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टैग: हंसी मजाक

  • नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नंदी की वजह से महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। माता पार्वती पूजा की तैयारी कर रही थीं। गणेश जी पास में बैठे मोदक खा रहे थे और कार्तिकेय जी अपने काम में व्यस्त थे। वहीं नंदी हमेशा की तरह महादेव के पास बैठे उनकी सेवा में लगे थे।

     

    महादेव ध्यान में बैठे थे।

     

    माता पार्वती ने पूजा की सारी तैयारी पूरी की और महादेव को आवाज दी,

     

    “महादेव, पूजा का समय हो गया है।”

     

    महादेव ने आँखें खोलीं।

     

    “अभी आया देवी।”

     

    लेकिन तभी नंदी महादेव के पास आकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी ने नंदी को देखा और फिर महादेव की तरफ।

     

    “आप पहले नंदी के साथ बैठेंगे या मेरे साथ पूजा करने आएँगे?”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “देवी, नंदी तो मेरे पास आए हैं। इन्हें कैसे भेज दूँ?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “जब भी मैं आपको बुलाती हूँ, नंदी बीच में आ जाते हैं।”

     

    नंदी ने यह सुना तो तुरंत उठकर दूसरी तरफ जाने लगे।

     

    महादेव बोले,

     

    “अरे नंदी, तुम कहाँ जा रहे हो?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “देखा! मैंने कहा था ना?”

     

    महादेव मुस्कुरा दिए।

     

    “देवी, नंदी ने तो कुछ किया ही नहीं।”

     

    “इसीलिए तो कह रही हूँ। आप ही उन्हें हर बार बुलाते हैं।”

     

    नंदी चुपचाप खड़े रहे।

     

    गणेश जी यह सब देख रहे थे। उन्होंने हँसते हुए कहा,

     

    “माता, आज तो नंदी फँस गए।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “बिल्कुल।”

     

    महादेव बोले,

     

    “गणेश, तुम भी अपनी माता का साथ दे रहे हो?”

     

    गणेश जी ने कहा,

     

    “मैं तो सच का साथ दे रहा हूँ पिता।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    पूजा के बाद माता पार्वती भोजन बनाने चली गईं। उन्होंने सोचा कि आज महादेव को अपने हाथों से भोजन खिलाएँगी। उन्होंने प्रेम से भोजन तैयार किया।

     

    उन्होंने महादेव को बुलाया,

     

    “महादेव, भोजन तैयार है।”

     

    महादेव आने ही वाले थे कि नंदी उनके सामने आकर खड़े हो गए।

     

    महादेव ने कहा,

     

    “नंदी, तुम भी भोजन करना चाहते हो?”

     

    पार्वती जी ने दूर से यह देखा।

     

    “फिर से!”

     

    महादेव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ देवी?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    महादेव समझ गए कि कुछ तो हुआ है।

     

    “देवी, आप नाराज़ हैं?”

     

    “नहीं।”

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “जब आप ‘कुछ नहीं’ कहती हैं, तब अक्सर कुछ न कुछ जरूर होता है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “आपको सब पता है फिर भी पूछते हैं।”

     

    महादेव नंदी की ओर देखने लगे।

     

    “क्या नंदी की वजह से?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “हाँ।”

     

    नंदी ने तुरंत अपना सिर झुका लिया।

     

    महादेव बोले,

     

    “बेचारे नंदी को क्यों दोष दे रही हैं?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “मैं नंदी को दोष नहीं दे रही। मैं आपको कह रही हूँ।”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “आपको पता है मैंने कितने प्रेम से भोजन बनाया है?”

     

    “हाँ देवी।”

     

    “फिर भी आप नंदी को देखते ही सब भूल जाते हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “ऐसा नहीं है।”

     

    “तो फिर?”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “मैं आपको भी उतना ही महत्व देता हूँ और नंदी को भी।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मुझे नंदी से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि आप उनके साथ इतना समय बिताते हैं कि मेरे लिए समय ही नहीं बचता।”

     

    महादेव ने उनकी बात ध्यान से सुनी।

     

    फिर बोले,

     

    “देवी, आपने कभी सोचा है कि नंदी मेरे लिए क्या हैं?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “हाँ, मैं जानती हूँ। वह आपके भक्त हैं, आपके वाहन हैं और आपके बहुत प्रिय हैं।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और आप?”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं?”

     

    “आप तो मेरे हृदय में हैं।”

     

    पार्वती जी कुछ पल चुप रहीं।

     

    उनकी नाराज़गी थोड़ी कम हो गई।

     

    तभी नंदी धीरे-धीरे उनके पास आए और अपना सिर माता पार्वती के चरणों के पास रख दिया।

     

    पार्वती जी ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “अरे नंदी, मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ।”

     

    नंदी ने जैसे राहत की साँस ली।

     

    महादेव हँसते हुए बोले,

     

    “देखा नंदी, तुम्हारी माता तुम्हें कितना प्रेम करती हैं।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “हाँ, लेकिन तुम मेरी शिकायत महादेव से मत करना।”

     

    महादेव बोले,

     

    “देवी, नंदी आपकी शिकायत करेंगे भी तो मैं आपकी ही बात मानूँगा।”

     

    पार्वती जी ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “सच?”

     

    “सच।”

     

    नंदी ने महादेव की ओर देखा।

     

    महादेव बोले,

     

    “नंदी, आज से तुम्हें देवी की अनुमति के बिना मुझे कहीं भी ले जाने की जरूरत नहीं।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “मैंने ऐसा कब कहा कि नंदी आपको कहीं ले जाते हैं?”

     

    महादेव बोले,

     

    “आपने तो कहा था कि वह हर बार बीच में आ जाते हैं।”

     

    “वो तो मैंने मजाक में कहा था।”

     

    “तो फिर मैं भी मजाक कर रहा था।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    लेकिन नंदी अचानक महादेव के पास आकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “देखिए, फिर आ गए।”

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम आज सच में मेरी परीक्षा ले रहे हो।”

     

    गणेश जी हँसते हुए बोले,

     

    “पिता, नंदी तो कुछ नहीं कर रहे। असली समस्या तो आप दोनों की नोक-झोंक है।”

     

    कार्तिकेय जी भी वहाँ आ गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    गणेश जी ने कहा,

     

    “आज नंदी माता और पिता के बीच फँस गए हैं।”

     

    कार्तिकेय जी हँस पड़े।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “तुम दोनों हँसो मत।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “देवी, अब तो पूरा परिवार हमारी बात सुन रहा है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “तो अच्छी बात है। सबको पता चले कि आप कितने भोले हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और सबको यह भी पता चले कि आप कितनी जल्दी नाराज़ हो जाती हैं।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “मैं जल्दी नाराज़ होती हूँ?”

     

    “हाँ।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर आज मैं आपसे बात नहीं करूँगी।”

     

    महादेव ने तुरंत कहा,

     

    “देवी, मैंने तो मजाक किया था।”

     

    पार्वती जी दूसरी तरफ देखने लगीं।

     

    गणेश जी ने धीरे से महादेव से कहा,

     

    “पिता, अब आपको ही संभालना होगा।”

     

    महादेव पार्वती जी के पास गए।

     

    “देवी, क्षमा कीजिए।”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “मैंने मजाक किया था।”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, अब तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    नंदी माता पार्वती के पास जाकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी नंदी को देखकर मुस्कुरा दीं।

     

    महादेव बोले,

     

    “देखा, नंदी ने भी मेरी मदद कर दी।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “नंदी अच्छे हैं, इसलिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और मैं?”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आप भी बुरे नहीं हैं।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “बस इतना ही?”

     

    “अभी इतना ही।”

     

    फिर माता पार्वती ने नंदी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “नंदी, आज से तुम जब चाहो महादेव के पास आ सकते हो। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और मैं?”

     

    “आपको भी अनुमति है।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    उस दिन कैलाश पर एक छोटी-सी बात ने सबको हँसा दिया। नंदी के कारण शुरू हुई नोक-झोंक आखिर में माता पार्वती और महादेव की मुस्कान में बदल गई।

     

    महादेव ने नंदी को प्यार से देखा और बोले,

     

    “नंदी, आज तुम्हारी वजह से मुझे देवी को मनाने का अवसर मिला।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “और मेरी वजह से आपको यह याद रहा कि मुझे समय देना भी जरूरी है।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “यह बात मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

     

    नंदी ने खुशी से अपना सिर झुका दिया।

     

    और कैलाश पर फिर वही शांति लौट आईजहाँ महादेव का भोला स्वभाव, माता पार्वती की प्यारी नाराज़गी और नंदी की भक्ति मिलकर एक ऐसा परिवार बनाते थे, जहाँ छोटी-सी नोक-झोंक भी अंत में प्रेम की मुस्कान बन जाती थी।

  • जय गुरु देव

    जय गुरु देव

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    आज की ये रात है भक्ति की,  

    आज का ये दिन है श्रद्धा की।  

    गुरु की महिमा गूँजे हर दिशा में,  

    गुरु का आशीष बरसे हर हृदय में।  

     

    गुरु वो दीप हैं, जो अंधकार मिटाते,  

    गुरु वो सागर हैं, जो सत्य सिखाते।  

    गुरु के चरणों में है जीवन का सार,  

    गुरु ही हैं हमारे पथ‑प्रदर्शक अपार।  

     

    आइए मिलकर करें गुरु का वंदन,  

    भक्ति से भर दें हर मन का आलोकन।  

    जय गुरु देव, जय गुरु देव,  

    गूँजे मंच पर यही स्वर नित्य देव।

     

    आइए गुरु शिष्य संवाद के आनंदित पलों का आनंद लें।😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, पढ़ाई बड़ी कठिन है,  

    गुरु मुस्काए – बेटा, यही तो जीवन का गहना है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, नींद बहुत सताती है,  

    गुरु हँसे – ज्ञान की रोशनी ही जगाती है। 😂

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, सफलता कब आएगी?  

    गुरु बोले – जब मेहनत तेरे कदमों को सजाएगी। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, आपका आशीष चाहिए,  

    गुरु बोले – बेटा, तेरा विश्वास ही सबसे बड़ा उपहार है।😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, किताबें बहुत भारी हैं,  

    गुरु बोले – बेटा, ज्ञान ही सबसे प्यारी है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, क्लास में नींद आती है,  

    गुरु बोले – बेटा, यही तो ध्यान की पहली सीढ़ी है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, परीक्षा में क्या लिखूँगा?  

    गुरु बोले – बेटा, वही जो पढ़ाया है, वरना फिर सुनूँगा! 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, आपकी डाँट भी मीठी लगती है,  

    गुरु बोले – बेटा, यही डाँट ही तेरी जीत की सीढ़ी बनती है।😊

     

    गुरु ने कहा – पढ़ ले बेटा, वरना पछताएगा,  

    शिष्य ने कहा – WiFi नहीं है, नेट कहाँ से आएगा! 😂

     

    गुरु ने कहा – ध्यान लगा, मन को शांत कर,  

    शिष्य ने कहा – कर दें मोबाइल साइलेंट पर! 😂

     

    गुरु ने कहा – ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है,  

    शिष्य ने कहा – लेकिन UPI से रिचार्ज भी ज़रूरी है! 😂

     

    गुरु पूर्णिमा पर सबने किया गुरु को प्रणाम, 🙏

    गुरु मुस्काए बोले – बेटा, अब कर दो Exam पास तमाम!😊

     

    आपको कैसा लगा पढ़कर

    , अपने विचार रखें नीचे कमेंट में लिखकर 😊😂