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  • कर्मों का हिसाब

    कर्मों का हिसाब

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कर्मों का हिसाब

     

    एक छोटे से गाँव में रमेश नाम का एक आदमी रहता था। वह बहुत अमीर था, लेकिन उसका दिल गरीब था। गाँव में कोई जरूरतमंद मदद माँगने आता तो वह उसे खाली हाथ लौटा देता।

     

    रमेश का पड़ोसी हरि गरीब किसान था। एक साल उसकी फसल बर्बाद हो गई। घर में खाने तक के पैसे नहीं थे। हरि ने रमेश से कुछ पैसे उधार माँगे।

     

    रमेश ने हँसते हुए कहा,

    “मेरे पास पैसे पेड़ पर नहीं उगते। अपनी परेशानी खुद संभालो।”

     

    हरि निराश होकर घर लौट गया। उसकी पत्नी ने कहा, “भगवान सब देख रहे हैं। आज नहीं तो कल हर किसी को अपने कर्मों का हिसाब देना पड़ता है।”

     

    समय बीतता गया। रमेश का कारोबार खूब बढ़ा। उसने शहर में बड़ी दुकान खोल ली और गाँव के गरीब लोगों को नीचा दिखाने लगा।

     

    एक दिन रमेश शहर से गाँव लौट रहा था। रास्ते में उसकी गाड़ी अचानक खराब हो गई। रात काफी हो चुकी थी। सड़क सुनसान थी। रमेश मदद के लिए इधर-उधर देखने लगा।

     

    तभी एक आदमी लालटेन लेकर वहाँ पहुँचा।

     

    वह कोई और नहीं, हरि था।

     

    रमेश ने शर्मिंदा होकर कहा,

    “हरि… मेरी मदद कर दो।”

     

    हरि ने बिना कोई पुरानी बात याद दिलाए उसकी मदद की। उसने गाड़ी ठीक करवाने के लिए मैकेनिक बुलाया और रमेश को अपने घर ले गया।

     

    रमेश की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने कहा,

    “हरि, मैंने तुम्हें उस समय मदद से मना कर दिया था, फिर भी तुमने मेरी मदद की। तुम मुझसे अच्छे इंसान हो।”

     

    हरि मुस्कुराया और बोला,

    “भाई, मैं तुम्हारे कर्मों का हिसाब रखने वाला कौन होता हूँ? उसका हिसाब तो ऊपर वाला रखता है।”

     

    कुछ दिनों बाद रमेश के कारोबार में अचानक बहुत बड़ा नुकसान हो गया। उसके पास कुछ भी नहीं बचा। जिन लोगों के साथ उसने कभी घमंड किया था, उनमें से किसी ने उसका साथ नहीं दिया।

     

    उस समय हरि ही उसके पास खड़ा रहा।

     

    हरि ने उसे अपने खेत में काम करने का मौका दिया। धीरे-धीरे रमेश ने मेहनत करना सीखा और समझ गया कि पैसा इंसान को बड़ा नहीं बनाता, उसके कर्म उसे बड़ा बनाते हैं।

     

    एक दिन रमेश गाँव के मंदिर के सामने खड़ा होकर बोला—

     

    “मैंने जिंदगी भर दूसरों को छोटा समझा। आज समझ आया कि इंसान जितना दूसरों के साथ करता है, जिंदगी किसी न किसी रूप में उसका हिसाब जरूर लौटाती है।”

     

    उस दिन से रमेश बदल गया। उसने गरीबों की मदद करना शुरू कर दिया और कभी किसी जरूरतमंद को खाली हाथ नहीं लौटाया।

     

    कहानी की सीख:

    अच्छे कर्म का फल देर से मिल सकता है, लेकिन मिलता जरूर है। और बुरे कर्मों का हिसाब भी जिंदगी किसी न किसी मोड़ पर जरूर चुकाती है।

  • सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    रवि एक मेहनती और खुशमिजाज लड़का था। वह अपने परिवार के साथ रहता था और भविष्य में कुछ बड़ा करने का सपना देखता था।

     

    कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों ने मज़ाक-मज़ाक में उसे सिगरेट पीने के लिए कहा। रवि ने पहले मना किया, लेकिन दोस्तों के दबाव में आकर उसने एक सिगरेट पी ली।

     

    उसे लगा कि यह बस एक बार की बात है। लेकिन धीरे-धीरे वही एक सिगरेट उसकी रोज़ की आदत बन गई।

     

    कुछ महीनों बाद रवि बिना सिगरेट के बेचैन रहने लगा। पढ़ाई और काम में उसका मन कम लगने लगा। घरवालों ने समझाया, लेकिन वह हर बार कहता, “मैं जब चाहूँगा, छोड़ दूँगा।”

     

    समय बीतता गया। उसकी सेहत और पैसे दोनों पर असर पड़ने लगा। सबसे ज्यादा दुख उसके माता-पिता को होता था, जो अपने बेटे को इस आदत से परेशान देखते थे।

     

    एक दिन रवि ने अपने पिता को चुपचाप रोते हुए देखा। पिता ने सिर्फ इतना कहा, “बेटा, हमें तुम्हारे पैसों की नहीं, तुम्हारी जिंदगी की चिंता है।”

     

    ये शब्द रवि के दिल में उतर गए।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह अपनी इस आदत से बाहर निकलने की कोशिश करेगा। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उसने परिवार का साथ लिया और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से मदद भी ली।

     

    कई दिनों की मेहनत के बाद रवि ने सिगरेट से दूरी बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी फिर पटरी पर आने लगी।

     

    रवि ने समझ लिया कि लत कभी छोटी नहीं होती। शुरुआत चाहे मज़ाक में हो, लेकिन उसका असर जिंदगी पर बहुत बड़ा हो सकता है।

     

    सीख: गलत आदत को “बस एक बार” कहकर शुरू करना आसान है, लेकिन उससे बाहर निकलने के लिए हिम्मत, परिवार का साथ और सही मदद जरूरी होती है।

  • सिगरेट की लत

    सिगरेट की लत

    पढ़ने का समय : 2 मिनट
    • रमेश एक मेहनती लड़का था। वह अपने परिवार से बहुत प्यार करता था। दोस्तों के साथ बैठते समय उसने पहली बार सिगरेट पी। दोस्तों ने कहा, “एक बार पीने से कुछ नहीं होता।”

     

    रमेश ने भी यही सोचा। लेकिन धीरे-धीरे एक सिगरेट रोज की आदत बन गई। फिर दो, फिर तीन… अब बिना सिगरेट के उसका मन बेचैन रहने लगा।

     

    उसकी माँ अक्सर कहतीं, “बेटा, ये सिगरेट छोड़ दे। हमें तेरी सेहत की चिंता होती है।”

     

    रमेश हर बार कहता, “माँ, छोड़ दूँगा… बस थोड़ा समय दो।”

     

    एक दिन सीढ़ियाँ चढ़ते समय रमेश जल्दी थक गया। उसे समझ आया कि जिस चीज को वह मज़ाक समझकर शुरू किया था, वही अब उसकी जिंदगी पर असर डाल रही थी।

     

    उस रात उसने अपनी माँ की बात याद की। उसने फैसला किया कि वह इस आदत से छुटकारा पाने की कोशिश करेगा। उसने अपने भरोसेमंद परिवारवालों से मदद ली और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेने का निर्णय किया।

     

    कई दिनों तक मुश्किल हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    कुछ समय बाद उसकी जिंदगी बदलने लगी। उसे महसूस हुआ कि असली आज़ादी वही है, जब इंसान किसी बुरी आदत का गुलाम न रहे।

     

    कहानी की सीख:

    सिगरेट की शुरुआत भले ही छोटी लगे, लेकिन निकोटीन की लत पकड़ सकती है। इसलिए शुरुआत ही न करना सबसे अच्छा है। और अगर किसी को लत लग चुकी हो, तो शर्मिंदा होने के बजाय किसी भरोसेमंद बड़े या स्वास्थ्यकर्मी से मदद लेना बेहतर है।