशचंद्र शर्मा – 1978”।
कबीर ने डायरी खोली। पहली एंट्री साफ अक्षरों में थी
“आज मैंने उससे मुलाकात की। नाम है सुमति। आँखें ऐसी कि दिल बैठ जाए। लेकिन वह किसी और की मंगेतर है।”
कबीर हैरान रह गया। बाबा की शादी दादी से हुई थी। सुमति कौन थी? उसने आगे पढ़ा। डायरी में प्यार भरी पंक्तियाँ थीं। बाबा ने सुमति के साथ नदी किनारे बैठने का जिक्र किया था, पुराने मंदिर में छिपकर मिलने का, और एक रात की बात जब दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया था कि वे जिंदगी भर साथ रहेंगे। लेकिन अचानक एंट्री रुक गईं। तीन महीने का गैप। फिर एक पन्ना
“सुमति चली गई। परिवार ने उसकी शादी जबरदस्ती कहीं और कर दी। मैंने विरोध किया तो घर से निकाल दिया गया। आज से यह डायरी सिर्फ यादों की रह जाएगी।”
कबीर का दिल बैठ गया। बाबा ने कभी इस बात का जिक्र नहीं किया था। दादी से शादी बाद में हुई थी। क्या बाबा ने अपना पहला प्यार छुपाया था?
रात भर कबीर डायरी पढ़ता रहा। बीच-बीच में बाबा ने लिखा था कि सुमति को खोजने की कोशिश की, लेकिन कोई पता नहीं चला। आखिरी एंट्री में सिर्फ एक वाक्य था
“अगर कभी मेरा कोई पोता यह डायरी पढ़े, तो उसे बता देना कि कुछ प्रेम अधूरे रह जाते हैं… लेकिन अधूरे रहकर भी पूरे होते हैं।”
सुबह कबीर ने माँ को फोन किया। माँ चुप रही। फिर धीरे से बोली, “बेटा, तुम्हारे बाबा ने कभी विस्तार से नहीं बताया। बस इतना कहा था कि जिंदगी में एक गलती हुई थी… और वह गलती उन्होंने अपनी ही चुप्पी से सुधारी।”
कबीर तय नहीं कर पाया कि आगे क्या करे। डायरी में एक पता था पुराने शहर का एक मोहल्ला, जहाँ सुमति के परिवार का घर हुआ करता था। उसने ट्रेन का टिकट काटा।
दो दिन बाद वह उस गली में खड़ा था। घर अब नहीं था। जगह पर एक छोटा सा स्कूल बन चुका था। कबीर ने आसपास के बुजुर्गों से पूछा। एक बूढ़ी दुकानदार ने याद किया, “सुमति? हाँ… रमेश बाबू वाली। गरीब घर की थी। शादी के बाद पति के साथ शहर छोड़कर चली गई थी। फिर कभी नहीं आई।”
कबीर निराश होकर लौट रहा था कि एक आवाज़ आई। “आप रमेशचंद्र के पोते हैं?”
पीछे एक महिला खड़ी थी—लगभग साठ साल की, सफेद बाल, लेकिन आँखें चमकदार। उसने अपना परिचय दिया, “मैं अंजलि। सुमति मेरी माँ थी।”
कबीर काँप उठा। अंजलि ने बताया कि सुमति ने जीवन भर रमेश का नाम नहीं छोड़ा। शादी के बाद भी वह कभी-कभी पुरानी डायरी जैसी छोटी नोटबुक में लिखती थी। “माँ कहती थी कि कुछ रिश्ते समय से बड़े होते हैं। वे पूरे नहीं होते, बस जीवित रह जाते हैं।”
अंजलि ने कबीर को अपने घर ले गई। वहाँ एक छोटी सी लकड़ी की पेटी निकाली। अंदर सुमति की नोटबुक थी। पन्ने में एक फोटो भी थी—जवान बाबा और एक सुंदर लड़की, नदी किनारे। फोटो के पीछे लिखा था—“रमेश… मेरा अधूरा पूरा”।
कबीर ने दोनों डायरियाँ साथ रखीं। बाबा की और सुमति की। दो अलग-अलग हाथों से लिखी गई एक ही कहानी। अंजलि ने कहा, “माँ ने मरते समय कहा था कि अगर कभी रमेश का कोई अपना आए तो उसे यह दे देना। उन्होंने कभी एक-दूसरे को भुलाया नहीं… बस स्वीकार कर लिया।”
कबीर कई घंटे वहाँ बैठा रहा। अंजलि ने चाय बनाई। दोनों चुपचाप पुरानी यादें बाँटते रहे। शाम होते-होते कबीर ने पूछा, “क्या वे कभी मिले थे बाद में?”
अंजलि ने सिर हिलाया। “नहीं। लेकिन माँ कहती थी कि हर बारिश में उन्हें लगता था जैसे रमेश कहीं पास ही खड़ा हो।”
वापस लौटते समय कबीर के बैग में दो डायरियाँ थीं। घर पहुँचकर उसने बाबा की तस्वीर के सामने दोनों रख दीं। रात को उसने डायरी के आखिरी खाली पन्ने पर कुछ लिखा
“बाबा, आपकी अधूरी कहानी मैंने पूरी पढ़ ली। अब समझ आया कि कुछ प्रेम इसलिए अधूरे रह जाते हैं ताकि वे पीढ़ियों तक जीवित रह सकें। आपने चुप रहकर हमें सिखाया कि प्यार सिर्फ मिलने में नहीं, निभाने और सहेजने में भी होता है।”
अगले दिन कबीर ने घर बेचने का विचार छोड़ दिया। उसने कमरों की सफाई शुरू की। बाबा का कमरा वैसा ही रखा। डायरी को अलमारी में वापस नहीं रखा, बल्कि एक काँच की पेटी में सहेज लिया। कभी-कभी रात को वह डायरी खोलकर पढ़ता। लगता जैसे बाबा और सुमति दोनों कमरे में मौजूद हों चुपचाप, लेकिन साथ।
महीनों बाद अंजलि आई। दोनों ने मिलकर बाबा और सुमति की याद में एक छोटी सी नोटबुक तैयार की। उसमें दोनों की डायरियों के चुनिंदा पन्ने थे। कबीर ने नाम रखा “अधूरे पूरे”।
एक शाम कबीर छत पर बैठा था। बारिश शुरू हुई। बूँदें गिर रही थीं। उसने आँखें बंद कीं। लगा जैसे कोई धीरे से कह रहा हो “धन्यवाद बेटा… अब बोझ हल्का हो गया।”
कबीर मुस्कुराया। पुरानी डायरी का रहस्य अब रहस्य नहीं रहा था। वह एक सच्चाई बन चुका था कि कुछ कहानियाँ समय के पार चली जाती हैं। वे खत्म नहीं होतीं। बस एक हाथ से दूसरे हाथ में चली जाती हैं। और जब सही हाथ मिलता है, तो अधूरा भी पूरा लगने लगता है।
घर की दीवारें अब उतनी पुरानी नहीं लगती थीं। उनमें गर्माहट थी। डायरी की खुशबू अभी भी कमरे में तैरती थी। और कबीर जानता था कि जब भी वह अकेला महसूस करेगा, बस डायरी खोल लेगा। वहाँ दो
दिलों की धड़कनें अभी भी बाकी थीं धीमी, लेकिन जिंदा।

NSW अनुभवी लेखक -🥇


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