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  • घुँघरुओं से सरहद तक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    अध्याय 1 — दो सपने, दो रास्ते

     

    सुबह की हल्की धूप खिड़की से कमरे में उतर रही थी। पाँच साल की नन्ही इरा आईने के सामने खड़ी थी। उसके छोटे-छोटे पैरों में बंधे घुँघरू हर कदम पर मीठी-सी आवाज़ कर रहे थे।

     

    “एक… दो… तीन… चार…”

     

    समने बैठी उसकी माँ मुस्कुरा रही थीं।

     

    “शाबाश इरा… बस ऐसे ही।”

     

    छोटी-सी इरा हर स्टेप पूरे मन से करती। कई बार गिरती, फिर खुद ही उठकर दोबारा नाचने लगती।

     

    माँ ने उसके माथे का पसीना पोंछते हुए पूछा, “थक गई?”

     

    इरा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं… मुझे बड़ा डांसर बनना है।”

     

    उसकी आँखों में उम्र से कहीं बड़े सपने थे।

     

    दिन बीतते गए। इरा स्कूल भी जाती और हर शाम डांस अकादमी भी। बाकी बच्चे छुट्टी के बाद खेलते थे, लेकिन इरा के लिए खेल भी डांस ही था।

     

    वह प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी। कभी जीतती, कभी हारती, लेकिन हारने पर भी उसके चेहरे की मुस्कान नहीं जाती थी।

     

    एक बार जिला स्तरीय प्रतियोगिता में वह दूसरे स्थान पर आई।

     

    सबको लगा कि वह रो पड़ेगी।

     

    लेकिन वह सीधे विजेता लड़की के पास गई, उसे गले लगाया और बोली,

     

    “आज तुमने बहुत अच्छा डांस किया। अगली बार मैं और मेहनत करूँगी।”

     

    उस दिन वहाँ मौजूद निर्णायक भी उसकी इस बात से प्रभावित हुए।

     

    धीरे-धीरे इरा की पहचान सिर्फ़ एक अच्छी डांसर के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छे इंसान के रूप में बनने लगी।

     

     

     

    उधर, शहर के दूसरे कोने में एक लड़का हर सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता था।

     

    उसका नाम था रुद्र।

     

    जहाँ दूसरे बच्चे क्रिकेट खेलते थे, वहीं रुद्र अपने घर की छत पर दौड़ लगाता, पुश-अप्स करता और तिरंगे को देखकर सलाम करता।

     

    एक दिन उसके पिता ने पूछा,

     

    “इतनी मेहनत क्यों करता है?”

     

    रुद्र ने बिना सोचे जवाब दिया,

     

    “एक दिन मैं सेना की वर्दी पहनूँगा।”

     

    उसकी आवाज़ में ऐसा विश्वास था कि पिता कुछ पल उसे देखते ही रह गए।

     

    रुद्र बचपन से ही निडर था।

     

    किसी को परेशान होते देख वह चुप नहीं बैठता था।

     

    कई बार उसकी यही आदत उसे मुसीबत में भी डाल देती।

     

    स्कूल में एक बार कुछ बड़े लड़के एक छोटे बच्चे को तंग कर रहे थे।

     

    रुद्र अकेला ही उनके सामने खड़ा हो गया।

     

    मारपीट हुई, उसके कपड़े फट गए, लेकिन उसने उस बच्चे को बचा लिया।

     

    घर पहुँचने पर माँ ने डाँटा,

     

    “हर लड़ाई में कूदना ज़रूरी है क्या?”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “अगर कोई गलत कर रहा हो, तो चुप रहना उससे भी बड़ी गलती है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    रुद्र ने एनसीसी जॉइन की।

     

    कड़ी मेहनत के बाद उसने एनडीए की परीक्षा पास की।

     

    फिर कठिन प्रशिक्षण के कई महीनों बाद वह भारतीय सेना का हिस्सा बन गया।

     

    उस दिन जब उसने पहली बार वर्दी पहनी, तो उसकी माँ की आँखों में आँसू थे।

     

    रुद्र ने सलाम करते हुए कहा,

     

    “आज मेरा सपना पूरा हुआ है… अब मेरी ज़िंदगी देश के नाम है।”

     

     

     

    इधर इरा भी अब एक जानी-मानी युवा डांसर बन चुकी थी।

     

    उसकी मेहनत रंग ला रही थी।

     

    देश के अलग-अलग शहरों से उसे प्रदर्शन के निमंत्रण मिलने लगे।

     

    एक दिन उसकी टीम को गोवा में होने वाले एक बड़े डांस फेस्टिवल का निमंत्रण मिला।

     

    इरा खुशी से उछल पड़ी।

     

    उसी समय दूसरी तरफ़ रुद्र को भी कई महीनों बाद दस दिनों की छुट्टी मिली।

     

    उसके दोस्तों ने कहा,

     

    “इस बार कहीं घूमने चलते हैं।”

     

    बहुत सोचने के बाद सबने गोवा जाने का फैसला किया।

     

    उन्हें नहीं पता था कि यह छुट्टी सिर्फ़ एक सफ़र नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाली थी।

     

    एक ही शहर…

     

    एक ही होटल…

     

    दो बिल्कुल अलग दुनिया…

     

    और किस्मत ने दोनों के नाम एक ही कहानी में लिख दिए थे।

     

    (अध्याय 1 समाप्त)