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  • सावन में कांवड़ यात्रा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सावन की कावड़ यात्रा — भोलेनाथ का बुलावा

     

    सावन का महीना शुरू होते ही पूरा गांव जैसे भोलेनाथ की भक्ति में रंग गया था। हर तरफ “हर हर महादेव” और “बोल बम” के जयकारे सुनाई दे रहे थे। गांव के मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भीड़ लगी रहती थी।

     

    उसी गांव में प्रकाश नाम का एक साधारण लड़का रहता था। वह भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन महादेव के लिए उसके मन में बहुत श्रद्धा थी।

     

    एक दिन सुबह प्रकाश मंदिर में जल चढ़ाते हुए हाथ जोड़कर बोला,

     

    “भोलेनाथ, मेरी एक इच्छा है। इस सावन में मैं आपके लिए कावड़ लेकर हरिद्वार से गंगाजल लाना चाहता हूं। बस आप मेरा साथ देना।”

     

    प्रकाश के पिता ने उसकी बात सुनी तो बोले,

     

    “बेटा, रास्ता बहुत लंबा है। इतनी दूर पैदल चलना आसान नहीं होगा।”

     

    प्रकाश मुस्कुराया।

     

    “बाबा, जब साथ भोलेनाथ हों तो रास्ता कितना भी लंबा हो, डर नहीं लगता।”

     

    अगले दिन प्रकाश ने कावड़ यात्रा की तैयारी शुरू कर दी। उसने अपने दोस्तों के साथ कावड़ सजाई। कावड़ के दोनों तरफ छोटे-छोटे कलश बांधे और उन पर फूल लगाए।

     

    जब यात्रा का दिन आया तो गांव से कई लोग हरिद्वार जाने के लिए निकले। सभी के चेहरे पर उत्साह था।

     

    “बोल बम!”

     

    “हर हर महादेव!”

     

    जयकारों के बीच प्रकाश ने अपनी कावड़ उठाई और यात्रा शुरू कर दी।

     

    शुरुआत में सब कुछ आसान लग रहा था। रास्ते में जगह-जगह भक्तों के लिए भंडारे लगे थे। कोई पानी पिला रहा था, कोई फल बांट रहा था और कोई थके हुए कावड़ियों के पैर दबा रहा था।

     

    प्रकाश हर किसी को देखकर हाथ जोड़ता और कहता,

     

    “महादेव सबका भला करें।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद उसका दोस्त राकेश बोला,

     

    “प्रकाश, तू इतनी भारी कावड़ लेकर इतनी दूर कैसे चलेगा?”

     

    प्रकाश ने हंसते हुए कहा,

     

    “कावड़ मेरे कंधे पर है, लेकिन हिम्मत मेरे भोलेनाथ के हाथ में है।”

     

    दोनों आगे बढ़ते रहे।

     

    कई घंटे चलने के बाद रास्ता मुश्किल होने लगा। पैरों में दर्द होने लगा। धूप भी तेज थी। कुछ साथी आराम करने के लिए रुक गए, लेकिन प्रकाश आगे बढ़ता रहा।

     

    तभी उसे रास्ते के किनारे एक बुजुर्ग आदमी दिखाई दिया। वह बहुत थका हुआ था और उसके पास पानी भी नहीं था।

     

    प्रकाश तुरंत रुक गया।

     

    “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    बुजुर्ग ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “बेटा, बहुत प्यास लगी है।”

     

    प्रकाश ने बिना सोचे अपनी पानी की बोतल उन्हें दे दी।

     

    राकेश बोला,

     

    “प्रकाश, आगे रास्ता बहुत लंबा है। अपना पानी मत खत्म कर।”

     

    प्रकाश ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अगर किसी प्यासे को पानी न दे पाया तो मेरी कावड़ किस काम की?”

     

    बुजुर्ग ने पानी पीकर प्रकाश की ओर देखा।

     

    “बेटा, भगवान शिव तुम्हारा रास्ता आसान करें।”

     

    प्रकाश ने उनके पैर छुए और आगे बढ़ गया।

     

    कुछ देर बाद अचानक मौसम बदल गया। आसमान में काले बादल छा गए और तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    कावड़ियों ने अपनी कावड़ संभाली और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। रास्ता कीचड़ से भर गया था।

     

    राकेश घबराकर बोला,

     

    “प्रकाश, वापस चलें? बहुत मुश्किल हो रही है।”

     

    प्रकाश ने कावड़ को संभालते हुए कहा,

     

    “नहीं राकेश। मंजिल पास हो या दूर, हमें अपने भोलेनाथ तक पहुंचना है।”

     

    बारिश के बीच वे आगे बढ़ते रहे।

     

    कुछ दूर जाने पर प्रकाश का पैर फिसल गया। वह जमीन पर गिर पड़ा। कावड़ भी उसके हाथ से छूटते-छूटते बची।

     

    राकेश ने उसे उठाया।

     

    “प्रकाश! चोट लगी है?”

     

    प्रकाश ने अपने पैर को देखा और दर्द सहते हुए बोला,

     

    “थोड़ी लगी है… लेकिन कावड़ को कुछ नहीं हुआ।”

     

    राकेश ने कहा,

     

    “तू आराम कर ले।”

     

    प्रकाश बोला,

     

    “मेरी थकान से ज्यादा जरूरी मेरी श्रद्धा है।”

     

    वह फिर चल पड़ा।

     

    आखिरकार कई घंटों की कठिन यात्रा के बाद वे हरिद्वार पहुंचे। गंगा के किनारे पहुंचते ही प्रकाश की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ, मैं आ गया।”

     

    उसने गंगाजल भरा और कावड़ को अपने कंधे पर रख लिया।

     

    अब वापसी की यात्रा शुरू हुई।

     

    इस बार प्रकाश के मन में एक अलग ही शांति थी। रास्ता अभी भी लंबा था, लेकिन उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसके कदमों को आगे बढ़ा रही हो।

     

    कई दिनों की यात्रा के बाद वह अपने गांव पहुंचा।

     

    गांव वालों ने उसका स्वागत किया।

     

    मंदिर के सामने पहुंचकर प्रकाश ने कावड़ से गंगाजल उतारा और शिवलिंग पर जल चढ़ाया।

     

    “हर हर महादेव!”

     

    पूरा मंदिर जयकारों से गूंज उठा।

     

    प्रकाश ने आंखें बंद कीं।

     

    उसे अचानक वही बुजुर्ग याद आए, जिन्हें उसने रास्ते में पानी पिलाया था।

     

    तभी मंदिर के पुजारी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा,

     

    “बेटा, आज तूने सिर्फ कावड़ यात्रा पूरी नहीं की। तूने रास्ते में एक प्यासे इंसान की मदद करके सच्ची शिवभक्ति भी की है।”

     

    प्रकाश ने हैरानी से पूछा,

     

    “पंडित जी, आपको उस बुजुर्ग के बारे में कैसे पता?”

     

    पुजारी मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि वह कोई साधारण बुजुर्ग नहीं था। कई साल पहले इस मंदिर में एक साधु आया करते थे। लोग कहते थे कि वह स्वयं महादेव के बहुत बड़े भक्त थे। आज सुबह गांव के बाहर किसी ने उन्हें देखा था… लेकिन उसके बाद वह कहीं दिखाई नहीं दिए।”

     

    प्रकाश कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने शिवलिंग की ओर देखा और धीरे से कहा,

     

    “भोलेनाथ… क्या आप ही थे?”

     

    मंदिर में उसी समय घंटियां बजने लगीं।

     

    प्रकाश के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उसे अपने सवाल का जवाब मिल चुका था।

     

    उस दिन उसे समझ आया कि कावड़ सिर्फ कंधे पर उठाया हुआ गंगाजल नहीं है। असली कावड़ तो वह श्रद्धा है, जिसमें इंसान रास्ते की मुश्किलों के बावजूद दूसरों की मदद करना नहीं भूलता।

     

    प्रकाश ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “हे महादेव, मेरे कंधे की कावड़ भले ही आज उतर गई हो, लेकिन आपके प्रति मेरी भक्ति हमेशा मेरे दिल में रहेगी।”

     

    और पूरा गांव एक साथ बोल उठा

    “हर हर महादेव!”

     

    सावन की उस पावन यात्रा ने प्रकाश को सिर्फ मंदिर तक नहीं पहुंचाया था, बल्कि उसे भक्ति का असली अर्थ भी समझा दिया थाभगवान को पाने के लिए लंबा रास्ता तय करना जरूरी नहीं, किसी जरूरतमंद के लिए उठाया गया एक छोटा सा कदम भी सच्ची पूजा बन जाता है।