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लेखक: Vikash Vinay

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Vikash Vinay

गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।

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अगस्त 2026
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  • बारिश में गरीब के घर मेहमान

    बारिश में गरीब के घर मेहमान

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में रामू अपनी पत्नी सीता और दस साल के बेटे सोनू के साथ रहता था। रामू मजदूरी करके किसी तरह अपने परिवार का पेट पालता था। घर में न पक्का छप्पर था, न ज्यादा सामान और न ही जमा पूँजी।

     

    उस दिन सुबह से ही आसमान में काले बादल छाए हुए थे। शाम होते-होते तेज बारिश शुरू हो गई। हवा इतनी तेज थी कि झोपड़ी की खपरैल जगह-जगह से हिलने लगी।

     

    सीता ने घर के कोने में रखे अनाज को देखते हुए कहा,

    “आज बस इतनी ही दाल और थोड़ा-सा आटा बचा है। कल का पता नहीं।”

     

    रामू ने मुस्कुराकर कहा,

    “चिंता मत करो, कल कुछ काम मिल जाएगा।”

     

    तभी दरवाजे पर किसी ने जोर से दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सोनू डरकर बोला,

    “बाबा, इतनी रात में कौन आया है?”

     

    रामू ने दरवाजा खोला तो सामने एक बूढ़ा आदमी बारिश में पूरी तरह भीगा हुआ खड़ा था। उसके कपड़े फटे हुए थे और वह ठंड से काँप रहा था।

     

    बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा,

    “बेटा, बहुत दूर से आ रहा हूँ। बारिश ने रास्ता रोक दिया। क्या आज रात तुम्हारे घर में थोड़ी जगह मिल सकती है?”

     

    रामू ने एक पल के लिए घर के अंदर देखा। झोपड़ी में पहले ही जगह बहुत कम थी और खाने के लिए भी पर्याप्त सामान नहीं था।

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा,

    “बाबा, यह आपका ही घर समझिए। अंदर आइए।”

     

    सीता ने जल्दी से अपनी पुरानी चादर निकालकर बूढ़े को दे दी।

     

    सोनू ने पूछा,

    “माँ, हमारी तो सिर्फ एक ही सूखी चादर थी।”

     

    सीता बोली,

    “बेटा, ठंड हमें थोड़ी देर और लग जाएगी, लेकिन किसी जरूरतमंद को रातभर ठंड में छोड़ देना उससे बड़ा दुख होगा।”

     

    कुछ देर बाद सीता ने बची हुई दाल और आटे से चार रोटियाँ बनाईं। उसने तीन रोटियाँ परिवार के लिए और एक रोटी बूढ़े के लिए रखी।

     

    लेकिन रामू ने अपनी रोटी बूढ़े की थाली में रख दी।

     

    सीता ने धीरे से कहा,

    “आप क्या खाएँगे?”

     

    रामू मुस्कुराकर बोला,

    “आज भूखे सो जाएँगे, लेकिन किसी मेहमान को भूखा नहीं सुलाएँगे।”

     

    सोनू ने भी अपनी आधी रोटी बूढ़े की थाली में रख दी।

     

    बूढ़े की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने कहा,

    “मैंने बड़े-बड़े घर देखे हैं बेटा, लेकिन इतनी बड़ी दौलत कहीं नहीं देखी।”

     

    रातभर बारिश होती रही। झोपड़ी की छत से पानी टपकता रहा, लेकिन उस छोटे से घर में इंसानियत की गर्माहट बनी रही।

     

    सुबह बारिश रुक गई।

     

    बूढ़ा आदमी जाने लगा। दरवाजे पर पहुँचकर उसने रामू से कहा,

    “तुमने मुझे रात में सिर्फ छत नहीं दी, बल्कि इंसानियत पर मेरा विश्वास भी लौटा दिया।”

     

    रामू ने कहा,

    “बाबा, हमने तो अपना फर्ज निभाया है।”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया और वहाँ से चला गया।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में खबर फैली कि शहर से एक बड़ा व्यापारी गाँव में जमीन देखने आया है। वह वही बूढ़ा आदमी था।

     

    उसने रामू को बुलाकर कहा,

    “मैंने तुम्हारी परीक्षा नहीं ली थी। उस रात मैं बस बारिश से बचने के लिए तुम्हारे घर पहुँचा था। लेकिन तुम्हारी गरीबी में भी तुम्हारी इंसानियत देखकर मैं प्रभावित हुआ।”

     

    व्यापारी ने रामू को अपने गोदाम में काम दे दिया और रहने के लिए एक छोटा पक्का घर भी दिलवा दिया।

     

    रामू की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने कहा,

    “बाबा, आपने हमारी जिंदगी बदल दी।”

     

    बूढ़े ने जवाब दिया,

    “नहीं बेटा, तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी अच्छाई ने बदली है। याद रखना—जिस घर में पैसा कम हो सकता है, लेकिन दिल बड़ा हो, वहाँ भगवान खुद मेहमान बनकर आते हैं।”

     

    उस दिन के बाद रामू के घर में कभी किसी जरूरतमंद को खाली हाथ नहीं लौटाया गया।

     

    सीख

     

    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।

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    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।

  • बहन की राखी और भाई की मजबूरी

    बहन की राखी और भाई की मजबूरी

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    बहन की राखी और भाई की मजबूरी

     

    गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में सीमा अपनी माँ के साथ रहती थी। उसका बड़ा भाई रमेश शहर में मजदूरी करता था। पिता के गुजर जाने के बाद रमेश ही घर की जिम्मेदारी संभाल रहा था।

     

    हर साल रक्षा बंधन पर रमेश किसी भी हालत में घर जरूर आता था। सीमा पूरे साल उस दिन का इंतज़ार करती थी।

     

    इस बार भी रक्षा बंधन से कुछ दिन पहले सीमा ने बाजार से एक सुंदर-सी राखी खरीदी। राखी को देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    वह माँ से बोली,

    “माँ, इस बार भैया आएँगे तो मैं उन्हें यही राखी बाँधूँगी। फिर भैया से अपनी पसंद की मिठाई भी बनवाऊँगी।”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ बेटी, तेरा भैया जरूर आएगा।”

     

    लेकिन माँ के चेहरे की चिंता सीमा से छिपी नहीं थी।

     

    उधर शहर में रमेश एक निर्माण स्थल पर काम कर रहा था। अचानक काम के दौरान उसके पैर में चोट लग गई। डॉक्टर ने कुछ दिनों तक आराम करने की सलाह दी। कई दिनों तक काम न करने के कारण उसकी मजदूरी भी रुक गई।

     

    रमेश के पास घर लौटने के लिए किराए तक के पैसे नहीं थे।

     

    रक्षा बंधन से एक दिन पहले सीमा ने भाई को फोन किया।

     

    “भैया, कब आ रहे हो? मैंने आपके लिए राखी खरीदी है।”

     

    कुछ पल तक रमेश चुप रहा। फिर बोला,

    “सीमा… इस बार शायद मैं घर नहीं आ पाऊँगा।”

     

    सीमा की आवाज़ धीमी हो गई।

    “क्यों भैया?”

     

    रमेश ने अपनी परेशानी छिपाते हुए कहा,

    “बस काम बहुत है। छुट्टी नहीं मिल रही।”

     

    फोन कटने के बाद रमेश की आँखें भर आईं। वह जानता था कि सीमा को उसकी सच्चाई पता चल गई तो वह और दुखी होगी।

     

    अगली सुबह सीमा ने राखी की थाली सजाई। माँ ने पूछा,

    “बेटी, तूने खाना क्यों नहीं खाया?”

     

    सीमा ने कहा,

    “भैया आते तो पहले उन्हें खिलाती।”

     

    दोपहर हो गई। फिर शाम भी होने लगी, लेकिन रमेश नहीं आया।

     

    सीमा बार-बार घर के दरवाजे की ओर देखती रही।

     

    तभी डाकिया एक छोटा-सा पैकेट लेकर आया।

     

    “सीमा के नाम है।”

     

    सीमा ने पैकेट खोला। उसमें एक नई साड़ी, कुछ मिठाई और एक छोटा-सा पत्र था।

     

    पत्र में लिखा था—

     

    “प्यारी सीमा,

    इस बार तेरी कलाई पर राखी बाँधने के लिए मैं सामने नहीं हूँ। इसका मुझे बहुत दुख है। लेकिन मजबूरी ने मुझे रोक लिया। तू मेरी कलाई पर राखी नहीं बाँध पा रही है, फिर भी याद रखना, तेरी राखी का धागा मेरे दिल से बंधा है।

    जल्द ही घर आऊँगा।

    तेरा भैया, रमेश।”

     

    पत्र पढ़ते-पढ़ते सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने राखी को अपने सीने से लगा लिया और बोली,

    “माँ, भैया नहीं आए तो क्या हुआ… उनकी मजबूरी तो हमारे साथ ही है।”

     

    माँ ने बेटी को गले लगा लिया।

     

    कुछ दिनों बाद रमेश वापस गाँव आया। उसके हाथ में ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन बहन के लिए एक छोटी-सी चॉकलेट जरूर थी।

     

    सीमा उसे देखते ही दौड़कर भाई से लिपट गई।

     

    रमेश बोला,

    “माफ कर दे बहना, उस दिन तेरी राखी नहीं बंधवा पाया।”

     

    सीमा ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “भैया, राखी तो उस दिन भी आपके हाथ में बंधी थी… बस धागा मेरी कलाई से नहीं, मेरे दिल से बंधा था।”

     

    रमेश की आँखों में आँसू आ गए।

     

    सीमा ने राखी निकाली और इस बार अपने भाई की कलाई पर बाँध दी।

     

    रमेश ने बहन के सिर पर हाथ रखकर कहा,

    “जब तक मैं हूँ, तुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूँगा।”

     

    सीमा मुस्कुराई।

     

    उस दिन दोनों ने समझा कि रक्षा बंधन सिर्फ राखी बाँधने का त्योहार नहीं, बल्कि उस रिश्ते का नाम है जिसमें दूरियाँ और मजबूरियाँ भी भाई-बहन के प्यार को कमजोर नहीं कर सकतीं।

     

    सीख: सच्चे रिश्ते हालात के मोहताज नहीं होते। मजबूरी इंसान को दूर कर सकती है, लेकिन सच्चा प्यार दिलों को हमेशा करीब रखता है।

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    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।

  • गरीब बहन की राखी

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    गरीब बहन की राखी

     

    रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला था। पूरे गांव में खुशी का माहौल था। हर घर में मिठाइयां बन रही थीं और बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सजे हुए थे।

     

    लेकिन गांव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में रहने वाली गुड़िया के घर में कोई खुशी नहीं थी।

     

    गुड़िया बहुत गरीब थी। उसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। उसका छोटा भाई मोहन ही उसका एकमात्र सहारा था। मोहन शहर में मजदूरी करता था और बड़ी मुश्किल से दोनों का गुजारा चलता था।

     

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले गुड़िया बाजार गई। उसने कई सुंदर राखियां देखीं, लेकिन उनके दाम सुनकर चुपचाप वापस लौटने लगी।

     

    रास्ते में उसकी नजर एक छोटी-सी साधारण राखी पर पड़ी। दुकानदार ने कहा,

    “बहन, ये सिर्फ दस रुपये की है।”

     

    गुड़िया ने अपनी मुट्ठी खोली। उसके पास केवल आठ रुपये थे।

     

    वह उदास होकर बोली,

    “भैया, दो रुपये कम हैं… क्या मैं ये राखी आठ रुपये में ले सकती हूं?”

     

    दुकानदार ने उसकी आंखों में आंसू देखे और मुस्कुराकर राखी उसके हाथ में रख दी।

     

    “ले जा बेटी, आज ये राखी मेरी तरफ से।”

     

    गुड़िया की आंखें खुशी से भर आईं।

     

    अगले दिन सुबह मोहन घर पहुंचा। उसके कपड़े पुराने थे और चेहरा थकान से भरा हुआ था।

     

    गुड़िया ने मुस्कुराते हुए उसकी कलाई पर राखी बांधी और बोली,

    “भैया, मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है। बस ये राखी है… और मेरा ढेर सारा प्यार।”

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने बहन को गले लगाते हुए कहा,

    “तूने मुझे दुनिया की सबसे कीमती चीज दी है, गुड़िया। ये राखी मेरे लिए सोने से भी ज्यादा कीमती है।”

     

    गुड़िया ने पूछा,

    “भैया, तुम मेरे लिए क्या लाए हो?”

     

    मोहन कुछ नहीं बोला। उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा पैकेट निकाला।

     

    गुड़िया ने पैकेट खोला तो उसमें नई चप्पल थी।

     

    गुड़िया हैरान होकर बोली,

    “भैया! ये कितने की है?”

     

    मोहन मुस्कुराया,

    “बहन के लिए चीजों की कीमत नहीं देखी जाती।”

     

    गुड़िया की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    कुछ दिन बाद मोहन को शहर में एक अच्छी नौकरी मिल गई। उसकी मेहनत देखकर मालिक ने उसे स्थायी काम दे दिया।

     

    मोहन ने सबसे पहले अपनी बहन को शहर बुलाया और कहा,

    “अब मेरी बहन को गरीबी में नहीं रहना पड़ेगा।”

     

    गुड़िया मुस्कुराई और बोली,

    “मुझे महंगे कपड़े या बड़ा घर नहीं चाहिए भैया। बस हर रक्षाबंधन पर मेरी कलाई में राखी बंधवाने के लिए तुम मेरे पास रहना।”

     

    मोहन ने बहन का हाथ पकड़कर कहा,

    “जब तक मेरी सांस चलेगी, मैं तेरी रक्षा का वादा निभाऊंगा।”

     

    उस दिन दोनों भाई-बहन की आंखों में आंसू थे, लेकिन उन आंसुओं में दुख नहीं, बल्कि प्यार और भरोसा था।

     

    सीख:

    राखी की कीमत उसके धागे या उसकी कीमत से नहीं होती। राखी की असली कीमत भाई-बहन के प्यार, विश्वास और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने में होती है।

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    Vikash Vinay

    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।

  • कर्मों का हिसाब

    कर्मों का हिसाब

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कर्मों का हिसाब

     

    एक छोटे से गाँव में रमेश नाम का एक आदमी रहता था। वह बहुत अमीर था, लेकिन उसका दिल गरीब था। गाँव में कोई जरूरतमंद मदद माँगने आता तो वह उसे खाली हाथ लौटा देता।

     

    रमेश का पड़ोसी हरि गरीब किसान था। एक साल उसकी फसल बर्बाद हो गई। घर में खाने तक के पैसे नहीं थे। हरि ने रमेश से कुछ पैसे उधार माँगे।

     

    रमेश ने हँसते हुए कहा,

    “मेरे पास पैसे पेड़ पर नहीं उगते। अपनी परेशानी खुद संभालो।”

     

    हरि निराश होकर घर लौट गया। उसकी पत्नी ने कहा, “भगवान सब देख रहे हैं। आज नहीं तो कल हर किसी को अपने कर्मों का हिसाब देना पड़ता है।”

     

    समय बीतता गया। रमेश का कारोबार खूब बढ़ा। उसने शहर में बड़ी दुकान खोल ली और गाँव के गरीब लोगों को नीचा दिखाने लगा।

     

    एक दिन रमेश शहर से गाँव लौट रहा था। रास्ते में उसकी गाड़ी अचानक खराब हो गई। रात काफी हो चुकी थी। सड़क सुनसान थी। रमेश मदद के लिए इधर-उधर देखने लगा।

     

    तभी एक आदमी लालटेन लेकर वहाँ पहुँचा।

     

    वह कोई और नहीं, हरि था।

     

    रमेश ने शर्मिंदा होकर कहा,

    “हरि… मेरी मदद कर दो।”

     

    हरि ने बिना कोई पुरानी बात याद दिलाए उसकी मदद की। उसने गाड़ी ठीक करवाने के लिए मैकेनिक बुलाया और रमेश को अपने घर ले गया।

     

    रमेश की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने कहा,

    “हरि, मैंने तुम्हें उस समय मदद से मना कर दिया था, फिर भी तुमने मेरी मदद की। तुम मुझसे अच्छे इंसान हो।”

     

    हरि मुस्कुराया और बोला,

    “भाई, मैं तुम्हारे कर्मों का हिसाब रखने वाला कौन होता हूँ? उसका हिसाब तो ऊपर वाला रखता है।”

     

    कुछ दिनों बाद रमेश के कारोबार में अचानक बहुत बड़ा नुकसान हो गया। उसके पास कुछ भी नहीं बचा। जिन लोगों के साथ उसने कभी घमंड किया था, उनमें से किसी ने उसका साथ नहीं दिया।

     

    उस समय हरि ही उसके पास खड़ा रहा।

     

    हरि ने उसे अपने खेत में काम करने का मौका दिया। धीरे-धीरे रमेश ने मेहनत करना सीखा और समझ गया कि पैसा इंसान को बड़ा नहीं बनाता, उसके कर्म उसे बड़ा बनाते हैं।

     

    एक दिन रमेश गाँव के मंदिर के सामने खड़ा होकर बोला—

     

    “मैंने जिंदगी भर दूसरों को छोटा समझा। आज समझ आया कि इंसान जितना दूसरों के साथ करता है, जिंदगी किसी न किसी रूप में उसका हिसाब जरूर लौटाती है।”

     

    उस दिन से रमेश बदल गया। उसने गरीबों की मदद करना शुरू कर दिया और कभी किसी जरूरतमंद को खाली हाथ नहीं लौटाया।

     

    कहानी की सीख:

    अच्छे कर्म का फल देर से मिल सकता है, लेकिन मिलता जरूर है। और बुरे कर्मों का हिसाब भी जिंदगी किसी न किसी मोड़ पर जरूर चुकाती है।

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    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।

  • सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    रवि एक मेहनती और खुशमिजाज लड़का था। वह अपने परिवार के साथ रहता था और भविष्य में कुछ बड़ा करने का सपना देखता था।

     

    कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों ने मज़ाक-मज़ाक में उसे सिगरेट पीने के लिए कहा। रवि ने पहले मना किया, लेकिन दोस्तों के दबाव में आकर उसने एक सिगरेट पी ली।

     

    उसे लगा कि यह बस एक बार की बात है। लेकिन धीरे-धीरे वही एक सिगरेट उसकी रोज़ की आदत बन गई।

     

    कुछ महीनों बाद रवि बिना सिगरेट के बेचैन रहने लगा। पढ़ाई और काम में उसका मन कम लगने लगा। घरवालों ने समझाया, लेकिन वह हर बार कहता, “मैं जब चाहूँगा, छोड़ दूँगा।”

     

    समय बीतता गया। उसकी सेहत और पैसे दोनों पर असर पड़ने लगा। सबसे ज्यादा दुख उसके माता-पिता को होता था, जो अपने बेटे को इस आदत से परेशान देखते थे।

     

    एक दिन रवि ने अपने पिता को चुपचाप रोते हुए देखा। पिता ने सिर्फ इतना कहा, “बेटा, हमें तुम्हारे पैसों की नहीं, तुम्हारी जिंदगी की चिंता है।”

     

    ये शब्द रवि के दिल में उतर गए।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह अपनी इस आदत से बाहर निकलने की कोशिश करेगा। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उसने परिवार का साथ लिया और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से मदद भी ली।

     

    कई दिनों की मेहनत के बाद रवि ने सिगरेट से दूरी बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी फिर पटरी पर आने लगी।

     

    रवि ने समझ लिया कि लत कभी छोटी नहीं होती। शुरुआत चाहे मज़ाक में हो, लेकिन उसका असर जिंदगी पर बहुत बड़ा हो सकता है।

     

    सीख: गलत आदत को “बस एक बार” कहकर शुरू करना आसान है, लेकिन उससे बाहर निकलने के लिए हिम्मत, परिवार का साथ और सही मदद जरूरी होती है।

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  • सिगरेट की लत

    सिगरेट की लत

    पढ़ने का समय : 2 मिनट
    • रमेश एक मेहनती लड़का था। वह अपने परिवार से बहुत प्यार करता था। दोस्तों के साथ बैठते समय उसने पहली बार सिगरेट पी। दोस्तों ने कहा, “एक बार पीने से कुछ नहीं होता।”

     

    रमेश ने भी यही सोचा। लेकिन धीरे-धीरे एक सिगरेट रोज की आदत बन गई। फिर दो, फिर तीन… अब बिना सिगरेट के उसका मन बेचैन रहने लगा।

     

    उसकी माँ अक्सर कहतीं, “बेटा, ये सिगरेट छोड़ दे। हमें तेरी सेहत की चिंता होती है।”

     

    रमेश हर बार कहता, “माँ, छोड़ दूँगा… बस थोड़ा समय दो।”

     

    एक दिन सीढ़ियाँ चढ़ते समय रमेश जल्दी थक गया। उसे समझ आया कि जिस चीज को वह मज़ाक समझकर शुरू किया था, वही अब उसकी जिंदगी पर असर डाल रही थी।

     

    उस रात उसने अपनी माँ की बात याद की। उसने फैसला किया कि वह इस आदत से छुटकारा पाने की कोशिश करेगा। उसने अपने भरोसेमंद परिवारवालों से मदद ली और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेने का निर्णय किया।

     

    कई दिनों तक मुश्किल हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    कुछ समय बाद उसकी जिंदगी बदलने लगी। उसे महसूस हुआ कि असली आज़ादी वही है, जब इंसान किसी बुरी आदत का गुलाम न रहे।

     

    कहानी की सीख:

    सिगरेट की शुरुआत भले ही छोटी लगे, लेकिन निकोटीन की लत पकड़ सकती है। इसलिए शुरुआत ही न करना सबसे अच्छा है। और अगर किसी को लत लग चुकी हो, तो शर्मिंदा होने के बजाय किसी भरोसेमंद बड़े या स्वास्थ्यकर्मी से मदद लेना बेहतर है।

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    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।