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मेरा छोटा सा ख्वाब

पढ़ने का समय : 9 मिनट

 

छोटा सा ख़्वाब मेरा

 

बारिश की हल्की बूंदें पुराने बस स्टैंड की टूटी हुई छत पर लगातार गिर रही थीं। शाम का धुंधलका धीरे-धीरे पूरे कस्बे को अपने आगोश में ले रहा था। सड़क किनारे लगी छोटी-छोटी दुकानों की पीली रोशनी भीगती हवा में किसी उम्मीद की तरह चमक रही थी। उन्हीं दुकानों के बीच एक छोटी-सी चाय की दुकान थी, जहाँ सत्रह साल की नैना अपने पिता के साथ काम करती थी।

 

नैना की दुनिया बहुत छोटी थी। सुबह दुकान खोलना, ग्राहकों को चाय देना, घर लौटकर माँ की मदद करना और रात को छत पर बैठकर आसमान को देखना। मगर उस छोटी-सी दुनिया के भीतर एक बहुत बड़ा सपना पल रहा था। वह सपना था, अपनी खुद की एक लाइब्रेरी खोलने का।

 

लोग अक्सर उस पर हँसते थे।

 

“चाय बेचने वाली लड़की लाइब्रेरी खोलेगी?”

 

“इतनी किताबें पढ़कर क्या कलेक्टर बनेगी?”

 

“लड़कियों के सपने घर की चौखट तक ही अच्छे लगते हैं।”

 

ऐसी बातें नैना रोज़ सुनती थी, मगर उसने कभी किसी को जवाब नहीं दिया। वह बस मुस्कुरा देती और रात में अपनी पुरानी कॉपी में कुछ लिखती रहती।

 

उस कॉपी के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—

 

“छोटा सा ख़्वाब मेरा…”

 

नैना को किताबों से प्यार बचपन से था। जब वह दस साल की थी, तब उसकी माँ उसे मंदिर के पास लगने वाले पुराने किताबों के बाज़ार में ले जाती थीं। लोग वहाँ फटी हुई, पुरानी और धूल भरी किताबें बेचते थे। दूसरों के लिए वे बेकार थीं, मगर नैना के लिए वे किसी खजाने से कम नहीं थीं।

 

उसने पहली बार वहीं से एक कहानी की किताब खरीदी थी। किताब के कई पन्ने फटे हुए थे, लेकिन उस कहानी ने उसके भीतर एक नई दुनिया जगा दी थी। तब से उसे लगने लगा था कि किताबें इंसान को वहाँ तक ले जा सकती हैं, जहाँ वह अपने पैरों से कभी नहीं पहुँच सकता।

 

एक रात जब दुकान बंद हो चुकी थी, नैना चुपचाप छत पर बैठी आसमान देख रही थी। उसके पिता रामू चाचा उसके पास आए और बोले,

 

“क्या सोच रही है बिटिया?”

 

नैना ने धीरे से कहा,

 

“बाबा, अगर हमारे पास बहुत सारे पैसे होते ना… तो मैं एक बड़ी-सी लाइब्रेरी खोलती।”

 

रामू चाचा हल्का-सा हँस पड़े।

 

“लाइब्रेरी क्यों?”

 

“ताकि कोई बच्चा सिर्फ पैसों की वजह से किताबों से दूर ना रहे।”

 

रामू चाचा कुछ पल तक उसे देखते रहे। फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले,

 

“सपने छोटे-बड़े नहीं होते नैना… बस उन्हें पूरा करने का हौसला बड़ा होना चाहिए।”

 

उस रात नैना देर तक सो नहीं पाई। उसे पहली बार लगा कि उसका सपना शायद सच भी हो सकता है।

 

दिन बीतते गए। नैना सुबह दुकान पर काम करती और रात को पढ़ाई। कस्बे के सरकारी स्कूल में वह हमेशा अच्छे नंबर लाती थी। उसके टीचर भी उसकी तारीफ़ करते थे। मगर बारहवीं के बाद आगे पढ़ाई करना आसान नहीं था। घर की हालत बहुत खराब थी। पिता की कमाई से मुश्किल से घर चलता था।

 

एक दिन माँ ने झिझकते हुए कहा,

 

“नैना… शर्मा जी अपने बेटे के लिए रिश्ता लेकर आए थे।”

 

नैना का दिल जैसे अचानक बैठ गया।

 

“माँ… मैं अभी शादी नहीं करना चाहती।”

 

“हम भी नहीं चाहते बिटिया… मगर हालात…”

 

नैना ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

 

“बस एक मौका दे दो माँ। मैं कुछ बनकर दिखाऊँगी।”

 

माँ की आँखें भर आईं। वह जानती थीं कि उनकी बेटी बाकी लड़कियों जैसी नहीं थी। उसके सपनों में चमक थी।

 

अगले दिन नैना स्कूल गई तो उसकी क्लास टीचर मीरा मैडम ने उसे स्टाफ रूम में बुलाया।

 

“तुम उदास क्यों हो?”

 

नैना पहले चुप रही, फिर उसने सब बता दिया। मीरा मैडम ध्यान से सुनती रहीं। फिर उन्होंने अपनी अलमारी से एक फॉर्म निकाला।

 

“ये शहर के कॉलेज की स्कॉलरशिप का फॉर्म है। अगर तुम पास हो गई, तो तुम्हारी पढ़ाई मुफ्त हो जाएगी।”

 

नैना की आँखों में चमक आ गई।

 

“सच मैडम?”

 

“हाँ। मगर मेहनत बहुत करनी पड़ेगी।”

 

उस दिन के बाद नैना ने खुद को पूरी तरह पढ़ाई में झोंक दिया। दिन में दुकान, रात में पढ़ाई। कई बार थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, मगर वह फिर भी किताबें खोलकर बैठ जाती।

 

परीक्षा का दिन आ गया। नैना ने पूरे आत्मविश्वास के साथ पेपर लिखा। जब रिज़ल्ट आया, तो पूरे कस्बे में उसकी चर्चा होने लगी। उसने सिर्फ परीक्षा पास नहीं की थी, बल्कि पूरे जिले में पहला स्थान हासिल किया था।

 

रामू चाचा की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने पहली बार अपनी बेटी को सीने से लगाकर कहा,

 

“मुझे तुझ पर गर्व है।”

 

कुछ ही दिनों बाद नैना शहर चली गई। नया शहर, नई जगह, नए लोग। शुरुआत आसान नहीं थी। कॉलेज के कई छात्र उसका मज़ाक उड़ाते थे क्योंकि उसके पास महंगे कपड़े नहीं थे। वह हॉस्टल की सबसे साधारण लड़की थी।

 

मगर नैना के पास एक चीज़ थी, जो बहुत कम लोगों के पास होती है, अपने सपनों पर भरोसा।

 

कॉलेज की लाइब्रेरी उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं थी। घंटों वह किताबों के बीच बैठी रहती। कभी कहानी पढ़ती, कभी इतिहास, कभी विज्ञान। उसे हर किताब में एक नई दुनिया दिखाई देती थी।

 

धीरे-धीरे उसकी दोस्ती आरव नाम के एक लड़के से हुई। आरव अमीर परिवार से था, मगर दिल से बहुत अच्छा था। उसने पहली बार नैना से पूछा,

 

“तुम हमेशा लाइब्रेरी में ही क्यों रहती हो?”

 

नैना मुस्कुराई।

 

“क्योंकि मुझे लगता है, किताबें इंसानों से ज्यादा सच्ची होती हैं।”

 

आरव उसकी बात सुनकर हँस पड़ा, मगर उस दिन के बाद वह भी अक्सर लाइब्रेरी आने लगा।

 

एक दिन आरव ने पूछा,

 

“तुम्हारा सपना क्या है?”

 

नैना कुछ पल चुप रही, फिर बोली,

 

“मैं अपने कस्बे में एक ऐसी लाइब्रेरी खोलना चाहती हूँ, जहाँ हर गरीब बच्चा मुफ्त में किताबें पढ़ सके।”

 

आरव उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया।

 

“इतना छोटा सपना?”

 

नैना मुस्कुराई।

 

“सपना छोटा है… मगर मेरे लिए पूरी दुनिया जैसा।”

 

कॉलेज के तीन साल कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। नैना ने अपनी पढ़ाई पूरी की और उसे शहर की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। उसकी पहली तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं थी, मगर उसके लिए वह किसी खजाने से कम नहीं थी।

 

उसने सबसे पहले क्या खरीदा?

 

कोई महंगा फोन नहीं। कोई कपड़े नहीं।

 

उसने खरीदीं, बीस नई किताबें।

 

हर महीने वह अपनी तनख्वाह का थोड़ा हिस्सा बचाने लगी। धीरे-धीरे उसकी छोटी-सी बचत बढ़ने लगी। दूसरी तरफ, वह अपने कस्बे के बच्चों के लिए पुरानी किताबें इकट्ठा करने लगी। सोशल मीडिया पर उसने एक अभियान शुरू किया—

 

“एक किताब दान करें।”

 

शुरुआत में बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया। मगर धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। कोई पाँच किताबें भेजता, कोई दस। कुछ लोग बच्चों की कहानियाँ भेजते, कुछ स्कूल की किताबें।

 

दो साल बाद जब नैना अपने कस्बे लौटी, तो उसके साथ सिर्फ सामान नहीं था। उसके साथ सैकड़ों किताबें थीं।

 

कस्बे के पुराने पंचायत भवन का एक कमरा कई सालों से बंद पड़ा था। नैना ने प्रधान जी से बात की और वह कमरा साफ करवाया। पूरा कमरा धूल और जालों से भरा हुआ था। लोग उसे देखकर हँस रहे थे।

 

“यही बनेगी लाइब्रेरी?”

 

“दो दिन में बंद हो जाएगी।”

 

मगर नैना ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उसने खुद झाड़ू लगाई, दीवारों को रंगा, पुराने टेबल ठीक करवाए। उसके पिता और माँ भी उसके साथ काम करते रहे।

 

आरव भी शहर से आ गया। उसने किताबों की अलमारियाँ बनवाने में मदद की।

 

आख़िरकार वह दिन आ गया, जिसका नैना ने बरसों से सपना देखा था।

 

दरवाज़े के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगा था—

 

“छोटा सा ख़्वाब लाइब्रेरी”

 

उद्घाटन वाले दिन वहाँ बहुत कम लोग आए। मगर कुछ छोटे बच्चे बड़े उत्साह से अंदर गए। उनकी आँखों में चमक थी। वे पहली बार इतनी सारी किताबें देख रहे थे।

 

एक छोटी लड़की नैना के पास आई और बोली,

 

“दीदी… क्या मैं ये किताब घर ले जा सकती हूँ?”

 

नैना की आँखें भर आईं।

 

“हाँ… ये सारी किताबें तुम्हारी हैं।”

 

धीरे-धीरे वह लाइब्रेरी पूरे कस्बे की पहचान बन गई। बच्चे स्कूल के बाद वहाँ आने लगे। कुछ पढ़ाई करने आते, कुछ कहानियाँ पढ़ने। कई माता-पिता, जो पहले नैना का मज़ाक उड़ाते थे, अब अपने बच्चों को उसके पास भेजने लगे।

 

एक दिन वही शर्मा जी, जिन्होंने कभी नैना के लिए रिश्ता भेजा था, अपनी पोती का हाथ पकड़कर लाइब्रेरी आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“बेटी… हमें माफ कर देना। हम तेरे सपने को समझ नहीं पाए थे।”

 

नैना ने विनम्रता से सिर झुका लिया।

 

उस रात वह फिर अपनी छत पर बैठी थी। आसमान में वही तारे चमक रहे थे, जिन्हें वह बचपन से देखती आई थी। मगर आज उसके चेहरे पर अलग सुकून था।

 

रामू चाचा उसके पास आए और बोले,

 

“तो बिटिया… तेरा छोटा सा ख़्वाब पूरा हो गया?”

 

नैना हल्का-सा मुस्कुराई।

 

“नहीं बाबा… अब तो बस शुरुआत हुई है।”

 

“मतलब?”

 

“अब मैं आसपास के गाँवों में भी ऐसी लाइब्रेरी खोलना चाहती हूँ।”

 

रामू चाचा हँस पड़े।

 

“तेरे सपने भी ना… कभी खत्म ही नहीं होते।”

 

नैना ने आसमान की तरफ देखा।

 

“सपने खत्म हो जाएँ ना बाबा… तो इंसान जीना छोड़ देता है।”

 

कुछ महीनों बाद नैना की लाइब्रेरी की कहानी अखबारों में छपने लगी। शहर से लोग उसे बुलाने लगे। स्कूलों और कॉलेजों में उसे सम्मानित किया गया। मगर इन सबके बावजूद नैना वैसी ही रही—साधारण, शांत और मुस्कुराती हुई।

 

एक दिन एक पत्रकार ने उससे पूछा,

 

“आपने इतनी मुश्किलों के बाद भी हार क्यों नहीं मानी?”

 

नैना ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

 

“क्योंकि मेरा सपना सिर्फ मेरा नहीं था। वह उन बच्चों की उम्मीद था, जो किताबें खरीद नहीं सकते थे।”

 

पत्रकार ने फिर पूछा,

 

“अगर आपको अपनी कहानी एक लाइन में बतानी हो, तो क्या कहेंगी?”

 

नैना कुछ पल सोचती रही। फिर उसने धीरे से कहा,

 

“मैं बस एक चाय बेचने वाली लड़की थी… जिसने किताबों में अपनी दुनिया ढूँढ ली।”

 

उसकी यह बात अगले दिन अखबार की हेडलाइन बन गई।

 

समय बीतता गया। नैना की लाइब्रेरी अब सिर्फ एक कमरा नहीं रही थी। वहाँ कंप्यूटर भी आ गए थे, पढ़ाई के लिए अलग हॉल भी बन गया था। गाँव के कई बच्चे, जो कभी स्कूल छोड़ने वाले थे, अब बड़े सपने देखने लगे थे।

 

एक शाम नैना लाइब्रेरी के कोने में बैठी किताबें सजा रही थी, तभी वही छोटी लड़की, जो पहली बार किताब लेने आई थी, उसके पास आई।

 

“दीदी…”

 

“हाँ?”

 

“मैं बड़ी होकर टीचर बनना चाहती हूँ।”

 

नैना मुस्कुराई।

 

“बहुत अच्छा सपना है।”

 

लड़की ने मासूमियत से पूछा,

 

“क्या मेरे सपने भी पूरे हो सकते हैं?”

 

नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा,

 

“अगर सपना सच्चा हो… और मेहनत ईमानदार… तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती।”

 

बाहर बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। हवा में मिट्टी की खुशबू घुल गई थी। लाइब्रेरी की खिड़की से आती पीली रोशनी दूर सड़क तक फैल रही थी।

 

नैना ने अपनी पुरानी कॉपी निकाली। वही कॉपी, जिसके पहले पन्ने पर बरसों पहले उसने लिखा था।

 

“छोटा सा ख़्वाब मेरा…”

 

उसने मुस्कुराते हुए उसके नीचे एक नई लाइन लिखी दिया।

 

“और अब यह सिर्फ मेरा नहीं रहा…”

 

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