एपिसोड 2: बॉस का इंतकाम या दिलचस्प शुरुआत?
मुंबई की रात कभी नहीं सोती। सड़कों पर शोर था, ट्रैफ़िक का शोर, लोगों की आवाज़ें… लेकिन AK Industries की 25वीं मंज़िल पर एक अलग ही खामोशी पसरी थी। वहां सिर्फ कीबोर्ड की ‘टैप-टैप’ सुनाई दे रही थी। कांच की बड़ी खिड़की के पीछे एक शख्स अंधेरे में डूबा, लैपटॉप की रोशनी में काम कर रहा था।
तभी, भारी दरवाज़ा एक झटके से खुला। शख्स की उंगलियां कीबोर्ड पर रुकीं। उसने बिना पीछे मुड़े, अपनी घड़ी देखी—रात के 11 बज रहे थे।
“तो… कैसी रही तुम्हारी ब्लाइंड डेट?” एक गहरी और रौबदार आवाज़ गूंजी।
दरवाज़े पर खड़ा शख्स, विजय, हंसते हुए अंदर आया और सामने वाली चेयर पर बैठ गया। “भाई! डेट तो ऐसी थी कि तुझे ज़िंदगी भर अफ़सोस होगा कि तू क्यों नहीं गया!”
काम में डूबे उस शख्स ने लैपटॉप बंद किया। यह अक्षय खन्ना था। 25 साल का हैंडसम, कामयाब और थोड़ा सा ‘वर्कहोलिक’ बिज़नेस टाइकून। उसके लिए काम ही उसकी दुनिया थी, और उसकी एक नज़र लड़कियों का दिल धड़काने के लिए काफी थी।
अक्षय ने कुर्सी पीछे झुकाई और ठंडे अंदाज़ में पूछा, “इतनी तारीफ? क्या खास था उसमें?”
विजय ने मेज़ पर झुकते हुए कहा, “खास वो नहीं, उसकी बातें थीं! उसे पता नहीं था कि वो ‘अक्षय खन्ना’ के सबसे पक्के दोस्त के साथ बैठी है। वो बेचारी तो अपने बॉस की धज्जियां उड़ा रही थी।”
अक्षय की एक भौंह ऊपर उठी। “बॉस की?”
“हाँ!” विजय ने मजे लेते हुए कहा, “कह रही थी कि उसका बॉस ‘चलता-फिरता टेंशन’ है। हिटलर का दूसरा अवतार! और सुन… उसने ये भी कहा कि अगर पैसों की मजबूरी न होती, तो वो उस ‘खड़ूस’ की कंपनी में एक पल न रुकती।”
अक्षय के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, पर उसकी आंखों में एक चमक जागी। “मेरी कंपनी की एम्प्लॉई है?”
“बिलकुल! बातों-बातों में उसने AK Industries का नाम ले लिया। नाम तो नहीं बताया उसने अपना, पर भाई… लड़की में दम है। तुझे ‘हिटलर’ बोलकर निकल गई!” विजय ठहाका मारकर हंसा।
अक्षय की उंगलियां टेबल पर ताल देने लगीं। उसके होंठों पर एक शातिर मुस्कान आई। “मेरे ही नमक का हक अदा कर रही है और मुझे ही हिटलर कह रही है? दिलचस्प है…”
उसने अपना फोन उठाया और एक नंबर डायल किया। “कल सुबह 9 बजे तक मुझे अपनी कंपनी की हर फीमेल एम्प्लॉई की लिस्ट चाहिए। हर एक की।”
दूसरी तरफ: आरोही का घर
आरोही ने अपने घर का दरवाज़ा खोला। सामने सोफे पर रोशनी बैठी थी, जिसके पैर पर पट्टी बंधी थी, पर हाथ में चिप्स का पैकेट था।
आरोही थककर सोफे पर गिरी। “पैर कैसा है अब तेरा? या सिर्फ मेरी खिंचाई करने के लिए पट्टी बांधी है?”
रोशनी हंसी, “अरे यार, दर्द तो है, पर तेरी डेट की कहानी सुनने की एक्साइटमेंट ज़्यादा है। बता, लड़का कैसा था? उसने तुझे रिजेक्ट किया या तूने उसे भगाया?”
आरोही ने टीवी का रिमोट उठाते हुए चैन की सांस ली। “मैंने काम तमाम कर दिया। साफ़ कह दिया कि मेरा बॉयफ्रेंड है। अब वो कभी पलटकर नहीं आएगा। वैसे… लड़का बुरा नहीं था, काफी सुलझा हुआ था। पर मुझे इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना।”
रोशनी ने उसे कोहनी मारते हुए कहा, “देख लेना आरोही, कहीं वो लड़का तेरा पीछा न करने लगे।”
आरोही ने लापरवाही से कहा, “अरे छोड़! मुंबई इतनी बड़ी है, वो दोबारा कभी नहीं मिलेगा। और कल सुबह मुझे ऑफिस जल्दी जाना है, वो ‘हिटलर’ बॉस कल कोई नई आफत न खड़ी कर दे।”
वापस अक्षय के केबिन में… अक्षय अंधेरे में खिड़की से बाहर मुंबई की लाइट्स देख रहा था। उसके दिमाग में विजय की बातें गूंज रही थीं—”चलता फिरता टेंशन।”
उसने धीरे से बुदबुदाया, “कल ऑफिस में मिलते हैं, मिस्टीरियस एम्प्लॉई। देखते हैं कल तुम अपनी ‘टेंशन’ को कैसे झेलती हो।”
उसकी आंखों में अब एक अलग ही शिकार वाली चमक थी।

NSW नया लेखक – 🥉
प्रातिक्रिया दे