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  • घुँघरुओं से सरहद तक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    अध्याय 2 — पहली टक्कर

    गोवा…

    समुद्र की लहरें बार-बार किनारे को छूकर लौट रही थीं। हवा में नमक की हल्की-सी खुशबू घुली थी। पूरे शहर में पर्यटकों की चहल-पहल थी।

    गोवा के सबसे प्रसिद्ध होटलों में से एक, सी ब्रीज़ ग्रैंड, आज कुछ ज़्यादा ही व्यस्त था।

    इसी होटल में दो अलग-अलग दुनिया ठहरने वाली थीं।

    इरा की एंट्री

    “वाह… गोवा सच में इतना खूबसूरत होता है?”

    बस से उतरते ही इरा ने मुस्कुराकर कहा।

    उसके साथ उसकी डांस टीम थी—रिया, निशा, काव्या और कोरियोग्राफर विकास सर।

    रिया ने मज़ाक में कहा, “मैडम, पहले होटल चलते हैं… फिर समुद्र से बातें कर लेना।”

    सब हँस पड़े।

    होटल के रिसेप्शन पर चेक-इन की प्रक्रिया पूरी हुई और सभी अपने-अपने कमरों की ओर बढ़ गए।

    शाम को रिहर्सल थी, इसलिए सबने जल्दी तैयार होने का फैसला किया।

    रुद्र की एंट्री

    उसी समय होटल के बाहर एक टैक्सी आकर रुकी।

    उसमें से पाँच लड़के उतरे।

    सबके कंधों पर बैग थे और चेहरों पर छुट्टियों की खुशी।

    उनमें सबसे आगे था…

    कैप्टन रुद्र।

    साथ में उसके दोस्त—कबीर, आर्यन, विवेक और समीर।

    कबीर ने हँसते हुए कहा, “कैप्टन साहब… यहाँ कोई मिशन नहीं है। थोड़ा मुस्कुरा भी लिया करो।”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “आर्मी ने छुट्टी दी है… अक्ल नहीं।”

    सब ज़ोर से हँस पड़े।

    रिसेप्शन पर औपचारिकताएँ पूरी हुईं और वे भी अपने कमरों की ओर बढ़ गए।

    पहली टक्कर

    करीब आधे घंटे बाद…

    इरा अपने कमरे से जल्दी-जल्दी बाहर निकली।

    रिहर्सल के लिए देर हो रही थी।

    उसके हाथ में मोबाइल, एक फाइल और पानी की बोतल थी।

    उसी समय दूसरी तरफ़ से रुद्र भी तेज़ कदमों से आ रहा था।

    वह अपने दोस्तों से बातें करते हुए मोबाइल देख रहा था।

    अचानक…

    धड़ाम!

    दोनों ज़ोर से टकरा गए।

    इरा के हाथ से फाइल और मोबाइल नीचे गिर गए।

    पानी की बोतल लुढ़कती हुई दूर चली गई।

    रुद्र भी एक कदम पीछे हट गया।

    एक पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

    इरा ने झुँझलाकर कहा, “देखकर नहीं चल सकते क्या?”

    रुद्र ने शांत स्वर में जवाब दिया, “सवाल मुझे भी यही पूछना चाहिए।”

    “मतलब गलती मेरी है?”

    “मैंने ऐसा कब कहा?”

    “तो घूर क्यों रहे हैं?”

    रुद्र ने गहरी साँस ली।

    “मैडम… पहले सामान उठा लीजिए। बहस बाद में कर लेंगे।”

    इरा को लगा जैसे वह उसका मज़ाक उड़ा रहा हो।

    “ज़रूरत नहीं है आपकी सलाह की।”

    वह नीचे झुककर सामान उठाने लगी।

    उसी समय रुद्र भी मोबाइल उठाने के लिए झुका।

    दोनों के हाथ एक साथ मोबाइल पर पहुँचे।

    इरा ने तुरंत मोबाइल खींच लिया।

    “थैंक यू… अब आप जा सकते हैं।”

    रुद्र ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आपका गुस्सा देखकर लग रहा है कि गोवा की गर्मी भी कम पड़ जाएगी।”

    “और आपको देखकर लग रहा है कि आपको दूसरों को परेशान करने की आदत है।”

    अब रुद्र भी थोड़ा चिढ़ गया।

    “अच्छा… तो सारी गलती मेरी ही है?”

    “बिल्कुल।”

    “ठीक है… फिर माफ़ कीजिएगा। अगली बार आपको देखकर पाँच मीटर पहले ही रास्ता बदल लूँगा।”

    इतना कहकर वह आगे बढ़ गया।

    इरा ने पीछे से धीरे से कहा,

    “घमंडी कहीं का…”

    रुद्र ने भी बिना पीछे देखे बुदबुदाया,

    “ड्रामा क्वीन…”

    दोनों अलग-अलग दिशाओं में चले गए।

    दूसरी मुलाकात

    शाम को इरा की टीम बीच पर रिहर्सल कर रही थी।

    संगीत बज रहा था।

    इरा पूरे ध्यान से स्टेप्स कर रही थी।

    उसी समय रुद्र और उसके दोस्त वहाँ घूमते हुए पहुँच गए।

    समीर ने कहा, “यार… कितना शानदार डांस है।”

    रुद्र ने एक नज़र इरा पर डाली।

    “अरे… ये तो वही होटल वाली मैडम हैं।”

    उधर इरा की नज़र भी रुद्र पर पड़ गई।

    उसने तुरंत नज़रें फेर लीं।

    रिया ने पूछा, “किसे देख रही हो?”

    “किसी घमंडी इंसान को।”

    उसी समय तेज़ हवा चली।

    रिहर्सल के लिए रखा एक हल्का-सा स्पीकर स्टैंड हिलने लगा।

    रुद्र ने दूर से देखा और तुरंत दौड़कर उसे पकड़ लिया, ताकि वह किसी पर न गिरे।

    इरा ने मुड़कर देखा।

    एक पल के लिए उसे लगा कि शायद उसने रुद्र को गलत समझा था…

    लेकिन अगले ही पल रुद्र ने मुस्कुराकर कहा,

    “इस बार भी अगर मैं न पकड़ता, तो शायद इसकी गलती भी मेरी ही होती।”

    इरा ने भौंहें चढ़ाईं।

    “आपको हर बात में मज़ाक करना ज़रूरी लगता है क्या?”

    “नहीं… लेकिन हर बात पर गुस्सा करना भी ज़रूरी नहीं होता।”

    दोनों फिर आमने-सामने खड़े थे।

    दोनों के दोस्त दूर खड़े यह सब देखकर मुस्कुरा रहे थे।

    उन्हें नहीं पता था…

    कि यही छोटी-छोटी नोकझोंक एक दिन ऐसी कहानी की शुरुआत बनेगी, जिसे न इरा भूल पाएगी, न रुद्र।

     

  • ” प्रेम : एक अधूरा अध्याय”

    ” प्रेम : एक अधूरा अध्याय”

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

                        “प्रेम : एक अधूरा अध्याय “  

    उसका नाम प्रेम था, हां मेरा वाला प्रेम, जो सिर्फ मेरा था, लोग कहते हैं अधूरा प्यार दर्द देता है, मैं हंसती थी उनकी बातों पर , जब तक प्रेम मुझे छोड़कर नहीं गया , 

    मेरी पहली मुलाकात उससे हमारी काॅलोनी के शर्मा जी के यहां हुई थी, वहां मैंने पहली दफा उसे देखा था, वैसे तो और लोग भी शामिल थे वहां क्योंकि शर्मा जी ने अपने घर में सत्यनारायण भगवान की पूजा रखवाई थी और हमें सपरिवार आमंत्रित किया गया था, मैं अपने परिवार के साथ उनके यहां सम्मिलित हुई थी, वहीं वो मुझे मिला, पता करने से पहले ही उसने हमारे बारे में जानकारी ली उनसे, बाद में हमें पता चला कि वो शर्मा जी के रिश्ते में दूर का भतीजा लगता है , पूजा करते वक्त भी किसी गैर की नजरें खुद पर महसूस करते हुए मैंने नज़रें उठाई तो वो मुझे ही देखता मिला, जिससे मैं असहज महसूस करते हुए अपनी आंखों को बंद करते हुए पूजा में ध्यान लगाने लगी, थोड़ी देर में पूजा समाप्त हो गई और प्रसाद लेकर हम-सब घर वापस आ गए, 

    वो मेरा ग्रेजुएशन का पहला साल था जिसकी वजह से मुझे खूब मेहनत करनी थी, मेरा पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगा रहता था, मोबाइल फोन मेरे लिए सपने जैसा था, क्योंकि पापा ने कहा था कि पहले रिजल्ट अच्छा लाओ फिर मोबाइल फोन मिलेगा, घर में मोबाइल फोन भी मम्मी-पापा के पास ही था, हमें अनुमति नहीं थी,जब तक हम काबिल नहीं हो जाते, एक कारण मेरी पढ़ाई का ये भी था क्योंकि स्कूल में अपने सहपाठियों के पास देखा करती थी उसके फंक्शन और सैल्फि का पागलपन जो धीरे-धीरे मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था, खैर यह सब सोचते हुए मैं अपनी पढ़ाई कर रही थी तभी शर्मा जी की बेटी ” स्वीटी” उस लड़के को लेकर मेरे पास आई और जियोग्राफी के प्रोजेक्ट्स के बारे में मुझसे जानकारी लेने लगी, वो मेरी ही क्लास में पढ़ती थी लेकिन ध्यान नहीं देती थी, मेरी भी पड़ोसी होने के नाते मैं उसे प्रोजेक्ट्स दे दिया करती थी, उस शाम वह उसे लेकर आई और उसका नाम ” प्रेम ” है कहकर संबोधित करते हुए बोली ये मेरे दूर के भाई हैं कुछ दिन हमारे साथ ही रहेंगे, ” मैंने हाथ जोड़कर अभिवादन किया वो मुस्कुरा कर बोले – “हम सब हमउम्र है तो हाय हेलो से काम चल सकता है ” मैं अपनी बेवकूफी पर मुस्कुराई और बैठने को बोलकर हम बातों में मशगूल हो गए, सच कहूं ! तो ये जिंदगी का पहला अनुभव था कि किसी अंजान शख्स के साथ मैं इतनी जल्दी घुल-मिल गयी और मुझे अच्छा भी लगा, ऐसे ही धीरे धीरे हम दोनों आप से तुम तक आ गये, प्रेम भी मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते थे और खुद आगे बढ़कर मेरे लिए कभी कभी कोई चाॅकलेट या टेडीबियर ले आते, मुझे यह सब अच्छा लगने लगा था, कि कोई ऐसा है जो मुझे एहमियत दे रहा है जो मुझे समझता है, पढ़ाई तो समझो जैसे भूल गयी मैं, वो रोज शाम को घर आते, मम्मी-पापा भी घुल मिल गए थे तो कोई दिक्कत नहीं थी, एक दिन ऐसे ही ये मुझे बाज़ार ले गए और एक कैफे में काॅफी पीते हुए प्रेम बोले – स्मृति देखो मैं जानता हूं ये बात तुम्हारे लिए अजीब सी है , लेकिन मैं अब अपने दिल की बात कहे बिना नहीं रह सकता, मैं सतर्क हो गई कि ये किस विषय में बात कर रहे हैं? , उन्होंने हिम्मत करके अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले -” स्मृति! मैं तुमसे प्यार करता हूं, मैं नहीं जानता कबसे, लेकिन ये सच है मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो, तुम्हारी बातें, तुम्हारी ये मुस्कान, तुम्हारी ये प्यारी आंखें, मुझे तुम्हारी तरफ खिंचती है, मैं चाहकर भी तुम्हें नजरंदाज नहीं कर सकता, प्लीज़ मुझे अपना लो, उनकी बातें मेरे दिल दिमाग में असर कर रही थी, सच्चाई तो यह है कि मैं भी उन्हें पसंद करने लगी थी, लेकिन कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी, जब उन्होंने अपने जज्बात को मेरे सामने रखा तो मैं कुछ पल सुन्न हो गई फिर हौले से उन्होंने हाथ को दबाया तो मैं अपने होशोहवास में आईं और मुस्कुरा कर कहा – “प्रेम सच तो यह है कि मैं भी आपसे प्यार करती हूं, लेकिन कहने की हिम्मत नहीं हुई कभी ” ये सुनकर वो हल्के से मुस्कुराए और मेरे हाथों को अपने लबों तक ले गए और उन्हें चूम लिया, सच कहो तो एक अजीब सी हलचल मच गई मेरे बदन में, मैंने अपने हाथ खींच लिये वो मुस्कुरा कर मुझे देखते रहे और हम बातें करते हुए सपनों की उड़ान भरने लगे, उस समय मुझे जरा भी पता नहीं था कि ये सब मेरे लिए एक सपने जैसा हो जाएगा, हमारी नजदीकिया बढ़ने लगी और वो मुझे कभी कभी स्वीटी के साथ सिनेमाहॉल भी ले जाते मेरे परिवार से पूछकर, ऐसे ही खुशनुमा मेरे दिन बीत रहे थे, एक शाम प्रेम आए और बोले -” मुझे किसी काम से घर जाना है,हमारी जमीनी कार्यवाही कोर्ट में चल रही है, जिसके लिए मुझे पापा के साथ रहकर सारे कागजात देखने पड़ सकते हैं,हो सकता है मुझे वापस आने में कुछ दिन लग जाए, उनकी बातें सुनकर मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे, उन्होंने प्यार से मेरा हाथ थामा और बोले -” स्मृति! तुमसे दूर रहकर मुझे भी अच्छा नहीं लगता लेकिन क्या करूं जाना जरूरी भी तो है, अगर तुम ऐसे रोओगी तो मैं कैसे जा पाऊंगा? प्लीज़ मुझे हंसते हंसते विदा करो, मैं वादा करता हूं जल्दी आने की कोशिश करुंगा, मैं भी उनकी बातों में आ गई और उन्हें मुस्कान बिखेरते हुए विदा किया, मेरा प्यार मेरा साथ मेरी आत्मा तक प्रेम अपने साथ ले गए थे,मेरा किसी चीज में मन नहीं लगता था, बहुत दिन हो गए और प्रेम वापस नहीं आये तो मैं स्वीटी के घर चली गई और बातों ही बातों में उनके बारे में पूछा, स्वीटी ने जो बताया उसे सुनकर मेरी आत्मा तक हिल गई, ऐसा कुछ मेरे साथ होगा 😔 मैंने सपने में भी नहीं सोचा था, उसने बताया कि प्रेम की बीवी प्रेगनेंट थी और उन्हें एक बेटा हुआ है, ये सुनते ही मेरे सपनों का संसार एक क्षण में धराशाई हो गया, प्रेम शादीशुदा थे यह मुझे पता नहीं था और ना ही कभी उन्होंने बताया, मैंने स्वीटी से भी कभी उनके जीवन के बारे में नहीं पूछा था तो किस मुंह से हमारे रिश्ते के बारे में उसे बताती, मैं बिखरी हुई सी किसी तरह अपने घर लौटी और कमरा बंद करके बिस्तर पर सिसकियां लेते हुए रोने लगी, ये कैसा प्यार था मेरा जो सपने सजाती आंखों से दिल में उतर गया और बेशुमार दर्द की अनुभूति दे गया, मैं शिकायत करूं भी तो किससे करुं, वो शख्स जो अजनबी बनकर मेरी जिंदगी में शामिल हुआ और दिल में घर कर गया था, मेरे हिस्से की आत्मा को घायल किया और चला गया, मेरा प्यार जिसे सबकुछ मान बैठी थी वहीं दगा दे गया, कड़वी सच्चाई को सामने रखा और प्रेम से मेरा भरोसा तोड़ दिया…

    ,

  • अंजानी चाहत

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अंजानी चाहत

     

    सुबह की पहली किरण जब खिड़की से छनकर कमरे में घुसी, तब अर्णव की आँखें खुल गईं। उसने बिस्तर पर करवट बदली और छत की ओर देखा। सपना अभी भी आँखों के सामने घूम रहा था—एक अजनबी चेहरा, एक मुस्कान, और एक आवाज़ जो उसके नाम को ऐसे पुकार रही थी जैसे वह सदियों से उसे जानती हो। अर्णव ने माथा सहलाया। पिछले कई महीनों से यही सपना बार-बार आ रहा था। कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता था, सिर्फ़ एक धुँधली सी आकृति, और एक तीव्र चाहत जो छाती में चुभती थी।

     

    अर्णव दिल्ली के एक साधारण से अपार्टमेंट में रहता था। वह एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर था, दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठा रहता, और रातें नींद की कमी से गुज़रतीं। उसकी ज़िंदगी में कुछ ख़ास नहीं था—न कोई गहरा रिश्ता, न कोई बड़ा सपना। सिर्फ़ एक अजीब सी ख़ालीपन, एक अनजानी चाहत जो कभी-कभी इतनी तेज़ हो जाती कि वह रात भर जागता रहता।

     

    उस दिन वह काम पर नहीं जा सका। मन बेचैन था। उसने कॉफ़ी बनाई, बालकनी में खड़ा होकर शहर को देखा। नीचे सड़क पर लोग भागते-दौड़ते दिख रहे थे, जैसे कोई मंज़िल हो उनके पास। अर्णव सोचने लगा—मेरी मंज़िल कहाँ है? क्या मैं किसी को खो चुका हूँ जिसे मैं जानता तक नहीं?

     

    शाम को उसने फैसला किया कि वह बाहर निकलेगा। पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमना उसे हमेशा शांत करता था। चाँदनी चौक की भीड़, मसाले की खुशबू, रिक्शों की घंटी—ये सब उसे ज़िंदा महसूस कराते थे। वह जामा मस्जिद के पास पहुँचा, सीढ़ियों पर बैठ गया। आसमान में सूरज डूब रहा था, आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी।

     

    वह सफ़ेद सलवार कमीज़ में थी, बाल खुले हुए, और हाथ में एक पुरानी किताब। वह सीढ़ियों के दूसरी तरफ़ बैठी थी, किताब में डूबी हुई। अर्णव की साँस रुक गई। वह चेहरा… सपने वाला चेहरा नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा था जो उसके अंदर की बेचैनी को और तेज़ कर गया। लड़की ने सिर उठाया, और उनकी नज़रें मिलीं। एक पल के लिए समय रुक गया। फिर उसने मुस्कुरा दिया—हल्की सी, शर्मीली सी मुस्कान।

     

    अर्णव ने हिम्मत जुटाई और पास गया। “माफ़ कीजिए… क्या आप यहाँ अकेली हैं?”

     

    लड़की ने किताब बंद की। “हाँ। मैं अक्सर यहाँ आती हूँ। शांति मिलती है।”

     

    “मेरा नाम अर्णव है।”

     

    “मैं दृष्टि।”

     

    दृष्टि। नाम सुनते ही अर्णव के मन में कुछ हिला। जैसे कोई पुरानी याद जाग उठी हो। उन्होंने बातचीत शुरू की। दृष्टि एक लाइब्रेरियन थी, पुरानी किताबों से प्यार करती थी। अर्णव ने बताया कि वह डिज़ाइनर है। बातें होती रहीं—किताबों की, शहर की, अकेलेपन की। सूरज डूब चुका था, लेकिन वे उठना नहीं चाहते थे।

     

    “क्या आपको कभी लगता है कि आप किसी को ढूँढ रहे हैं जिसे आपने कभी देखा ही नहीं?” अर्णव ने अचानक पूछ लिया।

     

    दृष्टि ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “हाँ… बहुत बार। जैसे कोई अधूरा सपना हो जो बार-बार याद आता है।”

     

    उस रात अर्णव घर लौटा तो नींद नहीं आई। दृष्टि का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। वह चाहत जो पहले धुँधली थी, अब साफ़ होने लगी थी। अगले दिन वह फिर उसी जगह गया। दृष्टि वहाँ थी। फिर अगले दिन भी। धीरे-धीरे उनकी मुलाक़ातें नियमित हो गईं। वे पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते, चाय पीते, किताबों की दुकानों में घंटों बिताते।

     

    एक शाम दृष्टि ने कहा, “अर्णव, मुझे लगता है मैं तुम्हें पहले से जानती हूँ। जैसे कोई पुरानी कहानी हो।”

     

    अर्णव की धड़कन तेज़ हो गई। “मुझे भी। मेरे सपनों में एक चेहरा आता है… और जब मैंने तुम्हें देखा, तो वह चाहत और तेज़ हो गई।”

     

    वे दोनों चुप हो गए। हवा में कोई अनकही बात तैर रही थी। दृष्टि ने अपना हाथ अर्णव के हाथ पर रखा। “शायद हमने पहले भी एक-दूसरे को खोया है।”

     

    उनकी दोस्ती प्यार में बदलने लगी। अर्णव पहली बार किसी के इतना क़रीब महसूस कर रहा था। दृष्टि की हँसी, उसकी बात करने का अंदाज़, यहाँ तक कि उसके बालों की खुशबू—सब कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। एक रात वे यमुना किनारे बैठे थे। चाँद चमक रहा था। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा।

     

    “दृष्टि… मैं तुमसे प्यार करता हूँ। लेकिन यह प्यार साधारण नहीं लगता। जैसे यह किसी और जन्म से चला आ रहा हो।”

     

    दृष्टि की आँखें नम हो गईं। “मैं भी… लेकिन मुझे डर लगता है। जैसे यह खुशी अस्थायी हो।”

     

    उसके बाद के दिन खुशियों भरे थे। वे साथ घूमते, फ़िल्में देखते, रात भर बातें करते। अर्णव का अकेलापन ख़त्म हो रहा था। लेकिन साथ ही एक अजीब सी बेचैनी भी बढ़ रही थी। उसके सपने और तीव्र हो गए थे। अब सपने में चेहरा साफ़ दिखने लगा था—दृष्टि का ही चेहरा, लेकिन पुराने ज़माने के कपड़ों में। एक महल, एक बगीचा, और फिर आग… चीखें… बिछड़ना।

     

    एक रात अर्णव चीखते हुए जागा। पसीने से लथपथ। उसने फ़ोन उठाया और दृष्टि को कॉल किया।

     

    “क्या हुआ?” दृष्टि की नींद भरी आवाज़ आई।

     

    “सपना… फिर से। तुम जल रही थी… मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    दृष्टि चुप रही। फिर धीरे से बोली, “अर्णव, मेरे भी ऐसे ही सपने आते हैं। मैंने कभी किसी को नहीं बताया। लगता है हम किसी पुरानी त्रासदी के हिस्से हैं।”

     

    अगले दिन वे मिले। दृष्टि ने एक पुरानी डायरी निकाली। “यह मेरी दादी की थी। उन्होंने कहा था कि हमारे परिवार में एक कहानी चलती आ रही है… दो प्रेमियों की, जो कभी मिल नहीं पाए। एक राजकुमारी और एक साधारण सिपाही। महल में आग लग गई थी, और वे दोनों मर गए। लेकिन कहा जाता है कि उनकी आत्माएँ अब भी एक-दूसरे को ढूँढती हैं।”

     

    अर्णव की साँस रुक गई। “क्या तुम सोचती हो… हम वही हैं?”

     

    दृष्टि ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। लेकिन जब मैं तुम्हें देखती हूँ, तो लगता है जैसे सदियों का इंतज़ार ख़त्म हो गया हो।”

     

    उनकी चाहत और गहरी हो गई। लेकिन साथ ही एक डर भी। जैसे किस्मत फिर से उन्हें अलग करने वाली हो। अर्णव ने दृष्टि से शादी का प्रस्ताव रखा। दृष्टि रो पड़ी, लेकिन हाँ कह दी।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। दोनों परिवार खुश थे। लेकिन अर्णव के अंदर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सपने अब सिर्फ़ रात को नहीं, दिन में भी आते थे। वह कभी-कभी दृष्टि को देखकर घबरा जाता—जैसे वह फिर से खो जाएगी।

     

    एक दिन, शादी से एक हफ़्ता पहले, अर्णव को एक पुराना पत्र मिला। कोई अनजान पता था। पत्र में लिखा था—

     

    “तुम फिर मिल गए हो। लेकिन इस बार भी समय कम है। आग फिर लगेगी। बचा लो उसे, वरना चाहत फिर अधूरी रह जाएगी।”

     

    अर्णव काँप उठा। उसने दृष्टि को बताया। दोनों डरे हुए थे, लेकिन उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। “हम इस बार नहीं हारेंगे,” दृष्टि ने कहा।

     

    शादी का दिन आ गया। मंडप सजा था, मेहमान आए थे। अर्णव और दृष्टि फेरे ले रहे थे। अचानक कहीं से धुआँ उठने लगा। किसी ने चीख दी—“आग!” तंबू में आग लग गई थी। लोग भागने लगे। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा और बाहर निकाला। लेकिन भीड़ में वे बिछड़ गए।

     

    अर्णव पागलों की तरह उसे ढूँढ रहा था। धुआँ चारों तरफ़ था। तभी उसने देखा—दृष्टि एक कोने में फँसी हुई थी, आग उसके क़रीब पहुँच रही थी। अर्णव बिना सोचे दौड़ा। उसने दृष्टि को गोद में उठाया और बाहर निकाला। दोनों सुरक्षित थे, लेकिन अर्णव के हाथ जल गए थे।

     

    हॉस्पिटल में दृष्टि उसके बिस्तर के पास बैठी थी। आँखों में आँसू। “तुमने मुझे बचा लिया… इस बार।”

     

    अर्णव मुस्कुराया, दर्द के बावजूद। “अब कोई आग हमें अलग नहीं कर सकती।”

     

    डॉक्टरों ने कहा कि जलन ठीक हो जाएगी। लेकिन उस रात अर्णव को फिर सपना आया। इस बार सपना अलग था। कोई आग नहीं थी। सिर्फ़ एक बगीचा, फूल, और दृष्टि मुस्कुरा रही थी। एक आवाज़ गूँजी—“अब तुम्हारी चाहत पूरी हो गई। इस जन्म में रहो, प्यार करो, और अगले जन्म की चिंता मत करो।”

     

    अर्णव जागा। कमरे में दृष्टि बैठी थी, उसका हाथ थामे हुए। “सपना अच्छा था?” उसने पूछा।

     

    अर्णव ने उसके हाथ को चूमा। “हाँ। अब कोई अनजानी चाहत नहीं रही। सब कुछ जाना-पहचाना है।”

     

    उसके बाद की ज़िंदगी शांत और खुशहाल रही। अर्णव और दृष्टि ने एक छोटा सा घर लिया, पुरानी दिल्ली के पास। वे किताबें पढ़ते, साथ चाय पीते, और कभी-कभी जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर शहर को देखते। अर्णव के हाथ के निशान रह गए, लेकिन वे निशान अब दर्द नहीं, बल्कि एक याद थे—कि इस बार उन्होंने भाग्य को हरा दिया था।

     

    साल बीतते गए। उनके बच्चे हुए। घर में हँसी-खुशी भरी रही। लेकिन कभी-कभी रात में, जब चाँद चमकता, तो अर्णव और दृष्टि एक-दूसरे की आँखों में देखते और मुस्कुरा देते। जैसे कोई पुरानी कहानी याद आ गई हो, जो अब पूरी हो चुकी थी।

     

    एक दिन, बहुत साल बाद, अर्णव बूढ़ा हो चुका था। वह बालकनी में बैठा था। दृष्टि उसके पास आई, सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    “अर्णव, क्या तुम्हें अब भी लगता है कि हम पहले मिले थे?”

     

    अर्णव ने उसकी तरफ़ देखा। आँखों में वही चमक थी जो पहली मुलाक़ात में थी। “हाँ। और मैं जानता हूँ कि हम फिर मिलेंगे। लेकिन इस बार, जब भी मिलें, कोई आग नहीं होगी। सिर्फ़ प्यार होगा।”

     

    दृष्टि मुस्कुराई। “अंजानी चाहत अब जानी-पहचानी हो गई है।”

     

    हवा में पुरानी खुशबू तैर रही थी—मसाले की, किताबों की, और एक प्यार की जो जन्मों से चला आ रहा था। अर्णव ने आँखें बंद कीं। उसके मन में अब कोई बेचैनी नहीं थी। सिर्फ़ एक शांति, एक पूर्णता।

     

    और कहीं दूर, स

    मय की धारा में, दो आत्माएँ मुस्कुरा रही थीं। क्योंकि उनकी अनजानी चाहत आख़िरकार पूरी हो गई थी।

     

  • 😱 Blood Raven -Part-3😱

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

    😱 ब्लड रैवन (Blood Raven)😱

    1. भाग–3 : रक्त का अंतिम श्राप😱

     

    भाग–3 : रक्त का अंतिम श्राप

     

    तीसरी रात…

     

    पूरा कालीघाट गाँव मौत की खामोशी में डूबा हुआ था।

     

    आसमान पर काले बादलों का साम्राज्य था। बिजली चमकती तो कुछ पल के लिए पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई देतीं, फिर सब कुछ फिर से अंधेरे में खो जाता।

     

    आरव पूरी रात जाग रहा था।

     

    उसकी मेज़ पर वही पुरानी तांत्रिक पुस्तक खुली हुई थी।

     

    उसकी नज़र बार-बार उस फटे हुए आख़िरी पन्ने पर जा रही थी।

     

    उसी समय दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन ज़मीन पर एक पुराना कपड़े का थैला रखा था।

     

    उसने थैला उठाकर खोला।

     

    अंदर वही फटा हुआ पन्ना रखा था जिसकी तलाश उसे थी।

     

    पन्ने के नीचे लाल स्याही से लिखा था—

     

    “यदि तुमने यह पढ़ लिया है… तो तुम्हारे पास केवल आज की रात बची है।”

     

    आरव ने काँपते हाथों से पन्ना खोला।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “रुद्रनाथ को कोई हथियार नहीं मार सकता। उसकी शक्ति उसके शरीर में नहीं, बल्कि उस पत्थर में कैद है जिस पर उसने पहला रक्त चढ़ाया था। यदि उस पत्थर को पवित्र अग्नि में भस्म कर दिया जाए, तो ब्लड रैवन भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।”

     

    नीचे एक नक्शा बना था।

     

    वह उसी प्राचीन मंदिर के पीछे छिपी गुफा की ओर इशारा कर रहा था।

     

    हरिदास ने पन्ना पढ़ा।

     

    उनकी आँखों में वर्षों बाद उम्मीद की हल्की-सी चमक दिखाई दी।

     

    “यही वह रहस्य है जिसे हमारे पूर्वजों ने छिपा दिया था।”

     

    लेकिन तभी…

     

    पूरा कमरा अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    एक काला पंख उड़ता हुआ भीतर आया।

     

    और हवा में एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “अब कोई मुझे नहीं रोक सकता…”

     

    आरव समझ गया…

     

    ब्लड रैवन सब जान चुका था।

     

    —

     

    आधी रात होने से पहले आरव, हरिदास और गाँव के पाँच साहसी युवक मशालें लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    आज जंगल पहले से भी ज़्यादा भयावह लग रहा था।

     

    हर पेड़ की डाल पर कौए बैठे थे।

     

    हज़ारों…

     

    शायद लाखों…

     

    लेकिन कोई आवाज़ नहीं।

     

    सिर्फ़ उनकी लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    जैसे ही दल मंदिर पहुँचा…

     

    सारे कौए एक साथ उड़ गए।

     

    उनके पंखों की आवाज़ से पूरा आकाश भर गया।

     

    “का…आ…आ…”

     

    ऐसा लगा जैसे पूरी धरती काँप उठी हो।

     

    मंदिर के पीछे पत्थरों के बीच एक संकरी गुफा थी।

     

    सब अंदर गए।

     

    गुफा की दीवारों पर पुराने संस्कृत मंत्र खुदे हुए थे।

     

    बीचों-बीच एक विशाल काला पत्थर रखा था।

     

    उस पर सूखे रक्त के निशान अब भी दिखाई दे रहे थे।

     

    हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “यही है श्राप का पत्थर…”

     

    लेकिन उसी क्षण गुफा के भीतर तेज़ हवा चली।

     

    सारी मशालें बुझ गईं।

     

    घना अंधेरा छा गया।

     

    और अंधेरे के बीच दो लाल आँखें चमकीं।

     

    ब्लड रैवन…

     

    वह धीरे-धीरे अंधेरे से बाहर आया।

     

    आज उसका आकार किसी घोड़े जितना विशाल था।

     

    उसके पंख फैलते ही पूरी गुफा ढक गई।

     

    उसकी चोंच से रक्त जैसी लाल बूँदें टपक रही थीं।

     

    लेकिन जब उसने मुँह खोला…

     

    तो आवाज़ रुद्रनाथ की थी।

     

    “डेढ़ सौ वर्षों से मैं इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था…”

     

    “सात आत्माएँ…”

     

    “और आज सातवीं आत्मा तुम्हारी होगी, आरव।”

     

    अचानक उसके चारों ओर काला धुआँ फैल गया।

     

    उस धुएँ से छह धुँधली आकृतियाँ बाहर निकलीं।

     

    वे वही लोग थे जो ब्लड रैवन का शिकार बन चुके थे।

     

    उनकी आँखें खाली थीं।

     

    वे किसी कठपुतली की तरह रुद्रनाथ के इशारों पर चल रहे थे।

     

    आरव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

     

    लेकिन तभी…

     

    एक छोटी-सी आवाज़ सुनाई दी।

     

    “डरो मत…”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    वही रहस्यमयी बालक खड़ा था, जो जंगल में मिला था।

     

    अब उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मैं पहला शिकार था…”

     

    “मैं डेढ़ सौ साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।”

     

    उसने अपनी हथेली खोली।

     

    उसमें एक छोटी-सी अग्नि जल रही थी।

     

    “यही पवित्र अग्नि है…”

     

    “इसे पत्थर तक पहुँचा दो…”

     

    इतना कहकर वह धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गया।

     

    आरव ने अग्नि अपने हाथों में ली।

     

    उसी समय ब्लड रैवन भयानक चीख के साथ उसकी ओर झपटा।

     

    गुफा ज़ोर से हिलने लगी।

     

    पत्थर टूटने लगे।

     

    हरिदास और गाँव वाले मंत्र पढ़ने लगे।

     

    कौओं का विशाल झुंड गुफा में घुस आया।

     

    चारों ओर सिर्फ़ पंख ही पंख दिखाई दे रहे थे।

     

    ब्लड रैवन बार-बार आरव पर हमला कर रहा था।

     

    उसके पंजों से आरव के कंधे पर गहरा घाव हो गया।

     

    लेकिन उसने अग्नि नहीं छोड़ी।

     

    वह धीरे-धीरे श्राप वाले पत्थर की ओर बढ़ता रहा।

     

    अचानक रुद्रनाथ की आवाज़ गूँजी—

     

    “अगर पत्थर जल गया… तो मेरी आत्मा के साथ इन सभी आत्माओं का भी अंत हो जाएगा!”

     

    आरव रुक गया।

     

    उसे लगा…

     

    क्या सचमुच वह उन निर्दोष आत्माओं को भी नष्ट कर देगा?

     

    तभी उन छह आत्माओं ने एक साथ उसकी ओर देखा।

     

    उनके चेहरों पर पहली बार शांति दिखाई दी।

     

    उन्होंने एक साथ कहा—

     

    “हमें मुक्त कर दो…”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने पूरी ताकत से पवित्र अग्नि उस काले पत्थर पर रख दी।

     

    क्षणभर के लिए सब कुछ शांत हो गया।

     

    फिर…

     

    पत्थर में महीन दरार पड़ी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और अगले ही पल भयंकर विस्फोट हुआ।

     

    गुफा सफेद प्रकाश से भर गई।

     

    ब्लड रैवन ने ऐसी चीख मारी कि पहाड़ गूँज उठे।

     

    उसके विशाल काले पंख एक-एक करके राख बनने लगे।

     

    उसकी लाल आँखों की चमक बुझने लगी।

     

    रुद्रनाथ की आवाज़ दर्द से भर उठी—

     

    “नहीं… यह असंभव है…”

     

    “मैं अमर हूँ…”

     

    लेकिन श्राप टूट चुका था।

     

    कुछ ही क्षणों में उसका पूरा शरीर राख बनकर हवा में बिखर गया।

     

    उसी समय छहों आत्माएँ मुस्कुराईं।

     

    उनके चेहरे से भय गायब हो चुका था।

     

    वे धीरे-धीरे उजाले में बदलकर आकाश की ओर उठ गईं।

     

    और अंत में वही छोटा बालक बोला—

     

    “धन्यवाद…”

     

    फिर वह भी प्रकाश बनकर विलीन हो गया।

     

    गुफा पूरी तरह शांत हो गई।

     

    बाहर बैठे लाखों कौए एक साथ उड़ गए।

     

    लेकिन इस बार उनकी आवाज़ भयावह नहीं थी।

     

    कुछ ही क्षणों बाद पूरा आकाश खाली हो गया।

     

    ब्लड रैवन का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।

     

    —

     

    सुबह जब सूरज निकला…

     

    तो कई वर्षों बाद कालीघाट में बच्चों की हँसी सुनाई दी।

     

    लोग अपने घरों से बिना डर के बाहर निकले।

     

    दरवाज़ों पर बँधे काले धागे उतार दिए गए।

     

    हरिदास ने आसमान की ओर देखकर गहरी साँस ली।

     

    “श्राप समाप्त हो गया…”

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने इस पूरे रहस्य पर एक पुस्तक लिखी।

     

    लेकिन उसने उस पुस्तक की अंतिम पंक्ति में केवल एक चेतावनी लिखी—

     

    “हर श्राप समाप्त हो जाता है… यदि उसका सामना साहस से किया जाए। लेकिन कुछ अंधेरे कभी पूरी तरह नहीं मरते। वे केवल सही समय का इंतज़ार करते हैं।”

     

    —

     

    एक वर्ष बाद…

     

    आरव अपनी पुस्तक के विमोचन से लौट रहा था।

     

    रात हो चुकी थी।

     

    सड़क सुनसान थी।

     

    अचानक उसकी कार के सामने एक काला पंख आकर गिरा।

     

    उसने ब्रेक लगाए।

     

    बाहर उतरकर पंख उठाया।

     

    पंख पर लाल रंग से केवल एक शब्द लिखा था—

     

    “फिर…”

     

    आरव का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उसने धीरे-धीरे ऊपर आसमान की ओर देखा।

     

    बहुत दूर…

     

    बादलों के बीच…

     

    दो लाल आँखें कुछ क्षणों के लिए चमकीं।

     

    फिर अंधेरे में गायब हो गईं।

     

    और उसी पल…

     

    हवा में एक बहुत धीमी, लेकिन परिचित आवाज़ तैर गई—

     

    “का…आ…आ…”

     

    समाप्त… या शायद नहीं।

     

     

    तीसरी रात…

     

    पूरा कालीघाट गाँव मौत की खामोशी में डूबा हुआ था।

     

    आसमान पर काले बादलों का साम्राज्य था। बिजली चमकती तो कुछ पल के लिए पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई देतीं, फिर सब कुछ फिर से अंधेरे में खो जाता।

     

    आरव पूरी रात जाग रहा था।

     

    उसकी मेज़ पर वही पुरानी तांत्रिक पुस्तक खुली हुई थी।

     

    उसकी नज़र बार-बार उस फटे हुए आख़िरी पन्ने पर जा रही थी।

     

    उसी समय दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन ज़मीन पर एक पुराना कपड़े का थैला रखा था।

     

    उसने थैला उठाकर खोला।

     

    अंदर वही फटा हुआ पन्ना रखा था जिसकी तलाश उसे थी।

     

    पन्ने के नीचे लाल स्याही से लिखा था—

     

    “यदि तुमने यह पढ़ लिया है… तो तुम्हारे पास केवल आज की रात बची है।”

     

    आरव ने काँपते हाथों से पन्ना खोला।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “रुद्रनाथ को कोई हथियार नहीं मार सकता। उसकी शक्ति उसके शरीर में नहीं, बल्कि उस पत्थर में कैद है जिस पर उसने पहला रक्त चढ़ाया था। यदि उस पत्थर को पवित्र अग्नि में भस्म कर दिया जाए, तो ब्लड रैवन भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।”

     

    नीचे एक नक्शा बना था।

     

    वह उसी प्राचीन मंदिर के पीछे छिपी गुफा की ओर इशारा कर रहा था।

     

    हरिदास ने पन्ना पढ़ा।

     

    उनकी आँखों में वर्षों बाद उम्मीद की हल्की-सी चमक दिखाई दी।

     

    “यही वह रहस्य है जिसे हमारे पूर्वजों ने छिपा दिया था।”

     

    लेकिन तभी…

     

    पूरा कमरा अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    एक काला पंख उड़ता हुआ भीतर आया।

     

    और हवा में एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “अब कोई मुझे नहीं रोक सकता…”

     

    आरव समझ गया…

     

    ब्लड रैवन सब जान चुका था।

     

    —

     

    आधी रात होने से पहले आरव, हरिदास और गाँव के पाँच साहसी युवक मशालें लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    आज जंगल पहले से भी ज़्यादा भयावह लग रहा था।

     

    हर पेड़ की डाल पर कौए बैठे थे।

     

    हज़ारों…

     

    शायद लाखों…

     

    लेकिन कोई आवाज़ नहीं।

     

    सिर्फ़ उनकी लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    जैसे ही दल मंदिर पहुँचा…

     

    सारे कौए एक साथ उड़ गए।

     

    उनके पंखों की आवाज़ से पूरा आकाश भर गया।

     

    “का…आ…आ…”

     

    ऐसा लगा जैसे पूरी धरती काँप उठी हो।

     

    मंदिर के पीछे पत्थरों के बीच एक संकरी गुफा थी।

     

    सब अंदर गए।

     

    गुफा की दीवारों पर पुराने संस्कृत मंत्र खुदे हुए थे।

     

    बीचों-बीच एक विशाल काला पत्थर रखा था।

     

    उस पर सूखे रक्त के निशान अब भी दिखाई दे रहे थे।

     

    हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “यही है श्राप का पत्थर…”

     

    लेकिन उसी क्षण गुफा के भीतर तेज़ हवा चली।

     

    सारी मशालें बुझ गईं।

     

    घना अंधेरा छा गया।

     

    और अंधेरे के बीच दो लाल आँखें चमकीं।

     

    ब्लड रैवन…

     

    वह धीरे-धीरे अंधेरे से बाहर आया।

     

    आज उसका आकार किसी घोड़े जितना विशाल था।

     

    उसके पंख फैलते ही पूरी गुफा ढक गई।

     

    उसकी चोंच से रक्त जैसी लाल बूँदें टपक रही थीं।

     

    लेकिन जब उसने मुँह खोला…

     

    तो आवाज़ रुद्रनाथ की थी।

     

    “डेढ़ सौ वर्षों से मैं इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था…”

     

    “सात आत्माएँ…”

     

    “और आज सातवीं आत्मा तुम्हारी होगी, आरव।”

     

    अचानक उसके चारों ओर काला धुआँ फैल गया।

     

    उस धुएँ से छह धुँधली आकृतियाँ बाहर निकलीं।

     

    वे वही लोग थे जो ब्लड रैवन का शिकार बन चुके थे।

     

    उनकी आँखें खाली थीं।

     

    वे किसी कठपुतली की तरह रुद्रनाथ के इशारों पर चल रहे थे।

     

    आरव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

     

    लेकिन तभी…

     

    एक छोटी-सी आवाज़ सुनाई दी।

     

    “डरो मत…”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    वही रहस्यमयी बालक खड़ा था, जो जंगल में मिला था।

     

    अब उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मैं पहला शिकार था…”

     

    “मैं डेढ़ सौ साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।”

     

    उसने अपनी हथेली खोली।

     

    उसमें एक छोटी-सी अग्नि जल रही थी।

     

    “यही पवित्र अग्नि है…”

     

    “इसे पत्थर तक पहुँचा दो…”

     

    इतना कहकर वह धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गया।

     

    आरव ने अग्नि अपने हाथों में ली।

     

    उसी समय ब्लड रैवन भयानक चीख के साथ उसकी ओर झपटा।

     

    गुफा ज़ोर से हिलने लगी।

     

    पत्थर टूटने लगे।

     

    हरिदास और गाँव वाले मंत्र पढ़ने लगे।

     

    कौओं का विशाल झुंड गुफा में घुस आया।

     

    चारों ओर सिर्फ़ पंख ही पंख दिखाई दे रहे थे।

     

    ब्लड रैवन बार-बार आरव पर हमला कर रहा था।

     

    उसके पंजों से आरव के कंधे पर गहरा घाव हो गया।

     

    लेकिन उसने अग्नि नहीं छोड़ी।

     

    वह धीरे-धीरे श्राप वाले पत्थर की ओर बढ़ता रहा।

     

    अचानक रुद्रनाथ की आवाज़ गूँजी—

     

    “अगर पत्थर जल गया… तो मेरी आत्मा के साथ इन सभी आत्माओं का भी अंत हो जाएगा!”

     

    आरव रुक गया।

     

    उसे लगा…

     

    क्या सचमुच वह उन निर्दोष आत्माओं को भी नष्ट कर देगा?

     

    तभी उन छह आत्माओं ने एक साथ उसकी ओर देखा।

     

    उनके चेहरों पर पहली बार शांति दिखाई दी।

     

    उन्होंने एक साथ कहा—

     

    “हमें मुक्त कर दो…”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने पूरी ताकत से पवित्र अग्नि उस काले पत्थर पर रख दी।

     

    क्षणभर के लिए सब कुछ शांत हो गया।

     

    फिर…

     

    पत्थर में महीन दरार पड़ी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और अगले ही पल भयंकर विस्फोट हुआ।

     

    गुफा सफेद प्रकाश से भर गई।

     

    ब्लड रैवन ने ऐसी चीख मारी कि पहाड़ गूँज उठे।

     

    उसके विशाल काले पंख एक-एक करके राख बनने लगे।

     

    उसकी लाल आँखों की चमक बुझने लगी।

     

    रुद्रनाथ की आवाज़ दर्द से भर उठी—

     

    “नहीं… यह असंभव है…”

     

    “मैं अमर हूँ…”

     

    लेकिन श्राप टूट चुका था।

     

    कुछ ही क्षणों में उसका पूरा शरीर राख बनकर हवा में बिखर गया।

     

    उसी समय छहों आत्माएँ मुस्कुराईं।

     

    उनके चेहरे से भय गायब हो चुका था।

     

    वे धीरे-धीरे उजाले में बदलकर आकाश की ओर उठ गईं।

     

    और अंत में वही छोटा बालक बोला—

     

    “धन्यवाद…”

     

    फिर वह भी प्रकाश बनकर विलीन हो गया।

     

    गुफा पूरी तरह शांत हो गई।

     

    बाहर बैठे लाखों कौए एक साथ उड़ गए।

     

    लेकिन इस बार उनकी आवाज़ भयावह नहीं थी।

     

    कुछ ही क्षणों बाद पूरा आकाश खाली हो गया।

     

    ब्लड रैवन का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।

     

    —

     

    सुबह जब सूरज निकला…

     

    तो कई वर्षों बाद कालीघाट में बच्चों की हँसी सुनाई दी।

     

    लोग अपने घरों से बिना डर के बाहर निकले।

     

    दरवाज़ों पर बँधे काले धागे उतार दिए गए।

     

    हरिदास ने आसमान की ओर देखकर गहरी साँस ली।

     

    “श्राप समाप्त हो गया…”

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने इस पूरे रहस्य पर एक पुस्तक लिखी।

     

    लेकिन उसने उस पुस्तक की अंतिम पंक्ति में केवल एक चेतावनी लिखी—

     

    “हर श्राप समाप्त हो जाता है… यदि उसका सामना साहस से किया जाए। लेकिन कुछ अंधेरे कभी पूरी तरह नहीं मरते। वे केवल सही समय का इंतज़ार करते हैं।”

     

    —

     

    एक वर्ष बाद…

     

    आरव अपनी पुस्तक के विमोचन से लौट रहा था।

     

    रात हो चुकी थी।

     

    सड़क सुनसान थी।

     

    अचानक उसकी कार के सामने एक काला पंख आकर गिरा।

     

    उसने ब्रेक लगाए।

     

    बाहर उतरकर पंख उठाया।

     

    पंख पर लाल रंग से केवल एक शब्द लिखा था—

     

    “फिर…”

     

    आरव का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उसने धीरे-धीरे ऊपर आसमान की ओर देखा।

     

    बहुत दूर…

     

    बादलों के बीच…

     

    दो लाल आँखें कुछ क्षणों के लिए चमकीं।

     

    फिर अंधेरे में गायब हो गईं।

     

    और उसी पल…

     

    हवा में एक बहुत धीमी, लेकिन परिचित आवाज़ तैर गई—

     

    “का…आ…आ…”

     

    समाप्त… या शायद नहीं।

  • 😱 Blood Raven -Part-2😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    1. 😱ब्लड रैवन (Blood Raven) भाग–2 : शापित जंगल और सात नाम😱

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    3.  
    4.  
    5. सुबह की पहली किरण कालीघाट की पहाड़ियों पर पड़ी, लेकिन गाँव में किसी ने सूर्योदय का स्वागत नहीं किया। हर घर का दरवाज़ा बंद था। हवा में धूप, राख और भय की गंध घुली हुई थी। गाँव के बीचोंबीच उस युवक का अंतिम संस्कार किया जा रहा था, जिसकी मृत्यु पिछली रात हुई थी। उसके परिवार का हर सदस्य रो रहा था, लेकिन सबसे विचित्र बात यह थी कि मृत युवक के चेहरे पर भय की जमी हुई परछाईं अब भी साफ़ दिखाई दे रही थी। हरिदास ने चिता की ओर देखते हुए धीमे स्वर में कहा, “यह मौत नहीं… बुलावा है।” आरव ने पूछा, “क्या हर बार ऐसा ही होता है?” हरिदास ने सिर हिलाया। “ब्लड रैवन किसी को मारने से पहले उसका नाम चुनता है। सात नाम पूरे होते ही वह फिर गायब हो जाता है… और तीस वर्षों बाद लौटता है।” आरव ने गहरी साँस ली। “अगर उसका सामना किया जाए तो?” “जिसने भी कोशिश की… वह कभी लौटकर नहीं आया।” उसी समय गाँव की एक वृद्धा दौड़ती हुई आई। उसके हाथ काँप रहे थे। “हरिदास… जंगल वाले मंदिर का दरवाज़ा खुल गया है!” यह सुनते ही वहाँ मौजूद हर व्यक्ति का चेहरा सफेद पड़ गया। “कौन-सा मंदिर?” आरव ने पूछा। हरिदास ने उत्तर दिया, “वही… जहाँ रुद्रनाथ ने आख़िरी तांत्रिक अनुष्ठान किया था। डेढ़ सौ वर्षों से वह बंद था।” कुछ देर बाद हरिदास, आरव और गाँव के चार साहसी लोग मशालें लेकर जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल में कदम रखते ही वातावरण बदल गया। सूरज ऊपर था, फिर भी पेड़ों के बीच अजीब अँधेरा फैला हुआ था। हवा बिल्कुल शांत थी। लेकिन हजारों कौओं की धीमी आवाज़ हर दिशा से सुनाई दे रही थी। चलते-चलते आरव की नज़र एक पुराने पेड़ पर पड़ी। उसकी छाल पर नाखूनों से सात नाम लिखे हुए थे। छह नाम धुंधले पड़ चुके थे। सातवाँ नाम खाली था। हरिदास ने काँपती आवाज़ में कहा, “हर बार ऐसा ही होता है… सातवाँ नाम आख़िर में लिखा जाता है।” जैसे ही वे आगे बढ़े, अचानक एक तेज़ झोंका आया। सभी मशालें एक साथ बुझ गईं। चारों ओर घना अँधेरा छा गया। तभी किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी। आरव ने टॉर्च जलाई। सामने एक छोटा लड़का खड़ा था। उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे और उसके हाथ में एक काला पंख था। “तुम कौन हो?” आरव ने पूछा। लड़के ने मुस्कुराकर कहा, “मैं रास्ता दिखाने आया हूँ।” “तुम गाँव के हो?” लड़का बोला, “मैं था…” इतना कहकर वह मुड़ा और जंगल के भीतर चलने लगा। हरिदास ने तुरंत आरव का हाथ पकड़ लिया। “उसके पीछे मत जाना!” लेकिन अगले ही पल वह लड़का धुएँ की तरह हवा में गायब हो गया। कुछ दूरी पर एक टूटा हुआ पत्थर का मंदिर दिखाई दिया। मंदिर के विशाल दरवाज़े सचमुच खुले हुए थे। अंदर घुसते ही उन्हें ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ। दीवारों पर कौओं की आकृतियाँ बनी थीं। बीच में एक पत्थर की वेदी थी, जिस पर सूखा हुआ लाल रंग फैला हुआ था। वेदी के पीछे एक लोहे का संदूक रखा था। आरव ने सावधानी से उसे खोला। अंदर एक चमड़े से बँधी पुरानी पुस्तक रखी थी। उसके पहले पन्ने पर लिखा था— “जो इसे पढ़ेगा, वह सत्य देखेगा… और सत्य उसे कभी नहीं छोड़ेगा।” आरव ने पुस्तक पलटनी शुरू की। उसमें रुद्रनाथ की लिखावट थी। “मैंने मृत्यु को हराने की कोशिश की। मैंने सात निर्दोष आत्माओं की शक्ति अपने भीतर बाँधनी चाही। परंतु अंतिम क्षण में मंत्र उल्टा पड़ गया। मेरा शरीर नष्ट हो गया और मेरी आत्मा रक्त-पिपासु पक्षी में कैद हो गई। जब तक सात भयभीत आत्माएँ मुझे नहीं मिलेंगी… मैं मुक्त नहीं हो सकूँगा।” आरव के हाथ काँपने लगे। “तो ब्लड रैवन लोगों की जान इसलिए लेता है…” हरिदास ने उत्तर दिया, “अपनी अधूरी साधना पूरी करने के लिए।” तभी मंदिर की छत से कुछ टपका। आरव ने ऊपर

       देखा। सैकड़ों काले कौए उल्टे लटके हुए थे। उनकी लाल आँखें एक साथ खुलीं। पूरा मंदिर चीखों से गूँज उठा। “का…आ…आ…” गाँव के लोग डरकर बाहर भागे। आरव भी दौड़ा, लेकिन जैसे ही वह दरवाज़े तक पहुँचा, उसके सामने वही विशाल ब्लड रैवन उतर आया। उसके पंख इतने बड़े थे कि पूरा रास्ता ढक गया। उसकी आँखों में जलती हुई लाल रोशनी थी। वह धीरे-धीरे आरव की ओर बढ़ा। फिर इंसानी आवाज़ में बोला— “दूसरा नाम…” इतना कहते ही वह धुएँ में बदलकर गायब हो गया। मंदिर फिर शांत हो गया। गाँव लौटते समय किसी ने एक शब्द तक नहीं कहा। उस रात पूरे गाँव में किसी ने दीपक तक नहीं बुझाया। हर घर में लोग जागते रहे। लेकिन आधी रात होते ही फिर वही आवाज़ सुनाई दी— “का…आ…आ…” इस बार आवाज़ पूरे गाँव के ऊपर से आई। लोग घरों से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पाए। अचानक एक घर की खिड़की अपने आप खुल गई। अंदर रहने वाली वृद्ध महिला चीख उठी। जब लोग सुबह पहुँचे… वह बिस्तर पर मृत पड़ी थी। कमरे में कोई संघर्ष नहीं हुआ था। उसकी मुट्ठी में केवल एक काला पंख दबा हुआ था। हरिदास की आँखें नम हो गईं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा— “अब दो नाम पूरे हो चुके हैं…” आरव को अब यह समझ आने लगा था कि यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक जीवित श्राप था। उसने तय किया कि वह ब्लड रैवन को रोकने का तरीका खोजेगा। रात के अंतिम पहर उसने फिर वही पुरानी पुस्तक खोली। आख़िरी पन्नों में एक अधूरा वाक्य लिखा था— “यदि रक्त से जन्मे रैवन का हृदय उस पत्थर पर लौटे जहाँ श्राप शुरू हुआ था… तभी उसका अंत संभव है।” लेकिन आगे का हिस्सा फटा हुआ था। किसी ने जानबूझकर वह पन्ना निकाल लिया था। आरव समझ गया— रहस्य अभी अधूरा है। और शायद वही फटा हुआ पन्ना पूरे गाँव की किस्मत बदल सकता है। उसी समय बाहर ज़ोरदार बिजली कड़की। खिड़की खुल गई। एक काला पंख उड़ता हुआ कमरे के बीच आकर गिरा। उस पर लाल रंग से केवल दो शब्द लिखे थे— “तीसरी रात…” आरव ने काँपते हाथों से पंख उठाया। बाहर पहाड़ी की चोटी पर ब्लड रैवन बैठा था। उसकी लाल आँखें सीधे आरव पर टिकी थीं। और फिर पूरी घाटी में उसकी भयावह आवाज़ गूँज उठी— “का…आ…आ…” आरव को पहली बार महसूस हुआ… अगला नाम शायद उसी का होने वाला था।

  • 😱ब्लड रैवन (Blood Raven) भाग–1 : काली आँखों वाला कौआ😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    😱 ब्लड रैवन (Blood Raven) 😱

    भाग–1 : 😱 काली आँखों वाला कौआ 😱

     

    रात के ठीक बारह बजे, उत्तर भारत के पहाड़ों के बीच बसे छोटे-से गाँव कालीघाट में एक ऐसी आवाज़ गूँजी जिसने पूरे गाँव की नींद छीन ली।

     

    “का…आ…आ…”

     

    यह किसी साधारण कौए की आवाज़ नहीं थी।

     

    उसकी चीख ऐसी थी, मानो किसी इंसान की आख़िरी साँस उसके गले में फँस गई हो।

     

    गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति, हरिदास, अपने बिस्तर से घबराकर उठ बैठे। उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। काँपते हाथों से उन्होंने अपनी खिड़की बंद की और बुदबुदाए—

     

    “वह लौट आया… ब्लड रैवन वापस आ गया…”

     

    उसी समय गाँव से कई किलोमीटर दूर, शहर में रहने वाला आरव, जो एक युवा पत्रकार था, अपने लैपटॉप पर रहस्यमयी घटनाओं से जुड़ी रिपोर्ट तैयार कर रहा था।

     

    अचानक उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

     

    “अगर सच जानना चाहते हो… तो कालीघाट चले आओ।”

     

    आवाज़ बूढ़े आदमी की थी।

     

    “कौन बोल रहे हैं?”

     

    लेकिन दूसरी तरफ़ से केवल कौए की भयानक आवाज़ सुनाई दी।

     

    “का…आ…आ…”

     

    कॉल कट गया।

     

    आरव को लगा कोई मज़ाक कर रहा है।

     

    लेकिन अगले ही पल उसके ईमेल पर एक पुरानी तस्वीर आई।

     

    तस्वीर में एक विशाल काला कौआ था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    और उसकी चोंच पर ताज़ा खून जैसा लाल दाग़ था।

     

    तस्वीर के नीचे केवल तीन शब्द लिखे थे—

     

    “Blood Raven Awaits.”

     

    आरव ने उसी रात कालीघाट जाने का निर्णय लिया।

     

    …

     

    अगले दिन शाम तक वह गाँव पहुँच गया।

     

    पहाड़ों से घिरा हुआ वह गाँव असामान्य रूप से शांत था।

     

    न बच्चे खेल रहे थे।

     

    न कहीं पशुओं की आवाज़।

     

    यहाँ तक कि हवा भी मानो धीरे चल रही थी।

     

    बस एक चीज़ साफ़ सुनाई दे रही थी—

     

    दूर जंगल से आती कौओं की आवाज़।

     

    गाँव में प्रवेश करते ही उसने देखा कि लगभग हर घर के दरवाज़े पर काले धागे और नींबू-मिर्च लटके हुए थे।

     

    कुछ दरवाज़ों पर राख से बने अजीब निशान बने थे।

     

    आरव ने एक महिला से पूछा—

     

    “यह सब क्यों लगाया है?”

     

    महिला ने उसकी ओर देखा।

     

    उसकी आँखों में डर साफ़ दिखाई दे रहा था।

     

    “सूरज ढलने से पहले यहाँ से चले जाओ।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “अगर ब्लड रैवन ने तुम्हें देख लिया… तो सुबह नहीं देख पाओगे।”

     

    इतना कहकर वह घर के अंदर चली गई।

     

    आरव ने इसे अंधविश्वास समझा।

     

    वह गाँव के पुराने सरपंच हरिदास के घर पहुँचा।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर धूप और कपूर की तेज़ गंध थी।

     

    हरिदास ने उसे देखते ही पूछा—

     

    “तुम्हें किसने बुलाया?”

     

    आरव ने ईमेल और कॉल के बारे में बताया।

     

    यह सुनते ही बूढ़े के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “उसने तुम्हें चुन लिया है।”

     

    “किसने?”

     

    “ब्लड रैवन ने।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “एक कौआ किसी इंसान को क्यों चुनेगा?”

     

    हरिदास धीरे-धीरे उठे।

     

    उन्होंने लकड़ी की एक पुरानी संदूक खोली।

     

    उसमें सौ साल पुरानी डायरी रखी थी।

     

    डायरी खोलते ही धूल का बादल उठा।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिसने भी यह पढ़ा… वह अब सुरक्षित नहीं है।”

     

    आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    हरिदास ने पढ़ना शुरू किया—

     

    “लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले इस गाँव में एक तांत्रिक रहता था। उसका नाम रुद्रनाथ था। वह अमर होना चाहता था। उसने एक भयानक अनुष्ठान किया। लेकिन अंतिम रात अनुष्ठान बिगड़ गया। उसके शरीर का अधिकांश भाग राख बन गया… पर उसकी आत्मा एक विशाल काले कौए में कैद हो गई।”

     

    “वही ब्लड रैवन है।”

     

    “वह हर तीस वर्ष बाद लौटता है।”

     

    “और सात लोगों की जान लेकर फिर गायब हो जाता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर यह सच है तो किसी ने उसे मारा क्यों नहीं?”

     

    हरिदास की आँखें भर आईं।

     

    “क्योंकि वह मरता नहीं।”

     

    उसी समय बाहर अचानक तेज़ हवा चलने लगी।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    कमरे की मोमबत्ती बुझ गई।

     

    पूरा घर अँधेरे में डूब गया।

     

    फिर…

     

    “का…आ…आ…”

     

    इतनी नज़दीक से आवाज़ आई कि लगा कौआ कमरे के अंदर ही बैठा है।

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    खिड़की पर एक विशाल काला कौआ बैठा था।

     

    उसकी आँखें चमकते अंगारों जैसी लाल थीं।

     

    वह बिना पलक झपकाए आरव को देख रहा था।

     

    फिर उसने अपनी चोंच काँच पर तीन बार मारी।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    और उड़ गया।

     

    हरिदास ज़मीन पर बैठ गए।

     

    “अब देर हो चुकी है…”

     

    “उसने तुम्हें पहचान लिया।”

     

    …

     

    उस रात आरव गाँव के एक पुराने अतिथि-गृह में रुका।

     

    कमरा पुराना था।

     

    दीवारों पर नमी थी।

     

    बाहर लगातार कौओं की आवाज़ आ रही थी।

     

    रात के लगभग दो बजे उसकी नींद खुली।

     

    उसे लगा कोई उसके कमरे में चल रहा है।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन फ़र्श पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    वे दरवाज़े से शुरू होकर सीधे उसके बिस्तर तक आए थे।

     

    और वहीं खत्म हो गए।

     

    अचानक कमरे के कोने से धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    आरव ने टॉर्च घुमाई।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर खून जैसे लाल रंग से लिखा था—

     

    “सात रातें…”

     

    आरव घबरा गया।

     

    उसने तुरंत दरवाज़ा खोला और बाहर भागा।

     

    पूरा गलियारा सुनसान था।

     

    तभी ऊपर की मंज़िल से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा।

     

    कमरा खुला था।

     

    अंदर एक लकड़ी का पालना अपने आप हिल रहा था।

     

    पालने में कोई बच्चा नहीं था।

     

    लेकिन रोने की आवाज़ लगातार आ रही थी।

     

    जैसे ही वह पास पहुँचा—

     

    आवाज़ बंद हो गई।

     

    कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।

     

    फिर उसके पीछे किसी ने बहुत धीरे से फुसफुसाया—

     

    “मुड़कर मत देखना…”

     

    आरव का शरीर काँप उठा।

     

    उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

     

    लेकिन जिज्ञासा उस पर भारी पड़ गई।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाज़े पर वही विशाल काला कौआ खड़ा था।

     

    इस बार उसकी आँखों से लाल आँसुओं जैसी धार बह रही थी।

     

    उसकी चोंच खुली।

     

    लेकिन आवाज़ इंसान की निकली—

     

    “पहला नाम मिल गया…”

     

    1. कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    अँधेरा छा गया।

     

    और उसी क्षण पूरे गाँव में किसी की दर्दनाक चीख गूँज उठी।

     

    सुबह जब लोग उस दिशा में पहुँचे, तो गाँव का एक युवक अपने घर के आँगन में मृत मिला।

     

    उसके शरीर पर कोई घाव नहीं था।

     

    लेकिन उसके पास ज़मीन पर कौए का एक काला पंख पड़ा था।

     

    हरिदास ने पंख उठाया।

     

    उनके होंठ काँप रहे थे।

     

    उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “एक चला गया…”

     

    “अब छह बाकी हैं…”

     

    और दूर पहाड़ की सबसे ऊँची चट्टान पर, धुंध के बीच, ब्लड रैवन अपनी लाल आँखों से पूरे गाँव को देख रहा था।

     

    उसकी भयावह चीख एक बार फिर घाटी में गूँज उठी—

     

    “का…आ…आ…”

  • Mera pahla pyar

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    मेरा पहला प्यार

    कुछ लोग ज़िंदगी में देर से आते हैं और हमेशा के लिए रह जाते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत जल्दी आकर हमेशा के लिए याद बन जाते हैं। मेरी ज़िंदगी में भी एक ऐसी ही याद थी—मेरा पहला प्यार।

    मेरा नाम आरव है। आज मैं एक सफल इंसान हूँ। अच्छी नौकरी, अच्छा घर, हर वह चीज़ है जिसकी कभी चाहत थी। लेकिन जब भी बारिश की पहली बूंदें धरती पर गिरती हैं, जब भी किसी पुराने गीत की धुन कानों में पड़ती है, तो मेरी यादें सात साल पीछे चली जाती हैं। उस छोटे से शहर में… जहाँ मैंने पहली बार किसी को दिल से चाहा था।

    उसका नाम था नैना।

    मैं पहली बार उससे कॉलेज के पहले दिन मिला था। सफेद सलवार-सूट, हल्की-सी मुस्कान और बड़ी-बड़ी आँखें… जैसे किसी ने चाँद का एक टुकड़ा धरती पर भेज दिया हो। वह क्लास में नई थी और घबराई हुई लग रही थी।

    मैंने उसके पास जाकर कहा, “अगर चाहो तो मैं तुम्हें पूरी क्लास दिखा सकता हूँ।”

    वह हल्का-सा मुस्कुराई और बोली, “धन्यवाद… मुझे सच में किसी की मदद की ज़रूरत थी।”

    बस, वहीं से हमारी दोस्ती शुरू हुई।

    दिन बीतते गए। हम साथ पढ़ते, साथ कैंटीन जाते, लाइब्रेरी में घंटों बैठते। वह बहुत समझदार थी। उसे किताबें पढ़ना पसंद था, जबकि मुझे गिटार बजाना। मैं उसके लिए अक्सर कॉलेज के गार्डन में बैठकर धुन बजाता और वह मुस्कुराकर सुनती रहती।

    धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं रही। उसके बिना एक दिन भी अधूरा लगता था। उसकी हँसी मेरी खुशी बन गई थी और उसकी उदासी मेरी बेचैनी।

    लेकिन मैंने कभी अपने दिल की बात नहीं कही। डरता था… कहीं दोस्ती भी न खो दूँ।

    एक दिन कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। मैंने पहली बार स्टेज पर एक गीत गाया। पूरा गीत मैं नैना को देखकर गा रहा था। शायद वह समझ गई थी कि उस गीत के पीछे छिपी हर भावना उसी के लिए थी।

    कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह मेरे पास आई।

    उसने पूछा, “क्या यह गीत… किसी खास के लिए था?”

    मैं कुछ पल चुप रहा। फिर हिम्मत करके कहा, “हाँ… तुम्हारे लिए।”

    कुछ सेकंड तक वह बिना कुछ बोले मुझे देखती रही। फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए।

    मैं घबरा गया।

    “अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो…”

    उसने मेरी बात बीच में ही रोक दी।

    “बुरा नहीं लगा, आरव… लेकिन मैं भी तुम्हें यही बताना चाहती थी।”

    उस दिन पहली बार उसने मेरा हाथ थामा था।

    उस पल ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया थम गई हो।

    हमारा रिश्ता बहुत खूबसूरत था। उसमें दिखावा नहीं था। महंगे तोहफे नहीं थे। बस एक-दूसरे के लिए सच्ची परवाह थी।

    हम छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढ़ लेते थे। कभी सड़क किनारे चाय पीना, कभी बारिश में भीगना, कभी बिना वजह घंटों बातें करना… यही हमारी दुनिया थी।

    कॉलेज का आखिरी साल शुरू हुआ।

    हम दोनों ने अपने-अपने सपनों के लिए मेहनत शुरू कर दी। मैं नौकरी की तैयारी कर रहा था और नैना आगे पढ़ना चाहती थी।

    लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी योजनाओं के हिसाब से नहीं चलती।

    एक शाम नैना ने मुझे मिलने बुलाया।

    वह पहले जैसी खुश नहीं थी।

    उसने धीमी आवाज़ में कहा, “पापा ने मेरी शादी तय कर दी है।”

    मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

    “लेकिन… तुमने उन्हें हमारे बारे में बताया?”

    “बताया था… लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। उनके लिए परिवार की इज़्ज़त सबसे ज़्यादा मायने रखती है।”

    मैंने कहा, “तो चलो… हम दोनों मिलकर उन्हें समझाएँगे।”

    वह मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी थी।

    “कुछ रिश्ते समझाने से नहीं बदलते, आरव।”

    उस दिन हम दोनों बहुत रोए।

    पहली बार मुझे महसूस हुआ कि प्यार करना आसान है, लेकिन उसे निभा पाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।

    अगले कुछ दिनों तक हम रोज़ मिलते रहे। हर मुलाकात आखिरी जैसी लगती थी।

    फिर वह दिन भी आ गया जब नैना हमेशा के लिए चली गई।

    उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा—

    “अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज़ होती है… तो मैं तुम्हें फिर ढूँढ़ लूँगी।”

    मैंने उसे जाते हुए देखा… और पहली बार महसूस किया कि कुछ लोगों का जाना, ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल देता है।

    उसके बाद मैंने खुद को काम में डुबो दिया।

    समय बीतता गया।

    लोग कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है।

    लेकिन सच यह है कि समय सिर्फ दर्द के साथ जीना सिखाता है।

    सात साल बाद मैं एक बिज़नेस कॉन्फ्रेंस के लिए उसी शहर गया।

    सब कुछ बदल चुका था।

    नई इमारतें, नई सड़कें…

    लेकिन कॉलेज के सामने वाली वही छोटी-सी चाय की दुकान आज भी थी।

    मैं वहीं जाकर बैठ गया।

    अचानक किसी ने पीछे से मेरा नाम पुकारा।

    “आरव…”

    मैंने मुड़कर देखा।

    वह नैना थी।

    चेहरे पर पहले जैसी मासूमियत थी, लेकिन आँखों में ज़िंदगी के कई अनुभव उतर आए थे।

    कुछ पल तक हम दोनों कुछ नहीं बोले।

    फिर उसने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे हो?”

    मैंने भी मुस्कुराने की कोशिश की।

    “ठीक हूँ… तुम?”

    “मैं भी ठीक हूँ।”

    हमने साथ बैठकर चाय पी।

    बहुत सारी बातें हुईं।

    उसने बताया कि उसकी शादी हो चुकी है। उसका एक छोटा बेटा भी है।

    मैंने भी अपनी ज़िंदगी के बारे में बताया।

    हम दोनों ने एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं की।

    क्योंकि अब शिकायतों की उम्र बीत चुकी थी।

    जाते-जाते उसने कहा, “जानते हो, पहला प्यार कभी खत्म नहीं होता। बस उसकी जगह बदल जाती है।”

    मैंने पूछा, “कैसी जगह?”

    वह मुस्कुराई।

    “दिल से निकलकर दुआओँ में।”

    मैं उसे दूर जाते हुए देखता रहा।

    इस बार मेरी आँखों में आँसू नहीं थे।

    बस एक सुकून था।

    क्योंकि अब मुझे समझ आ चुका था कि हर प्रेम कहानी का अंत शादी नहीं होती।

    कुछ प्रेम कहानियाँ इसलिए अधूरी रह जाती हैं ताकि इंसान को सिखा सकें कि सच्चा प्यार पाने का नहीं, निभाने का नाम है।

    आज भी जब बारिश होती है, मैं मुस्कुरा देता हूँ।

    क्योंकि मुझे याद आता है कि मेरी ज़िंदगी में भी कभी कोई था, जिसने मुझे बिना किसी शर्त के प्यार किया था।

    वह मेरा पहला प्यार था।

    और शायद… आखिरी भी।

    कहते हैं कि इंसान अपने पहले प्यार को कभी नहीं भूलता।

    मैं भी नहीं भूला।

    मैंने बस उसे यादों की सबसे सुरक्षित जगह पर रख दिया है, जहाँ न समय पहुँच सकता है, न दूरियाँ, न मजबूरियाँ।

    कुछ रिश्ते साथ चलकर पूरे होते हैं, और कुछ दूर होकर भी हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

    नैना अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं है, लेकिन मेरी दुआओँ का हिस्सा आज भी है।

    और शायद यही पहले प्यार की सबसे खूबसूरत पहचान है—वह कभी नफ़रत में नहीं बदलता।

    वह हमेशा एक मीठी याद बनकर दिल के किसी कोने में मुस्कुराता रहता है।

  • मीठे पुलाव — अनुराधा और अनु की कहानी

    मीठे पुलाव — अनुराधा और अनु की कहानी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    रसोई से इलायची और घी की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। अनुराधा ने चावल के बर्तन में चीनी डाली, फिर मुट्ठी भर किशमिश और काजू। लकड़ी के चम्मच से धीरे-धीरे चलाते हुए उसकी आँखें भर आईं। आज भी वह मीठा पुलाव बना रही थी, लेकिन खाने वाला अब सिर्फ एक ही था—उसकी आठ साल की बेटी, अनु।

     

    अनु दौड़ती हुई रसोई में आई और माँ की साड़ी का पल्लू पकड़कर बोली, “माँ, आज फिर मीठा पुलाव? आपको तो नमकीन पुलाव ज़्यादा पसंद है ना?”

     

    अनुराधा मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।

     

    “हाँ बेटा… लेकिन तुम्हारे पापा कहते थे कि मीठा पुलाव खाने से घर में मिठास बनी रहती है।”

     

    अनु कुछ पल चुप रही। उसने दीवार पर टंगी अपने पिता की तस्वीर की ओर देखा। तस्वीर पर चढ़ी माला थोड़ी सूख चुकी थी।

     

    “माँ… पापा को गए दो साल हो गए… क्या उन्हें हमारी याद आती होगी?”

     

    अनुराधा का हाथ काँप गया। चम्मच बर्तन से टकराया और हल्की सी आवाज़ आई।

     

    उसने अनु को अपनी गोद में बिठा लिया।

     

    “बहुत आती होगी… जितनी हमें उनकी आती है।”

     

    अनु ने मासूमियत से पूछा, “फिर वो वापस क्यों नहीं आते?”

     

    इस सवाल का जवाब शायद दुनिया की किसी माँ के पास नहीं होता।

     

    अनुराधा ने बस बेटी का माथा चूम लिया।

     

    —

     

    दो साल पहले तक यही घर हँसी से भरा रहता था।

     

    हर रविवार अनु के पिता, अमन, खुद रसोई में खड़े होकर मीठा पुलाव बनाते थे। वह कहते थे, “जिस घर में मीठे पुलाव की खुशबू हो, वहाँ नाराज़गी ज़्यादा देर नहीं टिकती।”

     

    अनुराधा हँसते हुए कहती, “इतनी तारीफ़ मत किया करो अपने पुलाव की।”

     

    और अमन जवाब देते, “देख लेना, एक दिन यही पुलाव मेरी याद बन जाएगा।”

     

    तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह बात सच हो जाएगी।

     

    एक सड़क दुर्घटना ने सब कुछ बदल दिया।

     

    अनु तब सिर्फ छह साल की थी।

     

    उसे समझ ही नहीं आया कि अस्पताल से लौटते समय लोग उसके पापा को सफेद चादर में क्यों लपेटे हुए थे।

     

    उस दिन के बाद अनुराधा ने महीनों तक रसोई में मीठा पुलाव नहीं बनाया।

     

    हर बार चावल हाथ में आते तो अमन की मुस्कान याद आ जाती।

     

    —

     

    समय धीरे-धीरे आगे बढ़ा, लेकिन कुछ दर्द कभी पुराने नहीं होते।

     

    अनु अब बड़ी हो रही थी।

     

    वह समझने लगी थी कि उसकी माँ हर रात चुपके से रोती है।

     

    एक रात उसने देखा कि अनुराधा पुराने एलबम को सीने से लगाकर बैठी है।

     

    अनु बिना कुछ बोले माँ के पास गई।

     

    उसने अपनी छोटी हथेली माँ के आँसू पोंछने के लिए आगे बढ़ाई।

     

    “माँ…”

     

    “हाँ बेटा?”

     

    “अगर मैं बड़ी होकर पापा जैसी बन जाऊँ… तो क्या आप फिर कभी नहीं रोओगी?”

     

    अनुराधा फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    उसने बेटी को कसकर गले लगा लिया।

     

    “तुम्हें किसी जैसा बनने की ज़रूरत नहीं है… तुम बस मेरी अनु बनी रहना।”

     

    —

     

    कुछ दिन बाद स्कूल में “माँ के लिए उपहार” प्रतियोगिता थी।

     

    सब बच्चे महंगे गिफ्ट बना रहे थे।

     

    किसी ने कार्ड बनाया, किसी ने पेंटिंग।

     

    लेकिन अनु चुपचाप घर आई और पड़ोस वाली दादी से बोली—

     

    “दादी… मुझे मीठा पुलाव बनाना सिखा दीजिए।”

     

    दादी ने हैरानी से पूछा, “इतनी छोटी सी बच्ची… क्यों?”

     

    अनु बोली, “माँ जब भी मीठा पुलाव बनाती हैं, रोने लगती हैं। इस बार मैं बनाऊँगी… ताकि माँ सिर्फ खाएँ… रोएँ नहीं।”

     

    दादी की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने बड़े प्यार से अनु को हर चीज़ सिखाई।

     

    चावल कितने धोने हैं…

     

    घी कितना डालना है…

     

    इलायची कब डालनी है…

     

    और सबसे ज़रूरी…

     

    खाना बनाते समय मन में प्यार होना चाहिए।

     

    —

     

    मदर्स डे की सुबह अनुराधा देर तक सोती रही।

     

    रसोई से कुछ जलने जैसी हल्की खुशबू आई।

     

    वह घबराकर उठी।

     

    रसोई में पहुँची तो देखा…

     

    अनु स्टूल पर खड़ी थी।

     

    बाल बिखरे हुए।

     

    चेहरे पर पसीना।

     

    हाथ में बड़ा सा चम्मच।

     

    और सामने आधा जला, आधा पका मीठा पुलाव।

     

    अनु डर गई।

     

    “सॉरी माँ… थोड़ा जल गया…”

     

    अनुराधा कुछ पल तक उसे देखती रही।

     

    फिर उसने गैस बंद की।

     

    बेटी को गोद में उठा लिया।

     

    “ये किसने बनाया?”

     

    “मैंने…”

     

    “क्यों?”

     

    अनु की आँखें भर आईं।

     

    “क्योंकि… मैं नहीं चाहती कि आप हर बार पापा को याद करके रोओ। आज आप सिर्फ मेरी माँ बनकर खाना खाइए…”

     

    बस…

     

    इतना सुनना था कि अनुराधा की दुनिया जैसे थम गई।

     

    उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी छोटी सी बेटी, उम्र से बहुत पहले बड़ी हो गई थी।

     

    —

     

    दोनों ने उसी जले हुए मीठे पुलाव को प्लेट में परोसा।

     

    अनुराधा ने पहला कौर खाया।

     

    चीनी कहीं ज़्यादा थी।

     

    चावल कुछ कच्चे थे।

     

    किशमिश भी आधी जली हुई थी।

     

    लेकिन…

     

    उसे लगा कि उसने ज़िंदगी का सबसे स्वादिष्ट भोजन खाया है।

     

    क्योंकि उसमें घी कम था…

     

    प्यार ज़्यादा था।

     

    —

     

    रात को अनु ने धीरे से पूछा—

     

    “माँ… पापा को हमारा पुलाव पसंद आता?”

     

    अनुराधा मुस्कुराई।

     

    “नहीं…”

     

    अनु उदास हो गई।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो कहते… इसमें चीनी थोड़ी कम है।”

     

    दोनों हँस पड़ीं।

     

    और उसी हँसी में बरसों का दर्द धीरे-धीरे पिघलने लगा।

     

    अनुराधा ने आसमान की ओर देखा।

     

    उसे लगा जैसे कहीं दूर अमन मुस्कुरा रहे हों।

     

    उसने मन ही मन कहा—

     

    “देखो अमन… तुम्हारा मीठा पुलाव अब सिर्फ एक खाना नहीं रहा। यह हमारी याद है… हमारी ताकत है… और हमारी बेटी का सबसे खूबसूरत प्यार भी।”

     

    उस रात बहुत दिनों बाद अनुराधा बिना रोए सो गई।

     

    और अनु ने माँ का हाथ पकड़कर आँखें बंद कर लीं।

     

    कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी खुशियाँ महंगे उपहारों में नहीं मिलतीं।

     

    वे मिलती हैं एक छोटी-सी रसोई में, आधे जले हुए मीठे पुलाव की खुशबू में, और उस मासूम बच्चे के दिल में, जो अपने हिस्से का बचपन छोड़कर अपनी माँ की मुस्कान बचाने की कोशिश करता है।

     

    यही प्यार है।

     

    यही परिवार है।

     

    और शायद यही वह मिठास है, जो किसी भी मीठे पुलाव से कहीं अधिक मीठी होती है।

  • पुराना पन्ना

    पुराना पन्ना

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    ​पहाड़ों की ढलान पर बसा वह छोटा सा गाँव शाम ढलते ही धुंध की चादर ओढ़ लेता था। 

    अक्टूबर की ठिठुरन महसूस होने लगी थी, गाँव के मोड़ पर बनी पुरानी चाय की टपरी पर हर शाम कुछ चेहरे जुटते थे, इन्हीं चेहरों में एक चेहरा था माधव का।

     

     

    ​माधव अपनी उम्र का पचास पड़ाव पार कर चुका था, उदास आँखें, बिखरे सफेद बाल और कंधे पर लटकता एक पुराना कैनवास का थैला, यह उसकी पहचान थी। गाँव के लोग जानते थे कि माधव कभी शहर का जाना-माना चित्रकार हुआ करता था। लेकिन पिछले दस सालों से उसने ब्रश को हाथ भी नहीं लगाया था। दस साल पहले एक सड़क हादसे में उसने अपनी इकलौती बेटी, स्नेहा को खो दिया था। उस हादसे ने न सिर्फ उसकी बेटी को छीना, बल्कि उसके भीतर के कलाकार को भी हमेशा के लिए सुला दिया।

    ​तब से माधव गाँव की इस चाय की दुकान पर बैठता, अलाव के उठते धुएँ को ताकता और खामोश रहता। उसकी ज़िंदगी उस रुकी हुई घड़ी की तरह हो गई थी, जिसकी सुइयां एक ही जगह ठहर गई हों।

     

     

    ​उस दिन भी हवा में गलन थी, चाय वाले रामू काका ने अलाव में कुछ सूखी लकड़ियाँ और डालीं। तभी बस स्टैंड की तरफ से एक छोटी सी लड़की चलती हुई टपरी के पास आई। उम्र यही कोई सात-आठ साल होगी। कंधे पर बड़ा सा स्कूल बैग, हाथ में एक स्केचबुक और चेहरे पर बेफ़िक्र मुस्कान।

     

     

    ​उसने रामू काका से पूछा, “काका, थोड़ा गरम पानी मिलेगा? मेरी बोतल का पानी बर्फ जैसा ठंडा हो गया है।”

     

     

    ​रामू काका ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया और पूछा, “बिटिया, तुम यहाँ नई आई हो क्या? पहले तो कभी नहीं देखा।”

     

     

    ​”हाँ काका! मेरे पापा का यहाँ फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में ट्रांसफर हुआ है। हम कल ही आए हैं, मेरा नाम दिशा है,” उसने चहकते हुए जवाब दिया।

     

     

    ​दिशा की नज़र पास ही बेंच पर बैठे माधव पर पड़ी, माधव अपनी धुन में अलाव की लपटों को देख रहा था। दिशा बिना झिझक के उसके बगल में जाकर बैठ गई। उसने अपनी स्केचबुक खोली और पेंसिल से अलाव का स्केच बनाने लगी।

    ​माधव ने अनमने ढंग से उसकी तरफ देखा, तो बच्ची के हाथ कांप रहे थे, पेंसिल की रेखाएँ टेढ़ी-मेढ़ी बन रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सा जुनून था।

     

     

    ​”रेखाएँ सीधी नहीं बन रहीं,” माधव के मुँह से अचानक निकल गया।

     

     

    ​दिशा ने चौंक कर उसकी तरफ देखा, फिर अपनी ड्राइंग को देखा, वह मुस्कुराई और बोली, “हाँ अंकल, पेंसिल बहुत छोटी है और मेरे हाथ ठंड से कांप रहे हैं। पर मुझे बनाना अच्छा लगता है। क्या आप मेरी मदद करेंगे?”

     

     

    ​माधव ने एक पल के लिए हिचकिचाया, दस साल… दस साल से उसने किसी स्केचबुक को नहीं छुआ था। पर फिर भी उसने उसने धीरे से अपना कांपता हाथ बढ़ाया और दिशा के हाथ से पेंसिल ले ली।

     

     

    ​माधव की उंगलियों ने जैसे ही पेंसिल को छुआ, उसकी स्मृति में पुरानी यादें तैर गईं। उसकी बेटी स्नेहा भी ठीक इसी उम्र में ऐसे ही ज़िद किया करती थी।

     

    ​माधव ने स्केचबुक के पन्ने पर पेंसिल चलाई, और एक ही मिनट में, उस टेढ़ी-मेढ़ी ड्राइंग ने एक नया रूप ले लिया। अलाव की लपटें, उससे निकलता धुआं और पीछे धुंध में लिपटा पहाड़, सब कुछ कागज़ पर ज़िंदा हो उठा।

     

     

    ​दिशा की आँखें फटी की फटी रह गईं, और उसके मुँह से निकला, “अरे वाह अंकल! आप तो जादूगर हैं! ये स्केच तो बिल्कुल असली लग रहा है।”

     

     

    ​माधव ने स्केचबुक वापस दिशा की तरफ बढ़ा दी, उसके हाथों में एक हल्की सी थरथराहट थी। बहुत दिनों बाद उसके सीने में दबी उदासी की चट्टान थोड़ी खिसकी थी।

     

     

    ​”अंकल, क्या आप मुझे रोज़ ड्राइंग सिखाएंगे?” दिशा ने बड़े ही मासूम भाव से पूछा।

     

     

    ​माधव ने गहरी सांस ली, फिर अलाव के धुएँ को देखा और धीमे से कहा, “नहीं बेटा, मैं अब पेंटिंग नहीं करता, मैंने यह सब बहुत पहले छोड़ दिया।”

     

     

    ​”क्यों? इतनी अच्छी चीज़ को कोई कैसे छोड़ सकता है?” दिशा का सीधा सवाल माधव के दिल में तीर की तरह चुभा। वह बिना कोई जवाब दिए, अपना थैला उठाकर वहाँ से उठकर चला गया।

     

     

    ​अगले कुछ दिनों तक माधव टपरी पर नहीं आया, वह अपने पुराने, सीलन भरे कमरे में बंद रहा। पर दिशा कहाँ मानने वाली थी। उसने रामू काका से माधव का घर पूछ लिया और एक दोपहर सीधे उसके घर पहुँच गई।

     

     

    ​घर का दरवाज़ा आधा खुला था, जिसके कारण दिशा चुपके से अंदर गई, तो देखा कमरा धूल से भरा हुआ था। कोने में कई कैनवास कपड़े से ढके रखे थे। उनको देख दिशा ने उत्सुकता में एक बड़े से कैनवास से कपड़ा हटा दिया।

     

     

    ​वह एक अधूरी पेंटिंग थी, एक छोटी लड़की की मुस्कुराती हुई तस्वीर, जिसके चारों तरफ चमकीले रंग थे, लेकिन चेहरा अधूरा छोड़ दिया गया था।

     

     

    ​तभी पीछे से माधव की सख्त आवाज़ आई, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

     

     

    ​दिशा उसकी आवाज़ सुन डरने की बजाय पलटकर सवाल पूछा, “अंकल, यह लड़की कौन है? और यह पेंटिंग अधूरी क्यों है?”

     

     

    ​माधव का चेहरा गुस्से और दर्द से लाल हो गया, उसने उसी लहजे में कहा, “यह मेरी बेटी है… स्नेहा! और यह अधूरी इसलिए है क्योंकि रंगों का कोई मतलब नहीं बचा। जब रोशनी ही चली जाए, तो रंगों से क्या सजाना?”

     

     

     

    ​माधव की आँखों में आँसू आ गए थे इतना कहते – कहते। उसने सोचा था कि बच्ची डरकर भाग जाएगी, लेकिन दिशा चलकर उसके पास आई। और फिर उसने अपने बैग से अपनी स्केचबुक निकाली और उसमें से एक पन्ना फाड़कर माधव के हाथ में थमा दिया।

     

     

    ​”अंकल, मेरी मम्मी कहती हैं कि जब शाम को अंधेरा होता है, तो सूरज मरता नहीं है… वह बस दूसरी तरफ रोशनी देने चला जाता है। अगर आप रंग भरना बंद कर देंगे, तो यह अंधेरा कभी खत्म ही नहीं होगा।”

     

     

     

    ​माधव ने उस फटे हुए पन्ने को देखा, उस पर दिशा ने एक स्केच बनाया था, एक बूढ़ा आदमी और एक छोटी लड़की अलाव के पास बैठे थे, और हवा में उड़ते धुएँ के बीच ऊपर बादलों में एक छोटी सी परी मुस्कुरा रही थी।

     

     

    ​उस बचकाने स्केच में जो भावना थी, उसने माधव के पत्थर बन चुके दिल को पिघलाकर रख दिया। वह घुटनों के बल बैठ गया और उस छोटे से पन्ने को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रो पड़ा। दस सालों का जमा हुआ दर्द आँसुओं के रास्ते बह निकला।

    ​

     

    क्योंकि उसे उस स्केच में वह बादलों में मुस्कराती हुई परी को अपनी बेटी समझ कर देख रहा था। 

     

     

    ​अगली सुबह पहाड़ पर एक अलग ही ताज़गी थी, सूरज की पहली किरणें जब धुंध को चीरती हुई बाहर निकलीं, तो चाय की टपरी पर रामू काका एक अनोखा नज़ारा देख रहे थे।

     

     

    ​माधव अलाव के पास बैठा था, उसके सामने एक नया कैनवास रखा था और हाथ में रंगों की प्लेट थी। उसके बगल में दिशा बैठी हुई अपनी स्केचबुक में रंग भर रही थी।

     

     

    ​माधव ने ब्रश उठाया और कैनवास पर पहला स्ट्रोक लगाया और उसने वही दस साल पुरानी अधूरी पेंटिंग पूरी करनी शुरू की थी। लेकिन इस बार वह उदास चेहरा नहीं बना रहा था। उसने स्नेहा के चेहरे पर वही मुस्कान उकेरी जो दिशा के चेहरे पर थी, और पृष्ठभूमि में गाँव के पहाड़ों पर उगते हुए नए सूरज को चित्रित किया।

     

     

     

    ​रामू काका ने मुस्कुराते हुए दो कप कड़क चाय उनके सामने रखी।

     

     

    ​माधव ने दिशा की तरफ देखा और कहा, “दिशा, आज तुम्हें सिखाऊंगा कि जब धुंध गहरी हो, तो कैनवास पर रोशनी कैसे बनाई जाती है।”

     

     

    ​दिशा खिलखिलाकर हँस पड़ी, “आप मुझे सब सीख दो!” 

     

     

    ​उस दिन अलाव का धुआं हवा में गायब हो रहा था, पर माधव के जीवन का अंधेरा हमेशा के लिए छट चुका था। उसने समझ लिया था कि अपनों की यादों को दर्द में नहीं, बल्कि उन रंगों और खुशियों में ज़िंदा रखा जाता है जो वे हमारे लिए छोड़ जाते हैं।

     

     

     

    —-

     

    आपको क्या लगता है कि जाने वाले की यादों को याद करके दर्द में रहना चाहिए। या अपने आप को एक नई उड़ान देनी चाहिए और जाने वाले को मुस्कुरा कर याद करना चाहिए। 

     

    मगर क्या जाने वाले को भुला देना इतना आसान होता है? 

     

     

  • सपनों का शहर

    सपनों का शहर

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    सपनों का शहर

     

    गाँव की धूल भरी गलियों में जब सूरज ढलता था तो आकाश में एक अलग सी चमक आ जाती थी। उसी चमक को देखकर अरुण के मन में सवाल उठते थे क्या शहर में भी सूरज ऐसे ही डूबता होगा? क्या वहाँ के सपने भी गाँव के सपनों जैसे टूटते होंगे या फिर पूरे हो जाते होंगे?

     

    अरुण बाईस साल का था। पिता खेतों में काम करते थे, माँ घर का काम और बहन की शादी की चिन्ता। घर में दो कमरे थे, एक आँगन, और एक पुराना रेडियो जो शाम को फिल्मी गाने बजाता था। अरुण उन गानों को सुनते हुए सोचता था कि मुम्बई में सब कुछ सम्भव है। वहाँ लोग सपने बेचते हैं, सपने खरीदते हैं, और कभी-कभी सपनों के साथ खुद को भी बेच देते हैं।

     

    एक दिन उसने तय कर लिया। सुबह चार बजे उठकर सामान बाँधा दो कमीजें, एक पैंट, माँ का दिया हुआ जनेऊ, और पिता का पुराना घड़ी। माँ रोई, पिता चुप रहे। बहन ने कहा, “भैया, लौटना मत भूलना।” अरुण मुस्कुराया, लेकिन दिल में कुछ और था। वह लौटना नहीं चाहता था। वह शहर में अपना नाम लिखना चाहता था।

     

    ट्रेन में बीस घंटे लगे। मुम्बई पहुँचा तो स्टेशन पर भीड़ ने उसे निगल लिया। लोग दौड़ रहे थे, चीख रहे थे, धक्का दे रहे थे। अरुण ने पूछा, “भाई साहब, दादर कैसे जाऊँ?” एक आदमी ने बिना रुके कहा, “लोकल पकड़।” लोकल क्या होती है, यह उसने पहली बार देखा। लोग खिड़कियों से लटक रहे थे, दरवाजों पर चिपके हुए थे। अरुण किसी तरह घुस गया। हवा में पसीने की गन्ध, तेल की गन्ध, और सपनों की एक अजीब सी गन्ध थी।

     

    दादर पहुँचा। वहाँ एक चाय की दुकान पर बैठकर उसने सोचा। पैसे कम थे। रात कहाँ बिताए? एक बुजुर्ग व्यक्ति ने देखा और पूछा, “नया है?” अरुण ने सिर हिलाया। बुजुर्ग ने कहा, “चल, मेरे साथ। नाम है रामलाल। मैं भी कभी गाँव से आया था।” रामलाल ने उसे एक छोटी सी झुग्गी में जगह दी। झुग्गी में चार लोग रहते थे। रात को छत से पानी टपकता था, लेकिन अरुण को लगा जैसे उसने महल पा लिया हो।

     

    सुबह रामलाल ने कहा, “काम ढूँढ। यहाँ कोई मुफ्त में नहीं खिलाता।” अरुण सड़कों पर निकला। होटलों में पूछा, दुकानों में पूछा, कारखानों के बाहर खड़ा रहा। कहीं “अनुभव चाहिए”, कहीं “अंग्रेजी आनी चाहिए”, कहीं “सिफारिश चाहिए”। तीन दिन बाद एक छोटे से ढाबे में बर्तन धोने का काम मिला। मालिक ने कहा, “दो सौ रोज। खाना मुफ्त।” अरुण ने हाँ कर दी।

     

    ढाबे में दिन भर बर्तन धोता, रात को झुग्गी लौटता। शरीर थक जाता, लेकिन मन नहीं थकता था। वह सोचता था एक दिन मैं भी बड़ा आदमी बनूँगा। एक दिन मेरा नाम अखबार में छपेगा। एक दिन माँ को मैं बड़ा घर दिखाऊँगा।

     

    एक शाम ढाबे में एक लड़की आई। नाम था मेघा। वह कॉलेज की छात्रा थी, पास वाले इलाके में रहती थी। वह रोज चाय पीने आती थी। अरुण जब बर्तन धो रहा होता तो वह मुस्कुराती। एक दिन उसने पूछा, “तुम कहाँ से हो?” अरुण ने गाँव का नाम बताया। मेघा ने कहा, “सपनों का शहर में स्वागत है। लेकिन याद रखना, यहाँ सपने सस्ते नहीं मिलते।”

     

    मेघा से बातें होने लगीं। वह किताबें पढ़ती थी, फिल्में देखती थी, और शहर की सच्चाइयाँ जानती थी। अरुण को उसने सिखाया कि अंग्रेजी के कुछ शब्द कैसे बोलें, कि रिज्यूम क्या होता है, कि इंटरव्यू में कैसे बैठना चाहिए। अरुण रात को झुग्गी में बैठा-बैठा उन शब्दों को दोहराता। रामलाल हँसता, “अरे, तू फिल्म स्टार बनने वाला है क्या?”

     

    तीन महीने बाद अरुण ने ढाबा छोड़ दिया। एक छोटे से ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली। वेतन तीन हजार। कमरा किराए पर लिया एक छोटा सा कमरा, जहाँ खिड़की से ट्रेन की आवाज आती थी। मेघा कभी-कभी मिलने आती। दोनों समुद्र किनारे बैठते, लहरों को देखते, और सपनों की बात करते।

     

    अरुण ने कहा, “मैं फिल्मों में काम करना चाहता हूँ।” मेघा चुप रही। फिर बोली, “बहुत लोग चाहते हैं। बहुत कम पहुँचते हैं।” अरुण ने जिद की, “मैं पहुँचूँगा।”

     

    उसने एक छोटे से थिएटर ग्रुप में दाखिला लिया। शाम को रिहर्सल, दिन को ऑफिस। थकान शरीर को तोड़ती, लेकिन आँखों में चमक रहती। एक दिन डायरेक्टर ने कहा, “तुम्हारे में कुछ है। लेकिन शहर में सिर्फ ‘कुछ’ काफी नहीं। कनेक्शन चाहिए, पैसा चाहिए, और किस्मत चाहिए।”

     

    अरुण ने कनेक्शन ढूँढे। एक असिस्टेंट डायरेक्टर से मिला, जिसने कहा, “पैसे दो, मैं तुम्हें एक छोटे रोल में डाल दूँगा।” अरुण के पास पैसे नहीं थे। उसने ऑफिस की नौकरी के साथ रात को टैक्सी चलायी। महीने भर में पैसे जमा किए और रोल खरीदा। फिल्म में उसका एक सीन था एक भीड़ में खड़ा आदमी जो सिर्फ मुस्कुराता है। फिल्म रिलीज हुई। किसी ने अरुण का नाम नहीं पूछा।

     

    मेघा ने कहा, “तुमने देखा? शहर ऐसे ही खाता है।” अरुण ने जवाब दिया, “मैं अभी नहीं हारा।”

     

    फिर एक और मौका आया। एक टीवी सीरियल में छोटा रोल। फिर एक विज्ञापन। फिर एक और फिल्म में बैकग्राउंड डांसर। पैसे आने लगे, लेकिन सम्मान नहीं। लोग पूछते, “तुम कौन हो?” अरुण जवाब देता, “मैं सपनों का शहर का एक सपना हूँ।”

     

    एक दिन रामलाल बीमार पड़ गया। अस्पताल में जगह नहीं मिली। अरुण ने सारे पैसे लगा दिए। रामलाल बच गया, लेकिन अरुण फिर से खाली हो गया। कमरा छोड़ा, फिर झुग्गी में लौटा। मेघा आई और बोली, “चलो गाँव लौट चलो। यहाँ कुछ नहीं रखा।” अरुण ने मना कर दिया। “मैं लौटूँगा तब, जब मेरे पास कहने को कुछ होगा।”

     

    समय बीतता गया। अरुण ने लिखा। कहानियाँ लिखीं, स्क्रिप्ट लिखीं। एक छोटी सी कहानी एक पत्रिका में छपी। फिर एक और। फिर एक रेडियो नाटक। पैसे कम थे, लेकिन नाम धीरे-धीरे फैलने लगा।

     

    एक शाम समुद्र किनारे बैठे हुए मेघा ने कहा, “तुम बदल गए हो।” अरुण ने पूछा, “कैसे?” मेघा बोली, “पहले तुम्हारी आँखों में भूख थी। अब समझ है।” अरुण मुस्कुराया, “शहर ने सिखाया कि सपने सिर्फ देखने की चीज नहीं। उन्हें जीना पड़ता है। और जीने के लिए कभी-कभी सपने तोड़ने भी पड़ते हैं।”

     

    फिर एक दिन एक बड़े प्रोडक्शन हाउस से फोन आया। उनकी एक स्क्रिप्ट पसंद आई थी। मीटिंग हुई। अरुण ने अपनी कहानी सुनाई गाँव से शहर आने वाले एक लड़के की कहानी, जो सपनों के पीछे भागता है, गिरता है, उठता है, और अंत में समझता है कि सपना शहर नहीं, खुद के अंदर होता है। डायरेक्टर ने कहा, “यह फिल्म बनेगी। तुम लिखोगे।”

     

    फिल्म बनी। अरुण का नाम लेखक के रूप में आया। प्रीमियर पर माँ-पिता आए। माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, तुमने कर दिखाया।” पिता ने सिर्फ कन्धे पर हाथ रखा। बहन ने कहा, “अब घर आ जाओ।” अरुण ने जवाब दिया, “घर तो अब यहीं है। लेकिन मैं आऊँगा।”

     

    फिल्म चली। लोग तारीफ करने लगे। अरुण अचानक जाना-माना नाम बन गया। इंटरव्यू में पूछा गया, “सपनों का शहर कैसा लगा?” अरुण ने कहा, “यह शहर सपनों को पूरा नहीं करता। यह सिर्फ आईना दिखाता है। जो खुद को देख पाता है, वही आगे बढ़ता है। बाकी लोग भीड़ में खो जाते हैं।”

     

    मेघा अब उसकी पत्नी थी। दोनों एक छोटे से फ्लैट में रहते थे। खिड़की से समुद्र दिखता था। रात को जब लहरें टकरातीं तो अरुण याद करता झुग्गी की रातें, बर्तन धोते हुए हाथ, रामलाल की खांसी, और वह पहला दिन जब ट्रेन से उतरा था।

     

    एक दिन रामलाल आया। बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो गया था। अरुण ने उसे गले लगाया। रामलाल बोला, “तूने कर लिया जो मैं नहीं कर पाया।” अरुण ने कहा, “आपके बिना मैं यहाँ नहीं टिक पाता।” रामलाल मुस्कुराया, “सपनों का शहर किसी को अकेला नहीं छोड़ता। या तो तोड़ देता है, या फिर नया बना देता है।”

     

    अरुण ने एक और कहानी लिखनी शुरू की। इस बार शीर्षक था “सपनों का शहर: एक और अध्याय”। लेकिन वह जानता था कि असली कहानी कभी खत्म नहीं होती। शहर चलता रहता है। लोग आते रहते हैं। सपने टूटते रहते हैं और नए सपने जन्म लेते रहते हैं।

     

    एक शाम अरुण समुद्र किनारे अकेला बैठा था। सूरज डूब रहा था। आकाश में वही चमक थी जो कभी गाँव में देखी थी। उसने सोचा क्या मैं पहुँच गया? क्या मेरा सपना पूरा हो गया?

     

    जवाब हवा में था। शहर की रोशनियाँ जल रही थीं। दूर कोई ट्रेन की सीटी बज रही थी। पास कोई गाना गा रहा था। अरुण उठा और चला। उसके कदम अब पहले जैसे नहीं थे। अब उनमें थकान कम, समझ ज्यादा थी।

     

    वापस फ्लैट पहुँचा तो मेघा ने पूछा, “क्या सोच रहे थे?” अरुण ने कहा, “सोच रहा था कि सपनों का शहर असल में कोई जगह नहीं है। यह एक यात्रा है। और यात्रा कभी खत्म नहीं होती। बस, रास्ते बदलते रहते हैं।”

     

    मेघा ने हाथ थाम लिया। दोनों खिड़की के पास खड़े रहे। बाहर शहर चमकीला था, शोरगुल भरा था, और अनगिनत सपनों से भरा हुआ था। कुछ सपने पूरे हो रहे थे, कुछ टूट रहे थे, कुछ नए जन्म ले रहे थे।

     

    अरुण ने धीरे से कहा, “मैं गाँव लौटूँगा एक दिन। लेकिन अभी नहीं। अभी मुझे और लिखना है। और कहानियाँ सुनानी हैं। क्योंकि इस शहर में हर किसी की एक कहानी है। और मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

     

    रात गहरी हो गई। शहर सो नहीं रहा था। कभी सोता भी नहीं। सपनों का शहर जागता रहता है उन लोगों के लिए जो अभी आए हैं, उन लोगों के लिए जो हार चुके हैं, और उन लोगों के लिए जो अभी भी लड़ रहे हैं।

     

    अरुण बिस्तर पर लेटा। आँखें बंद कीं। नींद में उसे गाँव दिख रहा था खेत, आँगन, माँ का चेहरा, और वह पुराना रेडियो। फिर दृश्य बदला। मुम्बई का स्टेशन, भीड़, रामलाल, मेघा, समुद्र, फिल्म का सेट, और अंत में वह खुद एक लेखक, जो अपनी कहानी खुद लिख रहा था।

     

    सुबह जब उठा तो सूरज की पहली किरण खिड़की से आ रही थी। अरुण मुस्कुराया। उसने नोटबुक खोली और लिखा

     

    “सपनों का शहर में कोई अंत नहीं होता। सिर्फ नए शुरूआत होती हैं। और हर शुरूआत एक नई कहानी लेकर आती है।”

     

    कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन शहर में कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। अरुण की कहानी एक एपिसोड में पूरी हो गई गाँव से शहर, संघर्ष से सफलता, सपने से समझ तक। वह पहुँच गया जहाँ पहुँचना चाहता था। लेकिन असली जीत यह नहीं थी कि उसका नाम छापा। असली जीत यह थी कि उसने खुद को खोया नहीं। शहर ने उसे तोड़ा, फिर जोड़ा, और अंत में एक नया इंसान बना दिया।

     

    और यही सपनों का शहर का सच है। यह तुम्हें वह सब कुछ देता है जो तुम चाहते हो बशर्ते तुम देने के लिए तैयार हो। कभी-कभी सपने, कभी-कभी अपनी पुरानी पहचान, और कभी-कभी सिर्फ समय।

     

     

     

    अरुण अब समय के साथ चल रहा था। और शहर उसके साथ चल रहा था। दोनों एक-दूसरे को समझ चुके थे। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।