” तुम मेरी हो..”❤️

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

बारिश की हल्की-हल्की बूंदें हवेली की छत पर गिर रही थीं। शाम ढल चुकी थी और आसमान में गहरे बादल किसी अनकहे राज़ को छिपाए बैठे थे। हवेली के बड़े से आँगन में खड़ा आरव दूर आसमान की ओर देख रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जैसे कोई अधूरी कहानी उसे हर पल पुकार रही हो।

 

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“तुम फिर वही ख्यालों में खो गए?”

 

आरव ने पलटकर देखा। सामने वही थी—मीरा। वही मासूम चेहरा, लेकिन अब आँखों में एक अजनबीपन था।

 

“तुम यहाँ क्यों आई हो?” आरव ने थोड़ी सख्ती से पूछा।

 

मीरा ने हल्की मुस्कान दी, “ये मेरा घर है, भूल गए क्या?”

 

आरव कुछ कह नहीं पाया। सच ही तो था। ये घर, ये आँगन… सब कभी उनका हुआ करता था।

 

 

बचपन का रिश्ता

 

जब मीरा और आरव छोटे थे, तब ही मीरा के बाबा ने आरव से कहा था—

“आरव बेटा, मीरा का हमेशा साथ देना… चाहे जो हो जाए।”

 

उस दिन आरव ने मासूमियत से सिर हिलाया था—

“मैं हमेशा उसका ख्याल रखूँगा, बाबा।”

 

तभी से दोनों का रिश्ता तय हो गया था। सब कहते थे—

“ये दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।”

 

बचपन में मीरा भी यही मानती थी। वह आरव के पीछे-पीछे घूमती रहती थी—

“आरव, तुम मेरे हो… कहीं मत जाना।”

 

और आरव हँसकर कहता—

“और तुम मेरी हो… हमेशा।”

 

 

दूरी और बदलता दिल

 

समय बीता। मीरा पढ़ाई के लिए शहर चली गई। नई दुनिया, नए लोग… और वहीं उसकी मुलाकात हुई कबीर से।

 

कबीर स्मार्ट था, बातों में जादू था। धीरे-धीरे मीरा को उससे प्यार हो गया।

 

“आई लव यू, कबीर…” एक दिन उसने कहा।

 

कबीर मुस्कुराया—

“मैं भी… मीरा।”

 

लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक सच्चाई छिपी थी, जिसे मीरा समझ नहीं पाई।

 

 

वापसी और टकराव

 

कई साल बाद मीरा वापस हवेली आई। आरव वही था—सीधा, सादा, हर वक्त उसकी परवाह करने वाला।

 

लेकिन अब मीरा बदल चुकी थी।

 

“तुम हर वक्त मेरे पीछे क्यों रहते हो?” उसने झुंझलाकर कहा।

 

आरव शांत रहा—

“क्योंकि ये मेरा वादा है।”

 

“किससे?!” मीरा चिल्लाई।

 

“तुम्हारे बाबा से… और खुद से भी।”

 

मीरा हँस पड़ी—

“ये बचपन की बातें हैं, आरव। मैं अब बड़ी हो चुकी हूँ। और… मैं किसी और से प्यार करती हूँ।”

 

ये सुनकर आरव का दिल जैसे टूट गया, लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा—

“अगर वो तुम्हें खुश रखता है… तो मुझे कोई शिकायत नहीं।”

 

 

सच का सामना

 

कुछ दिन बाद मीरा ने कबीर को हवेली बुलाया।

 

“कबीर, हम शादी कब करेंगे?” मीरा ने पूछा।

 

कबीर ने थोड़ा हिचकते हुए कहा—

“जल्दी… बस कुछ कागज़ी काम बाकी है।”

 

“कैसा काम?”

 

कबीर ने सीधा जवाब दिया—

“तुम्हारी प्रॉपर्टी मेरे नाम हो जाए, फिर सब आसान हो जाएगा।”

 

मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

“तो तुम मुझसे नहीं… मेरी दौलत से प्यार करते हो?”

 

कबीर हँस पड़ा—

“अब समझी?”

 

मीरा गुस्से में वहाँ से जाने लगी, लेकिन कबीर ने उसे रोक लिया।

 

“अब तुम कहीं नहीं जाओगी।”

 

 

 

 

कबीर ने मीरा को अपने फार्महाउस में बंद कर दिया। एक अंधेरा कमरा, लोहे की सलाखें… और चारों तरफ खामोशी।

 

मीरा रोते हुए बोली—

“मुझे जाने दो… प्लीज़…”

 

कबीर ने ठंडी आवाज़ में कहा—

“जब तक तुम साइन नहीं करोगी, तुम यहीं रहोगी।”

 

 

 

उधर हवेली में जब मीरा का पता नहीं चला, तो आरव को कुछ गड़बड़ लगा।

 

“मीरा खतरे में है…” उसने खुद से कहा।

 

वह बिना वक्त गंवाए उसे ढूंढने निकल पड़ा। कई घंटों की तलाश के बाद उसे कबीर का ठिकाना मिल गया।

 

रात का अंधेरा था। आरव चुपचाप फार्महाउस में घुसा। गार्ड्स को चकमा देकर वह उस कमरे तक पहुँचा जहाँ मीरा कैद थी।

 

“मीरा…” उसने धीरे से पुकारा।

 

मीरा ने सिर उठाया—

“आरव?!”

 

उसकी आँखों में उम्मीद की चमक आ गई।

 

आरव ने ताला तोड़ा—

“चलो, यहाँ से निकलते हैं।”

 

 

 

जैसे ही वे बाहर निकलने लगे, कबीर और उसके आदमी आ गए।

 

“भाग कहाँ रहे हो?” कबीर ने हँसते हुए कहा।

 

आरव ने मीरा को पीछे किया—

“तुम मेरे पीछे रहो।”

 

लड़ाई शुरू हो गई। आरव अकेला था, लेकिन हर वार में उसकी ताकत साफ दिख रही थी।

 

मीरा डरते हुए बोली—

“आरव… सावधान!”

 

एक गुंडे ने पीछे से हमला किया, लेकिन आरव ने उसे गिरा दिया।

 

“मैंने कहा था… मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।”

 

आखिरकार, आरव ने सबको हरा दिया। कबीर जमीन पर गिरा पड़ा था।

 

 

असली एहसास

 

हवेली लौटते समय मीरा चुप थी।

 

“तुम ठीक हो?” आरव ने पूछा।

 

मीरा ने धीरे से कहा—

“तुम हमेशा मेरे साथ क्यों रहते हो… जबकि मैं तुम्हें बार-बार दूर करती हूँ?”

 

आरव मुस्कुराया—

“क्योंकि मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता… चाहे तुम मुझे कितनी भी नफरत करो।”

 

मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे—

“मैं गलत थी, आरव… मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं।”

 

 

प्यार का इज़हार

 

अगली सुबह, वही आँगन… वही बारिश।

 

मीरा आरव के पास आई।

 

“आरव…”

 

“हाँ?”

 

मीरा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“तुमने कहा था ना… ‘तुम मेरी हो’?”

 

आरव ने हल्की मुस्कान दी—

“वो तो बचपन की बात थी…”

 

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया—

“नहीं… वो आज भी सच है।”

 

आरव चौंक गया—

“क्या मतलब?”

 

मीरा ने धीरे से कहा—

“मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ…”

 

कुछ पल के लिए समय जैसे थम गया।

 

“सच?” आरव ने पूछा।

 

“हाँ… अब समझ आया कि सच्चा प्यार क्या होता है।”

 

 

अंत

 

बारिश तेज हो गई। दोनों एक-दूसरे के करीब खड़े थे।

 

आरव ने धीरे से कहा—

“अब कभी मुझे छोड़कर मत जाना…”

 

मीरा मुस्कुराई—

“अब कहीं नहीं जाऊँगी… क्योंकि मैं तुम्हारी हूँ।”

 

आरव ने उसका हाथ थाम लिया—

“और मैं… हमेशा तुम्हारा रहूँगा।”

 

हवेली के आँगन में उस दिन सिर्फ बारिश नहीं हो रही थी… बल्कि दो दिलों का मिलन भी हो रहा था।

 

एक अधूरी कहानी आखिरकार पूरी हो गई थी।

 

“कभी-कभी सच्चा प्यार वही होता है, जो बचपन से हमारे साथ चलता है… बस हमें उसे पहचानने में देर लग जाती है।”

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