टैग: दर्द

  • सुना है बहुत ख़ुश है वो किसी और से मिलके…

    सुना है बहुत ख़ुश है वो किसी और से मिलके…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अर्ज किया है,,

    बिछड़े हुए लोग जब बुरे दौर से मिलेंगे 

    दर्द जब भी मिलेंगे चारों ओर से मिलेंगे!!

    सुना है बहुत खुश है वो किसी ओर से मिल कर 

    आग तो तब लगेगी जब हम किसी ओर से मिलेंगे… 😎😎

  • मर क्यों नहीं जाते हो…??

    मर क्यों नहीं जाते हो…??

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    आखिर कह ही डाला उसने

     एक दिन…..

    इस कदर टूटे हो बिखर क्यो 

    नही जाती हो…..??

    कब तक निभाओगे ये 

    दर्द भरी जिंदगी…..??

    किसी रात खामोशी से मर

     क्यो नही जाती हो……?? 😭😭

  • आखिर कौन…??

    आखिर कौन…??

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    ना दोस्त है ना दुश्मन हैं

      हमसे लड़ता कौन ?

    ना तूफान हैं ना सैलाब हैं

      हमसे डरता कौन ?

    ना ग़ालिब हैं ना प्रेमचंद हैं

       हमको पढ़ता कौन ?

     ना साँसे हैं ना धड़कन हैं 

      हम पर मरता कौन ?

  • सवाल का जबाव जिसका इंतजार सभी को है।

    सवाल का जबाव जिसका इंतजार सभी को है।

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    कहानी के इस भाग में एक रहस्य से पर्दा उठता है। जिसका इंतजार लगभग सभी को रहता है। चलिए कहानी की ओर चलें…
    ” अब रोने की बारी उनकी है। जिसने तुम्हें रूलाने की कोशिश की है । अब तुम्हें रोने की कोई जरूरत नहीं है। “
    शीला बोलती हुई,राधा को ढांढस बंधा रही थी। शीला और चांदनी दोनो मिलकर  राधा और रूपा को रस्सी के बंधन से आजाद कर चुकी थी । चारो सहेलियां एक दुसरे से आपस में लिपट कर रोने लगी थी। अब इन सभी के जिन्दगी में जो दु:ख के बादल छाये थे वो अब छट चुके थे। इन सबके जिवन में तुफान लाने वाला सख्श धराशाई होकर बेसुध फर्श पर परा था।
    “अब जब सब कुछ ठीक हो गया है तो, हमें यहां से चलना चाहिए।”
    बोलकर चांदनी बारी बारी से तीनो के तरफ देखती है।
    ” हां हमें चलना चाहिए इससे पहले की कोई और प्रोबलम खड़ा हो हमें यहां से निकल जाना चाहिए।”
    शीला भी अपने आप को शांत करते हुए आंख से आंसू के बुंद को साफ करते हुए बोली थी ।
    ” हां दीदी जायेंगे पर इसे ऐसे छोड़कर नहीं इसको इसके किए की सजा देने के बाद।”
    रूपा कठोर होते हुए बोली थी। राधा को बहुत बरा सदमा लगा था। वो अभी भी बहुत डरी हुई थी। उसे अभी भी यकिन नही हो रहा था की सब कुछ नॉर्मल हो गया है। और वो मन ही मन अपने आप को कोस भी रही थी। की ये जो कुछ भी हुआ है, सब उसी के वजह से हुआ है। और वो उसी के वजह से आज रूपा और चांदनी शीला के जान का भी खतरा हो सकता था।
    ” क्या इसको ऐसे हीं छोड़ दोगे दीदी आप लोग?”
    शीला और चांदनी के तरफ देखकर कमल के तरफ अपनी उंगली से इशारा करते हुए राधा बोली थी। और एक बार फीर राधा के आंख से आंसू बहने लगे थे।
    ” नहीं दीदी, हम लोग इस कमीने को छोड़ेंगे नहीं। बल्कि पुलिस में देंगे।”
    रूपा राधा के आंख से आंसू पोंछते हुए बोली थी। रूपा की बात सुनकर सभी रूपा को आशचर्य से देखने लगे थे। तीनो के मन में एक साथ एक बात चली थी। की रूपा कितनी समझदार है, वो कितनी समझदारी की बात कर रही है। पर राधा रूपा को समझदार के साथ साथ बहुत हिम्मत वाली भी मानने लगी थी। आज जिस तरह से रूपा कमल के साथ डटकर मुकाबला की थी। उसको कमल से मार भी खानी परी थी। पर वो जिस तरह से अपना हिम्मत नहीं हारी थी। रूपा की यही सब गुण राधा के नजर में रूपा को महान बना रही थी।
    अभी उधर ये सब चारो सहेलियों में चल हीं रहा था। कि इधर धीरे धीरे  कमल के हांथ पैर हिलने लग गया था। उसको होस आने लगा था। कमल का आंख धीरे धीरे खुलता है। कमल का हालत बिल्कुल भी ठीक नहीं था। उसके बदन में अभी भी बहुत अ सहनीय दर्द हो रहा था। उसके मुंह से बहुत सारा खून भी बह गया था। ज्यादा खून बह जाने के कारण हीं कमल को होश नहीं आ पाया था। जब कमल का आंख खुलता है। तो वो नजर घुमाकर सभी लड़कियों के तरफ देखता है। वो कुछ बोलना चाहता है, पर वो कुछ भी बोल नहीं पाता हैं। उसके शरीर के अंदर इतनी भी शक्ती नहीं बच पाई थी। की वो कुछ बोल भी पाये। यही सब सोचकर कमल अपने आप को बहुत लाचार और कमजोर महसूस कर रहा था।
    ” इसको मीटिंग हॉल में लेकर चलते हैं। वहां ले जा कर प्रिंसिपल मैम के हवाले कर देते हैं। अब वही  इसके साथ जो करना होगा करेंगे।”
    शीला अपनी समझदारी से सभी के तरफ देखते हुए बोली थी।
    ” दीदी पुलिस को कॉल करके बुला लेते हैं ना, इसको पुलिस के हवाले कर देंगे।”
    बोल कर रूपा शीला को प्रश्नवाचक मुद्रा में देखने लगी थी।
    ” नही इसको प्रिंसिपल मैम के पास लेकर चलते हैं।”
    शीला रूपा को जबाव देते हुए बोली थी।
    ” नहीं दीदी इस भेड़िये को खुला छोड़ना ठीक नहीं होगा।”
    रूपा शीला से बोली थी। कमल को होश में आने के बाद उसके दिमाग में एक हीं बात राऊंड मारते हुए चल रहा था। की ये दोनो क्लास रूम में कैसे आया था। और आकर उसका बना बनाया सारा खेल बिगाड़ दिया था। कमल का बात सही भी था। अगर उस टाइम शीला और चांदनी आ कर, कमल पर अटैक नहीं किया होता तो अभी सारा सिचुएशन उसके अंडर में होता। और शीला और चांदनी से उसको इतना मार नहीं पड़ा होता तो वो,अभी फर्श पर नहीं पड़ा होता।
    ” तुम दोनो अंदर कैसे आए?”
    कमल दर्द से कराहते हुए हिम्मत करते हुए शीला और चांदनी से अपनी बात पुछ हीं लिया था। ये आवाज चारो सहेलियों के कान में जैसे ही गई सभी आशचर्य से उस आती हुई आवाज के तरफ मुड़कर देखी। सभी सहेलियों के चेहरे के हाव भाव एक दम से बदल गये थे। सभी एक्शन मोड में आ गयी थी। सभी एक साथ एक बार फिर से कमल पर अटैक करने चल पड़ी थी। यह सीन देखकर कमल के होश उड़ गये थे। डर के मारे उसके पसीने छुटने लगे थे। वो सोचने लगा अब उसके शरीर में और मार बर्दास्त करने की छमता नहीं है। अब अगर और मार पड़ा तो वो जिन्दा बच नहीं पायेगा। इसी लिए अब वो दिमाग से काम लेना चाहा। कमल हिम्मत करके उठकर बैठ गया था।
    ” तो तुम्हें जानना है। की हम क्लास रूम के अंदर कैसे आए?”
    चांदनी कमल पर चीखते हुए जोर से बोली थी।
    ” हां इसे बता हीं देते हैं। की हम दोनो क्लास रूम के अंदर कैसे आए।”
    शीला चांदनी के तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर बोली थी। हालाकी राधा और रूपा भी कमल के इस सवाल का जबाव जानना चाहती थी। वो दोनो भी अपनी दीदी के तरफ देखने लगी थी। सभी चलकर कमल के पास पहूंच गये थे। रूपा का लात कमल के पीठ पर पड़ता है। जो कमल अभी अभी उठकर बैठा हीं था। एक भारी चीख कमल के मुंह से निकल जाता है।
    ” पहले इसको इसके सवाल का जबाव सुनने दो बहन, फिर उसके बाद तुम इस पर अपना बॉक्सिंग का प्रेक्टिस कर लेना।”
    शीला रूपा को रोकते हुए बोली थी। सुनकर रूपा रूक जाती है।
    “इसमें तुम्हारी हीं बेवकूफी है भेड़िए।”
    चांदनी गुस्से से दांत पीस कर कमल के तरफ मुड़कर बोली थी।
    ” मैं चाहती तो, तुम्हें वहीं सबक सीखा सकती थी। जब तुम्हें रस्सी और डंडा लिये क्लास रूम के तरफ आते हुए देखी थी। और छुपकर तुम्हारा पीछा करने लगी थी।”
    बीना रूके शीला बोलते रही।
    ” .मैं जानना चाहती थी। की आखिर बात क्या है। तुम रस्सी और डंडे लेकर क्या करने वाले हो। और सोने पे सुहागा तो तब हुआ, जब तुम्हारा दोनो हांथ खाली नहीं होने के वजह से तुमने दरवाजा लॉक नहीं किया। इसी बात का फायदा हमने उठायी और दोनो भीतर आके दरवाजे बंद कर ली थी। ताकी तुम्हें भी बचकर भागने नहीं दूं।”
    चांदनी ने कमल को पुरी बात बतायी थी ।
    ” दीदी जब आप पहले हीं आ गईं थी तो, आपने हमें पहले हीं क्यों नहीं बचाई थी। आप अपनी आंखों के सामने हमें रस्सी से बंधते और पिटते हुए देखी थी।”
    रूपा बोलकर शीला और चांदनी के तरफ सवालिया नजर से देखने लगी थी।
    ” इसका मतलब, दीदी मैं आपके आंखों के सामने बेहोश हुई थी।”
    राधा भी शीला और चांदनी से सवाल की थी। इस पर शीला और चांदनी कुछ भी नहीं बोलती है। बस दोनो अपना शर हां में हिला देती है।
    ये सुनकर कमल के पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी थी। उसमे अब हिम्मत भी नहीं थी। की वो उन सब से फाइट कर सके तो उसने अपनी जान बचाने का एक तरीका निकाला जो एक हारा हुआ हर इंसान लगभग यही करता है। और कमल ने भी वही किया था। वो झुक कर शीला के पैर पकर लिया था।
    ” मुझे माफ कर दो,मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गयी है। प्लीज मुझे माफ कर दो और मुझे जाने दो।”
    कमल शीला के पैरों में गिरकर नाक रगड़ते हुए बोला था।
    ” कमीने सुअर की औलाद, तुम्हें माफ कर दूं। निकल गयी सारी हेकड़ी, अब रेप नहीं करेगा मेरी दीदी का हां।”
    रूपा गुस्से में अपनी आंखे लाल करते हुए कमल से बोली थी । और धमा धम दो लात उसको रसीद करदी थी। कमल रूपा के पैर की चोट खा कर पुरी तरह से हिल गया था। अब उसको समझ आने लगा था। की उसकी ग़लती छोटी नहीं है।
    ” अब पछतावा आ रहा है। अपने किये पर पहले ये क्यों नहीं सोचा अपना अंजाम ये सब करने से पहले।”
    चांदनी जो राधा के कंधे में अपनी बांह डाली हुई थी। कमल से  बोली थी।
    “माफी तो तुम्हें मिलने से रही, पर तुम्हे जेल जरूर मिलेगी।”
    रूपा कमल को बाल से खींचते हुए बोली थी।
    ” अब इसके साथ बहस करने से, कोई फायदा नही है दीदी।”
    कहानी और भी मजेदार होने वाली है ! पढिए अगले भाग में….प्यार एक अहसास

  • 💞💞प्यार का नशा… पार्ट 3💞💞

    💞💞प्यार का नशा… पार्ट 3💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे,

    वरुणा देवी रिशाल के चेहरे को देखती हैं और पूछती हैं, “रिशाल, क्या हुआ? तुम कहीं और ही लग रहे हो।”

    रिशाल जल्दी से अपने आप को संभालता है और कहता है, “माँ, मीटिंग तो ठीक रही। बस थोड़ा थकान है।”

    वरुणा देवी रिशाल की बात मानती हैं और कहती हैं, “ठीक है, बेटा। तुम आराम करो। 

    लेकिन रिशाल का मन अमानत के साथ ही रहता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है, वह अमानत की मासूमियत और उसकी आँखों में आंसू को याद करता है और उसके लिए अपने दिल में एक अजीब सा हलचल महसूस करता है…:

    वरुणा देवी रिशाल के चेहरे को जब देखती हैं तो उसे लगता है कि वह किसी बात से परेशान है। वह रिशाल के पास जाती हैं और पूछती हैं, “रिशाल, क्या सब ठीक है? तुम्हारे चेहरे पर तनाव दिख रहा है। क्या तुम मुझे कुछ बताना चाहते हो?”

    रिशाल वरुणा देवी की बात सुनता है, लेकिन वह कुछ नहीं बताता। वह जल्दी से एक बहाना बनाता है और कहता है, “माँ, मेरा सर दर्द कर रहा है। मुझे लगता है कि मैं थोड़ा थक गया हूँ। मैं कुछ देर अकेले में आराम करना चाहता हूँ।”

    रिशाल अपने हाथ में रखे हुए अमानत के बाल के टुकड़े को देखता है और सोचता है,

    वरुणा अग्निहोत्री जब अपने बेटे के सर दर्द की बात सुनती है, तो तुरंत घर के नौकर, रामू को आवाज़ लगाती है, “रामू, रामू! जल्दी आओ और मुझे तेल लेकर आओ। रिशाल को सर दर्द हो रहा है।”

    रामू वरुणा देवी की आवाज़ सुनकर जल्दी से आता है और पूछता है, “मैम, कौन सा तेल लाऊं? कोकोनट का या बदाम का?”

    वरुणा देवी कहती हैं, “बदाम का तेल लाओ। और जल्दी करो। रिशाल को आराम करना है ।”

    रामू बदाम का तेल लेकर आता है और वरुणा देवी को देता है। वरुणा देवी तेल को लेकर रिशाल के कमरे में जाती हैं और उसके सर पर तेल से मालिश करने को कहती हैं, 

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करने के लिए कहती हैं, “बेटा, मैं तुम्हारे माथे की मालिश कर दूँ। इससे तुम्हारा सर दर्द कम होगा।”

    लेकिन रिशाल मना कर देता है, “नहीं, माँ। मैं ठीक हूँ। तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए।”

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल की बात नहीं मानती और कहती हैं, “नहीं, बेटा। तुम्हारी सेहत मेरे लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट है। मैं तुम्हारे माथे की मालिश करूँगी।”

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल को अपने पैरों के पास बैठने के लिए कहती हैं और खुद बेड पर बैठ जाती हैं। वह रिशाल के माथे पर तेल लगाती हैं और धीरे-धीरे मालिश करने लगती हैं, 

    रिशाल अपनी माँ की चम्पी से खुश होता है, लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही रहता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है, 

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करती हैं और कहती हैं, “बेटा, तुम्हें आराम करना चाहिए । मैं तुम्हारे लिए खाना भिजवा दूंगी ऊपर ही । तुम्हें कुछ नहीं करना है। बस आराम करो।”

    रिशाल वरुणा देवी की बात मानता है और आराम करने लगता है। लेकिन उसके मन मे अमानत के साथ बीते पल ही रहता है…

    वरुणा अग्निहोत्री की चम्पी धीरे-धीरे रिशाल को भी अच्छा लगने लगता है।

    .. to be continue….

     

  • 💞💞प्यार का नशा पार्ट 2 💞💞

    💞💞प्यार का नशा पार्ट 2 💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    • कहानी अब आगे,

    अमानत ने रिशाल की बात सुनी और उसकी आँखों में आंसू आ गए।

     “मुझे माफ कर दीजिए, मैं आपको नहीं जानती थी। मैं सिर्फ अपने भाई के साथ घूमने आई थी, और उसकी साथ खेलते हुए बस गलती से आपसे टकरा गयी मे माफ़ी मांगती हु pls माफ कर दीजिये “

    रिशाल ने अमानत को देखा और उसकी मासूमियत को देखकर उसका गुस्सा थोड़ा कम हो गया । लेकिन फिर भी वो अपने गुस्से को कण्ट्रोल नहीं कर पाया और वो गुस्सा अमानत पर निकल दी उसे काफ़ी कुछ सुना कर |” 

    अमानत ने रिशाल की बात सुनी जिससे उसके आँखों में आंसू आ गए। वह अपने भाई के साथ वहाँ से चली गई, लेकिन रिशाल की बातें उसके दिल में बस गईं…

    रिशाल ने अमानत को वहाँ से जाने दिया और अपनी मीटिंग में चला गया। लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही था। वह अमानत की मासूमियत और उसकी आँखों में आंसू देखकर थोड़ा परेशान हो गया था।

    मीटिंग खत्म होने के बाद, रिशाल अपने घर चला गया। लेकिन उसका मन अमानत के बारे में ही सोच रहा था। वह अपनी शर्ट के बटन को देखकर अचानक रुक गया। उसमें एक बाल फंसा हुआ था, जो अमानत का था।

    रिशाल को वो बाल को देख, अमानत की याद आ जाती है और वो उसी मे खो जाता है । वह सोच रहा था कि क्या उसने अमानत के साथ ठीक बर्ताव किया था। उसने अमानत को रुला दिया था, और अब उसे इसका अफसोस हो रहा था।

    रिशाल ने अपनी शर्ट उतारी और उस बाल को अपने हाथ में लिया। वह अमानत के बारे में सोच रहा था, और उसकी मासूमियत को याद कर रहा था।

    तभी एंट्री होती है, 

    वरुणा देवी, रिशाल की माँ, कमरे में आती हैं और रिशाल को अपने हाथ में कुछ पकड़े हुए देखती हैं। वह उसके पास जाती हैं और पूछती हैं,

    वरुणा अग्निहोत्री, “क्या है यह, रिशाल? तुम क्या कर रहे हो?”

    रिशाल जल्दी से उस बाल के टुकड़े को अपने हाथ में छिपा लेता है और कहता है, “कुछ नहीं, माँ। बस एक छोटी सी चीज़।”

    वरुणा देवी को लगता है कि रिशाल कुछ छिपा रहा है, लेकिन वह कुछ नहीं कहतीं। वह रिशाल के चेहरे को देखती हैं और पूछती हैं, “क्या हूआ सब ठीक है न , रिशाल? तुम थोड़े परेशान लग रहे हो।”

    रिशाल वरुणा देवी को देखता है और मुस्कराता है, “हाँ, माँ। सब ठीक है। बस थोड़ा थकान है।”

    वरुणा देवी रिशाल की बात मानती हैं और कहती हैं, “ठीक है, बेटा। तुम आराम करो। मैं तुम्हारे लिए चाय मंगवा देती हूँ।”

    जैसे ही वरुणा देवी जाती हैं, रिशाल अपने हाथ में छिपाए हुए बाल के टुकड़े को देखता है और अमानत के बारे में सोचता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है और उससे माफ़ी मांग सकता है, क्युकी कहीं न कहीं उसने गुस्से मे अमानत को कुछ ज़्यदा ही सुना दिया था और अब RA को उसकी लिए गिलट हो रहा था |” 

    वरुणा देवी रिशाल के लिए चाय लाती है और रिशाल के पास आकर बैठती हैं और पूछती हैं, “आज की मीटिंग कैसी रही, रिशाल? क्या हूआ सब ठीक रहा न ?”

    रिशाल को माँ की मीटिंग की बात सुन जुहू बिच पर हुई इंसिडेंट अमानत की याद आ जाती है और वह उसी में खो जाता है। वह वरुणा देवी की बात को सुनता है, लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही रहता है।

    … to be continue….

  • ज़िंदगी में इम्तिहान बहुत है… 🥹

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    इस जिंदगी के सफर में

    थकान बहुत हैं,

    अपनों के अपनों पर यहां

    इल्जाम बहुत है,

    शिकायतों का दौर देखता हूं तो

    थम सा जाता हूं,

    लगता है उम्र कम है और

    इम्तिहान बहुत है…🥹🥹

  • बेवजह की मोहब्बत

    बेवजह की मोहब्बत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    बेवजह की मोहब्बत

     

    मेरी लाइफ एकदम सॉर्टेड थी। अच्छी जॉब (सीनियर मैनेजर, गुड़गांव), एक प्यारी वाइफ (नेहा) और एक फ्लैट जिसकी ईएमआई (EMI) हर महीने मेरे अकाउंट को खाली करने की कसम खाती थी। मैं 32 साल का था, मैरिड था, और लाइफ की बोरियत को ‘सफलता’ मान चुका था।

    फिर आई रिया। फेसबुक के एक रैंडम ग्रुप पर हमारी बहस हुई,  “क्या चाय कॉफी से बेहतर है?” इस बेवकूफी भरे टॉपिक से शुरू हुई बात कब मैसेंजर से व्हाट्सएप और फिर वॉयस कॉल तक पहुँच गई, पता ही नहीं चला।

    “शादीशुदा होने का मतलब यह नहीं है कि आपका दिल धड़कना बंद कर देता है, बस वह गलत दिशा में धड़कने का रिस्क नहीं लेना चाहता।” पर मेरा दिल उस समय एडवेंचर के मूड में था।

    रिया मुझसे सात साल छोटी थी। बैंगलोर में रहती थी। उसकी आवाज़ में वो जादू था जो गुड़गांव के ट्रैफिक में भी मुझे सुकून देता था।

     

    शुरुआत में   सब ‘फ्रेंडली’ था। लेकिन धीरे-धीरे हमारी बातें ‘गुड मॉर्निंग’ से ‘आई मिस यू’ तक पहुँच गईं। नेहा (मेरी वाइफ) को लगता था कि मैं ऑफिस के कॉल्स पर बिजी हूँ। और एक तरह से मैं बिजी ही था, अपनी दूसरी लाइफ को मैनेज करने में।

    रिया और मेरे बीच घंटों वॉयस कॉल्स होते थे। जब रात को घर के सब लोग सो जाते, मैं बालकनी में जाकर उससे बात करता।

    “तुम शादीशुदा क्यों हो, अर्जुन?” वह अक्सर पूछती।

    “क्योंकि मैं तुमसे पहले नेहा से मिला था। टाइमिंग का खेल है सब,” मैं मज़ाक में कहता।

    लेकिन यह सिर्फ़ मज़ाक नहीं था। हमारे बीच खुलकर रोमांस होने लगा था। चैट पर वो बातें होती थीं जो शायद मैंने नेहा से कभी नहीं की थीं। वॉयस कॉल पर उसकी सांसों की आवाज़ सुनकर मुझे लगता था कि यही ‘सच्चा प्यार’ है। हमने हज़ारों वादे किए। हमने प्लान बनाया कि हम गोवा में मिलेंगे। वह कहती थी, अर्जुन, तुम मेरे सोलमेट हो। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि तुम मैरिड हो, मुझे बस तुम चाहिए।”

    मुझे लगा कि रिया वो ‘मिसिंग पीस’ है जो मेरी लाइफ की पहेली को पूरा कर देगी।

     

    सब कुछ परफेक्ट चल रहा था, जैसे किसी बॉलीवुड फिल्म का पहला हाफ। फिर अचानक रिया के मैसेज कम होने लगे।

    “बिजी हूँ,” “काम का प्रेशर है,” “मम्मी पास में हैं”, ये सब बहाने आम हो गए।

    फिर एक हफ्ता ऐसा आया जब उसने मेरा कोई कॉल नहीं उठाया। मैं पागल हो रहा था। गुड़गांव की सड़कों पर कार चलाते हुए मैं बार-बार फोन चेक करता। नेहा को लगा कि ऑफिस में कुछ बड़ा पंगा हुआ है। उसे क्या पता था कि मेरा ‘दिल का ऑफिस’ बंद होने की कगार पर है।

    “प्यार में ‘इंतज़ार’ करना अच्छा लगता है, लेकिन ‘इग्नोर’ होना दुनिया की सबसे गन्दी फीलिंग है।”

    आठ दिन बाद उसका फोन आया। मेरी जान में जान आई।

    “रिया! कहाँ थी तुम? मैं मर रहा था तुम्हारे बिना!”

    दूसरी तरफ से जो आवाज़ आई, वो रिया की तो थी, पर उसमें वो ‘इश्क’ नहीं था।

    “सुनो अर्जुन, मुझे लगता है हमें अब बात नहीं करनी चाहिए,” उसने बहुत ही ठंडे अंदाज़ में कहा।

     

    मैं यह सुनकर सुन्न रह गया। “क्या? क्यों? क्या हुआ?”

    “कुछ नहीं हुआ। बस मुझे रियलाइज हुआ कि यह सब ‘बेवजह’ है। तुम मैरिड हो। तुम्हारा फ्यूचर नेहा के साथ है। मैं अपनी लाइफ में आगे बढ़ना चाहती हूँ,” उसने ऐसे कहा जैसे वह किसी क्लाइंट को प्रेजेंटेशन दे रही हो।

    उसका अंदाज़ एकदम बदल गया था। वो रिया, जो कॉल पर रो पड़ती थी अगर मैं पाँच मिनट लेट फोन करूँ, अब पत्थर बन चुकी थी।

    “लेकिन रिया, तुमने कहा था कि तुम मुझसे प्यार करती हो? गोवा का प्लान? हमारी वो बातें?”

    “वो सब एक क्रेज था, अर्जुन। अब मैं मैच्योर हो गई हूँ। प्लीज, मुझे कॉल मत करना।”

    उसने फोन काट दिया। मैंने दोबारा मिलाया। ब्लॉक। व्हाट्सएप चेक किया। ब्लॉक। इंस्टाग्राम? ब्लॉक।

     

    मैंने हार नहीं मानी। मैंने अपने एक दोस्त के फोन से उसे कॉल किया। उसने उठाया।

    “रिया, प्लीज एक बार बात कर लो। मैं अपनी शादी छोड़ दूंगा, मैं बैंगलोर आ जाऊंगा,” मैं गिड़गिड़ा रहा था। एक 32 साल का शादीशुदा आदमी, जो अपनी लाइफ में सब कुछ अचीव कर चुका था, एक 25 साल की लड़की के सामने भीख मांग रहा था।

    “अर्जुन, तुम पैथेटिक लग रहे हो। गेट अ लाइफ!” रिया की आवाज़ में नफरत थी।

    “पर क्यों? कम से कम वजह तो बताओ? कोई और मिल गया क्या?”

    “वजह यह है कि मुझे अब तुममें कोई इंटरेस्ट नहीं है। ख़त्म।”

    उसने फिर से ब्लॉक कर दिया। मैंने ईमेल लिखे, लंबे-लंबे पैराग्राफ लिखे। मैंने उसे वो वॉयस नोट्स याद दिलाए जो उसने मुझे भेजे थे। मैंने उसे हमारी वो ‘हॉट चैट्स’ याद दिलाईं। पर कोई जवाब नहीं।

    मुझे समझ नहीं आ रहा था कि जो इंसान कल तक मेरे बिना सांस नहीं ले सकता था, वो आज मुझे कचरा कैसे समझ सकता है?

     

    कुछ हफ़्तों बाद, एक कॉमन फ्रेंड के ज़रिए मुझे पता चला कि रिया की सगाई हो गई है। एक एनआरआई (NRI) लड़के के साथ। वो लड़का अनमैरिड था, अमीर था और अमेरिका में रहता था।

    सब कुछ साफ़ हो गया। रिया के लिए मैं कोई ‘सोलमेट’ नहीं था। मैं बस एक ‘टाइमपास’ था, एक ‘फिलर’ था। जब तक उसे अपनी लाइफ का असली ‘हीरो’ नहीं मिला, वह मेरे साथ डिजिटल रोमांस का नाटक करती रही। मेरी शादीशुदा लाइफ उसके लिए एक सुरक्षा कवच थी, उसे पता था कि मैं कभी उस पर शादी का दबाव नहीं बनाऊंगा, इसलिए वह खुलकर एन्जॉय कर रही थी।

    जैसे ही उसकी लाइफ में ‘सेटल’ होने का मौका आया, उसने मुझे ‘डिलीट’ कर दिया जैसे हम फोन से कोई फालतू ऐप डिलीट कर देते हैं।

     

    आज मैं अपनी बालकनी में खड़ा हूँ। नेहा अंदर आरव (मेरा बेटा, जो अब हो गया है) को सुला रही है। लाइफ फिर से वही है, ईएमआई, ऑफिस और बोरियत।

    रिया अब अमेरिका में है। शायद वह अपने पति के साथ वैसी ही बातें करती होगी जैसी मुझसे करती थी। या शायद नहीं।

    यह कहानी एक लेसन पर खत्म होती है। मेरा लेसन यह था, ऑनलाइन प्यार अक्सर एक ‘फ्री ट्रायल’ की तरह होता है। जैसे ही सब्सक्रिप्शन लेने का टाइम आता है, कंपनी (या लड़की) हाथ खींच लेती है।”

    मोहब्बत बेवजह नहीं होती, उसके पीछे हमेशा एक वजह होती है। कभी वो वजह ‘अकेलापन’ होती है, तो कभी ‘लालच’। रिया के लिए वजह ‘मनोरंजन’ थी, और मेरे लिए वजह ‘भटकाव’ था।

    मैंने अपना फोन निकाला, रिया का नंबर जो आज भी मेरे ‘ब्लॉक लिस्ट’ में सबसे ऊपर था, उसे हमेशा के लिए डिलीट कर दिया। लाइफ सॉर्टेड तो नहीं हुई, पर अब कम से कम ‘हैंग’ नहीं हो रही थी।

     

    लेखक का सन्देश और आभार

    मेरे प्यारे और दिल टूटे (या जुड़े हुए) पाठकों,

    इस मॉडर्न, बेबाक और कड़वे सच से भरी शैली में रचित इस कहानी “बेवजह की मोहब्बत” को पढ़ने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया! यह कहानी हमें सिखाती है कि डिजिटल दुनिया के वादे अक्सर ‘नेटवर्क’ की तरह होते हैं, जो कभी भी गायब हो सकते हैं।

    शादीशुदा लाइफ में जब हम बाहर सुकून ढूंढते हैं, तो अक्सर हम ‘सुकून’ नहीं, बल्कि ‘तूफान’ को दावत देते हैं। उम्मीद है कि अर्जुन की यह कहानी आपको अपनी प्राथमिकताओं को समझने में मदद करेगी।

    क्या अर्जुन के साथ जो हुआ, वो सही था? क्या रिया ने जो किया, वह आज के समय की कड़वी सच्चाई है? अपनी राय और एक्सपीरियंस नीचे कमेंट सेक्शन में ज़रूर साझा करें।

    यदि इस डिजिटल लव-स्टोरी और ब्रेकअप ने आपके दिल को छुआ हो, तो कृपया स्टिकर  भेजकर अपना प्यार और समर्थन दें।

    आपकी हर प्रतिक्रिया मुझे और भी ज़्यादा आधुनिक लाइफस्टाइल और मानवीय रिश्तों पर कहानियाँ लिखने की प्रेरणा देती है।

     

    प्यार करो तो ‘लॉगिन’ संभलकर करना, क्योंकि ‘लॉगआउट’ अक्सर दर्दनाक होता है!

     

     

  • बेवजह की मोहब्बत

    बेवजह की मोहब्बत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बेवजह की मोहब्बत  

     

     

     

     

     

    रात के लगभग ढाई बजे थे, अंधेरे कमरे में बस मोबाइल की हल्की नीली रोशनी थी, और उस रोशनी में बैठा था विवेक, एक शादीशुदा आदमी, जिसकी ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल परफेक्ट लगती थी।

     

    एक अच्छी नौकरी, एक समझदार पत्नी, एक छोटा सा बच्चा… सब कुछ था उसके पास।

     

    फिर भी… उसे लगता था, कि कुछ कमी है।

     

    और उस कमी का नाम उसे तब तक नहीं पता था, जब तक कि एक दिन उसकी ज़िंदगी में “नेहा” नहीं आई।

     

     

     

     

    नेहा का एक मैसेज, जो विवेक की जिदंगी में सब बदल गया

     

    वो एक सामान्य दिन था। ऑफिस के काम के बीच विवेक ने फेसबुक खोला, और उसमें  एक नोटिफिकेशन आया

     

    “Hi… क्या आप सच में उतने ही serious हैं, जितने आपकी पोस्ट दिखती हैं?”

     

    विवेक ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, शायद उससे थोड़ा ज्यादा…

     

    बस, यहीं से शुरू हुई एक कहानी, जो जितनी जल्दी बनी, उतनी ही जल्दी टूट भी गई।

     

     

     

     

    नेहा आज की माडर्न लड़की थी, उसकी सोच अलग थी, उसकी बातें… उसकी सोच… सब कुछ ऐसा था जो विवेक को नेहा कि ओर खींचता चला गया।

     

    पहले तो शुरुआत में हल्की-फुल्की बातें हुईं, काम, जिंदगी, सपने… ज्यादातर काम की सीरियस बात उन दोनों के बीच होती थी।

     

    फिर धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं।

     

    नेहा विवेक से कहती तुमसे बात करके सुकून मिलता है…”

     

    विवेक हँसकर जवाब देता, मुझे भी…”

     

    लेकिन दोनों जानते थे, ये सिर्फ “सुकून” नहीं था।

     

     

     

     

    धीरे-धीरे उनके बीच बातचीत की सीमा टूटने लगी

     

    विवेक शादीशुदा था, ये बात उसने पहले ही दिन नेहा को बता दी थी।

     

    नेहा यह सुनकर कुछ पल के लिए चुप हुई थी…

    फिर बोली—

    “दिल का क्या करें… वो तो किसी से भी लग सकता है…”

     

    उस दिन के बाद से दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बन गया।

     

    ना नाम था, ना कोई वादा… लेकिन दोनों के बीच एहसास गहरे और सच्चे थे।

     

     

    अब उनकी बातें सिर्फ चैट तक सीमित नहीं रहीं।

     

    रात होते ही कॉल शुरू हो जाती।

     

    धीरे-धीरे वो कॉल्स लंबी होने लगीं—

    कभी एक घंटा, कभी दो…

     

    और फिर वो पल आया, जब दोनों ने अपनी झिझक छोड़ दी।

     

    अब उनकी आवाज़ों में सिर्फ बातें नहीं थीं…

    उनमें एहसास था, चाहत थी।

     

    नेहा की हँसी में एक अपनापन था,

    और विवेक की आवाज़ में एक अपनापन।

     

    वो कहते—

    “काश… हम पहले मिले होते…”

     

    और हर बार ये “काश” उनकी दूरी को और गहरा कर देता।

     

     

    उनके बीच अब झिझक की कोई दीवार नहीं बची थी।

     

    चैट में, कॉल में, दोनों खुलकर अपनी भावनाएँ जताते।

     

    नेहा विवेक से कहती जब तुम ‘miss you’ कहते हो ना… दिल सच में भर आता है…”

     

    विवेक जवाब देता, तुम मेरी आदत बन गई हो…”

     

    उनकी बातें कभी-कभी इतनी गहरी हो जातीं कि लगता हि नही था, कि ये रिश्ता सिर्फ ऑनलाइन है, दिल से जुड़ा हुआ नही है।

     

    लेकिन शायद यही विवेक का सबसे बड़ी गलती थी।

    एक दिन 1-2  हफ्ते के लिए अपने  ऑफिस के काम में कुछ ज्यादा ब्यस्त हो गया, तो वह नेहा को कुछ कम समय दे पा रहा था, जिससे नेहा नाराज रहने लगी।

     

    बाद मे जब विवेक अपने काम से फुर्सत पाया तो उसने नेहा से बात करने का कोशिश किया…  लेकिन अचानक से नेहा का व्यवहार बहुत बदल गया।

     

    धीरे-धीरे नेहा का मैसेज विवेक को कम आने लगा।

     

    कॉल्स छोटी हो गईं, और फिर… अचानक एक दिन वह बंद ही हो गया।

     

    पहले दिन जब  विवेक ने  सुबह दोपहर शाम को अभिवादन का मैसेज किया, जिसका कोई जबाब नही आया तो विवेक सोचा, शायद किसी काम में व्यस्त होगी।”

    दूसरे दिन, जब यही सिलसिला जारी रहा तो, विवेक सोचने लगा, शायद वह किसी बात से नाराज़ है…

    तीसरे दिन भी जब मैसेज  नही आया, तो विवेक अपने आप में सोचने लगा कि क्या मैंने कुछ गलत कहा?”

     

    उसने नेहा को  मैसेज किया सब ठीक है?”

    लेकिन कोई  जवाब  नही,  तब विवेक को नेहा कि फिक्र होने लगा, उसका मन किसी अनहोनी की आशंका से भर गया, वह उससे बात करने, तथा उसका हाल जानने के लिए  उसका मन तड़प गया।

    तब विवेक ने उसके और नेहा के बीच कुछ काॅमन दोस्त थे, उनसे चर्चा किया, नेहा के बारे में उसके कुछ देर बाद नेहा का मैसेज आया।

    मैसेज के शब्द बहुत ही उत्साहहीन था, एकदम बदलता हुआ अंदाज अब वह नेहा पहले जैसी नहीं रही।

     

    वो पहले घंटों बात करती थी,

    अब मिनटों में “busy हूँ” कहकर चली जाती थी।

     

    विवेक हर दिन कोशिश करता, नए तरीके से बात शुरू करने की, उसे हँसाने की…

     

    लेकिन हर बार जवाब वही मिलता “मूड नहीं है…”

     

     

     

     

    विवेक ने हार नहीं मानी।

     

    उसने खुद को दिल से और ज्यादा झोंक दिया उस रिश्ते में।

     

    वो हमेशा पूछता कुछ हुआ है क्या?”

     

    नेहा हमेशा अपने जबाब में  कहती कुछ नहीं…”

     

    वो कहता “तुम पहले जैसी क्यों नहीं हो?” क्योंकि विवेक को तो चुलबुली और नटखट नेहा की आदत थी, लेकिन यहां नेहा एक दम चुप हो गई थी।

     

    नेहा  ज्यादातर सवालों के जवाब में अब चुप हो जाती।

     

    उसकी चुप्पी…  विवेक को सबसे ज्यादा दर्द देती थी।

     

     

     

    एक सच, जो धीरे-धीरे सामने आया, एक दिन, बहुत कोशिश के बाद नेहा ने कहा विवेक… शायद ये सब गलत है…”

     

    विवेक का दिल धड़क उठा, और उसने पुछा

    “गलत? क्या?”

     

    नेहा बोली ये रिश्ता… ये बातें… सब कुछ…”

     

    विवेक ने समझाने की कोशिश की लेकिन ये रिस्ता तो  सच्चा है…”

     

    नेहा ने जवाब दिया “सच्चा है… लेकिन सही नहीं है…”

     

     

     

    उस दिन के बाद, नेहा विवेक से और दूर हो गई।

     

    अब वो खुद से बात शुरू नहीं करती थी।

     

    विवेक हर दिन एक नया मैसेज भेजता, कैसी हो?”

    “आज क्या किया?”

     

    लेकिन जवाब… या तो देर से आता,

    या आता ही नहीं।

     

    एक रात, विवेक ने हिम्मत जुटाई।

     

    उसने कॉल किया।

     

    काफी देर बाद नेहा ने उठाया।

     

    आवाज़ में वही अपनापन नहीं था।

     

    विवेक ने कहा नेहा, हम ये सब खत्म क्यों कर रहे हैं?”

     

    नेहा कुछ पल चुप रही…

    फिर बोली “क्योंकि ये कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था…”

     

     

    अलविदा… बिना शोर के

     

    विवेक ने आखिरी बार कहा—

    “मैं इसे संभाल सकता हूँ… हम इसे सही बना सकते हैं…”

     

    नेहा की आवाज़ धीमी थी—

    “कुछ चीजें सही नहीं बनतीं… बस खत्म हो जाती हैं…”

     

    और फिर… कॉल कट।

     

    उसके बाद नेहा ने खुद से कभी मैसेज नहीं किया।

     

     

    विवेक के पास सब कुछ था…

    फिर भी  उसे लग रहा था, कि जैसे कुछ नहीं था।

     

    उसकी जिंदगी वही थी, ऑफिस, घर, परिवार…

     

    लेकिन अब हर चीज में एक खालीपन था।

     

    वो  मिनट मिनट पर फोन उठाता… नेहा के मैसेज को देखता, लेकिन वहां सब कुछ खाली ही था।

    उसके दिनचर्या में एक अध्याय नेहा का इंतज़ार भी जुड गया।

     

    लेकिन रियल में क्योंकि अब कोई “नेहा” नहीं थी

     

    कुछ रिश्ते वजह से नहीं बनते…

    और इसलिए ही बिना वजह खत्म हो जाते हैं।

     

    विवेक और नेहा का रिश्ता भी ऐसा ही था।

     

    ना कोई शुरुआत का सही कारण,

    ना कोई अंत का सही जवाब।

     

    बस एक एहसास था, जो आया… और चला गया।

     

    एक दिन, महीनों बाद, विवेक ने अपने पुराने चैट पढ़े।

     

    हर मैसेज… हर कॉल…

    सब कुछ जैसे फिर से जिंदा हो गया।

     

    उसने मुस्कुराते हुए फोन बंद किया और सोचा, शायद वो सही थी…

    ये सच्चा था… लेकिन सही नहीं था…”

     

    बेवजह की मोहब्बत… दिल को बहुत कुछ देती है

    कुछ खूबसूरत यादें, कुछ अधूरे सवाल… और एक गहरा सन्नाटा।

     

    “कुछ लोग हमारी जिंदगी में आते हैं,

    हमें खुद से मिलवाने के लिए…

    और फिर चले जाते हैं, 

    हमें अधूरा छोड़कर,

    लेकिन थोड़ा मजबूत बनाकर…”

     

    इस कहानी को पढ़ने के लिए आपको दिल से धन्यवाद ❤️

    अगर कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो उत्साहवर्धन के लिए स्टिकर जरूर भेजें 😊