एक बेटी की शादी के बाद, विदाई के वक्त आंसू तो सब देखते हैं, लेकिन उस खालीपन को कोई नहीं देख पाता जो वह अपने पीछे छोड़ जाती है। यह कहानी उसी खालीपन और एक पिता-बेटी के रिश्ते की है, जहाँ “तीसरी चाय” उनकी आखरी चाय बन गई।
तीसरी चाय
अविनाश जी के दिन की शुरुआत हमेशा तीन कप चाय से होती थी। पहली सुबह की धूप के साथ, दूसरी दोपहर के आलस को भगाने के लिए, और तीसरी… तीसरी चाय उनके लिए सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि पूरे दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा थी।
यह तीसरी चाय शाम को ठीक ६ बजे बनती थी। इस चाय का एक नियम था इसे सिर्फ अविनाश जी और उनकी बेटी, पीहू, साथ पीते थे। पीहू जब से कॉलेज से, और बाद में ऑफिस से लौटती, वह सीधे रसोई में जाती थी। दो कप चाय छनती, और दोनों बालकनी में बैठ जाते। वहाँ न कोई फोन होता, न कोई अखबार। सिर्फ पिता-बेटी, दफ्तर की बातें, राजनीति, पुरानी यादें और ढेर सारे ठहाके।
“पापा, आपके हाथ की अदरक वाली तीसरी चाय न मिले, तो मेरा दिन पूरा नहीं होता है। ” पीहू अक्सर कहती थी।
अविनाश जी मुस्कुरा कर कहते थे। “और यह चाय न पिलाऊँ, तो मेरा दिन खत्म नहीं होता, बेटा।
वक्त पंख लगाकर उड़ गया। पीहू की शादी तय हो गई। घर में शहनाइयाँ गूँज उठीं, मेहमानों का ताँता लग गया। अविनाश जी शादी की तैयारियों में इतने मसरूफ रहे कि उन्हें सोचने का मौका ही नहीं मिला।
देखते ही देखते विदाई का दिन भी आ गया।
शादी के ठीक अगले दिन, शाम के ५:३० बज रहे थे। विदाई हो चुकी थी। सारे मेहमान अपने-अपने कमरों में थककर सो रहे थे। पूरा घर, जो कल तक हँसी-मजाक से गूँज रहा था, अचानक एक अजीब सी खामोशी में डूब गया था। चारों तरफ बिखरी हुई गेंदे के फूलों की पंखुड़ियाँ और खाली कुर्सियाँ उस अकेलेपन को और बढ़ा रही थीं।
अविनाश जी अकेले अपने सोफे पर बैठे थे। उनकी नजर घड़ी पर गई शाम के ठीक ५:५५ हो रहे थे।
आदत से मजबूर, वे भारी कदमों से रसोई की तरफ बढ़े। उन्होंने गैस जलाई, सस्पेन में पानी रखा। अदरक कूटी, पत्ती डाली, दूध मिलाया। चाय उबल रही थी और उसकी खुशबू पूरे घर में फैल गई।
अविनाश जी ने दो कप निकाले। हमेशा की तरह।
उन्होंने दोनों कपों में चाय छानी। ट्रे उठाई और बालकनी की तरफ चल दिए। बालकनी में दो कुर्सियाँ हमेशा की तरह आमने-सामने रखी थीं।
अविनाश जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने पीहू की कुर्सी के सामने दूसरा कप रख दिया। चाय से भाप उठ रही थी। उन्होंने आदत के मुताबिक आवाज देने के लिए मुँह खोला “पीहू, चाय तैयार” पर शब्द उनके हलक में ही फंस गए।
सामने की कुर्सी खाली थी। वहाँ कोई नहीं था। पीहू अब अपने नए घर, अपनी नई जिंदगी में कदम रख चुकी थी। वह अब इस घर की मेहमान थी, बाशिंदा नहीं।
अविनाश जी ने उस दूसरे कप को देखा। गर्म चाय की वह भाप धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी, ठीक वैसे ही जैसे उनके दिल की धड़कनें उस सूनेपन में जम रही थीं। उन्हें अहसास हुआ कि अब से हर शाम ६ बजे चाय तो बनेगी, पर वह तीसरी चाय साझा करने वाली पीहू वहाँ नहीं होगी।
उन्होंने पीहू के हिस्से की उस चाय के कप को धीरे से छुआ। वह कप अभी भी गुनगुना था, मानो पीहू की आखिरी छुअन उसमें बाकी हो। अविनाश जी की आँखों से एक आंसू टपका और सीधे उनकी चाय में जा गिरा।
वह तीसरी चाय, एक पिता के साथ उसकी बेटी की आखरी चाय बन चुकी थी सच्ची नहीं, तो यादों के साए में ही सही है।
“दुकानें चाय की अब भी सजी हैं शहर में,
मगर वो तीसरी चाय का स्वाद बेटी के साथ ही चला गया।”
Lakshmi Kumari …..
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NSW अनुभवी लेखक -🥇


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