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  • सच की जीत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 3: सच की जीत

     

    अगली सुबह शौर्य बहुत जल्दी उठ गया। रातभर उसके दिमाग में वही संदेश घूमता रहा था—

     

    “अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

     

    वह तैयार होकर चुपचाप घर से निकलने लगा।

     

    तभी पीछे से कबीर की आवाज आई, “इतनी सुबह कहां जा रहा है?”

     

    शौर्य पलटा।

     

    “तू यहां?”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था तू अकेला जाने की कोशिश करेगा।”

     

    शौर्य ने कहा, “मैसेज में साफ लिखा था कि अकेले आना है।”

     

    कबीर बोला, “और मैंने तय किया था कि इस बार तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    शौर्य ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन कबीर नहीं माना।

     

    दोनों पुराने पुल की तरफ चल पड़े।

     

    पुल के पास पहुंचकर शौर्य ने चारों तरफ देखा। वहां कोई नहीं था।

     

    “शायद जिसने मैसेज किया था, वो आया नहीं।”

     

    कबीर बोला, “या फिर हमें देख रहा है।”

     

    शौर्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डराने की जरूरत नहीं है।”

     

    “मैं डर नहीं रहा। बस तेरी नादानियों का अनुभव है।”

     

    दोनों कुछ देर इंतजार करते रहे।

     

    तभी पीछे से किसी ने आवाज लगाई।

     

    “शौर्य!”

     

    शौर्य पलटा।

     

    रघुवीर वहां खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी फाइल थी।

     

    शौर्य तुरंत उसके पास गया।

     

    “आपने मुझे यहां बुलाया था?”

     

    रघुवीर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    शौर्य ने पूछा, “कल आपने उस घर में मुझे वो चाबी क्यों दी थी?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि अब समय आ गया है कि तुम्हें पूरा सच पता चले।”

     

    कबीर ने पूछा, “आप इतने सालों से चुप क्यों थे?”

     

    रघुवीर कुछ पल शांत रहा।

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    शौर्य ने हैरानी से पूछा, “आप?”

     

    “हां। मैं भी उस समय तुम्हारे पिता के साथ था। लेकिन जब मुश्किल आई, तो मैंने उनका साथ छोड़ दिया।”

     

    रघुवीर ने फाइल शौर्य की तरफ बढ़ा दी।

     

    “इसमें सबूत हैं।”

     

    शौर्य ने फाइल खोली।

     

    अंदर कई पुराने कागज, रसीदें और कुछ तस्वीरें थीं।

     

    एक दस्तावेज पर उसके पिता के हस्ताक्षर थे।

     

    उसके पिता के नाम पर जिस रकम की हेराफेरी का आरोप लगाया गया था, वह रकम असल में किसी दूसरे खाते में भेजी गई थी।

     

    शौर्य की आंखें फैल गईं।

     

    “तो पापा ने पैसे नहीं चुराए थे?”

     

    “नहीं।”

     

    अनाया भी वहां पहुंच गई।

     

    “मेरे पिता भी निर्दोष थे?”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां। तुम्हारे पिता ने जब सच्चाई पता करने की कोशिश की, तो उन्हें धमकाया गया।”

     

    अनाया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “उन्होंने हमें कुछ क्यों नहीं बताया?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि उन्हें डर था कि सच की कीमत तुम्हारे परिवार को चुकानी पड़ेगी।”

     

    शौर्य ने फाइल के आखिरी पन्ने पर एक नाम देखा।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “ये… विक्रम?”

     

    रघुवीर ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    शौर्य को सब याद आने लगा।

     

    विक्रम उसके पिता का पुराना बिजनेस पार्टनर था। बचपन में वह कई बार उनके घर आता था। शौर्य उसे हमेशा अपने पिता का बहुत अच्छा दोस्त समझता था।

     

    “लेकिन वो तो हमारे परिवार के साथ हमेशा अच्छा रहा।”

     

    रघुवीर ने कहा, “यही तो उसकी सबसे बड़ी चाल थी।”

     

    उसी समय पीछे से ताली बजने की आवाज आई।

     

    ताली…

     

    ताली…

     

    तीनों ने पीछे देखा।

     

    विक्रम वहां खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    “बहुत अच्छा। आखिरकार तुम लोगों ने सच ढूंढ ही लिया।”

     

    शौर्य उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “आपने मेरे पापा को फंसाया।”

     

    विक्रम ने कहा, “तुम्हारे पिता बहुत भरोसा करते थे। और भरोसा करने वाले लोग अक्सर सबसे आसानी से धोखा खा जाते हैं।”

     

    शौर्य गुस्से में था, लेकिन उसने खुद को संभाला।

     

    “आपने अनाया के पिता की जिंदगी भी बर्बाद कर दी।”

     

    “मुझे अपना फायदा देखना था।”

     

    कबीर ने गुस्से से कहा, “आपको शर्म नहीं आती?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “शर्म से पैसा नहीं मिलता।”

     

    शौर्य ने फाइल उठाकर कहा, “लेकिन अब आपका सच सबके सामने आएगा।”

     

    विक्रम ने कहा, “तुम्हारे पास सबूत हैं, लेकिन क्या तुम साबित कर पाओगे?”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “इस बार मैंने नादानी नहीं की।”

     

    रघुवीर ने अपने फोन में रिकॉर्डिंग दिखाई।

     

    उसने विक्रम की पूरी बात रिकॉर्ड कर ली थी।

     

    विक्रम का चेहरा उतर गया।

     

    “तुमने ये सब रिकॉर्ड किया?”

     

    रघुवीर बोला, “हां। इतने साल डरने के बाद अब सच बोलने की हिम्मत आ गई है।”

     

    विक्रम पीछे हटने लगा।

     

    लेकिन शौर्य ने कहा, “अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”

     

    कुछ ही समय बाद पूरा मामला जांच के सामने पहुंचा।

     

    पुराने दस्तावेज और रिकॉर्डिंग ने सारी सच्चाई सामने ला दी।

     

    विक्रम के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई।

     

    शौर्य के पिता पर लगे सारे पुराने आरोप भी झूठे साबित हुए।

     

    जब शौर्य घर पहुंचा और अपनी मां को पूरी बात बताई, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम्हारे पापा आज होते तो तुम पर गर्व करते।”

     

    शौर्य ने मां को गले लगा लिया।

     

    “मां, मैंने बस उनका नाम साफ किया है।”

     

    मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू बदल गया है शौर्य।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “इतना भी नहीं।”

     

    तभी रिया बाहर से चिल्लाई—

     

    “मां! भैया ने फिर से रसोई में दूध गिरा दिया!”

     

    शौर्य ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कबीर जोर से हंसने लगा।

     

    “देखा? मैंने कहा था, नादानियां खत्म नहीं हुईं।”

     

    शौर्य ने कहा, “वो गलती से हुआ था।”

     

    रिया बोली, “भैया की हर गलती गलती से ही होती है।”

     

    पूरा घर हंसी से भर गया।

     

    कुछ दिनों बाद अनाया ने पुराने घर को दोबारा ठीक करवाने का फैसला किया।

     

    वह घर अब डरावना नहीं लगता था।

     

    वहीं एक छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू की गई, जहां आसपास के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाया जाने लगा।

     

    शौर्य भी रोज वहां मदद करने जाता।

     

    एक दिन अनाया ने उससे कहा, “अगर तुम उस दिन मेरी मदद करने नहीं आते, तो शायद मुझे अपने पिता का सच कभी नहीं पता चलता।”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस रास्ता दिखाने आया था।”

     

    अनाया बोली, “तुम हमेशा ऐसे ही कहते हो। पहले फूलदान तोड़ते हो, फिर साइकिल ठीक करते हो और आखिर में लोगों की जिंदगी का राज खोज निकालते हो।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “क्या करूं? मेरी नादानियां ही ऐसी हैं।”

     

    कबीर पास खड़ा सुन रहा था।

     

    उसने कहा, “एक बात माननी पड़ेगी। तेरी नादानियों ने इस बार बहुत अच्छा काम किया।”

     

    शौर्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अब मैं पहले जैसा नहीं रहूंगा।”

     

    कबीर ने पूछा, “मतलब?”

     

    “अब कोई भी काम करने से पहले दो बार सोचूंगा।”

     

    उसी वक्त रिया वहां पहुंची।

     

    “भैया, मां ने कहा है कि घर जाते समय सब्जियां लेते आना।”

     

    शौर्य बोला, “ठीक है।”

     

    रिया ने कहा, “और इस बार पैसे मत खो देना।”

     

    कबीर हंसने लगा।

     

    शौर्य ने झुंझलाकर कहा, “एक बार पैसे गिरे थे बस!”

     

    रिया बोली, “तीन बार।”

     

    शौर्य चुप हो गया।

     

    अनाया और कबीर दोनों हंस पड़े।

     

    शौर्य ने आसमान की तरफ देखा।

     

    उसकी जिंदगी में बहुत कुछ बदल चुका था।

     

    पहले वह अपनी नादानियों को सिर्फ अपनी कमजोरी समझता था। लेकिन अब उसे पता था कि गलती करना बुरा नहीं, गलती से सीखना जरूरी है।

     

    उसकी जल्दबाजी ने उसे कई बार मुसीबत में डाला था, लेकिन उसी ने उसे अनाया से मिलाया, पुराने राज तक पहुंचाया और उसके पिता का नाम साफ करने का मौका दिया।

     

    अब शौर्य पहले जैसा लापरवाह नहीं था।

     

    वह जिम्मेदारी समझने लगा था।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान और उसकी मासूम नादानियां अब भी उसके साथ थीं।

     

    शाम को घर लौटते समय उसने रास्ते में एक छोटे बच्चे को गिरा हुआ देखा।

     

    वह तुरंत उसकी मदद करने दौड़ा।

     

    कबीर ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    • “शौर्य! पहले देख लेना कि इस बार किसी मुसीबत में तो नहीं कूद रहा!”

     

    शौर्य हंसते हुए बोला—

     

    “मुसीबत हो या मदद… अगर किसी को मेरी जरूरत होगी, तो मैं जरूर जाऊंगा।”

     

    और वह बच्चे को उठाकर उसके घर की तरफ चल पड़ा।

     

    शौर्य की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई थी।

     

    क्योंकि उसकी नादानियां अभी बाकी थीं…

     

    समाप्त।