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  • सोन परी की जादुई दुनिया

    सोन परी की जादुई दुनिया

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

    यह कहानी है एक सात साल की प्यारी और नटखट बच्ची की, जिसका नाम था फ्रूटी। फ्रूटी एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार में रहती थी जहाँ उसके माता-पिता दोनों ही नौकरी करते थे। सुबह होते ही उसके माता-पिता अपने-अपने दफ्तर के लिए निकल जाते और शाम को देर से लौटते। घर में फ्रूटी अकेली रह जाती, या फिर उसकी देखभाल के लिए एक सख्त मिजाज आया (घरेलू सहायिका) रहती, जो उसे टीवी देखने से रोकती, समय पर होमवर्क कराने के लिए डाँटती और उसे खेलने के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं देती थी।

    फ्रूटी बहुत ही कल्पनाशील बच्ची थी। वह घंटों खिड़की के पास बैठकर आसमान में उड़ते बादलों को देखा करती थी। उसे परियों की कहानियाँ सुनना बहुत पसंद था। उसकी दादी ने उसे बचपन में परियों की कई कहानियाँ सुनाई थीं—परियों की रानी, उनका चमकता हुआ परी लोक, जादू की छड़ी और पंखों वाले खूबसूरत लिबास। फ्रूटी अक्सर सोचती थी कि काश उसकी जिंदगी में भी कोई परी आ जाए, जो उसकी सुननी सहेली बन सके, जिसके साथ वह खेल सके और अपने दिल की सारी बातें साझा कर सके।

    एक दिन फ्रूटी स्कूल से लौटी तो उसका मन बहुत उदास था। उसे स्कूल में एक ड्राइंग प्रतियोगिता में भाग लेना था, लेकिन उसकी अध्यापिका ने उसे डाँट दिया क्योंकि वह अपनी पेंटिंग समय पर पूरी नहीं कर पाई थी। घर आने पर आया ने भी उसके बस्ते को देखकर नाराजगी जताई और बिना बात के डाँट दिया। फ्रूटी अपने कमरे में आई, पलंग पर बैठकर फफक-फफक कर रोने लगी। उसने आसमान की तरफ देखते हुए रोते हुए कहा, “हे भगवान! अगर परियाँ सच में होती हैं, तो आप किसी परी को मेरे पास क्यों नहीं भेजते? क्या कोई मेरी सुनने वाला नहीं है?”

    वह रोते-रोते ही थक गई और उसकी आँखें बंद हो गईं। कमरे में सन्नाटा छा गया। खिड़की से आती शाम की ठंडी हवा ने उसके आँसू सुखा दिए। किसी को क्या पता था कि उस नन्हीं बच्ची की पुकार उस दुनिया तक पहुँच चुकी थी, जहाँ इंसानों की पहुँच नहीं होती—परी लोक तक।

    आसमान के उस पार, बादलों की ओट में एक बेहद खूबसूरत दुनिया बसी थी, जिसे ‘परी लोक’ कहा जाता था। यह जगह सोने की तरह चमकने वाले महलों, बहती हुई दूधिया नदियों और संगीत जैसी सुरीली हवाओं से भरी हुई थी। यहाँ हर तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे जो कभी मुरझाते नहीं थे। परी लोक पर न्याय और प्रेम की मूरत, ‘परी माँ’ का शासन था।

    परी माँ का दरबार सजा हुआ था। सभी परियाँ अपनी-अपनी जगहों पर बैठी थीं। तभी परी लोक के जादुई आईने में धरती पर रोती हुई नन्हीं फ्रूटी की तस्वीर उभरी। परी माँ ने उस तस्वीर को देखकर गहरी साँस ली और कहा, “धरती पर इंसानों की दुनिया में भौतिकता बढ़ रही है। वहाँ के बच्चे बड़े-बड़े महलों में रहते हैं, लेकिन उनके पास अपनों का प्यार और समय नहीं होता। नन्हीं फ्रूटी बहुत अकेली है। उसकी पुकार ने हमारे परी लोक की दीवारों को छू लिया है।”

    दरबार में बैठी सभी परियों ने फ्रूटी की मदद करने की इच्छा जताई। लेकिन परी माँ ने अपनी विशेष शक्ति से फौरन निर्णय लिया। उन्होंने अपनी सबसे खास, दयालु और ऊर्जावान परी की ओर देखा, जिनके सोने जैसे सुनहरे पंख और सुनहरी पोशाक पूरे दरबार को जगमगा रही थी। उनका नाम था—सोन परी।

    परी माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “सोन परी! यह कार्य केवल तुम्हारे बस का है। तुम जाओ धरती पर और उस नन्हीं फ्रूटी की जिंदगी में खुशियों के रंग भर दो। उसकी हर मुश्किल में उसकी ढाल बनो, लेकिन एक बात याद रखना—तुम्हारी शक्तियाँ तभी तक काम करेंगी जब तक तुम किसी अच्छे उद्देश्य के लिए उनका उपयोग करोगी और अपनी असली पहचान को इंसानों की दुनिया में छिपा कर रखोगी।”

    सोन परी ने आदर से अपना सिर झुकाया और कहा, “जैसी आपकी आज्ञा, परी माँ। मैं अभी धरती के लिए रवाना होती हूँ।”

    सोन परी ने अपने सुनहरे पंख फड़फड़ाए और एक तेज़ सुनहरी रोशनी के साथ वह परी लोक से सीधे फ्रूटी के कमरे में जा उतरीं। जब फ्रूटी की आँख खुली, तो उसका कमरा किसी साधारण कमरे जैसा नहीं लग रहा था। पूरे कमरे में सुनहरे रंग की चमक फैली हुई थी, और हवा में फूलों की भीनी-भीनी खुशबू महक रही थी।

    फ्रूटी ने अपनी आँखें मलते हुए पलंग पर उठकर देखा। उसके सामने एक बेहद खूबसूरत महिला खड़ी थीं। उन्होंने सुनहरे रंग का खूबसूरत गाउन पहना हुआ था, उनके सिर पर जगमगाता हुआ ताज था और पीठ पर दो सुनहरे पंख थे, जो हल्की रोशनी बिखेर रहे थे। उनके चेहरे पर ममता और अपनापन का ऐसा भाव था जिसे देखते ही फ्रूटी का सारा डर छूमंतर हो गया।

    फ्रूटी ने आँखें फाड़कर आश्चर्य से पूछा, “आप… आप कौन हैं? क्या आप कोई परी हैं?”

    सोन परी ने मुस्कुराते हुए प्यार से अपना हाथ फ्रूटी के सिर पर फेरा और कहा, “हाँ फ्रूटी! मैं सोन परी हूँ। तुम्हारी पुकार ने मुझे आसमान से खींचकर यहाँ बुला लिया है। अब तुम अकेली नहीं हो। मैं तुम्हारी दोस्त हूँ।”

    फ्रूटी खुशी से उछल पड़ी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने सोन परी को गले से लगा लिया और बोली, “क्या सचमुच? मेरी कोई परी दोस्त है? आप कहीं चली तो नहीं जाएंगी?”

    सोन परी ने हँसते हुए कहा, “नहीं फ्रूटी, मैं यहीं तुम्हारे पास रहूँगी। जब भी तुम्हें मेरी जरूरत होगी, मैं तुम्हारे पास आ जाऊँगी। बस तुम्हें अपनी जादुई अंगूठी से मुझे याद करना होगा।”

    सोन परी ने अपनी उंगली से एक चमकती हुई छोटी सी सुनहरी अंगूठी निकाली और फ्रूटी की उंगली में पहना दी। उन्होंने कहा, “इस अंगूठी को छूकर जब तुम मेरा नाम लोगी, तो मैं तुरंत तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगी। लेकिन याद रखना, इस राज़ को किसी को नहीं बताना है—न अपने मम्मी-पापा को और न ही अपनी आया को।”

    फ्रूटी ने उत्साह से सिर हिलाया, “वादा! मैं किसी को नहीं बताऊँगी।”

    उसी क्षण, घर की डोरबेल बजी। फ्रूटी के माता-पिता दफ्तर से लौट आए थे। सोन परी ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो फ्रूटी, तुम्हारे मम्मी-पापा आ गए हैं। मैं अभी जाती हूँ, लेकिन हम जल्द ही फिर मिलेंगे।” और एक चमकती हुई रोशनी के साथ सोन परी हवा में ओझल हो गईं। फ्रूटी ने अपनी उंगली की अंगूठी को छुआ और उसके चेहरे पर एक बहुत बड़ी मुस्कान आ गई। उसकी जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रहने वाली थी।

    अगले कुछ दिनों में फ्रूटी की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। अब उसका अकेलापन गायब हो चुका था। जब भी उसके माता-पिता काम पर चले जाते और आया उसे डाँटती, फ्रूटी चुपके से अपने कमरे में जाती, अंगूठी को छूती और सोन परी को बुला लेती।

    सोन परी सिर्फ एक जादुई शख्सियत नहीं थीं, बल्कि वह फ्रूटी की मार्गदर्शक भी थीं।

     

    एक दिन फ्रूटी का गणित का होमवर्क बहुत कठिन था और वह रो रही थी। सोन परी ने चुटकी बजाई और किताबों के पन्ने अपने आप पलटने लगे, लेकिन साथ ही उन्होंने फ्रूटी को प्यार से समझाया भी कि जादू सिर्फ मदद के लिए है, मेहनत तुम्हें खुद ही करनी होगी ताकि तुम्हारा दिमाग तेज हो सके।

     

    एक अन्य दिन, जब फ्रूटी उदास थी क्योंकि उसकी सहेली ने उसके साथ खेलना बंद कर दिया था, तो सोन परी ने उसके कमरे को एक जादुई खेल के मैदान में बदल दिया। वहाँ हवा में तैरने वाले खिलौने थे और रंग-बिरंगे गुब्बारे थे, जिनके साथ दोनों ने मिलकर खूब मस्ती की।

    सोन परी ने फ्रूटी को जीवन के बहुत से मूल्य सिखाए। उन्होंने सिखाया कि दूसरों की मदद कैसे करनी चाहिए, बड़ों का आदर कैसे करना चाहिए और हर परिस्थिति में मुस्कुराते रहना चाहिए। फ्रूटी के माता-पिता ने भी गौर किया कि उनकी बेटी अब पहले से ज्यादा खुश, समझदार और तरोताजा रहने लगी थी। उन्हें हैरानी होती थी कि जो बच्ची बात-बात पर रोती थी, वह अब हमेशा मुस्कुराती रहती थी।

    लेकिन हर कहानी में सुख के साथ परीक्षा की घड़ी भी आती है। परी लोक में सिर्फ भलाई और उजाला ही नहीं था, बल्कि वहाँ कुछ ऐसी शक्तियाँ भी थीं जो नकारात्मकता और अहंकार से भरी हुई थीं। उनमें सबसे प्रमुख थीं—काली परी।

    काली परी और उनके सहयोगी ‘अलटामा’ का यह मानना था कि इंसानों की दुनिया में प्यार, मासूमियत और जादू का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। काली परी हमेशा इस ताक में रहती थीं कि कब सोन परी से कोई गलती हो और वह परी लोक के नियमों का उल्लंघन करके सोन परी को नीचा दिखा सकें। काली परी जानती थीं कि सोन परी को फ्रूटी से बहुत लगाव हो गया है, और यही लगाव सोन परी की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता था।

    एक शाम, जब फ्रूटी अपने स्कूल के प्रोजेक्ट के लिए कुछ रंग ढूँढ रही थी, तभी कमरे का तापमान अचानक बहुत ठंडा हो गया। खिड़कियाँ अपने आप बंद होने लगीं और कमरे की सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे बैंगनी और धुएँ जैसी नीली रोशनी में बदलने लगी।

    फ्रूटी डरकर बिस्तर के कोने में दुकक गई। उसने काँपते हुए कहा, “सोन परी… आप कहाँ हैं?”

    कमरे के बीचों-बीच हवा में एक काली परछाई उभरी। धीरे-धीरे वह परछाई एक भयानक और गुस्से से भरी हुई सूरत में बदल गई। उसने काले रंग के पंख फैला रखे थे और उसके चेहरे पर एक अजीब सी क्रूर हँसी थी। वह थीं—काली परी।

    काली परी ने अपनी भारी और गूँजती हुई आवाज में कहा, “तो यह है वो नन्हीं लड़की, जिसके लिए हमारी महान सोन परी अपने सारे कर्तव्य भूलकर इस छोटी सी दुनिया में बैठी रहती है!”

    फ्रूटी ने डरते हुए पूछा, “आप कौन हैं? सोन परी को क्यों परेशान कर रही हैं?”

    काली परी ने ठहाका लगाते हुए कहा, “मैं काली परी हूँ! और तुम्हारी उस तथाकथित सोन परी की असलियत बहुत जल्द सबके सामने आने वाली है। तुम दोनों की यह दोस्ती परी लोक के नियमों के खिलाफ है। सोन परी को इंसानों से इतना मोह नहीं रखना चाहिए।”

    ठीक उसी समय, कमरे के दरवाजे पर एक तेज़ सुनहरी चमक फूटी और वहाँ सोन परी प्रकट हो गईं। उनके चेहरे पर चिंता और दृढ़ता दोनों भाव थे।

    सोन परी ने कड़े शब्दों में कहा, “काली परी! फ्रूटी एक मासूम बच्ची है। उसे डराने की कोशिश मत करो। अगर तुम्हें कोई शिकायत है, तो सीधे परी लोक में परी माँ के सामने बात करो।”

    काली परी ने मुस्कुराते हुए कहा, “शिकायत मैं वहीं करूँगी, सोन परी! लेकिन उससे पहले मैं यह देखना चाहती हूँ कि तुम इस छोटी सी बच्ची को बचाने के लिए अपनी कौन सी जादुई ताकत गँवाती हो।” और एक भयानक अट्टहास के साथ काली परी वहाँ से गायब हो गई।

    काली परी के जाने के बाद फ्रूटी बहुत घबरा गई थी। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने सोन परी का हाथ पकड़कर कहा, “सोन परी, क्या वह बुरी परी आपको वापस परी लोक खींच ले जाएगी? क्या आप मुझे छोड़कर चली जाएंगी?”

    सोन परी ने फ्रूटी के आँसू पोछे और उसे गले से लगाते हुए कहा, “घबराओ मत, फ्रूटी! सच्चाई और प्यार की ताकत सबसे बड़ी होती है। जब तक मेरे दिल में तुम्हारी और इंसानों की भलाई की भावना है, तब तक कोई भी काली शक्ति मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। लेकिन… हमें सावधान रहना होगा।”

    अगले ही दिन, काली परी ने अपनी चाल चलनी शुरू कर दी। उसने फ्रूटी के जीवन में मुश्किलें पैदा करनी शुरू कर दीं। फ्रूटी के स्कूल के बस्ते से उसकी जरूरी किताबें गायब हो गईं, उसके प्रोजेक्ट का सामान नष्ट हो गया, और यहाँ तक कि उसकी माँ के दफ्तर में भी कुछ अनहोनी हो गई जिससे उसके माता-पिता बहुत तनाव में आ गए। घर का माहौल फिर से उदास हो गया।

    आया ने फ्रूटी पर शक करना शुरू कर दिया कि वह ठीक से ध्यान नहीं देती। फ्रूटी अंदर ही अंदर बहुत टूट रही थी। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से ही सोन परी और उसके परिवार पर यह संकट आया है।

    एक रात, फ्रूटी ने अकेले में अपनी अंगूठी को छुआ और रोते हुए कहा, “सोन परी, मुझे माफ कर दीजिए। मेरी वजह से आप पर और मेरे मम्मी-पापा पर मुसीबत आ गई है। शायद मुझे आपको कभी नहीं बुलाना चाहिए था।”

    सोन परी तुरंत प्रकट हुईं। उन्होंने फ्रूटी के कंधे पर हाथ रखा और बहुत प्यार से समझाया, “फ्रूटी, कभी भी यह मत सोचना कि तुम्हारी वजह से कुछ बुरा हुआ है। मुश्किलें जिंदगी का हिस्सा हैं। असली ताकत तब दिखती है जब हम मुश्किलों के सामने हार मानने के बजाय उनका सामना करते हैं। क्या तुम मेरा साथ दोगी?

    फ्रूटी ने अपने आँसू पोंछे और दृढ़ता से सिर हिलाया, “हाँ, सोन परी! मैं डरूँगी नहीं। हम दोनों मिलकर उस काली परी को हरा देंगे।”

    सोन परी जानती थी कि इस समस्या का समाधान केवल परी लोक में ही हो सकता है। उन्हें परी माँ के सामने जाकर यह साबित करना था कि फ्रूटी के साथ उनकी यह दोस्ती सिर्फ एक व्यक्तिगत मोह नहीं, बल्कि इंसानों की दुनिया में उम्मीद और अच्छाई का बीज बोने का जरिया है।

    सोन परी ने फ्रूटी से कहा, “फ्रूटी, आज रात मुझे परी लोक जाना होगा। वहाँ एक बड़ी सभा बैठी है जहाँ काली परी ने मेरे खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। लेकिन जाने से पहले मैं तुम्हें अपनी विशेष शक्ति का एक अंश देती हूँ, ताकि तुम इस जादुई लॉकेट को पहनकर सुरक्षित रह सको।”

    सोन परी ने अपने हाथों से एक चमकता हुआ सुनहरी लॉकेट फ्रूटी के गले में पहना दिया। लॉकेट पहनते ही फ्रूटी के अंदर एक असीम ऊर्जा और साहस का संचार हो गया। इसके बाद, सोन परी एक सुनहरी रोशनी के साथ परी लोक के लिए रवाना हो गईं।

    परी लोक का दरबार खचाखच भरा हुआ था। परी माँ अपने सिंहासन पर विराजमान थीं। काली परी ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए सबके सामने आरोप लगाया कि सोन परी ने इंसानों की दुनिया में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप किया है और नियमों को तोड़ा है।

    परी माँ ने गंभीर मुद्रा में सोन परी से पूछा, “सोन परी, क्या यह सच है कि तुमने इंसानों के बीच रहकर अपने कर्तव्यों की सीमा लाँघी है?”

    सोन परी ने बिना डरे, आदर के साथ सिर झुकाकर कहा, “परी माँ, मैंने नियमों को तोड़ा नहीं है, बल्कि उनके असली अर्थ को निभाया है। प्रेम, करुणा और उम्मीद—यही तो परी लोक की असली ताकत है। फ्रूटी अकेली थी, उसके पास अपनों का प्यार नहीं था। अगर एक परी इंसानों के आंसुओं को न पोंछ सके, तो ऐसे परी लोक का क्या फायदा जो सिर्फ बादलों में चमकता हो और धरती के दुखों से अनजान रहे?”

    दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी परियाँ सोन परी के पक्ष में सोचने लगीं। तभी, दूर धरती से एक जादुई किरण परी लोक के दरबार में पहुँची। वह फ्रूटी की पुकार थी। फ्रूटी ने अपने गले के लॉकेट को छूकर मन ही मन पुकारा था, “सोन परी, हम सब आपके साथ हैं!”

    फ्रूटी की उस सच्ची और मासूम पुकार ने परी लोक के विशाल आईने को रोशन कर दिया। परी माँ ने जब उस दृश्य को देखा, तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उन्होंने समझ लिया कि सोन परी का कदम पूरी तरह सही था।

    परी माँ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, “काली परी! तुम्हारे आरोप निराधार हैं। सोन परी ने हमारे लोक के नियमों का उल्लंघन नहीं किया, बल्कि उन्हें सार्थक बनाया है। प्रेम और भलाई से बड़ी कोई शक्ति नहीं है।”

    काली परी गुस्से में लाल हो गईं, लेकिन वह परी माँ के आदेश के आगे कुछ नहीं कह सकीं। वह काले बादलों के साथ परी लोक के अंधेरे कोने में लौट गईं। दरबार में सभी ने सोन परी के पक्ष में जयजयकार की।

    अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरण फ्रूटी की खिड़की से अंदर आई, तो पूरा कमरा पहले से कहीं ज्यादा चमक रहा था। फ्रूटी की नींद खुली तो उसने देखा कि उसके माता-पिता उसके कमरे में खड़े हैं और उनके चेहरे पर एक बहुत प्यारी मुस्कान है। उसके पिता ने उसे गले से लगाया और कहा, “बेटी, हमारी दफ्तर की सारी परेशानियाँ दूर हो गई हैं, और आज हम छुट्टी पर हैं। हम पूरा दिन तुम्हारे साथ बिताएंगे!”

    फ्रूटी खुशी से उछल पड़ी। उसने तुरंत अपनी खिड़की की तरफ देखा। खिड़की की मुंडेर पर सोन परी खड़ी थीं। उन्होंने अपनी सुनहरी छड़ी से हवा में एक खूबसूरत दिल का निशान बनाया और मुस्कुराते हुए फ्रूटी की तरफ देखा।

    फ्रूटी ने मन ही मन कहा, “धन्यवाद, सोन परी!”

    सोन परी ने मुस्कुराते हुए हवा में हाथ हिलाया और धीरे-धीरे बादलों के पीछे परी लोक की तरफ ओझल हो गईं। लेकिन फ्रूटी जानती थी कि सोन परी कहीं नहीं गई हैं। वह हमेशा उसकी उंगली की उस अंगूठी में, उसके दिल में और उसके आसपास की हर अच्छी चीज में मौजूद रहेंगी।

    1. फ्रूटी की जिंदगी अब अकेली नहीं थी। उसके पास उसके मम्मी-पापा का प्यार था, और सबसे बढ़कर—एक जादुई दोस्त, सोन परी का अटूट साथ था। और इस तरह, हँसी-खुशी और जादू के साये में फ्रूटी का बचपन एक खूबसूरत परी कथा की तरह आगे बढ़ने लगा।
  • कदमों की आवाज

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    कदमों की आवाज

     

    रात के करीब बारह बज रहे थे। पूरे गांव में सन्नाटा पसरा था। सिर्फ राघव के पुराने मकान में ऊपर जाती लकड़ी की सीढ़ियां थीं, जो हर रात किसी के कदमों की आवाज से गूंजती थीं।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    पहले एक कदम।

     

    फिर दूसरा।

     

    फिर तीसरा।

     

    और फिर अचानक सब शांत।

     

    राघव उस आवाज से पिछले तीन महीने से परेशान था।

     

    मकान उसे अपने नाना से मिला था। नाना की मौत के बाद राघव अपनी पत्नी नंदिनी के साथ वहां रहने आया था।

     

    पहली रात ही नंदिनी ने पूछा था,

     

    “राघव, ऊपर कोई गया है क्या?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “नहीं, ऊपर तो कोई है ही नहीं।”

     

    नंदिनी ने हंसकर कहा,

     

    “तो फिर आवाज कैसी थी?”

     

    राघव ने बात टाल दी।

     

    लेकिन अगली रात फिर वही हुआ।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज नीचे से ऊपर जा रही थी।

     

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “ये आवाज सीढ़ियों से आ रही है।”

     

    राघव ने टॉर्च उठाई और सीढ़ियों के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगा।

     

    पहली सीढ़ी।

     

    दूसरी।

     

    तीसरी।

     

    जैसे ही वह पांचवीं सीढ़ी पर पहुंचा, ऊपर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    ठक-ठक-ठक-ठक!

     

    राघव ने तुरंत टॉर्च ऊपर की।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    लेकिन सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक छोटी-सी लाल रिबन पड़ी थी।

     

    राघव ने उसे उठा लिया।

     

    नंदिनी ने पूछा,

     

    “ये किसकी है?”

     

    राघव कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    “पता नहीं।”

     

    अगली सुबह राघव गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी गोविंद काका के पास गया।

     

    उसने घर की बात बताई।

     

    काका का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “क्या तुम्हें सीढ़ियों पर कोई रिबन मिली?”

     

    राघव चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    काका कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “उस घर की सीढ़ियों की आवाज नई नहीं है।”

     

    “मतलब?”

     

    “करीब बीस साल पहले तुम्हारी नाना की बेटी… तुम्हारी मौसी आरती… इसी घर में रहती थी।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मेरी तो कोई मौसी नहीं थी।”

     

    गोविंद काका ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें यही बताया गया था।”

     

    राघव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “सच क्या है?”

     

    काका ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “आरती एक रात ऊपर के कमरे में गई थी। उसके बाद वह कभी नीचे नहीं आई।”

    “क्या हुआ था उसके साथ?”

     

    काका ने सिर झुका लिया।

     

    “उस रात भी सीढ़ियों पर कदमों की आवाज आई थी।”

     

    राघव के हाथ से रिबन गिरते-गिरते बची।

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे नाना ने कहा कि आरती घर छोड़कर चली गई। लेकिन गांव वालों को यकीन नहीं हुआ।”

     

    राघव घर वापस लौट आया।

     

    उसने उसी दिन ऊपर का बंद कमरा खोलने का फैसला किया।

     

    कमरे के दरवाजे पर पुराना ताला लगा था।

     

    चाबी उसे नाना की अलमारी से मिली।

     

    ताला खुलते ही धूल की मोटी परत हवा में उड़ गई।

     

    कमरे के अंदर एक पुरानी लकड़ी की मेज, कुछ किताबें और दीवार पर लगी एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके बालों में लाल रिबन लगी थी।

    राघव का दिल बैठ गया।

     

    वह रिबन बिल्कुल वही थी जो उसे सीढ़ियों पर मिली थी।

     

    तस्वीर के नीचे लिखा था आरती उम्र 12 साल।

    नंदिनी ने तस्वीर देखते हुए पूछा,“ये तुम्हारी मौसी हैं?”

     

    राघव ने धीरे से सिर हिलाया।

    “शायद…”

     

    तभी कमरे के बाहर से आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों जम गए।

    आवाज सीढ़ियों से आ रही थी।

     

    नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा,

    “राघव… कोई ऊपर आ रहा है।”

     

    कदम धीरे-धीरे ऊपर आ रहे थे।

    ठक…ठक…ठक…

     

    राघव ने दरवाजे की ओर देखा।

    कदम दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गए।

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

    फिर दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

    नंदिनी डरते हुए पीछे हट गई।

     

    राघव ने हिम्मत करके दरवाजा खोला।

    बाहर कोई नहीं था।

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों से शुरू होकर कमरे के अंदर आ रहे थे।

    और जाकर तस्वीर के सामने खत्म हो रहे थे।

     

    राघव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    अब तस्वीर में आरती के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

    उसकी आंखें जैसे सीधे राघव को देख रही थीं।

     

    उसी रात राघव ने नाना की पुरानी डायरी ढूंढ निकाली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था

    “मैंने आरती को नहीं मारा। लेकिन उसे बचाया भी नहीं।”

     

    राघव की आंखें फैल गईं।

    अगली लाइन पढ़कर उसके हाथ कांपने लगे।

     

    “उस रात आरती ने सीढ़ियों पर किसी को देखा था। वह डरकर ऊपर भागी। मैं उसके पीछे गया। लेकिन मैंने जो देखा, उसके बाद मैं खुद डर गया।”

     

    आगे का पन्ना फटा हुआ था।

     

    राघव ने पूरी डायरी उलट-पलट दी।

    आखिर में एक छोटी-सी पर्ची मिली।

     

    उस पर लिखा था“जिस रात कदमों की आवाज सुनाई दे, सीढ़ियों पर पीछे मुड़कर मत देखना।”

    राघव ने नंदिनी को कुछ नहीं बताया।

     

    लेकिन उसी रात ठीक बारह बजे फिर आवाज शुरू हो गई।

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज बहुत तेज थी।

    राघव और नंदिनी नीचे कमरे में बैठे थे।

     

    आवाज धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।ठक… ठक… ठक…

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

    “राघव… ये नीचे आ रही है।”

    राघव ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    अंधेरे में किसी की परछाई दिखाई दी छोटी-सी।

    जैसे कोई बच्ची धीरे-धीरे सीढ़ियां उतर रही हो।

     

    राघव के मुंह से अचानक निकला,

    “आरती?”

    परछाई रुक गई।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई,“भैया…”

     

    राघव की आंखों में आंसू आ गए।

    “तुम्हें क्या हुआ था?”

     

    आवाज आई,मैं गिरी नहीं थी…

     

    राघव ने पूछा,तो?

    “मुझे धक्का दिया गया था।”

     

    नंदिनी ने राघव की तरफ देखा“किसने?”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर जवाब आया“नाना ने नहीं…”

     

    राघव की सांस रुक गई।

    “फिर किसने?”

     

    परछाई ने धीरे से अपना हाथ ऊपर उठाया।

    और सीढ़ियों के ऊपर खड़े एक आदमी की ओर इशारा किया।

     

    राघव ने पलटकर देखा।

    ऊपर उसके नाना खड़े थे।

    लेकिन वह तो बीस साल पहले मर चुके थे।

    राघव पीछे हट गया।

     

    नाना की परछाई धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।

     

    आरती की आवाज फिर सुनाई दी“उन्होंने मुझे नहीं धक्का दिया था…”

    राघव ने कांपते हुए पूछा,“फिर?”

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    नाना की परछाई के हाथ में एक पुरानी लालटेन थी।

    अचानक राघव को सब समझ आने लगा।

     

    उस रात आरती सीढ़ियों से गिर गई थी। नाना उसे बचाने दौड़े थे। लेकिन आरती गंभीर रूप से घायल हो गई थी।

     

    नाना उसे अस्पताल ले जाने के बजाय डर गए।

    क्योंकि उसी समय घर के पुराने कागजों में एक बड़ा राज छिपा था आरती ने नाना को किसी जमीन के धोखे का सच पता चलते सुन लिया था।

     

    नाना डर गए कि अगर आरती बच गई तो सबको सच बता देगी।

    उन्होंने मदद बुलाने में देर कर दी।

    और आरती चली गई।

     

    नाना ने पूरी जिंदगी यह सच छिपाए रखा।

    तभी पुलिस की गाड़ी की आवाज बाहर सुनाई दी।

    राघव ने चौंककर दरवाजा खोला।

    उसने अपने नाना की डायरी पुलिस को सौंप दी।

    सालों पुराना सच सामने आ गया।

     

    अगली रात पहली बार उस घर की सीढ़ियों पर कोई कदमों की आवाज नहीं आई।

    राघव और नंदिनी चैन की सांस लेकर सोने चले गए।

    लेकिन आधी रात को राघव की नींद अचानक खुल गई। ठक… ठक… ठक…

    वही आवाज।

    वह धीरे से बिस्तर से उठा।सीढ़ियों की तरफ देखा।

    इस बार वहां कोई परछाई नहीं थी।

    बस आखिरी सीढ़ी पर लाल रिबन पड़ी थी।

    राघव ने उसे उठाया।

    तभी पीछे से एक बच्ची की बहुत धीमी आवाज आई“भैया…”

    राघव पलटा।वहां कोई नहीं था।

    लेकिन दीवार पर लगी आरती की पुरानी तस्वीर में अब उसके साथ एक और बच्चा खड़ा था।

    वह बच्चा बिल्कुल राघव जैसा दिख रहा था।

    तस्वीर के नीचे एक नई तारीख लिखी थी“अगली रात…”

    और उसके नीचे सिर्फ तीन शब्द थे“सीढ़ियां फिर गिनना।”

  • कोई मरता नहीं था

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस घर में कोई मरता नहीं था

     

    शहर से करीब पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गांव था देवगढ़। गांव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुराना मकान था, जिसे लोग “अमर हवेली” कहते थे।

     

    अजीब बात ये थी कि उस घर में पिछले सौ सालों से रहने वाला कोई भी इंसान कभी मरा नहीं था।

     

    लोगों को यह बात सुनने में अच्छी लगती थी, लेकिन गांव का कोई आदमी उस घर के पास तक नहीं जाता था।

     

    कहा जाता था कि जो भी उस घर में रहने जाता है, वह बूढ़ा तो होता है, बीमार भी पड़ता है, लेकिन उसकी मौत कभी नहीं होती।

     

    इसी गांव में एक दिन अमन नाम का लड़का अपनी मां के साथ आया। उसके पिता की मौत कई साल पहले हो चुकी थी और उसकी मां को गांव में पुश्तैनी जमीन मिली थी।

     

    अमन ने घर के बारे में सुना तो हंसते हुए बोला,

     

    “मां, लोग भी न… कुछ भी कहानी बना लेते हैं। कोई इंसान मरता नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है?”

     

    पास खड़े बूढ़े हरिदास ने उसकी बात सुन ली।

     

    उन्होंने अमन की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “बेटा, कहानी नहीं है। मैंने अपनी आंखों से उस घर के लोगों को देखा है।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “तो फिर वो लोग अभी तक जिंदा हैं?”

     

    हरिदास का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “हां… लेकिन जिंदा रहना और जिंदगी जीना दो अलग बातें हैं।”

     

    अमन कुछ समझ नहीं पाया।

     

    उस रात अमन और उसकी मां गांव के एक पुराने मकान में रुके। आधी रात को अचानक उनके दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने दरवाजा खोला।

     

    सामने हरिदास खड़े थे।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

     

    “कल अगर कोई तुम्हें अमर हवेली में जाने को कहे… तो मत जाना।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    हरिदास ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस जाते-जाते इतना बोले,

     

    “उस घर में मौत नहीं आती… लेकिन वहां से कोई वापस भी नहीं आता।”

     

    अगली सुबह अमन अपनी मां के साथ खेत देखने निकला। रास्ते में उसकी मुलाकात एक बूढ़ी औरत से हुई।

     

    औरत ने अमन को देखते ही कहा,

     

    “तुम उसी घर के नए मालिक हो न?”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    औरत ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारे परिवार का नंबर आ गया है।”

     

    अमन को उसकी बात अजीब लगी।

     

    “कौन-सा नंबर?”

     

    औरत कुछ बोलती, उससे पहले उसकी मां ने अमन को वहां से चलने के लिए कहा।

     

    उस शाम उन्हें पुराने कागज मिले, जिनमें लिखा था कि अमर हवेली उनके परिवार की ही थी।

     

    अमन ने जिद की,

     

    “मां, हमें वो घर देखना चाहिए।”

     

    मां ने मना किया।

     

    लेकिन अमन अकेला ही हवेली पहुंच गया।

     

    लोहे का बड़ा दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    अंदर धूल से भरा आंगन था। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    लेकिन उन चित्रों में एक चीज अजीब थी।

     

    हर तस्वीर में एक ही परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    और हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    1920… 1935… 1951… 1970… 1992… 2010…

     

    अमन ने गौर से देखा।

     

    तस्वीरों में मौजूद लोग उम्र में लगभग एक जैसे थे।

     

    तभी पीछे से आवाज आई,

     

    “तुम आ ही गए।”

     

    अमन पलटा।

     

    एक बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

     

    उसकी आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “इस घर का रखवाला।”

     

    “यहां कौन रहता है?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे अपने लोग।”

     

    अमन ने दीवार पर लगी तस्वीर की ओर इशारा किया।

     

    “ये लोग कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “तुम्हारे दादा… परदादा… और उनसे भी पहले के लोग।”

     

    अमन के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “लेकिन ये सब तो मर चुके हैं।”

     

    बूढ़ा धीरे-धीरे उसके करीब आया।

     

    “नहीं। इस घर में कोई नहीं मरता।”

     

    अचानक ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने ऊपर देखा।

     

    बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    लेकिन तभी एक कमरे का दरवाजा खुला।

     

    अंदर से एक आदमी बाहर आया।

     

    अमन उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

     

    “पापा?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “अमन…”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आप जिंदा हैं?”

     

    उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बस कहा,

     

    “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमन उसके पास जाने लगा।

     

    तभी बूढ़े ने चिल्लाकर कहा,

     

    “भागो!”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियां बंद हो गईं।

     

    दरवाजे अपने आप बंद हो गए।

     

    और दीवारों पर लगी तस्वीरों के चेहरे बदलने लगे।

     

    अब हर तस्वीर में अमन दिखाई दे रहा था।

     

    कहीं वह बच्चा था।

     

    कहीं बूढ़ा।

     

    कहीं बिल्कुल वैसा ही जैसा अभी था।

     

    अमन घबराकर दरवाजे की ओर भागा।

     

    लेकिन रास्ते में उसके पिता खड़े थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “अगर बाहर गए तो मैं हमेशा के लिए अकेला रह जाऊंगा।”

     

    अमन रुक गया।

     

    “आप मेरे पिता नहीं हैं।”

     

    उस आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगा।

     

    और उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े दिखाई दिए।

     

    वे सभी अमन के परिवार के पुराने सदस्य थे।

     

    सबकी आंखें अमन पर थीं।

     

    तभी बूढ़ा चिल्लाया,

     

    “इसे बाहर निकालो!”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    फर्श पर बनी एक काली रेखा चमकी और अमन उसके बीच खिंचता चला गया।

     

    अगले ही पल सब शांत हो गया।

     

    सुबह अमन की मां हवेली के बाहर पहुंची।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    अंदर अमन नहीं था।

     

    सिर्फ एक नई तस्वीर दीवार पर टंगी थी।

     

    उस तस्वीर में अमन खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    नीचे तारीख लिखी थी

    11 अगस्त 2026

     

    मां चीख पड़ी।

     

    तभी पीछे से हरिदास की आवाज आई,

     

    “अब समझ आया कि इस घर में कोई क्यों नहीं मरता?”

     

    मां ने कांपते हुए पूछा,“क्यों?”

     

    हरिदास ने कहा,

     

    “क्योंकि मौत उन्हें लेने आती ही नहीं…”

     

    उन्होंने हवेली की तरफ देखा।

     

    “यह घर इंसानों को मारता नहीं है। यह उनकी मौत अपने अंदर कैद कर लेता है।”

    मां ने रोते हुए पूछा,

     

    “तो अमन?”

     

    हरिदास ने धीरे से कहा,

     

    “अब वह जिंदा है… हमेशा जिंदा रहेगा।”

    मां ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन हरिदास ने अगली बात कही तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन वह अब इंसानों की दुनिया में नहीं है।”

     

    उसी समय हवेली के अंदर से अमन की आवाज आई

     

    “मां…”

     

    मां दौड़कर अंदर जाने लगी।

     

    हरिदास ने उसे रोक लिया।

    “मत जाना!”

    “वो मेरा बेटा है!”

    हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “वह आवाज अमन की नहीं है।”

     

    अंदर से फिर आवाज आई“मां… मुझे बचा लो…”

    मां दरवाजे पर खड़ी रोती रही।

     

    और हवेली की दीवार पर लगी नई तस्वीर में अमन की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    उसकी जगह उसके चेहरे पर डर दिखाई देने लगा।

    फिर तस्वीर के नीचे लिखी तारीख अपने आप बदल गई।

    11 अगस्त 2026 मिट गई।

     

    उसकी जगह लिखा आया अगला नाम: अमन की मां।

     

    और उसी पल हवेली का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    धड़ाम!

    उस दिन के बाद देवगढ़ गांव में एक और बात मशहूर हो गई “जिस घर में कोई मरता नहीं था, वहां रहने वालों की उम्र जरूर बढ़ती थी… लेकिन हर पीढ़ी के साथ वह घर एक नए इंसान को अपना बना लेता था।”

    और सबसे डरावनी बात?

    बस उसकी दीवार पर अब एक नई तस्वीर के लिए जगह खाली थी।

  • बारिश की श्रापित मेढकी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश का मेढ़क और सात जन्मों की मेढ़की

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुराना जंगल था। उस जंगल के बीचों-बीच एक टूटी हुई हवेली थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि वहां कभी एक बहुत ही घमंडी राजकुमार रहता था।

     

    उस राजकुमार का नाम था एडविन।

     

    एडविन देखने में बेहद सुंदर और राजसी था, लेकिन उसके अंदर घमंड कूट-कूटकर भरा हुआ था। उसे अपनी दौलत, अपने महल और अपनी खूबसूरती पर बहुत नाज था।

     

    एक दिन तेज बारिश हो रही थी। एडविन अपने घोड़े पर बैठकर जंगल के रास्ते से गुजर रहा था। रास्ते में उसे एक बूढ़ी औरत दिखाई दी, जो बारिश में भीगती हुई सड़क किनारे बैठी थी।

     

    बूढ़ी औरत ने हाथ उठाकर कहा,

     

    “बेटा, मुझे थोड़ा सहारा दे दो। बारिश रुकने तक मुझे कहीं बैठने की जगह चाहिए।”

     

    एडविन ने घमंड से उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं है। रास्ते से हटो।”

     

    बूढ़ी औरत ने फिर कहा,

     

    “बस थोड़ी देर के लिए मुझे अपने महल में जगह दे दो।”

     

    एडविन हंस पड़ा।

     

    “तुम जैसी गरीब औरत मेरे महल में? वहां तुम्हारे लिए जगह नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत की आंखों में अचानक एक अजीब सी चमक आई।

     

    उसने शांत आवाज में कहा,”जिस खूबसूरती और राजसी जिंदगी पर तुम्हें इतना घमंड है, वही तुमसे छिन जाएगी। अब तुम तब तक इंसान नहीं बनोगे, जब तक तुम्हें सच्चा प्यार नहीं मिल जाता।”

     

    एडविन कुछ समझ पाता, उससे पहले ही आसमान में बिजली चमकी।

     

    अगले ही पल वह गायब हो गया।

    जब उसकी आंख खुली तो वह एक छोटे से गंदे पानी के गड्ढे में पड़ा था।

    वह अब राजकुमार नहीं था।वह एक मेढ़क बन चुका था।

     

    एडविन ने पानी में अपना चेहरा देखा और घबरा गया।

     

    “ये क्या हो गया?”

    उसने बोलने की कोशिश की, लेकिन उसके मुंह से सिर्फ टर्र-टर्र की आवाज निकली।

    दिन बीतते गए।

     

    बारिश आती तो नालियों और सड़कों का पानी बहकर जंगल के उस हिस्से में जमा हो जाता। वही गंदा पानी अब एडविन का घर बन गया था।

     

    महल की जगह कीचड़ थी।

    मखमली बिस्तर की जगह गीली मिट्टी थी।

     

    और राजसी भोजन की जगह छोटे-छोटे कीड़े।

     

    एडविन को धीरे-धीरे अपनी पुरानी जिंदगी याद आती और वह दुखी हो जाता।

     

    उधर उसी जंगल में एक छोटी सी मेढ़की रहती थी।

     

    उसका नाम था लिली।

     

    लेकिन लिली भी कोई साधारण मेढ़की नहीं थी।

     

    वह एक जादुई मेढ़की थी, जिसे भी एक श्राप मिला हुआ था।

     

    उसे अपनी जिंदगी के सात जन्म मेढ़की बनकर बिताने थे।

     

    लेकिन उसके श्राप में एक शर्त थी।

     

    “जब तक कोई इंसान तुम्हें तुम्हारे रूप के कारण नहीं, बल्कि तुम्हारे दिल के कारण सच्चा प्यार नहीं देगा, तब तक तुम अपने असली रूप में वापस नहीं आ पाओगी।”

     

    लिली को यह बात बचपन से पता थी।

     

    इसीलिए वह हमेशा सोचती थी कि शायद उसके लिए इंसानी प्यार कभी लिखा ही नहीं गया।

     

    एक शाम बहुत तेज बारिश हुई।

     

    बारिश का पानी बहते-बहते उसी गंदे गड्ढे में आ गया जहां एडविन रहता था।

     

    अचानक एक छोटी सी आवाज आई।

     

    “बचाओ!”

     

    एडविन ने देखा, लिली तेज पानी में बह रही थी।

     

    वह तुरंत पानी में कूद पड़ा।

     

    उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर लिली को एक पत्थर के पीछे पहुंचा दिया।

     

    लिली ने कांपते हुए उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे बचाया?”

     

    एडविन ने कुछ नहीं कहा।

     

    वह बस चुपचाप दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    लिली मुस्कुराई।

     

    “तुम बाकी मेढ़कों जैसे नहीं हो।”

     

    एडविन के मन में पहली बार किसी ने उसके लिए अच्छी बात कही थी।

     

    अगले दिन से दोनों साथ रहने लगे।

     

    लिली बहुत बातूनी थी।

     

    वह हर छोटी-बड़ी बात एडविन को बताती।

     

    कभी कहती,

     

    “देखो, आज बारिश का पानी कितना साफ है।”

     

    कभी कहती,

     

    “उस पेड़ पर जो पीला फूल खिला है, वो मुझे बहुत पसंद है।”

     

    एडविन पहले उसकी बातें सुनकर परेशान होता, लेकिन धीरे-धीरे उसे लिली की आवाज अच्छी लगने लगी।

     

    एक दिन लिली ने पूछा,

     

    “तुम हमेशा इतने उदास क्यों रहते हो?”

     

    एडविन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “क्योंकि मैं पहले कोई और था।”

     

    “कौन?”

     

    “एक राजकुमार।”

     

    लिली हंस पड़ी।

     

    “तुम? राजकुमार?”

     

    एडविन को बुरा लगा।

     

    “हंस क्यों रही हो?”

     

    लिली ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि राजकुमार तो बहुत घमंडी होते हैं। तुम तो इतने शांत हो।”

     

    एडविन ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं भी घमंडी था। बहुत ज्यादा।”

     

    फिर उसने उसे अपना पूरा सच बता दिया।

     

    लिली काफी देर तक चुप रही।

     

    उसने कहा,

     

    “शायद तुम्हें ये श्राप सजा देने के लिए नहीं, बदलने के लिए मिला है।”

     

    ये बात एडविन के दिल में उतर गई।

     

    समय गुजरता गया।

     

    बारिश का मौसम खत्म होने लगा।

     

    लेकिन एडविन और लिली की दोस्ती गहरी होती गई।

     

    एक रात अचानक जंगल में भयंकर बारिश शुरू हो गई।

     

    नाले का पानी तेजी से बढ़ने लगा।

     

    लिली पानी में फंस गई।

     

    एडविन उसे बचाने के लिए दौड़ा, लेकिन तेज बहाव में खुद भी बहने लगा।

     

    लिली चिल्लाई,

     

    “एडविन!”

     

    उसने पास की एक बेल पकड़ ली और पूरी ताकत से एडविन की तरफ बढ़ी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे को पकड़ लिया।

     

    काफी कोशिश के बाद वे एक बड़े पत्थर पर पहुंच गए।

     

    बारिश में दोनों चुपचाप बैठे रहे।

     

    लिली ने धीरे से कहा,

     

    “अगर तुम कभी इंसान बन गए तो मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

     

    एडविन ने उसकी तरफ देखा।

     

    पहली बार उसके मन में अपने पुराने महल, सोने और राजगद्दी से ज्यादा किसी और की चिंता थी।

     

    उसने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता मैं इंसान बनूंगा या नहीं। लेकिन इतना जानता हूं कि तुम्हें भूलना मेरे लिए सबसे मुश्किल होगा।”

     

    लिली की आंखों में चमक आ गई।

     

    अगली सुबह सूरज निकला।

     

    दोनों गंदे पानी के उसी छोटे से तालाब के किनारे बैठे थे।

     

    अचानक आसमान से सुनहरी रोशनी उतरी।

     

    वही बूढ़ी औरत उनके सामने आ खड़ी हुई।

     

    लिली डर गई।

     

    एडविन तुरंत उसके आगे आ गया।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “डरो मत। मैं तुम्हें सजा देने नहीं आई।”

     

    उसने एडविन की तरफ देखा।

     

    “राजकुमार, तुम्हारा घमंड खत्म हो चुका है। अब तुमने समझ लिया है कि किसी की कीमत उसके रूप या हैसियत से नहीं होती।”

     

    फिर उसने लिली की तरफ देखा।

     

    “और तुम्हारा श्राप भी अब खत्म हो सकता है।”

     

    अचानक दोनों के चारों तरफ सुनहरी रोशनी फैल गई।

     

    कुछ ही पलों में वहां दो इंसान खड़े थे।

     

    एडविन फिर से राजकुमार बन चुका था।

     

    और लिली एक सुंदर लड़की के रूप में उसके सामने खड़ी थी।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखकर हैरान रह गए।

     

    बूढ़ी औरत ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “सच्चा प्यार वही है जो बुरे समय में साथ रहे। तुम्हें इंसान बनाने वाली चीज कोई जादू नहीं, बल्कि तुम्हारा बदला हुआ दिल था।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    एडविन ने लिली की तरफ देखा।

     

    अब उसके सामने एक राजकुमार नहीं, बल्कि वही साधारण दिल वाला लड़का खड़ा था जिसे लिली ने गंदे पानी के बीच जाना था।

     

    एडविन ने कहा,

     

    “मुझे राजमहल वापस मिल गया, लेकिन अगर तुम मेरे साथ नहीं हो तो वो महल मेरे लिए फिर से खाली है।”

     

    लिली मुस्कुराई।

     

    “और मुझे अपने सात जन्मों का श्राप खत्म होने की खुशी से ज्यादा इस बात की खुशी है कि मुझे मेरा दोस्त वापस मिल गया।”

     

    उस दिन के बाद एडविन ने कभी अपनी दौलत और हैसियत पर घमंड नहीं किया।

     

    उसने जंगल के पास रहने वाले गरीब लोगों के लिए एक बड़ा आश्रय बनवाया, जहां बारिश के दिनों में कोई भी इंसान भीगने के लिए मजबूर न हो।

     

    और जब भी बारिश होती, एडविन और लिली उस पुराने तालाब के पास जरूर जाते।

     

    क्योंकि वहीं गंदे पानी के बीच एक घमंडी राजकुमार ने अपना घमंड खोया था…

     

    और वहीं एक मेढ़की ने उसे सिखाया था कि सच्चा प्यार चेहरे से नहीं, दिल से पहचाना जाता है।

  • सुनियना कि मुस्कान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनैना की मुस्कान

     

    सुनैना को बचपन से ही एक बात बार-बार समझाई जाती थ उसे मुस्कुराना नहीं है।

     

    जब भी उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आती, उसकी दादी तुरंत उसे घूरकर कहतीं,

    “सुनैना! दांत मत दिखाया कर। तेरी मुस्कान इस घर के लिए अच्छी नहीं है।”

     

    सुनैना छोटी थी, इसलिए उसे समझ नहीं आता था कि उसकी मुस्कान से घर को क्या नुकसान हो सकता है।

     

    एक दिन वह आंगन में अपनी सहेली के साथ खेल रही थी। सहेली ने कोई मजेदार बात कही तो सुनैना जोर से हंस पड़ी।

     

    तभी दादी की आवाज आई,

    “कितनी बार कहा है तुझे, हंसना बंद कर!”

     

    सुनैना की हंसी अचानक रुक गई।

     

    वह चुपचाप नीचे देखने लगी।

     

    दादी उसके पास आईं और बोलीं,

    “जब भी तू हंसती है, घर में कोई न कोई परेशानी आ जाती है। याद नहीं पिछले साल तू ऐसे ही हंसी थी और उसी रात तेरे पिताजी का कारोबार बंद हो गया था?”

     

    सुनैना ने मासूमियत से पूछा,

    “लेकिन दादी, मेरी हंसी से पापा का कारोबार कैसे बंद हो सकता है?”

     

    दादी ने तुरंत कहा,

    “बहस मत कर। बड़ों की बात मानना सीख।”

     

    सुनैना चुप हो गई।

     

    उस दिन के बाद उसने अपने चेहरे से मुस्कान जैसे छीन ही ली।

     

    स्कूल में उसकी सहेलियां उसे हंसाने की कोशिश करतीं, लेकिन वह बस हल्का सा मुस्कुराकर रह जाती।

     

    एक दिन उसकी दोस्त रिया ने पूछा,

    “तू इतनी उदास क्यों रहती है? पहले तो तू सबसे ज्यादा हंसती थी।”

     

    सुनैना ने धीरे से कहा,

    “मुझे हंसने से मना किया गया है।”

     

    रिया हैरान होकर बोली,

    “किसने?”

     

    “घरवालों ने।”

     

    “क्यों?”

     

    सुनैना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,

    “उन्हें लगता है कि मेरी मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है।”

     

    रिया कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर उसने कहा,

    “सुनैना, अगर मुस्कुराने से गरीबी आती तो दुनिया का हर खुश इंसान गरीब होता।”

     

    सुनैना के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

     

    घर में वैसे भी हालात अच्छे नहीं थे। उसके पिता रमेश की छोटी सी कपड़ों की दुकान थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से बिक्री कम हो गई थी। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था।

     

    दादी हर परेशानी का कारण सुनैना को ही मानतीं।

     

    कभी घर में दूध कम पड़ जाता तो कहतीं,

    “सुबह-सुबह इसे हंसते देखा था, तभी से दिन खराब जा रहा है।”

     

    कभी बिजली का बिल ज्यादा आ जाता तो कहतीं,

    “इस लड़की की हंसी घर का सुख खा रही है।”

     

    सुनैना हर बार अपना चेहरा छिपा लेती।

     

    उसकी मां कमला सब सुनतीं, लेकिन कुछ नहीं कहतीं। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने सुनैना का साथ दिया तो घर में झगड़ा हो जाएगा।

     

    एक दिन सुनैना की छोटी बहन बीमार पड़ गई।

     

    दादी ने फिर सुनैना को दोष देते हुए कहा,

    “कल शाम तू आंगन में खिलखिला रही थी न? देख लिया उसका नतीजा!”

     

    इस बार सुनैना की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह अपने कमरे में गई और पहली बार अपनी मां से बोली,

    “मां, क्या सच में मेरी मुस्कान इतनी बुरी है?”

     

    कमला का दिल भर आया।

     

    उन्होंने सुनैना को गले लगा लिया।

     

    “नहीं बेटा। तेरी मुस्कान बुरी नहीं है।”

     

    “तो फिर सब मुझे हंसने से क्यों रोकते हैं?”

     

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    उन्होंने बस उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

    “कभी-कभी लोग डर के कारण ऐसी बातें मान लेते हैं, जिनका कोई सच नहीं होता।”

     

    सुनैना ने मां की तरफ देखा।

     

    “तो क्या मैं हंस सकती हूं?”

     

    कमला ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “जब दिल करे, हंस लेना।”

     

    उस रात बहुत दिनों बाद सुनैना अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी हुई।

     

    उसने खुद को देखा और धीरे से मुस्कुराई।

     

    आईने में उसे कोई अशुभ लड़की नहीं दिखाई दी।

     

    उसे बस एक मासूम लड़की दिखाई दी, जो बहुत दिनों से अपनी खुशी छिपाकर जी रही थी।

     

    अगले दिन स्कूल में उसकी अध्यापिका ने घोषणा की कि स्कूल में बच्चों के लिए एक कहानी प्रतियोगिता होने वाली है।

     

    सुनैना ने भी अपना नाम लिखवा दिया।

     

    उसने ऐसी कहानी लिखी जिसमें एक चिड़िया को उड़ने से रोक दिया जाता था क्योंकि गांव वालों को लगता था कि उसके उड़ने से तूफान आ जाएगा।

     

    प्रतियोगिता के दिन सुनैना ने पूरी कहानी सबके सामने सुनाई।

     

    कहानी खत्म होते ही पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा।

     

    सुनैना के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    उसे उस पल पहली बार लगा कि उसकी मुस्कान किसी मुसीबत का कारण नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।

     

    उसे प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला।

     

    लेकिन घर लौटते समय उसे डर लग रहा था।

     

    वह सोच रही थी कि दादी को पता चला तो क्या होगा?

     

    जब वह घर पहुंची तो देखा कि पिता दुकान से लौटे हुए थे।

     

    उनके हाथ में एक बड़ा डिब्बा था।

     

    पिता ने मुस्कुराकर कहा,

    “सुनैना, पता है आज क्या हुआ?”

     

    सुनैना चुप रही।

     

    “दुकान पर एक बड़े व्यापारी का ऑर्डर मिला है। इतना बड़ा कि अगले कई महीनों तक घर की चिंता नहीं रहेगी।”

     

    सुनैना की आंखें चमक उठीं।

     

    वह खुशी से मुस्कुराने लगी।

     

    दादी वहीं बैठी थीं।

     

    उन्होंने सुनैना को मुस्कुराते देखा तो तुरंत बोलीं,

    “बस! अब इसे मत हंसने देना। कहीं फिर—”

     

    इस बार रमेश ने पहली बार अपनी मां की बात रोक दी।

     

    “बस मां।”

     

    दादी चुप हो गईं।

     

    रमेश ने कहा,

    “मेरी दुकान कई दिनों से इसलिए खराब चल रही थी क्योंकि मैं गलत जगह माल खरीद रहा था। आज मुझे सही ग्राहक मिला है। इसका सुनैना की मुस्कान से कोई लेना-देना नहीं है।”

     

    दादी कुछ नहीं बोलीं।

     

    रमेश ने सुनैना की तरफ देखा।

     

    “और अगर मेरी बेटी की मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है, तो आज पहली बार उसकी मुस्कान के साथ मेरे घर में खुशहाली क्यों आई?”

     

    कमला की आंखों में आंसू आ गए।

     

    सुनैना ने पिता को देखा और धीरे से पूछा,

    “पापा, क्या मैं अब खुलकर हंस सकती हूं?”

     

    रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “बिल्कुल। और आज से कोई तुम्हें हंसने से नहीं रोकेगा।”

     

    सुनैना ने पहली बार पूरे मन से हंसा।

     

    उसकी हंसी पूरे आंगन में गूंज उठी।

     

    दादी उसे देखती रहीं।

     

    कुछ दिनों बाद दादी खुद सुनैना के पास आईं।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

    “बेटा… शायद मैं गलत थी।”

     

    सुनैना ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

     

    दादी बोलीं,

    “मेरी मां भी मुझे बचपन में यही कहा करती थी। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि ये बात सच है या नहीं। बस डरती रही और वही डर तुझ पर डाल दिया।”

     

    सुनैना की आंखें भर आईं।

     

    उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “दादी, अब मुझे हंसने दोगी?”

     

    दादी की आंखों में भी मुस्कान आ गई।

     

    “हां बेटा… खूब हंस।”

     

    सुनैना खिलखिलाकर हंस पड़ी।

     

    उस दिन उस छोटे से घर में पहली बार किसी को डर नहीं लगा कि मुस्कान के साथ दरिद्रता आएगी।

     

    क्योंकि सब समझ चुके थे

     

    घर की खुशियां किसी की मुस्कान से नहीं जातीं।

    खुशियां तब चली जाती हैं, जब इंसान अंधविश्वास के डर से अपने ही घर की हंसी छीन लेता है।

     

    और सुनैना ने उसी दिन तय कर लिया कि अब वह अपनी मुस्कान कभी किसी डर के हवाले नहीं करेगी।

  • एकतरफा मुहब्बत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एकतरफा मोहब्बत 

     

    लविश की उम्र चालीस साल थी। शहर में उसका नाम एक बड़े बिजनेसमैन के तौर पर जाना जाता था। कई कंपनियां, आलीशान घर, महंगी गाड़ियां और हर सुविधा उसके पास थी। लेकिन इन सबके बावजूद उसकी जिंदगी में एक खालीपन था, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पाता था।

     

    फिर एक दिन उसकी मुलाकात लावण्या से हुई।

     

    लावण्या इक्कीस साल की कॉलेज स्टूडेंट थी। हंसमुख, आत्मविश्वासी और अपनी पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर। उसे दिखावे वाली जिंदगी बिल्कुल पसंद नहीं थी। वह अपने दम पर कुछ बनना चाहती थी।

     

    लविश की मुलाकात उससे पहली बार एक कॉलेज के कार्यक्रम में हुई, जहां उसकी कंपनी ने विद्यार्थियों के लिए एक स्कॉलरशिप कार्यक्रम रखा था।

     

    लावण्या मंच पर खड़ी होकर अपने प्रोजेक्ट के बारे में बता रही थी।

     

    लविश की नजर अचानक उसी पर जाकर रुक गई।

     

    उसने बहुत सी खूबसूरत लड़कियां देखी थीं, लेकिन लावण्या में उसे कुछ अलग लगा। शायद उसका आत्मविश्वास, शायद उसकी बात करने का तरीका या शायद उसकी आंखों में अपने सपनों को पूरा करने की चमक।

     

    कार्यक्रम खत्म हुआ तो लावण्या अपने दोस्तों के साथ बाहर निकलने लगी।

     

    तभी लविश ने उसे आवाज दी।

     

    “लावण्या?”

     

    वह पलटकर बोली, “जी?”

     

    “तुम्हारा प्रोजेक्ट काफी अच्छा था।”

     

    लावण्या मुस्कुराई।

     

    “थैंक यू।”

     

    “तुम आगे क्या करना चाहती हो?”

     

    “अपना खुद का बिजनेस शुरू करना चाहती हूं।”

     

    लविश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “अच्छा सपना है।”

     

    लावण्या ने हंसते हुए कहा, “सपना नहीं सर, प्लान है। सपना होता तो शायद मैं इतनी मेहनत नहीं करती।”

     

    उसकी बात सुनकर लविश कुछ पल चुप रहा।

     

    उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि वह लड़की सिर्फ खूबसूरत नहीं थी, बल्कि उसके अंदर कुछ बनने की जिद भी थी।

     

    समय बीतता गया।

     

    लविश किसी न किसी बहाने कॉलेज के कार्यक्रमों में आने लगा। कभी स्कॉलरशिप की मीटिंग, कभी विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट की समीक्षा।

     

    और लगभग हर बार उसकी नजर लावण्या को ही ढूंढती।

     

    लावण्या के लिए लविश सिर्फ एक सम्मानित बिजनेसमैन था।

     

    लेकिन लविश के लिए बात धीरे-धीरे बदल चुकी थी।

     

    उसे लावण्या की छोटी-छोटी बातें याद रहने लगीं।

     

    उसे याद था कि लावण्या चाय में ज्यादा चीनी पसंद नहीं करती।

     

    उसे याद था कि वह बारिश में भीगने के बजाय छतरी लेकर चलती है।

     

    उसे याद था कि परीक्षा के दिनों में वह देर रात तक पढ़ती थी।

     

    लावण्या को इन बातों का अंदाजा तक नहीं था।

     

    एक शाम कॉलेज से निकलते समय लावण्या की मुलाकात लविश से हुई।

     

    “आप यहां?”

     

    लविश ने सहजता से कहा, “बस एक मीटिंग थी।”

     

    लावण्या ने सिर हिलाया।

     

    “अच्छा।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर लविश ने पूछा, “तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?”

     

    “बहुत अच्छी। अगले महीने मेरे फाइनल प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन है।”

     

    “ऑल द बेस्ट।”

     

    “थैंक यू।”

     

    लावण्या अपने रास्ते चली गई।

     

    लविश उसे जाते हुए देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन दिल में एक अजीब-सी बेचैनी।

     

    वह जानता था कि दोनों की उम्र में बहुत अंतर है।

     

    वह यह भी जानता था कि लावण्या की जिंदगी अभी शुरू ही हुई थी।

     

    उसके अपने सपने थे, अपनी दुनिया थी।

     

    और शायद सबसे बड़ी बात यह थी कि लावण्या ने कभी उसे उस नजर से देखा ही नहीं था।

     

    फिर भी लविश के दिल में उसके लिए भावनाएं बढ़ती चली गईं।

     

    एक दिन उसके दोस्त समीर ने उससे कहा,

     

    “तू पिछले कुछ महीनों से बदला-बदला सा है। बात क्या है?”

     

    लविश चुप रहा।

     

    समीर ने हंसते हुए कहा, “कहीं प्यार-व्यार तो नहीं हो गया?”

     

    लविश ने कुछ नहीं कहा।

     

    समीर समझ गया।

     

    “कौन है?”

     

    लविश ने धीमे से कहा, “लावण्या।”

     

    समीर कुछ पल चुप रहा।

     

    “वही कॉलेज वाली लड़की?”

     

    “हां।”

     

    “लविश, तू चालीस का है और वो इक्कीस की।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “और क्या उसे भी पता है कि तू उसके बारे में ऐसा सोचता है?”

     

    लविश ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    समीर ने गंभीर होकर कहा,

     

    “तो फिर पहले खुद से पूछ कि तुझे उसका साथ चाहिए या सिर्फ उसकी जिंदगी में अपनी जगह चाहिए। दोनों चीजों में फर्क होता है।”

     

    लविश को उसकी बात दिल पर लगी।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं पाया।

     

    अगले दिन उसने फैसला किया कि वह लावण्या पर अपनी भावनाएं नहीं थोपेगा।

     

    वह उससे प्यार करता था, लेकिन उसके प्यार का मतलब यह नहीं था कि लावण्या भी उसे पसंद करे।

     

    कुछ दिन बाद लावण्या अपनी प्रेजेंटेशन के लिए परेशान थी।

     

    उसका प्रोजेक्ट बार-बार फेल हो रहा था।

     

    लविश को जब पता चला तो उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर तुम्हें किसी सलाह की जरूरत हो तो बता देना। फैसला तुम्हारा होगा।”

     

    लावण्या ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

     

    “आप सच में मेरी मदद करेंगे?”

     

    “अगर मेरी सलाह तुम्हारे काम आए तो जरूर।”

     

    लावण्या ने उसकी मदद ली।

     

    लविश ने उसे रास्ता दिखाया, लेकिन प्रोजेक्ट खुद नहीं बनाया। उसने हमेशा उसकी मेहनत का सम्मान किया।

     

    कुछ हफ्तों बाद लावण्या का प्रोजेक्ट कॉलेज में सबसे अच्छा चुना गया।

     

    वह खुशी से लविश के पास आई।

     

    “सर! मेरा प्रोजेक्ट सिलेक्ट हो गया।”

     

    लविश मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था तुम कर लोगी।”

     

    लावण्या ने उत्साह में कहा,

     

    “आपकी वजह से हुआ।”

     

    “नहीं,” लविश ने कहा, “मेरी वजह से नहीं। तुमने मेहनत की थी।”

     

    लावण्या के मन में उस दिन लविश के लिए सम्मान और बढ़ गया।

     

    लेकिन प्यार?

     

    वह भावना अभी भी उसके दिल में नहीं थी।

     

    कुछ समय बाद लावण्या को एक बड़ी कंपनी में इंटर्नशिप मिल गई। वह अपने सपनों की तरफ बढ़ने लगी।

     

    लविश दूर से उसकी सफलता देखता रहा।

     

    एक दिन समीर ने फिर पूछा,

     

    “अब भी उससे प्यार करता है?”

     

    लविश मुस्कुराया।

     

    “हां। शायद हमेशा करूंगा।”

     

    “फिर उसे बता क्यों नहीं देता?”

     

    लविश ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि प्यार सिर्फ अपनी बात कह देना नहीं होता। कभी-कभी सामने वाले की आजादी को समझना भी प्यार होता है।”

     

    समीर चुप हो गया।

     

    कुछ दिनों बाद लावण्या लविश से मिलने आई।

     

    उसने कहा,

    “सर, मुझे एक बात बतानी है। मुझे दूसरी कंपनी से ऑफर मिला है। मैं शायद दूसरे शहर चली जाऊंगी।”

     

    लविश के दिल को जैसे एक पल के लिए झटका लगा।

    लेकिन उसने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तो फिर जाना चाहिए।”

     

    “आपको बुरा नहीं लगेगा?”

    “क्यों लगेगा?”

     

    “आपने हमेशा मेरी मदद की है।”

     

    लविश ने कहा,”मैं चाहता हूं कि तुम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो। अगर मेरी वजह से तुम्हारे कदम रुक गए तो मेरी सारी मदद बेकार हो जाएगी।”

     

    लावण्या की आंखें नम हो गईं।”आप बहुत अच्छे इंसान हैं।”

     

    लविश हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “बस इतना ही काफी है।”

    लावण्या चली गई।

    दरवाजा बंद होते ही लविश कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

     

    उसकी आंखों में दर्द था, लेकिन चेहरे पर सुकून।

     

    उसने अपनी मोहब्बत को पाने की कोशिश नहीं की थी।

    उसने उसे आजाद छोड़ दिया था।

    क्योंकि लविश समझ चुका था कि सच्ची मोहब्बत हमेशा साथ रहने का नाम नहीं होती।

     

    कभी-कभी किसी की खुशी के लिए पीछे हट जाना भी मोहब्बत होती है।

    और लावण्या?

    वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ती रही।

    शायद उसे कभी पता नहीं चला कि एक चालीस साल का बिजनेसमैन उसे कितनी गहराई से चाहता था।

     

    लेकिन अगर कभी उसे यह बात पता भी चलती, तो शायद वह यही कहती

    “लविश ने मुझे पाया नहीं था, लेकिन उसने मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचने से कभी रोका भी नहीं।”

    और शायद यही उसकी एकतरफा मोहब्बत की सबसे खूबसूरत बात थी।

  • सावन

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    🌧️ सावन 🌿

    सावन आया, बदली छाई,

    मिट्टी ने फिर खुशबू पाई।

    बूंदों ने जब गीत सुनाया,

    मन ने भी कुछ याद किया।

    पेड़ों पर झूले, होंठों पर गान,

    हर ओर बिखरा प्रेम का अरमान।

    ठंडी हवा जब छूकर जाए,

    सावन दिल को फिर महकाए। ❤️

  • दोस्ती….

    दोस्ती….

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

     

    “तू सच में जा रही है?”

     

    नैना ने सामने खड़ी रिया को देखते हुए पूछा।

     

    रिया ने मुस्कुराकर अपना बैग कंधे पर डाला। “हाँ यार… जाना तो पड़ेगा।”

     

    “लेकिन तूने कहा था कि तू कहीं नहीं जाएगी।”

     

    “कहा था… पर जिंदगी में सब कुछ हमारे हिसाब से थोड़ी होता है।”

     

    नैना कुछ नहीं बोली। दोनों कुछ देर चुपचाप एक-दूसरे को देखती रहीं।

     

    पिछले आठ सालों से दोनों साथ थीं। स्कूल में एक ही बेंच पर बैठना, कॉलेज में साथ जाना, एक-दूसरे के घर बिना बताए जब दिल चाहे पहुँच जाना… सब कुछ जैसे रोज़ की बात थी।

     

    लेकिन आज पहली बार उन्हें लग रहा था कि शायद उनकी दोस्ती में दूरी आने वाली है। रिया के पापा का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया था। पूरा परिवार अगले हफ्ते दिल्ली छोड़कर जयपुर जाने वाला था।

     

    “तू मुझे भूल तो नहीं जाएगी?” नैना ने अचानक पूछा।

     

    रिया हँस पड़ी। “पागल है क्या? दोस्ती कोई जगह बदलने से खत्म होती है?”

     

    “पता नहीं… लोग बदल जाते हैं।”

     

    रिया ने नैना का हाथ पकड़ लिया। “लोग बदल सकते हैं, लेकिन हमारी दोस्ती नहीं बदलेगी।”

     

    नैना ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें भर आईं। “पक्का?”

     

    “एकदम पक्का।”

     

    दोनों ने हाथ मिलाया। “बेस्ट फ्रेंड्स?”

     

    “forever।”

     

    —

     

    अगले हफ्ते रिया चली गई, लेकिन रिया के जाने के बाद नैना का मन बिल्कुल नहीं लगा। पहले हर शाम रिया का फोन आ जाता था।

    “चल बाहर चलते हैं।”

     

    “चाय पीने चल।”

     

    “आज गोलगप्पे खाने हैं।”

     

    “चल मेरे घर, मम्मी ने पकौड़े बनाए हैं।”

     

    अब शाम को फोन नहीं आता था। नैना कई बार अपना फोन उठाकर रिया को कॉल करने का सोचती, फिर खुद ही रख देती। उसे लगता, शायद रिया नए शहर में व्यस्त होगी। एक दिन उसने रिया को फोन किया।

     

    “हेलो?” दूसरी तरफ से रिया की आवाज़ आई। “नैना!”

     

    आवाज़ सुनते ही नैना के चेहरे पर मुस्कान आ गई। “कैसी है?”

     

    “ठीक हूँ। तू बता?”

     

    “मैं भी ठीक हूँ।”

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    नैना चौंक गई। “तुझे कैसे पता?”

     

    “तेरी आवाज़ से।”

     

    नैना हँस दी। “तू अभी भी मुझे पहचान लेती है?”

     

    “पागल, तू मेरी दोस्त है। तेरी आवाज़ भी पहचानूँगी और तेरी चुप्पी भी।”

     

    कुछ देर दोनों बातें करती रहीं। उस दिन नैना को समझ आया कि दोस्ती सिर्फ साथ बैठने का नाम नहीं है। दोस्ती वो है जहाँ दूर रहकर भी सामने वाले की आवाज़ से पता चल जाए कि उसके दिल में क्या चल रहा है।

     

    —

     

    समय बीतता गया ,दोनों की पढ़ाई खत्म हुई। रिया ने नौकरी शुरू कर दी और नैना ने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। अब दोनों की बातें पहले से कम हो गई थीं। कभी दो दिन बाद फोन होता, कभी हफ्ते भर बाद। लेकिन जब भी बात होती, ऐसा लगता जैसे कल ही तो मिले थे।

     

    एक रात नैना का फोन बजा। रिया का कॉल था। 

    “हेलो?”

     

    दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    “रिया?” 

     

    फिर धीमी आवाज़ सुनाई दी। “नैना… मुझे तुझसे बात करनी है।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मेरी नौकरी चली गई।”

     

    नैना कुछ सेकंड चुप रही। “तो?”

     

    “तो क्या?”

     

    “तो नौकरी चली गई। तू थोड़ी चली गई है।”

     

    रिया चुप रही।

     

    नैना ने कहा, “तू परेशान मत हो। दूसरी नौकरी मिल जाएगी।”

     

    “लेकिन यहाँ किराया, घर का खर्च… सब है। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।” परेशान सी रिया ने कहा। 

     

    नैना, “तू मेरे पास आ जा।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    “हाँ। कुछ दिन मेरे साथ रह। नौकरी ढूँढ। जब तक काम नहीं मिलता, हम दोनों मिलकर संभाल लेंगे।”

     

    रिया की आवाज़ भर्रा गई। “तू सच बोल रही है?”

     

    “नहीं, मज़ाक कर रही हूँ। इतनी रात को तुझे बुलाकर चाय पिलाऊँगी।” नैना ने कहा। 

     

    दोनों हँस पड़ीं। लेकिन नैना जानती थी कि रिया सच में बहुत परेशान है। अगले ही दिन उसने अपने स्कूल की प्रिंसिपल से बात की। स्कूल में एक खाली पोस्ट थी।

     

    नैना ने रिया का रिज़्यूमे दिया। कुछ दिनों बाद रिया को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।

    और फिर… उसे नौकरी मिल गई। रिया ने सबसे पहले नैना को फोन किया। “नैना!”

     

    नैना, “क्या हुआ?”

     

    रिया, “मेरी नौकरी लग गई!”

     

    नैना खुशी से चिल्ला पड़ी। “सच?”

     

    रिया, “हाँ!”

     

    नैना, “मैंने कहा था ना, सब ठीक हो जाएगा।”

     

    रिया, “लेकिन ये तेरी वजह से हुआ है।”

     

    नैना, “नहीं। तेरी मेहनत की वजह से हुआ है।”

     

    रिया, “फिर भी… अगर तू नहीं होती ना, तो शायद मैं हार जाती।”

     

    नैना कुछ नहीं बोली। बस मुस्कुरा दी।

     

    —

     

    करीब दो साल बाद नैना की शादी तय हो गई।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। घर में हर तरफ खुशी का माहौल था। लेकिन नैना के मन में एक चिंता थी। “रिया आ पाएगी ना?”

     

    उसने माँ से पूछा। उन्होंने कहा, “क्यों नहीं आएगी?”

     

    नैना उदास होते हुए बोली, “उसकी नौकरी है।”

     

    उसकी मां बोली, “तू उसे बुला लेना।”

     

    “बुलाऊँगी नहीं… लेकर आऊँगी।”

     

    शादी से तीन दिन पहले रिया सच में दिल्ली पहुँच गई। हाथ में बड़ा सा बैग और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान। नैना उसे देखते ही दौड़कर उससे गले लग गई। “तू आ गई!”

     

    “हाँ मैडम, तेरी शादी है। कैसे नहीं आती?”

     

    “मुझे लगा था तू नहीं आ पाएगी।”

     

    “पागल है? तेरी शादी है। मेरी छुट्टी नहीं मिली तो नौकरी छोड़ देती।”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा। “ऐसा मत बोलना।”

     

    रिया हँसते हुए बोली, “चल अब रोना बंद कर। बहुत काम पड़ा है।”

     

    और फिर दोनों उसी तरह शादी की तैयारियों में लग गईं जैसे पिछले कई सालों की दूरी के बीच कुछ हुआ ही न हो।

     

    मेहंदी की रात दोनों छत पर बैठी थीं। नैना ने धीरे से पूछा,

    “रिया?”

     

    रिया, “हम्म?”

     

    नैना, “तुझे कभी लगा कि हमारी दोस्ती खत्म हो जाएगी?”

     

    रिया ने कुछ पल सोचा। “शुरू में लगा था।”

     

    नैना उसकी तरफ देखते हुए बोली, “फिर?”

     

    “फिर समझ आया कि सच्ची दोस्ती में रोज़ बात करना जरूरी नहीं होता।”

     

    नैना उसकी तरफ देखने लगी।

     

    रिया बोली, “कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें दूरी आ सकती है, लेकिन दिलों के बीच दूरी नहीं आती।”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए। “तू बहुत अच्छी बातें करने लगी है।”

     

    “हाँ, क्योंकि अब मैं बड़ी हो गई हूँ।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    दोनों हँस पड़ीं।

     

    —

     

    शादी के बाद नैना अपनी नई जिंदगी में व्यस्त हो गई।

     

    रिया भी अपनी नौकरी में। लेकिन उनकी दोस्ती वैसी ही रही, कभी फोन पर लड़ाई, कभी बिना वजह हँसी, कभी एक-दूसरे से शिकायत और कभी बस चुपचाप फोन पर बने रहना।

     

    एक दिन नैना बहुत परेशान थी। उसने रिया को फोन नहीं किया। लेकिन कुछ देर बाद रिया का फोन आ गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर झूठ क्यों बोल रही है?”

     

    नैना चुप रही।

     

    रिया ने कहा, “देख, अगर बात नहीं करनी तो मत कर। लेकिन अकेले मत रहना, मैं फोन पर हूँ।”

     

    नैना की आँखों से आँसू निकल आए। उसे उस पल समझ आया कि जिंदगी में कितने भी लोग क्यों न आएँ, कुछ दोस्त ऐसे होते हैं जो सिर्फ दोस्त नहीं रहते।

     

    वे परिवार बन जाते हैं। उनके साथ खून का रिश्ता नहीं होता, फिर भी वे अपने लगते हैं। उनसे रोज़ मिलना जरूरी नहीं होता हर दिन बात करना जरूरी नहीं होता।

     

    बस इतना पता होना काफी होता है कि अगर दुनिया तुम्हारे खिलाफ खड़ी हो जाए, तो एक इंसान ऐसा है जो तुम्हारे साथ खड़ा रहेगा।

     

    नैना ने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “रिया?”

     

    “हाँ?”

     

    “थैंक यू।”

     

    “किसलिए?”

     

    “मेरी दोस्त होने के लिए।”

     

    रिया कुछ सेकंड चुप रही, फिर बोली, “पागल… दोस्ती में थैंक यू नहीं बोलते।”

     

    नैना हँस पड़ी। “तो क्या बोलते हैं?”

     

    “बस इतना कहते हैं…”

     

    “क्या?”

     

    “चल, चाय पीने चलते हैं।”

     

    नैना खिलखिलाकर हँस दी।

     

    दो शहरों में रहने वाली दो सहेलियाँ फिर से फोन पर चाय पीने का प्लान बनाने लगीं। क्योंकि कुछ दोस्तियाँ दूरी से नहीं टूटतीं।

     

    बल्कि दूरी उन्हें और मजबूत कर देती है। क्योंकि सच्ची दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं… साथ निभाने का नाम है।

  • 😱शिनिगामी 😱 (मौत का संदेशवाहक)😱

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    मंदिर की दीवार पर लिखे शब्दों को देखकर हारुतो की साँस रुक गई।

     

    “हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

     

    उसके सामने खड़ा शिनिगामी बिल्कुल स्थिर था।

     

    उसका चेहरा इंसान जैसा था, लेकिन उस चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

     

    फिर भी हारुतो को महसूस हो रहा था कि वह उसे देख रहा है।

     

    बहुत देर तक मंदिर में कोई आवाज़ नहीं हुई।

     

    अचानक शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली सीधे हारुतो की तरफ थी।

     

    “तुम्हारे पूर्वजों ने मुझे जन्म दिया था।”

     

    उसकी आवाज़ इंसान की आवाज़ नहीं थी।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कई बूढ़े लोग एक साथ बोल रहे हों।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    “मैंने क्या किया है?”

     

    शिनिगामी ने उत्तर दिया,

     

    “तुमने कुछ नहीं किया।”

     

    कुछ पल की खामोशी।

     

    “लेकिन तुम्हारे खून ने बहुत कुछ किया है।”

     

    हारुतो के पिता आगे आए।

     

    “उसे छोड़ दो!”

     

    शिनिगामी ने अपना सिर पिता की तरफ घुमाया।

     

    “तुम पहले ही मर चुके हो।”

     

    पिता ने कहा,

     

    “लेकिन मैं उसका पिता हूँ।”

     

    शिनिगामी हँसा।

     

    “मृत लोग पिता नहीं होते।”

     

    अचानक उसके हाथ में पकड़ी घंटी बज उठी।

     

    टन…

     

    पिता जमीन पर गिर पड़े।

     

    हारुतो चीख पड़ा।

     

    “पापा!”

     

    उसने उन्हें उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उनके शरीर से धुआँ निकल रहा था।

     

    पिता ने कमजोर आवाज़ में कहा,

     

    “हारुतो… मंदिर के पीछे वाला दरवाज़ा…”

     

    “क्या?”

     

    “वहीं से सब शुरू हुआ था।”

     

    शिनिगामी उनकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    पिता ने आखिरी बार कहा,

     

    “अपनी दादी को ढूँढो।”

     

    हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

     

    “दादी तो—”

     

    “वह अभी जिंदा है।”

     

    अगले ही पल पिता का शरीर राख में बदल गया।

     

    हारुतो चीख उठा।

     

    लेकिन शिनिगामी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब केवल तुम बचे हो।”

     

    हारुतो मंदिर के पीछे बने लकड़ी के दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    नीचे जाने वाली पत्थर की सीढ़ियाँ थीं।

     

    वह तेजी से नीचे उतरने लगा।

     

    सीढ़ियाँ इतनी लंबी थीं कि उसे लग रहा था जैसे वह जमीन के अंदर नहीं, बल्कि किसी दूसरी दुनिया में जा रहा हो।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।

     

    एक चित्र में गाँव के लोग एक काले कपड़े पहने आदमी के सामने खड़े थे।

     

    दूसरे चित्र में वही आदमी एक घंटी पकड़े हुए था।

     

    तीसरे चित्र में…

     

    एक बच्चा था।

     

    उस बच्चे के सामने वही शिनिगामी खड़ा था।

     

    हारुतो रुक गया।

     

    चित्र के नीचे पुराने जापानी अक्षरों में कुछ लिखा था।

     

    वह उसे पूरी तरह पढ़ नहीं पा रहा था, लेकिन एक शब्द पहचान गया।

     

    “कुरोमोरी।”

     

    तभी पीछे से कदमों की आवाज़ आई।

     

    हारुतो ने पीछे देखा।

     

    सीढ़ियों के ऊपर कोई खड़ा था।

     

    उसकी दादी।

     

    “हारुतो…”

     

    हारुतो दौड़कर उनके पास गया।

     

    “दादी!”

     

    दादी ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “सच क्या है?”

     

    दादी कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “आज तुम्हें सब जानना होगा।”

     

    वे उसे एक विशाल भूमिगत कमरे में ले गईं।

     

    कमरे के बीचों-बीच पत्थर की एक वेदी थी।

     

    उसके ऊपर वही लोहे की घंटी रखी थी।

     

    दादी ने कहा,

     

    “सौ साल पहले तुम्हारे परदादा ने मौत से बात करने की कोशिश की थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “तुम्हारी परदादी मर रही थीं।”

     

    हारुतो चुप रहा।

     

    “उन्होंने एक पुरानी किताब में एक अनुष्ठान पढ़ा। उस अनुष्ठान के जरिए उन्होंने मृत्यु को रोकने की कोशिश की।”

     

    “और शिनिगामी पैदा हुआ?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। शिनिगामी पहले से था।”

     

    उन्होंने घंटी की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे परदादा ने उसे इंसानों की दुनिया में बुलाया।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “शुरुआत में शिनिगामी ने सौदा किया।”

     

    “कैसा सौदा?”

     

    “वह एक इंसान की जान बचाएगा… बदले में हर पचास साल में उसी परिवार की एक आत्मा उसे देनी होगी।”

     

    हारुतो के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “और अगर परिवार ने मना किया?”

     

    दादी ने कहा,

     

    “तो वह पूरे गाँव की मौत चुनता।”

     

    हारुतो ने चारों तरफ देखा।

     

    “इसलिए गाँव के लोग उसे नहीं रोकते थे?”

     

    “वे डरते थे।”

     

    अचानक कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    हारुतो…

     

    हारुतो…

     

    हारुतो…

     

    दादी ने जल्दी से वेदी के नीचे से एक पुरानी किताब निकाली।

     

    “लेकिन तुम्हारे परदादा ने एक और गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    दादी ने किताब खोली।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस दिन परिवार का अंतिम वंशज जन्म लेगा, उसी दिन शिनिगामी की शक्ति समाप्त की जा सकती है।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “अंतिम वंशज मैं हूँ?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    दादी ने घंटी की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे बजाना होगा।”

     

    हारुतो ने घंटी उठाई।

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    दादी की आँखों में डर था।

     

    “घंटी तभी काम करेगी जब उसे शिनिगामी के सामने बजाया जाए।”

     

    “और फिर?”

     

    “जिस व्यक्ति ने घंटी बजाई… उसे अपनी सबसे प्यारी याद हमेशा के लिए खोनी होगी।”

     

    हारुतो ने किताब नीचे रख दी।

     

    “कौन-सी याद?”

     

    दादी ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई।

     

    “तुम्हारी माँ की।”

     

    हारुतो पलट गया।

     

    शिनिगामी कमरे के प्रवेश द्वार पर खड़ा था।

     

    उसके पीछे अंधेरा फैलता जा रहा था।

     

    दादी ने हारुतो को अपने पीछे कर लिया।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    दादी हवा में उठ गईं।

     

    हारुतो चीख पड़ा।

     

    “दादी!”

     

    शिनिगामी ने कहा,

     

    “तुम्हारे परिवार ने मुझे जन्म दिया।”

     

    फिर उसने दादी को जमीन पर फेंक दिया।

     

    “अब तुम्हारे परिवार का अंत होगा।”

     

    हारुतो ने घंटी उठाई।

     

    शिनिगामी उसकी तरफ बढ़ने लगा।

     

    हर कदम के साथ जमीन काँप रही थी।

     

    हारुतो पीछे हटता गया।

     

    उसके दिमाग में माँ की यादें घूमने लगीं।

     

    माँ का चेहरा।

     

    माँ की हँसी।

     

    बचपन में उसका हाथ पकड़कर चलना।

     

    बारिश में उसके लिए छाता लेकर आना।

     

    और आखिरी दिन…

     

    जब माँ ने मरने से पहले उससे कहा था—

     

    “डरना मत।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    शिनिगामी उसके सामने आ चुका था।

     

    “घंटी बजाओ।”

     

    हारुतो ने उसे देखा।

     

    “अगर मैं बजाऊँगा तो?”

     

    “तुम अपनी माँ को हमेशा के लिए भूल जाओगे।”

     

    हारुतो काँपने लगा।

     

    “और अगर नहीं बजाया?”

     

    शिनिगामी मुस्कुराया।

     

    “तो तुम्हारी दादी मरेंगी।”

     

    हारुतो ने दादी की तरफ देखा।

     

    वह जमीन पर पड़ी थीं।

     

    बहुत कमजोर।

     

    लेकिन उन्होंने आँखें खोलकर कहा,

     

    “बजा दो।”

     

    “दादी…”

     

    “तुम्हारी माँ ने भी यही चाहा होता।”

     

    हारुतो ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने घंटी उठाई।

     

    और पूरी ताकत से बजा दी।

     

    टन————————!

     

    आवाज़ पूरे भूमिगत कमरे में गूँज उठी।

     

    शिनिगामी पीछे हट गया।

     

    उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    उसका चेहरा फटने लगा।

     

    और पहली बार…

     

    उसके चेहरे पर आँखें दिखाई दीं।

     

    सैकड़ों आँखें।

     

    हर आँख में किसी मरे हुए इंसान का चेहरा था।

     

    शिनिगामी चीखने लगा।

     

    “नहीं!!!”

     

    हारुतो ने दूसरी बार घंटी बजाई।

     

    टन————————!

     

    पूरा मंदिर काँपने लगा।

     

    ऊपर गाँव के घरों की खिड़कियाँ टूटने लगीं।

     

    जंगल के पेड़ एक साथ झुक गए।

     

    और फिर तीसरी बार…

     

    हारुतो ने घंटी बजाई।

     

    टन————————!

     

    अचानक सब कुछ शांत हो गया।

     

    शिनिगामी गायब था।

     

    कमरे में सिर्फ हारुतो और उसकी दादी थे।

     

    दादी धीरे-धीरे उठीं।

     

    “खत्म हो गया।”

     

    हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

     

    “सच में?”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “हाँ।”

     

    हारुतो ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल उसने पूछा,

     

    “दादी… मेरी माँ कौन थी?”

     

    दादी का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    हारुतो ने फिर पूछा,

     

    “मेरी माँ कौन थी?”

     

    दादी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    हारुतो अपनी माँ को पूरी तरह भूल चुका था।

     

    उसके चेहरे की कोई तस्वीर उसे याद नहीं थी।

     

    उसकी आवाज़…

     

    उसकी हँसी…

     

    कुछ भी नहीं।

     

    वह रोने लगा।

     

    दादी ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम्हारी माँ बहुत अच्छी औरत थी।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “क्या वह मुझसे प्यार करती थी?”

     

    दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बहुत ज्यादा।”

     

    सुबह होने लगी।

     

    कुरोमोरी के ऊपर पहली बार कई वर्षों बाद साफ सूरज निकला।

     

    जंगल की धुंध गायब हो गई।

     

    गाँव के लोग अपने घरों से बाहर आने लगे।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन उसी शाम…

     

    हारुतो अपने घर में अकेला बैठा था।

     

    उसने पुराने सामान की एक पेटी खोली।

     

    अंदर उसकी माँ की एक तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर उठाई।

     

    वह तस्वीर में मौजूद औरत को देख रहा था।

     

    लेकिन उसके दिल में कोई पहचान नहीं थी।

     

    बस एक अजीब-सी खाली जगह थी।

     

    तभी…

     

    तस्वीर के पीछे कुछ गिरा।

     

    एक छोटी लोहे की घंटी।

     

    हारुतो ने उसे उठाया।

     

    उस पर खून से एक शब्द लिखा था—

     

    “समाप्त नहीं।”

     

    हारुतो के हाथ से घंटी गिर गई।

     

    उसी समय बाहर जंगल से…

     

    टन…

     

    एक घंटी बजी।

     

    हारुतो खिड़की की तरफ मुड़ा।

     

    जंगल के बीच एक काली आकृति खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह शिनिगामी नहीं था।

     

    वह उसकी माँ थी।

     

    वह दूर से उसे देख रही थी।

     

    और उसके होंठों पर एक मुस्कान थी।

     

    हारुतो ने धीरे से खिड़की खोली।

     

    हवा के साथ उसकी माँ की आवाज़ आई—

     

    “बेटा… तुमने मुझे याद तो नहीं रखा… लेकिन मैंने तुम्हें कभी नहीं भुलाया।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    और जंगल के भीतर वह आकृति धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गई।

     

    उस रात के बाद कुरोमोरी में कभी शिनिगामी की घंटी नहीं बजी।

     

    लेकिन गाँव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं—

     

    अगर किसी रात जापान के किसी सुनसान जंगल में आपको आधी रात को घंटी की आवाज़ सुनाई दे…

     

    तो पीछे मुड़कर मत देखना।

     

    क्योंकि हो सकता है…

     

    मौत आपको बुला नहीं रही हो।

     

    हो सकता है…

     

    वह सिर्फ यह देख रही हो कि आपको अब भी कौन याद है।

     

    समाप्त।

  • 😱 शिनिगामी 😱( मौत का संदेशवाहक)😱

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    “हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

     

    तहखाने में खड़ा हारुतो पत्थर की तरह जम गया।

     

    ऊपर से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    धीरे-धीरे वे कदम सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगे।

     

    हारुतो ने अपनी साँस रोक ली।

     

    उसे दादी की बात याद आई—

     

    “जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन तभी ऊपर से उसके पिता की आवाज़ आई।

     

    “हारुतो?”

     

    वह आवाज़ बिल्कुल वैसी ही थी।

     

    गहरी।

     

    शांत।

     

    जैसी आवाज़ वह बचपन से सुनता आया था।

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “पापा…?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ सेकंड बाद आवाज़ फिर आई।

     

    “बेटा, बाहर आओ।”

     

    हारुतो ने तहखाने के दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।

     

    तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।

     

    उसके पिता हमेशा उसे “हारु” कहकर बुलाते थे।

     

    कभी “हारुतो” नहीं।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह दरवाज़े से कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    फिर ऊपर से उसकी दादी की चीख सुनाई दी।

     

    “हारुतो! दरवाज़ा मत खोलना!”

     

    और उसके तुरंत बाद…

     

    एक भारी आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    हारुतो ने काँपते हाथों से दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

     

    उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।

     

    ऊपर का कमरा खाली था।

     

    लालटेन टूटी हुई थी।

     

    फर्श पर दादी की चादर पड़ी थी।

     

    लेकिन दादी कहीं नहीं थीं।

     

    हारुतो ने उन्हें पुकारा।

     

    “दादी?”

     

    कोई उत्तर नहीं।

     

    तभी उसे फर्श पर कुछ दिखाई दिया।

     

    काले रंग की मिट्टी से बने पैरों के निशान।

     

    वे दरवाज़े से शुरू होकर घर के पीछे वाले कमरे तक जा रहे थे।

     

    हारुतो उनके पीछे चल पड़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    अंदर से सड़ी हुई गंध आ रही थी।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    और जो उसने देखा, उसे देखकर उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    कमरे की दीवार पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    गाँव के लोगों की तस्वीरें।

     

    बच्चे।

     

    बूढ़े।

     

    औरतें।

     

    पुरुष।

     

    हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    कुछ तारीखें बहुत पुरानी थीं।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि कई तस्वीरों में लोगों के चेहरों पर लाल निशान बने थे।

     

    हारुतो ने एक तस्वीर उठाई।

     

    वह उसकी माँ की थी।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    12 अक्टूबर 2006

     

    और उसके नीचे एक शब्द था—

     

    “मृत।”

     

    हारुतो का गला सूख गया।

     

    उसकी माँ की मृत्यु भी 12 अक्टूबर 2006 को हुई थी।

     

    उसने अगली तस्वीर उठाई।

     

    उसके पिता की तस्वीर थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “मृत — 3 अगस्त 2014।”

     

    हारुतो के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    उसका पिता जिंदा था।

     

    कम से कम वह यही सोचता आया था।

     

    उसके पिता पिछले बारह वर्षों से शहर में काम कर रहे थे।

     

    हर महीने पैसे भेजते थे।

     

    हर कुछ दिनों में फोन करते थे।

     

    लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

     

    पिछले तीन महीनों से उसके पिता ने उसे फोन नहीं किया था।

     

    उन्होंने सिर्फ संदेश भेजे थे।

     

    छोटे-छोटे संदेश।

     

    “मैं ठीक हूँ।”

     

    “जल्द घर आऊँगा।”

     

    “दरवाज़ा रात में मत खोलना।”

     

    हारुतो के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी कमरे के कोने से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    हारुतो धीरे से मुड़ा।

     

    वहाँ एक छोटी लड़की बैठी थी।

     

    उसके बाल उसके पूरे चेहरे को ढके हुए थे।

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो काले खाली गड्ढे।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे भी यही सवाल पूछा था।”

     

    अचानक कमरे की सारी तस्वीरें अपने-आप हिलने लगीं।

     

    फिर एक साथ गिरने लगीं।

     

    धड़… धड़… धड़…

     

    लड़की गायब हो गई।

     

    हारुतो कमरे से भागकर बाहर आया।

     

    घर का मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    बाहर बारिश रुक चुकी थी।

     

    लेकिन जंगल की तरफ से धुंध गाँव में उतर रही थी।

     

    और उस धुंध के भीतर…

     

    एक आदमी खड़ा था।

     

    लंबा कोट।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    हाथ में पुरानी छतरी।

     

    हारुतो की आँखें फैल गईं।

     

    “पापा?”

     

    आदमी ने सिर उठाया।

     

    वह सचमुच उसका पिता था।

     

    हारुतो दौड़कर उसके पास गया।

     

    “पापा!”

     

    उसके पिता ने उसे गले लगा लिया।

     

    उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था।

     

    हारुतो काँप गया।

     

    “आप इतने साल कहाँ थे?”

     

    पिता ने कुछ नहीं कहा।

     

    हारुतो ने उनका चेहरा देखा।

     

    चेहरा वही था।

     

    लेकिन आँखें…

     

    उनमें कोई भाव नहीं था।

     

    “पापा?”

     

    पिता ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी दादी ने गलती की।”

     

    हारुतो ने घबराकर पूछा,

     

    “दादी कहाँ हैं?”

     

    पिता ने जंगल की तरफ देखा।

     

    “वह उसे रोकने गई है।”

     

    “किसे?”

     

    पिता ने उत्तर नहीं दिया।

     

    तभी जंगल के भीतर से घंटी बजी।

     

    टन…

     

    पिता का चेहरा बदल गया।

     

    “भागो।”

     

    “लेकिन—”

     

    “भागो!”

     

    उनकी आवाज़ अचानक इतनी तेज़ थी कि हारुतो पीछे हट गया।

     

    जंगल से कोई चीज़ उनकी तरफ आ रही थी।

     

    पेड़ों के बीच एक काली आकृति दिखाई दी।

     

    लंबे हाथ।

     

    झुका हुआ शरीर।

     

    और हाथ में वही लोहे की घंटी।

     

    शिनिगामी।

     

    हारुतो के पिता ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे, तो जवाब मत देना।”

     

    दोनों गाँव की तरफ भागने लगे।

     

    पीछे से घंटी लगातार बज रही थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    हर घंटी के साथ गाँव का एक घर अंधेरे में डूबता जा रहा था।

     

    पहले मंदिर की बत्तियाँ बुझीं।

     

    फिर स्कूल।

     

    फिर गाँव के घर।

     

    एक-एक करके पूरा गाँव अंधेरे में डूब गया।

     

    कुछ ही मिनटों में पूरा कुरोमोरी काली धुंध में घिर चुका था।

     

    पिता हारुतो को गाँव के पुराने मंदिर में ले गए।

     

    मंदिर का दरवाज़ा बंद करते हुए उन्होंने कहा,

     

    “यह जगह कुछ समय के लिए उसे रोक सकती है।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “आपको यह सब कैसे पता है?”

     

    पिता चुप रहे।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    पिता ने उसकी ओर देखा।

     

    “मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

     

    “नहीं!”

     

    हारुतो की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “मेरे पिता की मौत 2014 में हो चुकी थी।”

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर उसके पिता ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हें सच पता चल गया।”

     

    मंदिर के अंदर एक पुरानी घंटी लटकी थी।

     

    पिता ने उसे देखा।

     

    “बारह साल पहले मैं मर गया था।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “तो फिर आप…”

     

    “मैं यहाँ अपनी इच्छा से नहीं हूँ।”

     

    “कौन लाया आपको?”

     

    पिता ने धीमे स्वर में कहा,

     

    “शिनिगामी।”

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    “क्यों?”

     

    पिता ने मंदिर के फर्श पर बने एक पुराने निशान की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक गोल घेरा बना था।

     

    उसके चारों ओर जापानी अक्षरों जैसे चिन्ह खुदे थे।

     

    “हर पचास साल में शिनिगामी एक परिवार चुनता है।”

     

    “उस परिवार के किसी एक व्यक्ति को मृत्यु के बाद उसका सेवक बनना पड़ता है।”

     

    हारुतो ने डरते हुए पूछा,

     

    “और हमारा परिवार?”

     

    पिता ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “हमारा परिवार पिछले सौ साल से चुना जा रहा है।”

     

    तभी मंदिर के बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

     

    ठक…

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    फिर दूसरी दस्तक।

     

    ठक… ठक…

     

    पिता ने हारुतो के मुँह पर उंगली रख दी।

     

    बाहर से दादी की आवाज़ आई।

     

    “हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”

     

    हारुतो ने राहत की साँस ली।

     

    “दादी!”

     

    वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “वह दादी हैं!”

     

    पिता ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    बाहर से फिर आवाज़ आई।

     

    “हारुतो… मैं हूँ।”

     

    हारुतो दरवाज़े के पास गया और नीचे की दरार से बाहर देखने लगा।

     

    उसे दादी के पैर दिखाई दिए।

     

    वह वहीं खड़ी थीं।

     

    लेकिन…

     

    उनके पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    बाहर खड़ी चीज़ अचानक हँसने लगी।

     

    फिर दादी की आवाज़ बदल गई।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत कुछ बता दिया।”

     

    दरवाज़े पर एक लंबी काली उँगली दिखाई दी।

     

    “लेकिन एक बात नहीं बताई…”

     

    पिता का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    काली उँगली धीरे-धीरे दरवाज़े पर ऊपर की तरफ चलने लगी।

     

    “तुम्हारे परिवार को शिनिगामी ने क्यों चुना।”

     

    हारुतो ने पिता की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    पिता ने आँखें बंद कर लीं।

     

    बाहर से आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पूर्वजों ने…”

     

    एक लंबी खामोशी हुई।

     

    फिर दरवाज़े के पीछे से फुसफुसाहट आई—

     

    “पहले शिनिगामी को बनाया था।”

     

    मंदिर के अंदर अचानक सारी मोमबत्तियाँ जल उठीं।

     

    और सामने रखी बुद्ध की मूर्ति के पीछे…

     

    एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    हारुतो ने उसे पहले कभी नहीं देखा था।

     

    दरवाज़े पर खून से एक ही वाक्य लिखा था—

     

    “जिसने शिनिगामी को जन्म दिया, उसका अंतिम वंशज ही उसे खत्म कर सकता है।”

     

    हारुतो ने काँपते हुए पूछा,

     

    “अंतिम वंशज कौन है?”

     

    उसके पिता ने उसकी तरफ देखा।

     

    और पहली बार…

     

    उनकी आँखों में डर दिखाई दिया।

     

    “तुम।”

     

    उसी पल मंदिर की घंटी अपने-आप बज उठी।

     

    टन…

     

    और दूर जंगल से किसी ने चीखकर कहा—

     

    “हारुतो!!!”

     

    तीसरी घंटी बजते ही मंदिर की सारी खिड़कियाँ टूट गईं।

     

    काली धुंध अंदर भरने लगी।

     

    और उस धुंध के बीच…

     

    एक बहुत लंबी आकृति धीरे-धीरे मंदिर के अंदर प्रवेश कर गई।

     

    उसके चेहरे पर इस बार कोई आँखें नहीं थीं।

     

    लेकिन वह सीधे हारुतो को देख रही थी।

     

    शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    और उसकी हथेली पर एक नया नाम उभर आया—

     

    “हारुतो — मृत्यु: आज रात।”