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❤️ तुम बिन — भाग 2 ❤️

पढ़ने का समय : 9 मिनट

 

 

 

राजवंशी हवेली में अब फिर से खुशियाँ लौट आई थीं।जिस आँगन में कभी आरोही अकेली बैठकर आँसू बहाया करती थी, वहीं अब उसकी हँसी गूँजती थी।

 

काव्या अब आरोही को बेटी नहीं, अपनी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा मानती थी।

 

नैना और आरोही की बहन जैसी मोहब्बत और भी गहरी हो गई थी।

 

और अर्जुन…

 

वह तो आरोही की दुनिया बन चुका था।

 

सुबह आरोही की आँख खुलने से पहले अर्जुन उसके लिए चाय रख देता।

 

“आपको कैसे पता कि मुझे आज चाय चाहिए?”

 

अर्जुन मुस्कुराता।

 

“तुम्हारे चेहरे को पढ़ना सीख गया हूँ।”

 

आरोही हँसते हुए कहती,

 

“और अगर कभी मेरा चेहरा पढ़ नहीं पाए तो?”

 

अर्जुन उसका हाथ पकड़कर कहता,

 

“तब तुम्हारा हाथ पकड़ लूँगा… क्योंकि तुम्हारा हाथ हमेशा सच बोलता है।”

 

आरोही की आँखों में प्यार उतर आता।

 

लेकिन उसे नहीं पता था…

 

उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य अभी खुलना बाकी था।

 

एक रात अचानक हवेली की बिजली चली गई।

 

पूरी हवेली अंधेरे में डूब गई।

 

आरोही खिड़की के पास खड़ी थी।

 

तभी उसे नीचे पुराने बरगद के पास किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

 

वह चौंक गई।

 

“इस वक्त कौन हो सकता है?”

 

आरोही ने अर्जुन को जगाया।

 

दोनों नीचे गए।

 

बरगद के पास कोई नहीं था।

 

लेकिन वहाँ जमीन पर एक पुराना लिफाफा पड़ा था।

 

लिफाफे पर सिर्फ एक नाम लिखा था—

 

“आरोही के लिए।”

 

आरोही के हाथ काँपने लगे।

 

अर्जुन ने लिफाफा उठाया।

 

“इसे अभी मत खोलो।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

 

“क्योंकि मुझे लगता है… इसमें तुम्हारे अतीत से जुड़ी कोई बात है।”

 

आरोही ने उसकी आँखों में देखा।

 

“अगर अतीत में कुछ गलत हुआ है तो मुझे जानना होगा।”

 

उसने लिफाफा खोल दिया।

 

अंदर सिर्फ एक कागज था।

 

उस पर लिखा था—

 

“तुम्हें जिस माँ की मौत के बारे में बताया गया था… उसकी मौत प्राकृतिक नहीं थी।”

 

आरोही के हाथ से कागज गिर गया।

 

“मेरी… माँ?”

 

अर्जुन ने उसे संभाल लिया।

 

“आरोही…”

 

वह रोते हुए बोली,

 

“मेरी माँ की मौत कैसे हुई थी?”

 

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।

 

अगली सुबह आरोही सीधे धीरेंद्र के कमरे में पहुँची।

 

“पापा, मुझे अपनी माँ के बारे में सब कुछ जानना है।”

 

धीरेंद्र का चेहरा अचानक बदल गया।

 

“किसने तुमसे ये सब कहा?”

 

आरोही ने वह कागज उनके सामने रख दिया।

 

धीरेंद्र की आँखों में डर उतर आया।

 

काव्या भी वहीं थी।

 

कागज देखते ही उसके हाथ से कप गिर गया।

 

आरोही ने पहली बार महसूस किया कि…

 

काव्या कुछ जानती है।

 

“माँ… आपको पता है ना?”

 

काव्या की आँखों से आँसू निकल पड़े।

 

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

 

तभी धीरेंद्र ने पुरानी अलमारी खोली और एक तस्वीर निकालकर आरोही के हाथ में रख दी।

 

तस्वीर में उसकी माँ सविता थीं।

 

उनके साथ एक अनजान आदमी खड़ा था।

 

आरोही ने पूछा,

 

“ये कौन हैं?”

 

धीरेंद्र ने धीमे स्वर में कहा,

 

“तुम्हारे मामा।”

 

आरोही चौंक गई।

 

“मेरे मामा?”

 

“हाँ… लेकिन वह कई साल पहले गायब हो गए थे।”

 

अर्जुन ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

 

फिर उसकी नजर तस्वीर के पीछे लिखे शब्दों पर गई।

 

“अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरी बेटी को सच बता देना।”

 

अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

 

उसी रात अर्जुन ने अपने आदमी राघव को बुलाया।

 

“मुझे सविता के भाई के बारे में पूरी जानकारी चाहिए।”

 

राघव ने कहा,

 

“मैंने पता लगाया है। उनका नाम विक्रम सिंह था।”

 

“और अब?”

 

“पंद्रह साल से कोई खबर नहीं।”

 

अर्जुन ने पूछा,

 

“क्या वह जिंदा हैं?”

 

राघव ने कुछ सेकंड चुप रहने के बाद कहा,

 

“एक आदमी ने दावा किया है कि उसने उन्हें कुछ महीने पहले देखा था।”

 

अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।

 

“कहाँ?”

 

“इसी शहर 

 

अगली सुबह आरोही के कमरे के दरवाजे पर एक और चिट्ठी मिली।

 

“सच के बहुत करीब मत जाना।”

 

आरोही डर गई।

 

लेकिन अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“अब कोई तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता।”

 

“अगर खतरा तुम्हारे सामने आ गया तो?”

 

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखकर कहा,

 

“तो मैं तुम्हारे सामने खड़ा हो जाऊँगा।”

 

आरोही की आँखों से आँसू बह निकले।

 

“मुझे डर लगता है…”

 

अर्जुन ने उसे अपनी बाँहों में ले लिया।

 

“डरना मत। जब तक मैं हूँ, तुम्हें अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।”

 

उस पल आरोही ने पहली बार महसूस किया—

 

प्यार सिर्फ किसी के साथ हँसना नहीं होता… प्यार वह है जो डर के समय ढाल बन जाए।

 

रात को काव्या अकेली बैठी रो रही थी।

 

आरोही उसके पास गई।

 

“माँ…”

 

काव्या ने उसकी ओर देखा।

 

“मैंने तुम्हें बहुत दर्द दिया है।”

 

आरोही उसके पास बैठ गई।

 

“जो बीत गया उसे भूल जाइए।”

 

काव्या ने सिर हिलाया।

 

“नहीं बेटी… अब मुझे तुम्हें सच बताना होगा।”

 

आरोही का दिल तेज धड़कने लगा।

 

काव्या ने कहा,

 

“तुम्हारी माँ की मौत के पीछे किसी और का हाथ था।”

 

“किसका?”

 

काव्या की आवाज काँपने लगी।

 

“धीरेंद्र का नहीं…”

 

आरोही ने पूछा,

 

“फिर?”

 

काव्या ने धीरे से कहा—

 

“विक्रम का।”

 

आरोही स्तब्ध रह गई।

 

“मेरे मामा?”

 

काव्या ने सिर झुका लिया।

 

“तुम्हारे मामा को लगता था कि तुम्हारे पिता ने उनकी सारी संपत्ति छीन ली। उन्होंने बदला लेने की कोशिश की थी।”

 

तभी दरवाजे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

 

दोनों चुप हो गईं।

 

दरवाजा खुला।

 

लेकिन वहाँ कोई उसी रात हवेली के बाहर एक काली कार आकर रुकी।

 

एक अधेड़ उम्र का आदमी कार से उतरा।

 

उसने हवेली की तरफ देखा।

 

उसकी आँखों में नफरत थी।

 

“पंद्रह साल…”

 

उसने धीमे से कहा।

 

“अब हिसाब पूरा होगा।”

 

लेकिन उसे नहीं पता था कि हवेली में कोई और भी था जो उसका इंतजार कर रहा था।

 

अर्जुन।

 

अर्जुन ने उसे दूर से देख लिया था।

 

उसने तुरंत राघव को फोन किया।

 

“वह वापस आ गया है।”

 

“कौन?”

 

अर्जुन ने कहा—

 

“विक्रम।”

 

उस रात अर्जुन कमरे में आया तो आरोही खिड़की के पास खड़ी थी।

 

“आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं?”

 

अर्जुन चुप रहा।

 

आरोही उसकी तरफ मुड़ी।

 

“आपने मुझसे वादा किया था कि मेरे सामने कभी झूठ नहीं बोलेंगे।”

 

अर्जुन उसके करीब आया।

 

“मैं तुमसे झूठ नहीं बोल रहा।”

 

“फिर?”

 

अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया।

 

“मैं तुम्हें खोने से डरता हूँ।”

 

आरोही की आँखें भर आईं।

 

“आप मुझे खो नहीं सकते।”

 

“क्यों?”

 

आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

 

“क्योंकि मैंने अपना दिल आपको दे दिया है।”

 

अर्जुन ने उसके माथे को चूमते हुए कहा,

 

“और मैं वादा करता हूँ… तुम्हारे इस दिल को कभी टूटने नहीं दूँगा।”अगले दिन विक्रम हवेली में घुस आया।धीरेंद्र उसे देखकर स्तब्ध रह गए।“विक्रम!”

 

विक्रम हँसा।

 

“हाँ… मैं जिंदा हूँ।”

 

काव्या पीछे हट गई।

 

आरोही ने काँपते हुए पूछा,

 

“आप मेरी माँ के साथ क्या करने वाले थे?”

 

विक्रम की आँखें झुक गईं।

 

कुछ सेकंड बाद उसने कहा,

 

“मैंने तुम्हारी माँ को नुकसान पहुँचाने की योजना बनाई थी… लेकिन मैंने उन्हें नहीं मारा।”

 

सभी चौंक गए।

 

“फिर?”

 

विक्रम ने एक नाम लिया।

 

“कबीर।”

 

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

 

कबीर?

 

जिसे वह पहले ही धोखेबाज साबित कर चुका था।

 

विक्रम ने बताया कि कबीर ने वर्षों पहले परिवार के भीतर दुश्मनी पैदा की थी और सविता की मौत के मामले में भी उसने परिस्थितियों का फायदा उठाया था।

 

लेकिन उसके पास पूरी सच्चाई साबित करने के लिए एक आखिरी सबूत था।

 

एक पुरानी रिकॉर्डिंग।

 

रिकॉर्डिंग में कबीर की आवाज साफ सुनाई दे रही थी।

 

सच सामने आ गया।

 

विक्रम ने सिर झुका लिया।

 

“मैंने बदला लेने में अपनी जिंदगी बर्बाद कर दी। मुझे माफ कर दो।”

 

धीरेंद्र ने कुछ नहीं कहा।

 

लेकिन आरोही आगे बढ़ी।

 

“मामा… अगर मेरी माँ होतीं तो शायद वो भी यही कहतीं कि नफरत को यहीं खत्म कर दो।”

 

विक्रम की आँखों से आँसू बह निकले।कुछ महीनों बाद हवेली में फिर उत्सव था।इस बार कोई राज नहीं था।

 

कोई झूठ नहीं था।

 

सिर्फ प्यार था।

 

धीरेंद्र ने परिवार को अपने पास बुलाया।

 

काव्या, नैना, आरोही और अर्जुन सभी साथ बैठे थे।

 

धीरेंद्र ने कहा,

 

“आज से इस घर में कोई सौतेला नहीं होगा।”

 

काव्या ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

 

नैना ने दूसरी तरफ से उसका हाथ थाम लिया।

 

और अर्जुन ने पीछे से उसकी हथेली पकड़ ली।

 

आरोही की आँखों में आँसू थे।

 

अर्जुन ने धीरे से पूछा,

 

“फिर रो रही हो?”

 

आरोही मुस्कुराई।

 

“खुशी के आँसू हैं।”

 

“किस बात की खुशी?”

 

आरोही ने पूरे परिवार की ओर देखा।

 

“इस बात की… कि अब मुझे किसी चीज की कमी नहीं।”

 

अर्जुन ने पूछा,

 

“और मुझसे?”

 

आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

 

“आपसे?”

 

वह उसके करीब आई।

 

“आप तो मेरी जरूरत नहीं…”

 

अर्जुन ने हैरानी से देखा।

 

आरोही ने उसका हाथ अपने दिल पर रख दिया।

 

“आप मेरी जिंदगी हैं।”

 

अर्जुन मुस्कुराया।

 

“और तुम?”

 

आरोही ने धीरे से कहा—

 

“मैं… तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं।”

 

हवेली के आँगन में फूल बरसने लगे।

 

परिवार हँस रहा था।

 

और बरगद के पेड़ के नीचे दो दिल एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे।

 

उनके बीच अब कोई राज नहीं था।

 

कोई डर नहीं था।

 

कोई दूरी नहीं थी।

 

सिर्फ मोहब्बत थी…

 

क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ खत्म नहीं होतीं।

 

वे हर सच के सामने आने के बाद और मजबूत होती जाती हैं।

 

और आरोही की जिंदगी ने उसे एक बात सिखा दी—

 

❤️ “जिस प्यार में साथ निभाने का वादा हो, वहाँ तूफान भी रास्ता बदल देता है।” ❤️

 

और अर्जुन के लिए आरोही हमेशा वही रहेगी—

 

“तुम बिन…”

 

“मेरी हर खुशी अधूरी है।”

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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