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टैग: #हास्य #भावपूर्ण

  • लोहे की सासू मां

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    लोहे की सासू माँ 

     

    मीरा की शादी को दो साल हो चुके थे। उसका पति अमन एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। दोनों शहर से थोड़ी दूर एक छोटे-से घर में रहते थे। घर में उनके अलावा कोई नहीं था। अमन के माता-पिता कई साल पहले इस दुनिया से जा चुके थे। इसलिए मीरा पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं थी।

     

    हर सुबह मीरा पाँच बजे उठ जाती। चाय बनाती, नाश्ता तैयार करती, घर की सफाई करती, कपड़े धोती और खाना भी बना लेती। नौ-दस बजे तक उसका सारा काम खत्म हो जाता। फिर वह अपने पौधों में पानी डालती, कभी सिलाई करती तो कभी किताब पढ़ने बैठ जाती।

     

    उसकी जिंदगी बहुत सादगी से चल रही थी।

     

    लेकिन उसके मोहल्ले की कुछ औरतों को उसकी यह जिंदगी बिल्कुल पसंद नहीं थी।

     

    जब भी वे मीरा को खाली बैठा देखतीं, कोई न कोई ताना जरूर मार देती।

     

    एक दिन कमला बोली,

    “अरे मीरा, तेरी तो किस्मत ही खुल गई। न सास है, न ननद। आराम ही आराम है।”

     

    दूसरी पड़ोसन शांति हंसते हुए बोली,

    “हमारी सास तो हर पाँच मिनट में आवाज लगा देती हैं। कभी चाय बना, कभी पानी ला, कभी ये कर, कभी वो कर।”

     

    तीसरी औरत भी बोल पड़ी,

    “तुझे क्या पता बहू होना किसे कहते हैं? तेरे ऊपर तो कोई हुक्म चलाने वाला ही नहीं है।”

     

    सब औरतें हंसने लगीं।

     

    मीरा भी हल्का-सा मुस्कुरा देती, लेकिन अंदर ही अंदर उसे बुरा लगता था।

     

    उसे अपनी सास की कमी कभी महसूस नहीं हुई थी। लेकिन रोज-रोज एक ही बात सुनकर अब उसका मन उदास रहने लगा।

     

    शाम को अमन घर लौटा तो उसने देखा कि मीरा चुपचाप बैठी है।

     

    “क्या हुआ? आज इतनी शांत क्यों हो?”

     

    मीरा बोली,

    “क्या सच में बिना सास के बहू की कोई कीमत नहीं होती?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “लोगों की बातों पर ध्यान मत दो। हर किसी को दूसरे की जिंदगी में कमी निकालने की आदत होती है।”

     

    मीरा ने सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन में कुछ और ही चल रहा था।

     

    अगले दिन उसने घर के कोने-कोने से पुराने लोहे के बर्तन निकालने शुरू कर दिए। टूटी कड़ाही, पुराना तवा, जंग लगी बाल्टी, बेकार चिमटा, पुरानी थाली, लोहे का डिब्बा और कई टूटे-फूटे सामान उसने एक जगह इकट्ठा कर दिए।

     

    अमन ने हैरानी से पूछा,

    “ये सब कबाड़ क्यों जमा कर रही हो?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “बस… एक छोटा-सा काम है।”

     

    वह सारे बर्तन लेकर गांव के मशहूर लोहार रामदीन के पास पहुंच गई।

     

    रामदीन ने पूछा,

    “अरे बहू, इतना कबाड़ किसलिए लाई हो?”

     

    मीरा बोली,

    “काका, मुझे इन सबसे एक मूर्ति बनवानी है।”

     

    रामदीन ने पूछा,

    “किसकी मूर्ति?”

     

    मीरा ने बिल्कुल गंभीर होकर जवाब दिया,

    “मेरी सासू माँ की।”

     

    रामदीन पहले तो कुछ पल उसे देखता रहा, फिर जोर से हंस पड़ा।

     

    “अरे बहू, कहीं मजाक तो नहीं कर रही?”

     

    “नहीं काका। बिल्कुल सच कह रही हूं।”

     

    रामदीन को बात अजीब जरूर लगी, लेकिन उसने काम करने की हामी भर दी।

     

    करीब दस दिन तक वह मेहनत करता रहा। आखिरकार पुराने बर्तनों और लोहे के टुकड़ों से एक बड़ी मूर्ति तैयार हो गई।

     

    मूर्ति बिल्कुल किसी सख्त स्वभाव वाली सास जैसी लग रही थी। सिर पर पल्लू, कमर पर हाथ और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे अभी किसी को डांटने वाली हो।

     

    मीरा ने खुशी-खुशी वह मूर्ति घर लाकर रसोई के दरवाजे के पास खड़ी कर दी।

     

    अगली सुबह उसने सबसे पहले मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर कहा,

    “प्रणाम सासू माँ।”

     

    फिर खुद ही आवाज बदलकर बोली,

    “बहू, पहले झाड़ू लगा।”

     

    मीरा हंसते हुए झाड़ू लगाने लगी।

     

    थोड़ी देर बाद फिर बोली,

    “अब बर्तन धो।”

     

    और वह बर्तन धोने लगी।

     

    कभी कहती,

    “बहू, चाय बना।”

     

    तो खुद ही चाय बना लेती।

     

    अगर थक जाती तो मूर्ति के सामने बैठकर कहती,

    “सासू माँ, आज थोड़ा आराम कर लूं?”

     

    फिर खुद ही जवाब देती,

    “ठीक है बहू, लेकिन शाम की रोटी समय पर बन जानी चाहिए।”

     

    यह सब देखकर अमन अपनी हंसी नहीं रोक पाता।

     

    एक दिन पड़ोस की कमला खिड़की से यह सब देख रही थी। उसने तुरंत बाकी औरतों को बुला लिया।

     

    कुछ ही देर में सभी मीरा के घर के बाहर खड़ी थीं।

     

    उन्होंने जैसे ही लोहे की सासू माँ को देखा, उनकी आंखें खुली की खुली रह गईं।

     

    कमला ने पूछा,

    “मीरा… ये सब क्या है?”

     

    मीरा मुस्कुराकर बोली,

    “आप लोग रोज़ कहती थीं कि मेरी सास नहीं है। इसलिए मैंने सोचा, अब यह कमी भी पूरी कर लेती हूं।”

     

    इतना सुनते ही कुछ औरतें हंसने लगीं, लेकिन मीरा के चेहरे पर हल्की-सी गंभीर मुस्कान थी।

     

     

    मीरा की बात सुनकर कुछ औरतें हंस रही थीं, लेकिन उसकी आंखों में छिपा दर्द किसी ने नहीं देखा।

     

    कमला ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “अरे, हमने तो मजाक किया था। तूने सच में लोहे की सास बना डाली!”

     

    मीरा ने शांत आवाज में कहा,

    “मजाक रोज़-रोज़ सुनने वाले को कैसा लगता है, ये वही जानता है। आप सब बार-बार यही कहती थीं कि मेरी जिंदगी आसान है क्योंकि मेरी सास नहीं है। इसलिए मैंने सोचा, अब मेरे घर में भी सासू माँ होंगी।”

     

    इतना कहकर वह रसोई में चली गई।

     

    अगले दिन से उसकी एक नई आदत बन गई।

     

    सुबह उठते ही वह मूर्ति के सामने हाथ जोड़ती और कहती,

    “सासू माँ, आज क्या-क्या काम करना है?”

     

    फिर खुद ही दूसरी आवाज़ बनाकर बोलती,

    “बहू, पहले आंगन साफ कर, फिर नाश्ता बना, उसके बाद कपड़े धोना मत भूलना।”

     

    यह देखकर अमन हंसते-हंसते लोटपोट हो जाता।

     

    वह कहता,

    “मीरा, अगर किसी ने पहली बार यह देखा तो सच में समझेगा कि हमारी सासू माँ यहीं रहती हैं।”

     

    मीरा भी मुस्कुरा देती।

     

    कुछ ही दिनों में पूरे मोहल्ले में यह बात फैल गई।

     

    लोग दूर-दूर से सिर्फ उस लोहे की सासू माँ को देखने आने लगे।

     

    कोई फोटो खींचता, कोई हंसता, तो कोई हैरानी से मूर्ति को देखता रहता।

     

    एक दिन कुछ छोटे बच्चे भी वहां पहुंच गए।

     

    एक बच्चे ने पूछा,

    “चाची, क्या ये आपको डांटती भी हैं?”

     

    मीरा हंसकर बोली,

    “जब मैं आलस करती हूं, तब बहुत डांटती हैं।”

     

    दूसरा बच्चा बोला,

    “फिर तो ये अच्छी सासू माँ हैं।”

     

    सब बच्चे खिलखिलाकर हंस पड़े।

     

    उसी समय अमन भी ऑफिस से घर लौट आया।

     

    उसने बच्चों से मजाक में कहा,

    “सावधान! ज्यादा शोर मचाया तो मेरी लोहे वाली सासू माँ तुम्हें भी झाड़ू लगवा देंगी।”

     

    बच्चे हंसते हुए भाग गए।

     

    धीरे-धीरे मोहल्ले की औरतों को एहसास होने लगा कि मीरा ने यह सब मजाक के लिए नहीं किया था। उसके मन को उनके तानों ने सचमुच चोट पहुंचाई थी।

     

    एक दोपहर गांव की सबसे बुजुर्ग महिला, जिन्हें सब दादी कहते थे, मीरा के घर आईं।

     

    उन्होंने लोहे की मूर्ति को ध्यान से देखा, फिर मीरा के पास बैठ गईं।

     

    “बेटी, सच-सच बता, क्या बात है?”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसने धीरे से कहा,

    “दादी, मुझे कभी सास न होने का दुख नहीं था। लेकिन लोगों ने ऐसा महसूस करा दिया कि जैसे मेरी जिंदगी अधूरी है। हर दिन वही ताना सुन-सुनकर मैंने सोचा, अगर लोगों को सास चाहिए, तो मैं खुद ही बना लेती हूं।”

     

    दादी ने गहरी सांस ली।

     

    उन्होंने उसी शाम मोहल्ले की सभी औरतों को बुलाया।

     

    सबके सामने उन्होंने कहा,

    “किसी की मजबूरी या उसकी किस्मत का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। जिसके पास जो नहीं है, उसे बार-बार याद दिलाना सबसे बड़ा दुख होता है।”

     

    सभी औरतों के सिर शर्म से झुक गए।

     

    कमला सबसे आगे आई।

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़कर कहा,

    “हमें माफ कर दे। हमने कभी सोचा ही नहीं कि हमारी बातें तुझे इतना दुख पहुंचा रही हैं।”

     

    बाकी औरतों ने भी उससे माफी मांगी।

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली,

    “अब पुरानी बातें भूल जाइए।”

     

    कमला ने हंसते हुए लोहे की मूर्ति की तरफ देखा और बोली,

    “चलो, अब तो हमारी भी सासू माँ बन गईं।”

     

    यह सुनते ही पूरा आंगन हंसी से गूंज उठा।

     

    उस दिन के बाद मोहल्ले का माहौल बदल गया।

     

    अब औरतें मीरा के घर ताने देने नहीं, बल्कि चाय पीने और बातें करने आने लगीं।

     

    अगर किसी को कोई परेशानी होती, तो मीरा उसकी मदद करती।

     

    धीरे-धीरे सबके बीच अच्छा रिश्ता बन गया।

     

    लोहे की वह सासू माँ अब सिर्फ एक मूर्ति नहीं रही थी, बल्कि पूरे मोहल्ले को एक सीख देने वाली निशानी बन गई थी।

     

    कई साल बाद भी जब कोई नया व्यक्ति उस गली में आता, तो सबसे पहले उसी मूर्ति के बारे में पूछता।

     

    लोग मुस्कुराकर कहते,

    “ये सिर्फ लोहे की मूर्ति नहीं है, बल्कि उन तानों का जवाब है जो किसी के दिल को चोट पहुंचाते हैं।”

     

    मीरा आज भी कभी-कभी उस मूर्ति के सामने खड़ी होकर हंसते हुए कहती,

     

    “सासू माँ, अब तो सब सुधर गए हैं। अब आपको किसी को डांटने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”

     

    और फिर खुद ही जवाब देती,

     

    “बहू, अगर लोग एक-दूसरे की इज्जत करना सीख जाएं, तो हर घर अपने आप खुशियों से भर जाता है।”