बेवजह की मोहब्बत
रात के लगभग ढाई बजे थे, अंधेरे कमरे में बस मोबाइल की हल्की नीली रोशनी थी, और उस रोशनी में बैठा था विवेक, एक शादीशुदा आदमी, जिसकी ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल परफेक्ट लगती थी।
एक अच्छी नौकरी, एक समझदार पत्नी, एक छोटा सा बच्चा… सब कुछ था उसके पास।
फिर भी… उसे लगता था, कि कुछ कमी है।
और उस कमी का नाम उसे तब तक नहीं पता था, जब तक कि एक दिन उसकी ज़िंदगी में “नेहा” नहीं आई।
नेहा का एक मैसेज, जो विवेक की जिदंगी में सब बदल गया
वो एक सामान्य दिन था। ऑफिस के काम के बीच विवेक ने फेसबुक खोला, और उसमें एक नोटिफिकेशन आया
“Hi… क्या आप सच में उतने ही serious हैं, जितने आपकी पोस्ट दिखती हैं?”
विवेक ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, शायद उससे थोड़ा ज्यादा…
बस, यहीं से शुरू हुई एक कहानी, जो जितनी जल्दी बनी, उतनी ही जल्दी टूट भी गई।
नेहा आज की माडर्न लड़की थी, उसकी सोच अलग थी, उसकी बातें… उसकी सोच… सब कुछ ऐसा था जो विवेक को नेहा कि ओर खींचता चला गया।
पहले तो शुरुआत में हल्की-फुल्की बातें हुईं, काम, जिंदगी, सपने… ज्यादातर काम की सीरियस बात उन दोनों के बीच होती थी।
फिर धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं।
नेहा विवेक से कहती तुमसे बात करके सुकून मिलता है…”
विवेक हँसकर जवाब देता, मुझे भी…”
लेकिन दोनों जानते थे, ये सिर्फ “सुकून” नहीं था।
धीरे-धीरे उनके बीच बातचीत की सीमा टूटने लगी
विवेक शादीशुदा था, ये बात उसने पहले ही दिन नेहा को बता दी थी।
नेहा यह सुनकर कुछ पल के लिए चुप हुई थी…
फिर बोली—
“दिल का क्या करें… वो तो किसी से भी लग सकता है…”
उस दिन के बाद से दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बन गया।
ना नाम था, ना कोई वादा… लेकिन दोनों के बीच एहसास गहरे और सच्चे थे।
अब उनकी बातें सिर्फ चैट तक सीमित नहीं रहीं।
रात होते ही कॉल शुरू हो जाती।
धीरे-धीरे वो कॉल्स लंबी होने लगीं—
कभी एक घंटा, कभी दो…
और फिर वो पल आया, जब दोनों ने अपनी झिझक छोड़ दी।
अब उनकी आवाज़ों में सिर्फ बातें नहीं थीं…
उनमें एहसास था, चाहत थी।
नेहा की हँसी में एक अपनापन था,
और विवेक की आवाज़ में एक अपनापन।
वो कहते—
“काश… हम पहले मिले होते…”
और हर बार ये “काश” उनकी दूरी को और गहरा कर देता।
उनके बीच अब झिझक की कोई दीवार नहीं बची थी।
चैट में, कॉल में, दोनों खुलकर अपनी भावनाएँ जताते।
नेहा विवेक से कहती जब तुम ‘miss you’ कहते हो ना… दिल सच में भर आता है…”
विवेक जवाब देता, तुम मेरी आदत बन गई हो…”
उनकी बातें कभी-कभी इतनी गहरी हो जातीं कि लगता हि नही था, कि ये रिश्ता सिर्फ ऑनलाइन है, दिल से जुड़ा हुआ नही है।
लेकिन शायद यही विवेक का सबसे बड़ी गलती थी।
एक दिन 1-2 हफ्ते के लिए अपने ऑफिस के काम में कुछ ज्यादा ब्यस्त हो गया, तो वह नेहा को कुछ कम समय दे पा रहा था, जिससे नेहा नाराज रहने लगी।
बाद मे जब विवेक अपने काम से फुर्सत पाया तो उसने नेहा से बात करने का कोशिश किया… लेकिन अचानक से नेहा का व्यवहार बहुत बदल गया।
धीरे-धीरे नेहा का मैसेज विवेक को कम आने लगा।
कॉल्स छोटी हो गईं, और फिर… अचानक एक दिन वह बंद ही हो गया।
पहले दिन जब विवेक ने सुबह दोपहर शाम को अभिवादन का मैसेज किया, जिसका कोई जबाब नही आया तो विवेक सोचा, शायद किसी काम में व्यस्त होगी।”
दूसरे दिन, जब यही सिलसिला जारी रहा तो, विवेक सोचने लगा, शायद वह किसी बात से नाराज़ है…
तीसरे दिन भी जब मैसेज नही आया, तो विवेक अपने आप में सोचने लगा कि क्या मैंने कुछ गलत कहा?”
उसने नेहा को मैसेज किया सब ठीक है?”
लेकिन कोई जवाब नही, तब विवेक को नेहा कि फिक्र होने लगा, उसका मन किसी अनहोनी की आशंका से भर गया, वह उससे बात करने, तथा उसका हाल जानने के लिए उसका मन तड़प गया।
तब विवेक ने उसके और नेहा के बीच कुछ काॅमन दोस्त थे, उनसे चर्चा किया, नेहा के बारे में उसके कुछ देर बाद नेहा का मैसेज आया।
मैसेज के शब्द बहुत ही उत्साहहीन था, एकदम बदलता हुआ अंदाज अब वह नेहा पहले जैसी नहीं रही।
वो पहले घंटों बात करती थी,
अब मिनटों में “busy हूँ” कहकर चली जाती थी।
विवेक हर दिन कोशिश करता, नए तरीके से बात शुरू करने की, उसे हँसाने की…
लेकिन हर बार जवाब वही मिलता “मूड नहीं है…”
विवेक ने हार नहीं मानी।
उसने खुद को दिल से और ज्यादा झोंक दिया उस रिश्ते में।
वो हमेशा पूछता कुछ हुआ है क्या?”
नेहा हमेशा अपने जबाब में कहती कुछ नहीं…”
वो कहता “तुम पहले जैसी क्यों नहीं हो?” क्योंकि विवेक को तो चुलबुली और नटखट नेहा की आदत थी, लेकिन यहां नेहा एक दम चुप हो गई थी।
नेहा ज्यादातर सवालों के जवाब में अब चुप हो जाती।
उसकी चुप्पी… विवेक को सबसे ज्यादा दर्द देती थी।
एक सच, जो धीरे-धीरे सामने आया, एक दिन, बहुत कोशिश के बाद नेहा ने कहा विवेक… शायद ये सब गलत है…”
विवेक का दिल धड़क उठा, और उसने पुछा
“गलत? क्या?”
नेहा बोली ये रिश्ता… ये बातें… सब कुछ…”
विवेक ने समझाने की कोशिश की लेकिन ये रिस्ता तो सच्चा है…”
नेहा ने जवाब दिया “सच्चा है… लेकिन सही नहीं है…”
उस दिन के बाद, नेहा विवेक से और दूर हो गई।
अब वो खुद से बात शुरू नहीं करती थी।
विवेक हर दिन एक नया मैसेज भेजता, कैसी हो?”
“आज क्या किया?”
लेकिन जवाब… या तो देर से आता,
या आता ही नहीं।
एक रात, विवेक ने हिम्मत जुटाई।
उसने कॉल किया।
काफी देर बाद नेहा ने उठाया।
आवाज़ में वही अपनापन नहीं था।
विवेक ने कहा नेहा, हम ये सब खत्म क्यों कर रहे हैं?”
नेहा कुछ पल चुप रही…
फिर बोली “क्योंकि ये कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था…”
अलविदा… बिना शोर के
विवेक ने आखिरी बार कहा—
“मैं इसे संभाल सकता हूँ… हम इसे सही बना सकते हैं…”
नेहा की आवाज़ धीमी थी—
“कुछ चीजें सही नहीं बनतीं… बस खत्म हो जाती हैं…”
और फिर… कॉल कट।
उसके बाद नेहा ने खुद से कभी मैसेज नहीं किया।
विवेक के पास सब कुछ था…
फिर भी उसे लग रहा था, कि जैसे कुछ नहीं था।
उसकी जिंदगी वही थी, ऑफिस, घर, परिवार…
लेकिन अब हर चीज में एक खालीपन था।
वो मिनट मिनट पर फोन उठाता… नेहा के मैसेज को देखता, लेकिन वहां सब कुछ खाली ही था।
उसके दिनचर्या में एक अध्याय नेहा का इंतज़ार भी जुड गया।
लेकिन रियल में क्योंकि अब कोई “नेहा” नहीं थी
कुछ रिश्ते वजह से नहीं बनते…
और इसलिए ही बिना वजह खत्म हो जाते हैं।
विवेक और नेहा का रिश्ता भी ऐसा ही था।
ना कोई शुरुआत का सही कारण,
ना कोई अंत का सही जवाब।
बस एक एहसास था, जो आया… और चला गया।
एक दिन, महीनों बाद, विवेक ने अपने पुराने चैट पढ़े।
हर मैसेज… हर कॉल…
सब कुछ जैसे फिर से जिंदा हो गया।
उसने मुस्कुराते हुए फोन बंद किया और सोचा, शायद वो सही थी…
ये सच्चा था… लेकिन सही नहीं था…”
बेवजह की मोहब्बत… दिल को बहुत कुछ देती है
कुछ खूबसूरत यादें, कुछ अधूरे सवाल… और एक गहरा सन्नाटा।
“कुछ लोग हमारी जिंदगी में आते हैं,
हमें खुद से मिलवाने के लिए…
और फिर चले जाते हैं,
हमें अधूरा छोड़कर,
लेकिन थोड़ा मजबूत बनाकर…”
इस कहानी को पढ़ने के लिए आपको दिल से धन्यवाद ❤️
अगर कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो उत्साहवर्धन के लिए स्टिकर जरूर भेजें 😊
NSW नया लेखक 🥉

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