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Epi – 2 Dosti ki darmiyan,,,,,

📚 सीरीज: Dosti ki darmiyan,,,,,
पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

Epi – 2 दोस्ती खोदेने का डर

 

सिया का कॉलेज का पहला दिन उसके जीवन में एक नई शुरुआत लेकर आया। जब उसने अपनी मां सावित्री से कॉलेज के बारे में बताया, तो उसके चेहरे पर गर्व का भाव था। सावित्री ने अपनी बेटी को हमेशा शिक्षा के महत्व के बारे में समझाया था और ये बात उनके लिए गर्व की बात थी कि उनकी बहु ने सिया को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। 

 

जब सिया ने अपनी मां से कॉलेज के पहले दिन की चर्चा की, तो उसने बताया कि कैसे उसने अपने नए दोस्तों से मुलाकात की, कैसे उसे अपनी पहली क्लास में दाखिला मिला और कैसे उसने अपने जीवन के इस नए अध्याय की शुरुआत की। सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारा पहली बार किसी संस्थान में जाना बहुत महत्वपूर्ण है, बेटी। ये तुम्हारे भविष्य के लिए एक आधार बनाएगा।” 

इस बीच, शोभा, सावित्री की ननद, भी वहां पहुंच गई।

 

उसने सिया को देखते हुए कहा, “तुम्हारे लिए यह बहुत खुशी की बात है कि तुम पढ़ाई कर रही हो। हमारी समाज में लड़कियों का पढ़ाई करना मुश्किल होता है, लेकिन तुमने सब कुछ पार कर लिया।” शोभा की बातों में एक समर्थन था, जो सिया को और भी उत्साहित कर रहा था। 

सिया ने अपनी ननद से कहा, “आपकी बात सही है, लेकिन मुझे आशा है कि मैं …और देखें

 

सिया कपूर मेंशन में प्रवेश करती है और देखते ही देखते गायत्री जी को किचन में काम करते हुए देख लेती है। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “मां, कैसे हैं आप?” गायत्री जी ने जवाब दिया, “मैं ठीक हूँ, बेटा। तुम कैसे हो?” सिया ने थोड़ी hesitantly कहा, “मैं भी ठीक हूँ।” फिर उसने उत्साहित स्वर में पूछा, “मां, मेरा कॉलेज का पहला दिन कैसा गया?”

 

गायत्री जी ने पास रखी सब्जियों को काटते हुए कहा, “अच्छा, पहले दिन का अनुभव कैसा रहा?” सिया ने ऊंची आवाज में कहा, “मां, यह बहुत अद्भुत था! नए दोस्त बने और हमारी प्रोफेसर बहुत अच्छे हैं। पहले दिन ही पढ़ाई का तनाव नहीं था।” गायत्री जी ने उसका उत्साह देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “यह सुनकर अच्छा लगा। मैं जानती थी कि तुम इसे पसंद करोगी।” 

सिया ने फिर कहा, “मां, मैंने थोड़ी देर लाइब्रेरी में भी बिताई और वहां की किताबें बहुत रोचक हैं। मैं जल्दी ही और भी पढ़ाई करूंगी।” गायत्री जी ने कहा, “बहुत बढ़िया, बेटा। तुम हमेशा अपने सपनों के पीछे दौड़ो।” इस पर सिया ने कहा, “जी हां, मां! मैं कोशिश करूंगी।” 

 

सिया और गायत्री जी की बातचीत का माहौल गर्म था। दोनों के बीच सास-बहु के रिश्तों की मिठास और कभी-कभी खटास का जिक्र चल रहा था। गायत्री जी अपने अनुभवों को साझा कर रही थीं, जब शोभा, उनकी ननद, किचन में आती हैं। वह मुस्कुराते हुए कहती हैं, “क्या बात है भाभी, आप तो जैसे सास-बहु की परिभाषा ही पलटकर रख दी है!” 

 

गायत्री जी हंसते हुए कहती हैं, “हाँ शोभा, आजकल के जमाने में तो सास और बहु के रिश्ते वैसे ही बदल गए हैं। जहां आमतौर पर सास आराम करती है और बहु किचन में काम करती है, वहीं हमारे घर में तो पूरी उल्टी कहानी है। बहु पढ़ाई कर रही है और मैं यहाँ चावल भिगोने में लगी हूँ।” 

 

शोभा उनकी बात सुनकर चौंक जाती हैं। “आप सच में अनोखी सास हैं। इतना पढ़ी-लिखी बहु मिलने पर आपने अपनी परंपराओं को एक तरह से भुला दिया है!” 

गायत्री जी मुस्कुराकर कहती हैं, “क्योंकि मैं चाहती हूं कि सिया अपने सपनों को पूरा करे। अगर मेरी बहु आगे बढ़ेगी, तो मैं भी गर्व महसूस करूंगी। मुझे लगता है कि हमें एक-दूसरे का साथ देना चाहिए।” 

 

सिया उनकी बात सुनकर दिल में एक गहरी खुशी महसूस करती है। वह सोचती है कि कैसे उसकी सास ने न केवल उसे सहारा दिया, बल्कि उसके सपनों के लिए रास्ता भी खोला।

 

सिया ने कमरे में कदम रखा और खुद को यादों की एक लहर में डुबो दिया। उसके सामने शादी की एक फोटो थी, जिसमें उसका पति राघव मुस्कुरा रहा था। उनकी शादी एक भव्य समारोह थी, लेकिन राघव का व्यवहार सदैव उसे एक अनजान की तरह महसूस कराता था। सिया की आंखों में आंसू तैरने लगे। उसे याद था कैसे राघव ने उस दिन उसे दुल्हन की तरह सजाया था, लेकिन फिर भी उसके दिल में एक ठंडापन था। 

 

सिया की सोच में फिर वही पल जिंदा हो गए, जब राघव ने उसे पहली बार अपने परिवार से मिलवाया था। उसने उसे दिखाया कि वह एक अच्छा पति बनने का प्रयास कर रहा है, लेकिन वहीं, उसे हमेशा एक दूरी महसूस होती थी। कभी-कभी सिया सोचती,  राघव ने सच में मुझे अपने दिल से स्वीकार किया है, 

 

सिया ने ठान लिया कि अब वह अपने दिल की सुनकर आगे बढ़ेगी। उसे अपने लिए एक नया रास्ता तलाशना होगा, कहीं न कहीं उसने अपनी पहचान खो दी थी।

 

उसकी यादों में अब राघव से जुड़े पल उसके लिए एक प्रेरणा बन गए। उसे अपनी खुशी का मार्ग खुद तय करना था। इस बार वह अपनी कहानी खुद लिखेगी, क्योंकि वह जानती थी कि उसकी जिंदगी उसके हाथ में है।

 

सिया अगले दिन कॉलेज गा सिद्धार्थ उसे देखते ही उसके पास चला गया और सिया को अपने दोस्तों से मिलवाया सिया सब से मिल कर खुश थी ।

 

सिया के चेहरे पर वह खिला हुआ मुस्कुराहट सिद्धार्थ को बहुत भा गई। धीरे-धीरे, सिद्धार्थ ने सिया में एक ऐसी खूबी देखी, जो उसे अपनी ओर खींचने लगी। 

 

सिया एक खुशमिजाज और समझदार लड़की थी। उसकी हँसी में एक खास बात थी, जिससे आस-पास का माहौल ही बदल जाता था। सिद्धार्थ को पता था कि सिया के साथ बिताए पल उसके जीवन के सबसे खुशनुमा क्षण बन गए हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, सिद्धार्थ को यह समझ में आया कि उसके दिल में सिया के प्रति कुछ और ही भावनाएँ पनप रही हैं। 

 

सिद्धार्थ ने अपने भीतर उठती इस भावनात्मक चिंगारी को महसूस किया, लेकिन एक डर उसे लगातार सताता रहा। वह सिया की दोस्ती को खोने का डर नहीं सहन कर सकता था।

 

इसलिए उसने खुद को रोकने की पूरी कोशिश की। वह सोचता, “अगर मैंने अपने दिल की बात सिया से कह दी और उसने नकार दिया, तो यह हमारी दोस्ती के लिए खत

रनाक हो सकता है”

 

Dosti ki darmiyan,,,,

 

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Lakshmi Kumari

NSW  अनुभवी लेखक -🥇

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